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Pratidin Ek Kavita

Arts HI ↓ 1297 episodes

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

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Oct 21, 2026

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Episodes

Yaad | Kailash Vajpeyi 21.10.2026

याद । कैलाश वाजपेयी जहाँ में नहीं गया उन सभी देशों के वे सारे फूल मैं जिनके नाम नहीं जानता जैसे वसंत की प्रतीक्षा किए बिना खिल-खिल गए हों।

Kal Raat | Nida Fazli 20.10.2026

कल रात । निदा फ़ाज़ली कल रात वो थका हुआ चुप चुप उदास उदास सुनता रहा सड़क से गुज़रती बसों का शोर पीपल का पत्ता टूट के दीवार ढा गया आंतों का दर्द नींद की परियों को खा गया झुँझला के उस ने चाँदी का दीपक बुझा दिया आकाश को समेट के नीचे गिरा दिया फैली हुई ज़मीं को धुएँ सा उड़ा दिया फिर कुछ नहीं न खेत, न मैदाँ, न रास्ते बस इक निगाह खिड़की की रंग-जालियाँ (बस तीन चार आने की दो चार गोलियां)

Wo Zamana Guzar Gaya Kab Ka | Javed Akhtar 19.10.2026

वो ज़माना गुज़र गया कब का । जावेद अख़्तर वो ज़माना गुज़र गया कब का था जो दीवाना मर गया कब का ढूँढता था जो इक नई दुनिया लूट के अपने घर गया कब का वो जो लाया था हम को दरिया तक पार अकेले उतर गया कब का उस का जो हाल है वही जाने अपना तो ज़ख़्म भर गया कब का ख़्वाब-दर-ख़्वाब था जो शीराज़ा अब कहाँ है बिखर गया कब का

Zinda Rahein To Kya Hai | Muneer Niyazi 18.10.2026

ज़िंदा रहें तो क्या है जो मर जाएँ हम तो क्या । मुनीर नियाज़ी ज़िंदा रहें तो क्या है जो मर जाए हम तो क्या।  दुनिया में ख़ामोशी से गुज़र जाए हम तो क्या।  हस्ती ही अपनी क्या है ज़माने के सामने, एक ख़्वाब हैं जहां में बिखर जाए हम तो क्या।  अब कौन मुंतज़िर (इंतज़ार करने वाला) है हमारे लिये वहाँ, शाम आ गई है लौट के घर जाएँ हम तो क्या।  दिल की ख़लिश तो साथ रहेगी तमाम उम्र, दरिया-ए-ग़म के पार उतर जाएँ हम...

Nayi Sanskriti | Doodhnath Singh 17.10.2026

नई संस्कृति । दूधनाथ सिंह आसमान में बसा हुआ नगर निर्वसन हवा को नींव में चुनवा कर, आपस में टकराते, जूझते मकान। बँधे हुए कुत्तों का मुँह नोचते व्यवसायी जूतों के तल्लों में सोना चिपकाए कंधों पर लादे— मसान। बेतहाशा भागती हुई भीड़ अमर-बेलि की काली लतरों पर, और दुहरे चुटीले अँधेरे में गुँथे हुए पीली रोशनी के बियाबान। ढेर-सा सवेरा—अलकतरे से पुती किवाड़ों की फटी सनद में पिरोया-सा। भीतर एक गाए गए मौसम, एक...

Maun | Arti Abodh 16.10.2026

मौन । आरती अबोध अर्धविकसित चेतना के बहेलिए ने अव्यक्त आकांक्षाओं के मेरे मृग की हत्या कर दी जिस संग मुझे मरने का सुख भोगना था उसके न होने का संताप मेरी आत्मा में उतर आया और इस तरह प्रेम में मेरी भाषा मौन बनकर बही।

Prem Ke Baare Mein Ek Shabd Nahi | Viren Dangwal 15.10.2026

प्रेम के बारे में एक शब्द नहीं । वीरेन डंगवाल शहद के बारे में मैं एक शब्द भी नहीं बोलूँगा वह जो बहुश्रुत संकलन था सहस्र पुष्प कोषों में संचित रहस्य रस का जो न पारदर्शी न ठोस न गाढ़ा न द्रव न जाने कब एक तर्जनी की पोर से चखी थी उसकी श्यानता गई नहीं अब भी वह काकु से तालु से जीभ के बीचों-बीच से आँखों की शीतलता में भी वही प्रेम के बारे में मैं एक शब्द भी नहीं बोलूँगा।

Ghar Ek Muktibodh-Numa Kavita Hai | Kumar Divyanshu Shekhar 14.10.2026

घर एक मुक्तिबोध-नुमा कविता है ।  कुमार दिव्यनशु शेखर   कुल जमा चार लोग रहते हैं छुट्टियों में गिनती कुछ बढ़ जाती है घर एक मुक्तिबोध-नुमा कविता है। अलग-अलग अँधेरे हिस्सो में  अपनी ही प्राणवायु के बीच साँय-साँय करते लोग जोड़ रहे हैं लेखा-जोखा―'अब तक क्या किया, जीवन क्या जिया!' एक लड़का है जिसकी दाढ़ी सफेद हो रही है मरम्मत करता रहता है पहिया वर्तमान का हर बार जिस पर भूत की कील उभर आती है धुरी में भविष्य...

Kharepan Ka Ehsaas | Kanhaiya Lal Nandan 13.10.2026

खारेपन का अहसास । कन्हैयालाल नंदन खारेपन का अहसास मुझे था पहले से पर विश्वासों का दोना सहसा बिछल गया कल, मेरा एक समंदर गहरा-गहरा सा मेरी आंखों के आगे उथला निकल गया।

Khut Jayein | Nilesh Raghuvanshi 12.10.2026

खुट जाएँ । नीलेश रघुवंशी  नए साल के आगमन पर पूछा गया सिंघाड़े बेचने वाली से नए साल के बारे में क्या सोचा है तुमने सिंघाड़े बेचती स्त्री ने कहा नए साल में हम खुट जाएँ खुट जाएँ मतलब.. खुट जाएँ मतलब खुट जाएँ याने हम मर जाएँ ही ही हा हा ही हा अरे अरे ए ऐसा नहीं कहते हँसी ठसक से सिंघाड़े वाली मुश्किल से जबरिया हँसी को रोकती बोली क्यों खुटने से डरते हो ??? हम तो रोज़ खुटते हैं…

Ek Baar | Rajula Shah 11.10.2026

एक बार । राजुला शाह बह जाने देना उड़ जाने देना अपने आप को एक बार तुम भी। गुब्बारे-सा हवा के बुलबुले-सा हल्का होगा तुम्हारा मन और कहीं भी जा सकेगा बिला रोक-टोक फिर- प्रेम से इन्तज़ार में इन्तज़ार से मौन में मौन से निपट शून्य में और तुम्हें लगेगा, सबसे ताकतवर हो तुम ऊपर और ऊपर और ऊपर उठते हुए....

Chandini | Ramvilas Sharma 10.10.2026

चाँदनी । रामविलास शर्मा चाँदी की झीनी चादर-सी फैली है वन पर चाँदनी। चाँदी का झूठा पानी है यह माह-पूस की चाँदनी। खेतों पर ओस-भरा कुहरा, कुहरे पर भीगी चाँदनी; आँखों में बादल-से आँसू, हँसती है उन पर चाँदनी। दु:ख की दनिया पर बुनती है माया के सपने चाँदनी। मीठी मुस्कान बिछाती है भीगी पलकों पर चाँदनी। लोहे की हथकड़ियों-सा दु:ख, सपनों-सी झूठी चाँदनी; लोहे से दु:ख को काटे क्या सपनों-सी मीठी चाँदनी। यह चाँद...

Parcham | Kumar Ambuj 09.10.2026

परचम।  कुमार अम्बुज  वहाँ एक फूल खिला हुआ है अकेला  कोई उसे छू भी नहीं रहा है  किसी सुबह शाम में वह झर जाएगा  लेकिन देखो, वह खिला हुआ है बारिश, धूल और यातनाओं को और ऋतुओं को  जज़्ब करते हुए  एक पत्थर भी है वहाँ किसी की प्रतीक्षा में  आसपास की हर चीज़ इशारा करती है  तालाब किनारे अँधेरी झाड़ियों में चमकते हैं जुगनू  दुर्दिनों के किनारे शब्द मुझे प्यास लग आयी है और यह सपना नहीं है  जैसे पेड़ की यह छा...

Buri Aurat Ke Sapnon Mein | Kailash Manhar 08.10.2026

बुरी औरत के सपनों में । कैलाश मनहर बुरी औरत के सपनों में नहीं होता पति और चरित्र और मर्यादाएँ बन्द खिड़कियों वाला पिंजरेनुमा घर बुरी औरत के सपनों में नहीं होती बदन को धरती बनाकर धान कुटवाने वाली निर्जीव सहन-शक्ति बचपन के प्रेम को भूल जाने वाला परिवार की प्रतिष्ठा के नाम का पाखण्ड-पर्व कभी नहीं होता बुरी औरत के सपनों में दुनियादारी के घुटते हुए अँधेरे की चहारदीवारी में आत्महत्या का अनायास आदर्श नही...

Prem Ki Anivaaryata | Hemant Deolekar 07.10.2026

प्रेम की अनिवार्थता ।  हेमंत देवलेकर बहुत असंभव-से आविष्कार किए प्रेम ने और अंततः हमें मनुष्य बनाया लेकिन अस्वीकार की गहरी पीड़ा उस प्रेम के हर उपकार का ध्वंस करने पर तुली दिया जिसने सब कुछ न्यौछावर कर देने का भोलापन, तर्क न करने की सहजता और रोने की मानवीय उपलब्धि प्रेम ने हमारी ऊबड़ - खाबड़, जाहिल-सी भाषा को कविता की कला सिखाई और ज़िन्दगी के घोर कोलाहल में एकांत की दुआ मांगना संभव नहीं था प्रेम के...

Sandhya Vandana | Sumitranandan Pant 06.10.2026

सांध्य वंदना । सुमित्रानंदन पंत जीवन का श्रम ताप हरो हे! सुख सुषुमा के मधुर स्वर्ण हे! सूने जग गृह द्वार भरो हे! लौटे गृह सब श्रान्त चराचर नीरव, तरु अधरों पर मर्मर, करुणानत निज कर पल्लव से विश्व नीड प्रच्छाय करो हे! उदित शुक्र अब, अस्त भनु बल, स्तब्ध पवन, नत नयन पद्म दल तन्द्रिल पलकों में, निशि के शशि! सुखद स्वप्न वन कर विचरो हे!

Aaj Shaam Hai Bahut Udaas | Bhagwati Charan Verma 05.10.2026

आज शाम है बहुत उदास । भगवतीचरण वर्मा आज शाम है बहुत उदास केवल मैं हूँ अपने पास । दूर कहीं पर हास-विलास दूर कहीं उत्सव-उल्लास दूर छिटक कर कहीं खो गया मेरा चिर-संचित विश्वास । कुछ भूला सा और भ्रमा सा केवल मैं हूँ अपने पास एक धुन्ध में कुछ सहमी सी आज शाम है बहुत उदास । एकाकीपन का एकान्त कितना निष्प्रभ, कितना क्लान्त । थकी-थकी सी मेरी साँसें पवन घुटन से भरा अशान्त, ऐसा लगता अवरोधों से यह अस्तित्व स्वय...

Pin Bahut Saare | Kunwar Bechain 04.10.2026

पिन बहुत सारे। कुँअर बेचैन जिंदगी का अर्थ मरना हो गया है और जीने के लिये हैं दिन बहुत सारे । इस समय की मेज़ पर रक्खी हुई जिंदगी है 'पिन-कुशन' जैसी दोस्ती का अर्थ चुभना हो गया है और चुभने के लिए हैं पिन बहुत सारे। निम्न-मध्यमवर्ग के परिवार की अल्पमासिक आय-सी है जिंदगी वेतनों का अर्थ चुकना हो गया है और चुकने के लिए हैं ऋण बहुत सारे।

Baaghi Biyabaan Auratein | Aishwarya Tiwari 03.10.2026

बागी बियाबान औरतें।  ऐश्वर्या तिवारी   लोग कहते हैं वो औरत है ही कहाँ, ज़्यादा  सही शब्द है आफ़त। उसके गले में कोई मंगलसूत्र नहीं, एक सूखी नदी लटकी है जिस पर कभी किसी ने नाव चलाने की ज़िद की थी और आधे में ही डर गया। वो हँसती है तो लगता है जैसे किसी पुराने मकान की दीवार अचानक गिर पडी हो - लोग भागते हैं मलबा बचाने, वो बस अपनी हँसी से धूल झाड़ती है। उसकी देह पर कपड़े कम हैं, किस्से ज़्यादा। हर तह से को...

Pyaar | Sarveshwar Dayal Saxena 02.10.2026

प्यार । सर्वेश्वरदयाल सक्सेना इस पेड में कल जहाँ पत्तियाँ थीं आज वहाँ फूल हैं जहाँ फूल थे वहाँ फल हैं जहाँ फल थे वहाँ संगीत के तमाम निर्झर झर रहे हैं उन निर्झरों में जहाँ शिला खंड थे वहाँ चाँद तारे हैं उन चाँद तारों में जहाँ तुम थीं वहाँ आज मैं हूँ और मुझमें जहाँ अँधेरा था वहाँ अनंत आलोक फैला हुआ है लेकिन उस आलोक में हर क्षण उन पत्तियों को ही मैं खोज रहा हूँ जहाँ से मैंने- तुम्हें पाना शुरु किया थ...

Mera Uska Parichay Itna | Ansar Kambari 01.10.2026

मेरा उसका परिचय इतना । अंसार कम्बरी मेरा उसका परिचय इतना वो नदिया है, मैं मरुथल हूँ। उसकी सीमा सागर तक है मेरा कोई छोर नहीं है। मेरी प्यास चुरा ले जाए ऐसा कोई चोर नहीं है। मेरा उसका इतना नाता वो ख़ुशबू है, मैं संदल हूँ। उस पर तैरें दीप शिखाएँ सूनी सूनी मेरी राहें। उसके तट पर भीड़ लगी है कौन करेगा मुझसे बातें। मेरा उसका अंतर इतना वो बस्ती है, मैं जंगल हूँ। उसमें एक निरन्तरता है मैं तो स्थिर हूँ जनम...

Idhar Se Dekhein To Apna Makaan Lagta Hai | Shamsur Rehman Farooqi 30.09.2026

इधर से देखें तो अपना मकान लगता है । शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी इधर से देखें तो अपना मकान लगता है इक और ज़ाविए से आसमान लगता है जो तुम हो पास तो कहता है मुझ को चीर के फेंक वो दिल जो वक़्त-ए-दुआ बे-ज़बान लगता है शुरू-ए-इश्क़ में सब ज़ुल्फ़ ओ ख़त से डरते हैं अख़ीर उम्र में इन ही में ध्यान लगता है सरकने लगती है तब ही क़दम तले से ज़मीन जब अपने हाथ में सारा जहान लगता है दो चार घाटियाँ इक दश्त कुछ नदी नाले बस इ...

Hawa Jab Aayegi | Champa Vaid 29.09.2026

हवा जब आएगी | चंपा वैद  हवा जल आएगी अकेली बैठा लूँगी अपने पास चले चलेंगे हम दोनों उस कविता के पर्वत पर उड़ते, पेड़ लगाते, एक हज़ार चश्मों से एकत्रित कर जल और सूरज के प्रबल प्रकाश मैं भी धूप बटोरूँगी दिन भर हवा तुम्हारे साथ

Lehron Ka Geet | Sumitranandan Pant 28.09.2026

लहरों का गीत । सुमित्रानंदन पंत अपने ही सुख से चिर चंचल हम खिल खिल पडती हैं प्रतिपल, जीवन के फेनिल मोती को ले ले चल करतल में टलमल! छू छू मृदु मलयानिल रह रह करता प्राणों को पुलकाकुल; जीवन की लतिका में लहलह विकसा इच्छा के नव नव दल! सुन मधुर मरुत मुरली की ध्वनी गृह-पुलिन नांध, सुख से विह्वल, हम हुलस नृत्य करतीं हिल हिल खस खस पडता उर से अंचल! चिर जन्म-मरण को हँस हँस कर हम आलिंगन करती पल पल, फिर फिर अस...

Tabla | Vivek Nirala 27.09.2026

तबला ।  विवेक निराला   किसी की खाल है जो खींच कर मढ़ दी गई है मढ़ी हुई है मृतक की जीवन्त भाषा। मृतक के परिजनों का विलाप कस गया है इस खाल के साथ। वादक की फूँक से नहीं खाल के मालिक की आख़िरी साँस से बज रही है वह बाँसुरी जो सँगत पर है। धा-धा-धिन-धा और तिरकिट के पीछे एक विषादी स्वर है।

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