Nayi Dhara Radio
Pratidin Ek Kavita
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
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Último episódio
11 de jul de 2026
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Episódios
Nadiyaan | Kedarnath Singh 18.05.2023 3:53
नदियाँ - केदारनाथ सिंह वे हमें जानती हैं जैसे जानती हैं वे अपनी मछलियों की बेचैनी अपने तटों का तापमान जो कि हमीं हैं बस हमीं भूल गए हैं हमारे घर कभी उनका भी आना-जाना था उनकी नसों में बहता है पहाड़ों का खून जिसमे थोड़ा सा खून हमारा भी शामिल है और गरम-गरम दूध टपकता हुआ भूरे दरख्तों की छाल से पता लगा लो दरख्तों की छाल और हमारी त्वचा का गोत्र एक ही है परछाइयां भी असल में नदियाँ ही हैं हमीं से फूटकर हमार...
Ho Sakta Hai | Ashok Vajpeyi 17.05.2023 2:54
हो सकता है - अशोक वाजपेयी हो सकता है, इस बार हम असमय आ गए हों हर समय कुछ ना कुछ का अंत हो रहा होता है और उसी समय कुछ ना कुछ का आरंभ भी ऐसा लग सकता है कि अंत ही आरंभ है और आरंभ ही अंत है ठीक-ठीक समय तय कर पाना मुश्किल है क्योंकि हर आना अंत है, आरंभ भी जब मनुष्य अपने एकांत में विलप रहा होता है, तब हरितिमा बाहर खिलखिला रही होती है फूलों को कतई ख़बर नहीं कि मनुष्य के आंसू क्या होते हैं प्रकृति ना हँ...
Auratein | Ramashankar Yadav Vidrohi 16.05.2023 4:29
औरतें - रमाशंकर यादव विद्रोही कुछ औरतों ने अपनी इच्छा से कुएँ में कूदकर जान दी थी, ऐसा पुलिस के रिकार्डों में दर्ज है। और कुछ औरतें चिता में जलकर मरी थीं, ऐसा धर्म की किताबों में लिखा है। मैं कवि हूँ, कर्ता हूँ, क्या जल्दी है, मैं एक दिन पुलिस और पुरोहित, दोनों को एक ही साथ औरतों की अदालत में तलब कर दूँगा, और बीच की सारी अदालतों को मंसूख कर दूँगा। मैं उन दावों को भी मंसूख कर दूँगा, ...
Marna Hai Ye To Tai Hai | Naresh Saxena 15.05.2023 1:53
मरना है ये तो तय है - नरेश सक्सेना मरना है ये तो तय है पर कब और किसके हाथ यही संचय है जो है सबसे नज़दीक उसी से सबसे ज़्यादा भय है यह इतना बुरा समय है मरना है ये तो तय है
Bas Ek Khwab | Pratibha Katiyar 14.05.2023 4:32
बस एक ख़्वाब कविता- प्रतिभा कटियार स्वर- शुबा सुभाष रावत पूरे शहर में तितलियां उड़ती फिर रही हैं. रंग बिरंगी तितलियां, छोटी बड़ी तितलियां. खूबसूरत तितलियां. आज शहर को अचानक क्या हो गया है? पूरा शहर तितलियों से भरा है. हर कोई तितलियों के पीछे भाग रहा है. भागता ही जा रहा है. कोई छोटी तितली के पीछे भाग रहा है, कोई बड़ी तितली के पीछे. न कोई गाड़ी, न बस, न ऑटो. सारे ऑफिस बंद, दुकानें भी बंद. घर में कोई...
Ek Vriksh Ki Hatya | Kunwar Narayan 13.05.2023 3:08
एक वृक्ष की हत्या - कुँवर नारायण अबकी घर लौटा तो देखा वह नहीं था— वही बूढ़ा चौकीदार वृक्ष जो हमेशा मिलता था घर के दरवाज़े पर तैनात। पुराने चमड़े का बना उसका शरीर वही सख़्त जान झुर्रियोंदार खुरदुरा तना मैला-कुचैला, राइफ़िल-सी एक सूखी डाल, एक पगड़ी फूल पत्तीदार, पाँवों में फटा-पुराना जूता चरमराता लेकिन अक्खड़ बल-बूता धूप में बारिश में गर्मी में सर्दी में हमेशा चौकन्ना अपनी ख़ाकी वर्दी म...
Itne Bhale Nahi Ban Jana | Viren Dangwal | Varun Grover 12.05.2023 2:47
इतने भले नहीं बन जाना साथी - वीरेन डंगवाल इतने भले नहीं बन जाना साथी जितने भले हुआ करते हैं सरकस के हाथी गदहा बनने में लगा दी अपनी सारी कूवत सारी प्रतिभा किसी से कुछ लिया नहीं न किसी को कुछ दिया ऐसा भी जिया जीवन तो क्या जिया? इतने दुर्गम मत बन जाना संभव ही रह जाए न तुम तक कोई राह बनाना अपने ऊँचे सन्नाटे में सर धुनते रह गए लेकिन किंचित भी जीवन का मर्म नहीं जाना इतने चालू मत हो जाना सुन-सु...
Jo Tum Aa Jaate Ek Baar | Mahadevi Verma 11.05.2023 2:03
जो तुम आ जाते एक बार - महादेवी वर्मा जो तुम आ जाते एक बार कितनी करुणा कितने सँदेश, पथ में बिछ जाते बन पराग, गाता प्राणों का तार-तार अनुराग-भरा उन्माद-राग; आँसू लेते वे पद पखार ! जो तुम आ जाते एक बार ! हँस उठते पल में आर्द्र नयन घुल जाता ओठों से विषाद, छा जाता जीवन में वसंत लुट जाता चिर-संचित विराग; आँखें देतीं सर्वस्व वार | जो तुम आ जाते एक बार !
Pita - Uday Prakash 10.05.2023 3:15
पिता - उदय प्रकाश पिता झाड़-झंखाड़, घाटियों और पत्थरों से भरे चटियल मैदान थे। पिता सागौन, शीशम, बबूल, तेंदुओं और हिरनों से भरे बीहड़ थे। बचपन में अक्सर किसी ऊँचे टीले पर चढ़ कर मैं आस-पास के गाँवों में ललकार दिया करता था नाके के पार शहर तक में पिता का रोब था। एक-एक इमारत पर उनकी कन्नियाँ सरकी थीं। एक-एक दीवार पर उनकी उँगलियों के निशान थे। हर दरवाज़े की काठ पर उनका रंदा चला था। नाक...
Yun Safar Bhar Yaad Hai | Dr Sheoraj Singh Bechain 09.05.2023 3:01
यूँ सफ़र भर याद हैं - शिवराज सिंह बेचैन यूँ सफ़र भर याद हैं गुज़रे मुक़ामातों के लोग मेरी मजबूती तो हैं कमज़ोर हालातों के लोग दोस्त-दुश्मन, ग़ैर-अपने पास से देखे सभी यूँ तो इन्सां ही हैं आख़िर सब धर्म-जातों के लोग मैं कई सदियों से यूँ ख़ामोश था, संतप्त था मेरी जानिब से बहुत बोलें हैं बेबातों के लोग बात मंज़िल की तो करने का कोई मतलब नहीं ये तजुर्बात-ए-सफ़र लें मुझसे जो चाहते हैं लोग ये मेरा बचपन कर...
Amarphal | Arun Kamal 08.05.2023 3:11
तोते का जुठाया अमरूद दो मुझे जिसके भीतर की लामिला फूटती हो बाहर गिलहरी के दाँतों के दागवाला जामुन दो काला अंधकार के रस से भरा हुआ पक कर अपने ही उल्लास से फटता एक फल दो शरीफे का और रस के तेज वेग से जिस ईख के फटे हों पोर वह ईख दो मुझे और खूब चौड़े थन वाली गाय का दूध जिसके चलने भर से छीमियों से झरता हो दूध मुझे छप्पन व्यंजन नहीं बस एक फल दो सूर्य का लाल फल अंधकार का काला फल जिसे बस एक बार काटूँ औ...
Amrapali - Anamika 07.05.2023 6:05
आम्रपाली - अनामिका था आम्रपाली का घर मेरी ननिहाल के उत्तर ! आज भी हर पूनो की रात खाली कटोरा लिए हाथ गुज़रती है वैशाली के खण्डहरों से बौद्धभिक्षुणी आम्रपाली । अगल-बगल नहीं देखती, चलती है सीधी मानो ख़ुद से बातें करती शरदकाल में जैसे (कमण्डल-वमण्डल बनाने की ख़ातिर) पकने को छोड़ दी जाती है लतर में ही लौकी पक रही है मेरी हर मांसपेशी, खदर-बदर है मेरे भीतर का हहाता हुआ सत ! सूखती-टटाती हुई हड्डियाँ मेरी...
Apne Ghar Ki Talash Mein - Nirmala Putul 06.05.2023 2:31
अपने घर की तलाश में - निर्मला पुतुल अंदर समेटे पूरा का पूरा घर मैं बिखरी हूँ पूरे घर में पर यह घर मेरा नहीं है बरामदे पर खेलते बच्चे मेरे हैं घर के बाहर लगी नेम-प्लेट मेरे पति की है मैं धरती नहीं पूरी धरती होती है मेरे अंदर पर यह नहीं होती मेरे लिए कहीं कोई घर नहीं होता मेरा बल्कि मैं होती हूँ स्वयं एक घर जहाँ रहते हैं लोग निर्लिप्त गर्भ से लेकर बिस्तर तक के बीच कई-कई रूपों में... धरती...
Ityaadi - Rajesh Joshi 05.05.2023 3:47
कुछ लोगों के नामो का उल्लेख किया गया था जिनके ओहदे थे बाकी सब इत्यादि थे इत्यादि तादात में हमेशा ही ज्यादा होते थे इत्यादि भाव ताव कर के सब्जी खरीदते थे और खाना वाना खा कर खास लोगों के भाषण सुनने जाते थे इत्यादि हर गोष्ठियों में उपस्थिति बढ़ाते थे इत्यादि जुलूस में जाते थे तख्तियां उठाते थे नारे लगाते थे इत्यादि लम्बी लाइनों में लग कर मतदान करते थे उन्हें लगातार ऐसा भ्रम दिया गया था कि वो ही इस लोक...
Mallikarjun Mansoor | Ashok Vajpeyi 04.05.2023 2:15
मल्लिकार्जुन मंसूर - अशोक वाजपेयी मल्लिकार्जुन मंसूर अपने भरे पर फिर भी सीधे बुढ़ापे में हलका -सा झुककर रखते हैं कल के कंधे पर पर अपना हाथ ठिठककर सुलगाते हैं अपनी बीड़ी चल पड़ते हैं फिर किसी अप्रत्याशित पड़ाव की ओर अपने लिए कुछ नहीं बटोरते उनके संत-हाथ सिर्फ लुटाते चलते हैं सब कुछ गुनगुनाते चलते हैं पंखुरी-पंखुरी सारा संसार ईश्वर आ रहा होता घूमने इसी रास्ते तो पहचान न पाता कि वह स्वयं है या मल...
Sainik Pati Ke Prati | Kalyani Sen | Dr Deoshankar Naveen 03.05.2023 3:12
सैनिक पति के प्रति - कल्याणी सेन तुम फ़ौजी वर्दी में सजे हुए घर आये और तुमने अपनी माँ से कहा - कल सुबह चला जाऊँगा पता नहीं बन्दूक, राइफ़लों के जंगल से कब लौट कर आऊँगा तो मैंने लाल फूलों की माला तुम्हें नहीं पहनाई मैंने चन्दन तिलक तुम्हें नहीं लगाया नहीं की तुम्हारी आरती-वंदना या तुम्हारे सकुशल लौट आने की पूजा और प्रार्थना बिना पते-ठिकाने की आती हैं तुम्हारी चिट्ठियाँ सीमा पर बंद है युद्...
Chait Ki Chaupahi | Dinesh Kumar Shukla 02.05.2023 5:29
चैत की चौपही - दिनेश कुमार शुक्ल दिन नेवर्तों के महीना चैत का है पड़ चले फीके मगर रह-रह दहकते हैं अभी तक रंग होली के हवा के तेवर जरा बदले हुए हैं और गाढ़ी हो चली है धूप फसल के पकने का मौसम आ गया पर लॉक अब तक हरी है इस बार भुस तो बहुत होगा किन्तु दाने कम पड़ेंगे बालियों में मगर कोई क्या करे! दिन नेवर्तों के महीना चैत का है चौपही में सज सँवर कर स्वाँग निकलेंगे, जग रही है रूप-रूपक की वो दिल-अंगेज दुन...
Bahamuni | Nirmala Putul 01.05.2023 2:54
बहामुनी - निर्मला पुतुल तुम्हारे हाथों बने पत्तल पर भरते हैं पेट हज़ारों पर हज़ारों पत्तल भर नहीं पाते तुम्हारा पेट कैसी विडम्बना है कि ज़मीन पर बैठ बुनती हो चटाईयाँ और पंखा बनाते टपकता है तुम्हारे करियाये देह से टप....टप...पसीना...! क्या तुम्हें पता है कि जब कर रही होती हो तुम दातुन तब तक कर चुके होते हैं सैकड़ों भोजन-पानी तुम्हारे ही दातुन से मुँह-हाथ धोकर? जिन घरों के लिए बनाती हो झाड़ू उन्हीं...
Naye Ilake Mein |Arun Kamal 30.04.2023 2:56
इस नए बसते इलाके में जहाँ रोज़ बन रहे हैं नये-नये मकान मैं अक्सर रास्ता भूल जाता हूँ धोखा दे जाते हैं पुराने निशान खोजता हूँ ताकता पीपल का पेड़ खोजता हूँ ढहा हुआ घर और ज़मीन का खाली टुकड़ा जहाँ से बाएँ मुड़ना था मुझे फिर दो मकान बाद बिना रंग वाले लोहे के फाटक का घर था इकमंज़िला और मैं हर बार एक घर पीछे चल देता हूँ या दो घर आगे ठकमकाता यहाँ रोज़ कुछ बन रहा है रोज़ कुछ घट रहा है यहाँ स्मृति का भरोसा...
Aane Walon Se Ek Sawaal | Bharatbhushan Agrawal 29.04.2023 3:01
आने वालों से एक सवाल - भारतभूषण अग्रवाल तुम, जो आज से पूरे सौ वर्ष बाद मेरी कविताएँ पढ़ोगे तुम मेरी धरती की नई पौध के फूल तुम, जिनके लिए मेरा तन-मन खाद बनेगा तुम, जब मेरी इन रचनाओं को पढ़ोगे तो तुम्हें कैसा लगेगा : इस का मेरे मन में बड़ा कौतूहल है। बचपन में तुम्हें हिटलर और गांधी की कहानियाँ सुनाई जाएँगी उस एक व्यक्ति की जिसने अपने देशवासियों को मोह की नींद सुला कर सारे संसार में आग लगा...
Besan Ki Saundhi Roti Par | Nida Fazli 28.04.2023 2:05
बेसन की सोंधी रोटी पर - निदा फ़ाज़ली बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ , याद आता है चौका-बासन, चिमटा फुँकनी जैसी माँ । बाँस की खुर्री खाट के ऊपर हर आहट पर कान धरे , आधी सोई आधी जागी थकी दुपहरी जैसी माँ । चिड़ियों के चहकार में गूँजे राधा-मोहन अली-अली , मुर्गे की आवाज़ से खुलती, घर की कुंड़ी जैसी माँ । बीवी, बेटी, बहन, पड़ोसन थोड़ी-थोड़ी सी सब में , दिन भर इक रस्सी के ऊपर चलती नटनी जैसी मां ।...
Aara Machine | Vishwanath Prasad Tiwari 27.04.2023 2:29
आरा मशीन - विश्वनाथ-प्रसाद-तिवारी चल रही है वह इतने दर्प में कि चिनगारियाँ छिटकती हैं उससे दौड़े आ रहे हैं अगल-बगल के यूकिलिप्टस और हिमाचल के देवदारु उसके आतंक में खिंचे हुए दूर-दूर अमराइयों में पक्षियों का संगीत गायब हो गया है गुठलियाँ बाँझ हो गई हैं उसकी आवाज से मेरा छोटा बच्चा देख रहा है उसे कौतुक से कि कैसे चलती है वह कैसे अपने आप एक लकड़ी दूसरी को ठेलकर आगे निकल जाती है और अपना कलेजा निकालकर...
Baarish | Nemichandra Jain 26.04.2023 3:10
बारिश - नेमिचंद्र जैन बारिश सुबह हुई थी जब फुहारों से नहाए थे पेड़ घर-द्वार बच्चे लोगों के मन और अब शाम को पश्चिम में रंगों का मेला भरा है लाल और सुनहरे की कितनी रंगते हैं ऊदे-साँवले बादलों को लपेटे कमरे में उमस के बावजूद बाहर हवा में सरसराहट है तरावट भरी छतों पर बच्चे नौजवान और अधेड़ भी पतंगें उड़ा रहे हैं चारों तरफ़ किलकारियाँ, खिलखिलाहट, भाग-दौड़ पतंगें कटने या काटने की सनसनी ह...
Adha Chand | Naresh Saxena 25.04.2023 2:36
पूरे चाँद के लिए मचलता है आधा समुद्र आधा चांद मांगता है पूरी रात पूरी रात के लिए मचलता है आधा समुद्र आधे चांद को मिलती है पूरी रात आधी पृथ्वी की पूरी रात आधी पृथ्वी के हिस्से में आता है पूरा सूर्य आधे से अधिक बहुत अधिक मेरी दुनिया के करोड़ों-करोड़ लोग आधे वस्त्रों से ढांकते हुए पूरा तन आधी चादर में फैलाते हुए पूरे पांव आधे भोजन से खींचते पूरी ताकत आधी इच्छा से जीते पूरा जीवन आधे इलाज की देते पूरी...
Achcha Laga | Ramdarash Mishra 24.04.2023 3:35
'अच्छा लगा' - रामदरश मिश्र आज धरती पर झुका आकाश तो अच्छा लगा सिर किये ऊँचा खड़ी है घास तो अच्छा लगा आज फिर लौटा सलामत राम कोई अवध में हो गया पूरा कड़ा बनवास तो अच्छा लगा था पढ़ाया मांज कर बरतन घरों में रात-दिन हो गया बुधिया का बेटा पास तो अच्छा लगा लोग यों तो रोज़ ही आते रहे, आते रहे आज लेकिन आप आये पास तो अच्छा लगा क़त्ल, चोरी, रहज़नी व्यभिचार से दिन थे मुखर चुप रहा कुछ आज का दिन ख़ास तो अच्छा ल...
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