Nayi Dhara Radio
Pratidin Ek Kavita
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
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Último episódio
11 de jul de 2026
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Episódios
Phoolan Ke Liye Ek Shokgeet | Mrinal Pande 23.04.2023 2:22
फूलन के लिए एक शोकगीत - मृणाल पाण्डे सिरहाने आहिस्ता बोलेंगे लोग, तेरे नहीं मीर के क्योंकि फूलन, बिना रोए-धोए तू बस टुक से सो गई तेरे सिरहाने पैताने बस अब एक शोर है नेता, अभिनेता, अंग्रेज़ी में गोद लेकर तुझे फ़ोटोजेनिक बनाने वाले, सबकी वन्स मोर, वन्स मोर है सिरहाने आहिस्ता बोलेंगे लोग, तेरे नहीं मीर के बीहड़ों के सतर्क साए सरका किए थे लगातार तेरी निगाह में घायल शेरनी सी जब तू चहलकदमी किया करे थी...
Ek Ladka | Ibn-E-Insha 22.04.2023 1:49
'एक लड़का' - इब्न-ए-इंशा एक छोटा-सा लड़का था मैं जिन दिनों एक मेले में पंहुचा हुमकता हुआ जी मचलता था एक-एक शै पर मगर जेब खाली थी कुछ मोल ले न सका लौट आया लिए हसरतें सैकड़ों एक छोटा-सा लड़का था मै जिन दिनों खै़र महरूमियों के वो दिन तो गए आज मेला लगा है इसी शान से आज चाहूं तो इक-इक दुकां मोल लूं आज चाहूं तो सारा जहां मोल लूं नारसाई का जी में धड़का कहां? पर वो छोटा-सा अल्हड़-सा लड़का कहां?
Gandhi Ho Ya Ghalib Ho | Sahir Ludhiyanvi | Varun Grover 21.04.2023 1:40
'गाँधी' हो या 'ग़ालिब' हो - साहिर लुधियानवी 'गाँधी' हो या 'ग़ालिब' हो ख़त्म हुआ दोनों का जश्न आओ उन्हें अब कर दें दफ़्न ख़त्म करो तहज़ीब की बात बंद करो कल्चर का शोर सत्य अहिंसा सब बकवास हम भी क़ातिल तुम भी चोर ख़त्म हुआ दोनों का जश्न आओ उन्हें अब कर दें दफ़्न वो बस्ती वो गाँव ही क्या जिस में हरीजन हो आज़ाद वो क़स्बा वो शहर ही क्या जो न बने अहमदाबाद ख़त्म हुआ दोनों का जश्न आओ उन्हें अ...
Vichar Aate Hain | Muktibodh | Dr Anunaya Chaubey 20.04.2023 2:18
विचार आते हैं - गजानन माधव मुक्तिबोध विचार आते हैं— लिखते समय नहीं, बोझ ढोते वक़्त पीठ पर सिर पर उठाते समय भार परिश्रम करत समय चाँद उगता है व पानी में झलमलाने लगता है हृदय के पानी में। विचार आते हैं लिखते समय नहीं, ...पत्थर ढोते वक़्त पीठ पर उठाते वक़्त बोझ साँप मारते समय पिछवाड़े बच्चों की नेकर फचीटते वक़्त!! पत्थर पहाड़ बन जाते हैं नक़्शे बनते हैं भौगोलिक पीठ कच्छप बन जाते हैं स...
Satpura Ke Jungle | Bhawani Prasad Mishra 19.04.2023 5:30
सतपुड़ा के जंगल - भवानीप्रसाद मिश्र सतपुड़ा के घने जंगल नींद में डूबे हुए-से, ऊँघते अनमने जंगल। झाड़ ऊँचे और नीचे चुप खड़े हैं आँख भींचे; घास चुप है, काश चुप है मूक शाल, पलाश चुप है; बन सके तो धँसो इनमें, धँस न पाती हवा जिनमें, सतपुड़ा के घने जंगल नींद में डूबे हुए-से ऊँघते अनमने जंगल। सड़े पत्ते, गले पत्ते, हरे पत्ते, जले पत्ते, वन्य पथ को ढँक रहे-से पंक दल में पले पत्ते, चलो इन प...
Bahut Se Geet | Tejender Sharma 18.04.2023 2:38
बहुत से गीत ख़्यालों में - तेजेन्द्र शर्मा बहुत से गीत ख्यालों में सो रहे थे मेरे तुम्हारे आने से जागे हैं, कसमसाए हैं जो नग़मे आजतक मैं गुनगुना न पाया था तुम्हारी बज़्म में ख़ातिर तुम्हारी गाए हैं मेरे हालात से अच्छी तरह तूं है वाकिफ़ ज़माने भर की ठोकरों के हम सताए हैं तेरे किरदार की तारीफ़ में जो लिखे थे उन्हीं नग़मों को अपने दिल में हम बसाए हैं फूल, तारे औ चांद पड़ ग़ये पुराने हैं अपने अरमानों...
Dharti Ke Is Hisse Mein | Rajesh Joshi 17.04.2023 2:56
धरती के इस हिस्से में - राजेश जोशी धरती के इस हिस्से में इस समय सबसे तेज़ आवाज़ें चिड़ियों के चेहचाने की है धरती के इस हिस्से में इस समय सबसे तेज़ आवाज़ें किनारे से लहरों के टकराने की है इस समय इस हिस्से में समुद्र किनारे की चट्टान पर अपनी लहर को एक उस्तरे की तरह घिस रहा है क्या वो आसमान की दाढ़ी बनाने की तैयारी कर रहा है ? बहुत पास हलकी हलकी सी डुबुक की छोटी छोटी आवाज़ें हैं वहां मछलियाँ मस्ता रही है...
Tumhara Pyar | Manglesh Dabral 16.04.2023 1:47
तुम्हारा प्यार - मंगलेश डबराल तुम्हारा प्यार लड्डुओं का थाल है जिसे मैं खा जाना चाहता हूँ तुम्हारा प्यार एक लाल रूमाल है जिसे मैं झंडे-सा फहराना चाहता हूँ तुम्हारा प्यार एक पेड़ है जिसकी हरी ओट से मैं तारॊं को देखता हूँ तुम्हारा प्यार एक झील है जहाँ मैं तैरता हूँ और डूब रहता हूँ तुम्हारा प्यार पूरा गाँव है जहाँ मैं होता हूँ ।
Thimpu - Bhutan | Gulzar 15.04.2023 3:31
थिंपू - भूटान | गुलज़ार पिछली बार भी आया था तो इसी पहाड़ ने नीचे खड़ा था मुझसे कहा था तुम लोगों के कद क्यूँ छोटे होते हैं ? आओ हाथ पकड़ लो मेरा पसलियों पर पांव रखो ऊपर आ जाओ आओ ठीक से चेहरा तो देखूं तुम कैसे लगते हो जैसे मेरे चींटियों को तुम अलग अलग पहचान नहीं सकते मुझको भी तुम एक ही जैसे लगते हो सब एक ही फर्क है मेरी कोई चींटी जो बदन पर चढ़ जाए तो चुटकी से पकड़ के फेक उसको मार दिया करते हो तुम म...
Mangal Gaan | Ashok Vajpayi 14.04.2023 2:11
मंगल गान - अशोक वाजपेयी नदी गा रही है नदी से नहा कर लौटता देव-शिशु गा रहा है किनारे के किसी झुरमुट में अदृश्य एक चिड़िया गा रही है नदी तक जाती पगडंडी अपनी हरी घास में धीरे से गा रही है नदी पर झलकता रक्तिम सूर्यास्त गा रहा है फ़ीकी सी आभा लिए उभरता अर्धचंद्र गा रहा है गा रहे हैं सभी एक असमाप्य मंगलकामना मुझे सुनाई नहीं देता पृथ्वी का आकाश का मंगल गान? सुनता हूँ विलाप,चीख पुकार, चीत्कार सुनाई नहीं...
Parvaah | Jacinta Kerketta 13.04.2023 1:33
परवाह | जसिंता केरकेट्टा माँ एक बोझा लकड़ी के लिए क्यों दिन भर जंगल छानती, पहाड़ लाँघती, देर शाम घर लौटती हो? माँ कहती है : जंगल छानती, पहाड़ लाँघती, दिन भर भटकती हूँ सिर्फ़ सूखी लकड़ियों के लिए। कहीं काट न दूँ कोई ज़िंदा पेड़!
Kate Haath | Ashok Chakradhar 12.04.2023 7:20
कटे हाथ | अशोक चक्रधर बगल में एक पोटली दबाए एक सिपाही थाने में घुसा और सहसा थानेदार को सामने पाकर सैल्यूट मारा थानेदार ने पोटली की तरफ निहारा सैल्यूट के झटके में पोटली भिंच गई और उसमें से एक गाढी-सी कत्थई बूंद रिस गई थानेदार ने पूछा: 'ये पोटली में से क्या टपक रहा है ? क्या कहीं से शरबत की बोतलें मारके आ रहा है ? सिपाही हडबढाया , हुजूर इसमें शरबत नहीं है शरबत नहीं है तो घबराया क्यों है, हद है...
Aagman | Dinesh Kumar Shukla 11.04.2023 4:01
आगमन / दिनेश कुमार शुक्ल जंगी बेड़ों पर नहीं न तो दर्रा-खैबर से आयेंगे इस बार तुम्हारे भीतर से वे धन-धरती ही नहीं तुम्हारा मर्म, तुम्हारे सपने भी वे छीनेंगे इस बार, वे तुम सबके रक्त पसीने और आँसुओं का बदलेंगे रंग तुम्हारी दृष्टि तुम्हारा स्वाद तुम्हारी खाल तुम्हारी चाल-ढाल का भी बदलेगे ढंग, बीजों के अंकुरण और जीवों के गर्भाधान नियंत्रित होंगे उनके कानूनों से तुम्हें पता ही नहीं तुम्हारी कविता में...
Namaskar 2064 | Anamika 10.04.2023 3:13
नमस्कार, दो हजार चौंसठ - अनामिका नमस्कार दो हजार चौंसठ! कैसे हो? इन दिनों कहां हो? नमस्कार, पानी! नमस्कार, पीपल के पत्तो, तुमको बरफ की शकल याद है न? दूर वहां उस पहाड़ की चोटी पर उसका घर था, कभी-कभी घाटी तक आती थी- मनिहारिन-सी अपनी टोकरी उठाए: दिन-भर कहानियां सुनाती थी परियों की! कैसे तुम भूल गए उसको? नमस्कार, नदियो! दुबली कितनी हो गई हो! आंखों के नीचे पसर आए हैं साये! क्या स्वास्थ्य अच्छा नही...
Des Me Nikla Hoga Chand | Rahi Masoom Raza 09.04.2023 1:53
देश में निकला होगा चाँद - राही मासूम रज़ा हिन्दी और उर्दू के लेखक, शायर और कथाकार रही मासूम रज़ा का जन्म 1 सितंबर 1927 को उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर में हुआ था। उन्होंने बी आर चोपड़ा के कालजई शो ‘महाभारत’ के लिए कथानक और संवाद लिखे थे। हम तो हैं परदेस में देस में निकला होगा चाँद अपनी रात की छत पर कितना तन्हा होगा चाँद जिन आँखों में काजल बन कर तैरी काली रात उन आँखों में आँसू का इक क़तरा होगा चाँद रात...
Main Jhukta Hun - Rajesh Joshi 08.04.2023 2:37
मैं झुकता हूँ - राजेश जोशी राजेश जोशी साहित्य अकादमी पुरस्कृत कवि और साहित्यकार हैं। उनका जन्म 18 जुलाई 1946 को नरसिंहगढ़, मध्य प्रदेश में हुआ। प्रमुख कृतियों के लिए उन्हें शिखर सम्मान, पहल सम्मान, कैफ़ी आजमी सम्मान, शशि भूषण स्मृति नाट्य सम्मान आदि कई प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है। दरवाज़े से बाहर जाने से पहले अपने जूतों के तस्मे बाँधने के लिए मैं झुकता हूँ रोटी का कौर तोड़ने और...
Utni Door Mat Byahna Baba - Nirmala Putul 07.04.2023 5:35
उतनी दूर मत ब्याहना - निर्मला पुतुल निर्मला पुतुल हिंदी और संताली भाषा की बहुचर्चित लेखिका व कवयित्री हैं। उनका काव्य-संसार आदिवासी महिलाओं के मानवाधिकार, लैंगिक भेदभाव, उत्पीड़न और पलायन जैसे ज़रूरी मुद्दों की आवाज़ बना। निर्मला जी एक सोशल एक्टिविस्ट भी हैं और दलित, आदिवासी महिलाओं की शिक्षा एवं जागरुकता हेतु प्रयासरत रही हैं। बाबा! मुझे उतनी दूर मत ब्याहना जहाँ मुझसे मिलने जाने ख़ातिर घर की बकरि...
Mera Ghanisht Padosi - Kunwar Narayan 06.04.2023 3:16
19 सितंबर 1927 को उत्तर प्रदेश के फ़ैज़ाबाद में जन्में कुँवर नारायण समकालीन कविता के अग्रणी कवि हैं। उनका पहला कविता-संग्रह ‘चक्रव्यूह’ 1956 में प्रकाशित हुआ था। 1959 में उन्हें अज्ञेय के संपादन में प्रकाशित ‘तीसरा सप्तक’ में शामिल किया गया। 15 नवंबर 2017 में लखनऊ में उनका निधन हुआ। मेरा घनिष्ठ पड़ोसी - कुँवर नारायण मेरा घनिष्ठ पड़ोसी है एक पुराना पेड़ - न जाने क्या तो है उसका नाम, क्या उसकी जात...
Koi La Ke Mujhe De - Damodar Agrawal 05.04.2023 1:58
बाल- साहित्य के अग्रणी लेखक दामोदर अग्रवाल का जन्म 4 जनवरी 1932 को वाराणसी में हुआ था। उनकी प्रसिद्ध रचनाओं में आज़ादी की कहानी, चल मेरी नैया कागज वाली, प्राणों के स्वर शामिल हैं। कोई ला के मुझे दे - दामोदर अग्रवाल कुछ रंग भरे फूल कुछ खट्टे-मीठे फल, थोड़ी बाँसुरी की धुन थोड़ा जमुना का जल कोई ला के मुझे दे! एक सोना जड़ा दिन एक रूपों भरी रात, एक फूलों भरा गीत एक गीतों भरी बात- कोई ला के मुझे दे! ए...
Pani Kya Keh Raha Hai - Naresh Saxena 03.04.2023 3:57
आज की हमारी कविता है 'पानी क्या कर रहा है'। इसे लिखा है नरेश सक्सेना जी ने।सुनिए यह कविता उन्ही के आवाज़ में। इंजीनियरिंग के विद्यार्थी रहे नरेश सक्सेना जी की कविताएँ यथार्थ के धरातल से शुरू होती हैं और मानवीय भावों को टटोलती हैं। उनकी बहुत सी कविताएँ स्कूल और कॉलेज के पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं। नरेश जी को साहित्य भूषण समेत कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाज़ा गया है। कविता - आज जब पड़ रही है कड़ाके की...
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