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Pratidin Ek Kavita

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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

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11 de jul de 2026

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Episódios

Bansuri Morpankh | Nandkishore Acharya 12.06.2023

बाँसुरी: मोरपाँख - नंदकिशोर आचार्य बुरा तो नहीं मानोगे यदि मुझे अब तुम्हारी बाँसुरी बने रहना स्वीकार नहीं। यह नहीं कि मैं उपेक्षित हुआ बल्कि अधरों पर तुम्हारे सदा सज्जित रहा, किन्तु मेरा कब रहा संगीत वह जो मेरे ही रन्ध्र-रन्ध्र से बहा ? मुझे से तो अच्छी रही वह मोरपाँख जो तुम्हारे मुकुट पर चढ़ी और न भी चढ़ती पर जिस का सौन्दर्य उस का अपना था। यह अन्तर क्या कम है कि तुम्हारा संगीत मेरी विवशता है और म...

Dharm hai | Gopaldas Neeraj 11.06.2023

धर्म है - गोपालदास "नीरज" जिन मुश्किलों में मुस्कुराना हो मना, उन मुश्किलों में मुस्कुराना धर्म है। जिस वक़्त जीना गैर मुमकिन सा लगे, उस वक़्त जीना फर्ज है इंसान का, लाजिम लहर के साथ है तब खेलना, जब हो समुन्द्र पे नशा तूफ़ान का जिस वायु का दीपक बुझना ध्येय हो उस वायु में दीपक जलाना धर्म है। हो नहीं मंजिल कहीं जिस राह की उस राह चलना चाहिए इंसान को जिस दर्द से सारी उम्र रोते कटे वह दर्द पाना है जरूर...

Mat Kaho Akash Me | Dushyant Kumar 10.06.2023

मत कहो, आकाश में कुहरा घना है - दुष्यंत कुमार मत कहो, आकाश में कुहरा घना है, यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है । सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह से, क्या करोगे, सूर्य का क्या देखना है । इस सड़क पर इस क़दर कीचड़ बिछी है, हर किसी का पाँव घुटनों तक सना है । पक्ष औ' प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं, बात इतनी है कि कोई पुल बना है रक्त वर्षों से नसों में खौलता है, आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है । हो गई हर घाट पर प...

Joote | Naresh Saxena | Varun Grover 09.06.2023

 जूते  - नरेश सक्सेना जिन्होंने खुद नहीं कीं अपनी यात्राएँ, दूसरों की यात्रा के साधन बने रहे  एक जूते का जीवन जिया जिन्होंने   यात्रा के बाद उन्हें छोड़ दिया गया,  घर के बाहर।

Prem Ki Jagah Anishchit Hai | Vinod Kumar Shukla 08.06.2023

प्रेम की जगह अनिश्चित है -  विनोद कुमार शुक्ल प्रेम की जगह अनिश्चित है यहाँ कोई नहीं होगा की जगह भी नहीं है। आड़ की ओट में होता है कि अब कोई नहीं देखेगा पर सबके हिस्‍से का एकांत और सबके हिस्‍से की ओट निश्चित है। वहाँ बहुत दोपहर में भी थोड़ा-सा अंधेरा है जैसे बदली छाई हो बल्कि रात हो रही है और रात हो गई हो। बहुत अंधेरे के ज्‍यादा अंधेरे में प्रेम के सुख में पलक मूंद लेने का अंधकार है अपने हिस्‍से क...

Bejagah | Anamika 07.06.2023

बेजगह - अनामिका  “अपनी जगह से गिर कर  कहीं के नहीं रहते  केश, औरतें और नाख़ून”—  अन्वय करते थे किसी श्लोक को ऐसे  हमारे संस्कृत टीचर।  और मारे डर के जम जाती थीं  हम लड़कियाँ अपनी जगह पर।  जगह? जगह क्या होती है?  यह वैसे जान लिया था हमने  अपनी पहली कक्षा में ही।  याद था हमें एक-एक क्षण  आरंभिक पाठों का—  राम, पाठशाला जा!  राधा, खाना पका!  राम, आ बताशा खा!  राधा, झाड़ू लगा!  भैया अब सोएगा  जाकर बिस्...

Shakkar Si Yaad | Suryabala 06.06.2023

शक्कर सी याद -  सूर्यबाला   धुली-धुली शक्कर सी याद- तन-मन में रच रही मिठास। आओ सब, बैठो मेरे पास सुनो कहानी.... न राजा, न रानी.... न मोती, न माणिक बस एक अधफूटे जीने और उखड़े पलस्तर वाले घर की- अधफूटी मुंडेरों से  सर्र-सर्र उड़ती पतंगों की-फर-फर पतंगें,  जैसी मेरी पंचरंग चुनर.... मां ने रंगवाई, जतन से पहनाई। हल्दी-दूब, धान-पान कुमकुम से भरी मांग  कैसी तो जगर-मगर टोने-टोटके और काजल के टीके से सँवर- दे...

Baad | Damodar Khadse 05.06.2023

बाढ़ - दामोदर खड़से बाढ़ जब तोड़ती है दरवाज़े बड़े-बड़े बांधों के  तब नन्हें-नन्हें गाँव काले बादलों की नीयत समझ जाते हैं पानी का रंग दिमाग बदरंग कर जाता है पानी जीवन भी है बिजली भी पानी नहर और झील भी है पानी नाचता हुआ समंदर और मदमस्त बादल है पानी पानी, पानी यानी सबकुछ है पर जब बाढ़ आती है, पानी के विवेक पर प्रश्नचिन्ह लगा जाती है बाढ़ नदी-नालों का पानी समेट बहुमत पा जाती है और अपने आप को बहाव के हाथों सौं...

Naye Kavi ka Dukh | Kedarnath Singh 04.06.2023

नए कवि का दुख -  केदारनाथ सिंह दुख हूँ मैं एक नए हिंदी कवि का बाँधो मुझे बाँधो पर कहाँ बाँधोगे किस लय, किस छंद में? ये छोटे-छोटे घर ये बौने दरवाज़े ताले ये इतने पुराने और साँकल इतनी जर्जर आसमान इतना ज़रा-सा और हवा इतनी कम-कम नफ़रत यह इतनी गुमसुम-सी और प्यार यह इतना अकेला और गोल-मोल बाँधो मुझे बाँधो पर कहाँ बाँधोगे किस लय, किस छंद में? क्या जीवन इसी तरह बीतेगा शब्दों से शब्दों तक जीने और जीने और जी...

Belly Dancer | Dinesh Kumar Shukla 03.06.2023

बेली डान्‍सर - दिनेश कुमार शुक्ल बमाको शहर के खण्डहरों में मेरा जन्म हुआ माली के प्राचीन परास्त राजकुल में ... माँ के सूखते स्तनों से मिला मुझे मज्जा का स्वाद, जब गोद में ही थी मैं सुनी मैंने मृत्यु की पहली पदचाप क्षयग्रस्त माँ की मंद होती धड़कन में, गोद में ही लग गई लत मुझे ज़िंदा बने रहने की सूखी हुई घास, कटीली नागफनी और ठुर्राई झाड़ियों की मिट्टी ने पाला पोसा मुझे सीखा मैंने ज़हरीले साँपों को भून...

Antim Unchai | Kunwar Narayan 02.06.2023

अंतिम ऊँचाई - कुँवर नारायण कितना स्पष्ट होता आगे बढ़ते जाने का मतलब अगर दसों दिशाएँ हमारे सामने होतीं, हमारे चारों ओर नहीं। कितना आसान होता चलते चले जाना यदि केवल हम चलते होते बाक़ी सब रुका होता। मैंने अक्सर इस ऊलजलूल दुनिया को दस सिरों से सोचने और बीस हाथों से पाने की कोशिश में अपने लिए बेहद मुश्किल बना लिया है। शुरू-शुरू में सब यही चाहते हैं कि सब कुछ शुरू से शुरू हो, लेकिन अंत तक पहुँचते-पहुँचत...

Kitna Achha Hota Hai | Sarveshwar Dayal Saxena 01.06.2023

कितना अच्छा होता है -  सर्वेश्वरदयाल सक्सेना कितना अच्छा होता है एक-दूसरे को बिना जाने पास-पास होना और उस संगीत को सुनना जो धमनियों में बजता है, उन रंगों में नहा जाना जो बहुत गहरे चढ़ते-उतरते हैं। शब्दों की खोज शुरू होते ही हम एक-दूसरे को खोने लगते हैं और उनके पकड़ में आते ही एक-दूसरे के हाथों से मछली की तरह फिसल जाते हैं। हर जानकारी में बहुत गहरे ऊब का एक पतला धागा छिपा होता है, कुछ भी ठीक से जान...

Girna | Naresh Saxena 31.05.2023

गिरना - नरेश सक्सेना चीज़ों के गिरने के नियम होते हैं! मनुष्यों के गिरने के  कोई नियम नहीं होते।  लेकिन चीज़ें कुछ भी तय नहीं कर सकतीं  अपने गिरने के बारे में  मनुष्य कर सकते हैं  बचपन से ऐसी नसीहतें मिलती रहीं  कि गिरना हो तो घर में गिरो  बाहर मत गिरो  यानी चिट्ठी में गिरो  लिफ़ाफ़े में बचे रहो, यानी  आँखों में गिरो  चश्मे में बचे रहो, यानी  शब्दों में बचे रहो  अर्थों में गिरो  यही सोच कर गिरा भी...

Kitab Padkar Rona | Raghuvir Sahai 30.05.2023

किताब पढ़कर रोना - रघुवीर सहाय रोया हूँ मैं भी किताब पढ़कर के पर अब याद नहीं कि कौन-सी शायद वह कोई वृत्तांत था पात्र जिसके अनेक बनते थे चारों तरफ़ से मँडराते हुए आते थे पढ़ता जाता और रोता जाता था मैं क्षण-भर में सहसा पहचाना यह पढ़ता कुछ और हूँ रोता कुछ और हूँ दोनों जुड़ गए हैं पढ़ना किताब का और रोना मेरे व्यक्ति का लेकिन मैंने जो पढ़ा था उसे नहीं रोया था पढ़ने ने तो मुझमें रोने का बल दिया दु:ख मैंन...

Tum Likho Kavita | Damodar Khadse 29.05.2023

तुम लिखो कविता | दामोदर खडसे तुम लिखो कविता  और मैं देखूँ जी भरकर  कलम, स्याही, कागज़ पर  गुनगुनाता ज़िन्दगी का  अनगाया गीत  सफ़र के बहुत पीछे  कोई गुमनाम मोड़  और इमली के पेड़ पर  कटी हुई पतंग  कबूतरों का जत्था,  राह से उड़ती धूल  मुड़-मुड़कर ठिठकते कदम  लहराता हाथ  कुछ-कुछ क़रीबी  बहुत कुछ दूरियाँ  भीतर-बाहर उतराते  आँखों की डोरों में  किए-अनकिए की उलझन  आत्महंता सिसकन  कैसे बरगलाए कोई अपनी ही आवाज़  लिखो...

Maine Aahuti Bankar Dekha | Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya 28.05.2023

 मैंने आहुति बन कर देखा - सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ मैं कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने, मैं कब कहता हूँ जीवन-मरू नंदन-कानन का फूल बने? काँटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है, मैं कब कहता हूँ वह घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने? मैं कब कहता हूँ मुझे युद्ध में कहीं न तीखी चोट मिले? मैं कब कहता हूँ प्यार करूँ तो मुझे प्राप्ति की ओट मिले? मैं कब कहता हूँ विजय करूँ मेरा ऊँच...

Kaash Ki Pehle Likhi Jaati Ye Kavitayein | Priyadarshan 27.05.2023

काश कि पहले लिखी जातीं ये कविताएँ - प्रियदर्शन   एक वह एक उजली नाव थी जो गहरे आसमान में तैर रही थी चाँदनी की झिलमिल पतवार लेकर कोई तारा उसे खे रहा था आकाशगंगाएँ गहरी नींद में थीं अपनी सुदूर जमगग उपस्थिति से बेख़बर रात इतनी चमकदार थी कि काला आईना बन गई थी समय-समय नहीं था एक सम्मोहन था जिसमें जड़ा हुआ था यह सारा दृश्य यह प्रेम का पल था जिसका जादू टूटा तो सारे आईने टूट गए। दो वह एक झील थी जो आँखों मे...

Lautna | Vishnu Khare 26.05.2023

लौटना - विष्णु खरे उसे जहाँ छोड़ा था कभी-कभी वहाँ जाकर खड़ा हो जाता हूँ कूडे़ के जिस अम्बार को देख वह लपक कर दौड़ गया था अब वहाँ नहीं है दरअसल अब कुछ भी वहाँ उस दिन जैसा नहीं है मैंने उसे आधे दिल से पुकारा भी था कि अगर लौट आए तो उसे वापस ले जाऊँ लेकिन वह सिर्फ़ एक बार मेरी तरफ़ देख कर मुझे ऐसा लगा कि जैसे हँसता हुआ कूड़ा खोदने में जुटा रहा उसके बाद मैं चला आया लेकिन कई बार लौटा हूँ वह जगह अब एकदम...

Prajapati | Rajesh Joshi 25.05.2023

प्रजापति - राजेश जोशी चीज़ों का हूबहू दिखना अपनी ही शक्ल में  कविता में मुझे पसंद नहीं बिल्कुल  मैं चाहता हूँ मेरा फटा-पुराना जूता भी दिखे वहाँ  पूर्णिमा के पूरे चाँद की तरह  एक साबुन की तरह दिखे मेरी आत्मा  छोटी-छोटी विकृतियाँ और अंतर्विरोध भी दिखें वहाँ  फूली हुई नसों वाले राक्षसों से इतने वीभत्स और दैत्याकार  कि आसानी से की जा सके उनसे घृणा  की जा सके नफ़रत  मुझे पसंद हैं वे विदूषक जो मंच पर आन...

Kavi | Viren Dangwal 24.05.2023

कवि - वीरेन डंगवाल   मैं ग्रीष्म की तेजस्विता हूँ और गुठली जैसा छिपा शहद का ऊष्म ताप मैं हूँ वसंत में सुखद अकेलापन जेब में गहरी पड़ी मूँगफली को छाँटकर चबाता फ़ुरसत से मैं चेकदार कपड़े की क़मीज़ हूँ उमड़ते हुए बादल जब रगड़ खाते हैं तब मैं उनका मुखर ग़ुस्सा हूँ इच्छाएँ आती हैं तरह-तरह के बाने धरे उनके पास मेरी हर ज़रूरत दर्ज है एक फ़ेहरिस्त में मेरी हर कमज़ोरी उन्हें यह तक मालूम है कि कब मैं चुप होकर...

Angarey Ko Tumne Chhua | Kanhaiya Lal Nandan 23.05.2023

अंगारे को तुमने छुआ - कन्हैयालाल नंदन अंगारे को तुमने छुआ और हाथ में फफोला नहीं हुआ इतनी-सी बात पर अंगारे पर तोहमत मत लगाओ ज़रा तह तक जाओ आग भी कभी-कभी अपना धर्म निभाती है और जलने वाले की क्षमता देखकर जलाती है

Main Tumhe Phir Milungi | Amrita Pritam 22.05.2023

मैं तुम्हें फिर मिलूँगी - अमृता प्रीतम   मैं तुम्हें फिर मिलूँगी  कहाँ? किस तरह? नहीं जानती  शायद तुम्हारे तख़्ईल की चिंगारी बन कर  तुम्हारी कैनवस पर उतरूँगी  या शायद तुम्हारी कैनवस के ऊपर  एक रहस्यमय रेखा बन कर  ख़ामोश तुम्हें देखती रहूँगी  या शायद सूरज की किरन बन कर  तुम्हारे रंगों में घुलूँगी  या रंगों की बाँहों में बैठ कर  तुम्हारे कैनवस को  पता नहीं कैसे-कहाँ?  पर तुम्हें ज़रूर मिलूँगी  या शायद...

Sankhyaein | Naresh Saxena 21.05.2023

संख्याएँ - नरेश सक्सेना शब्द तो आए बहुत बाद में सँख्याएँ हमारे साथ जन्म से ही हैं गर्भ में जब निर्माण हो रहा था हमारी हड्डियों का रक्तकणों और कोशिकाओं का साथ-साथ सँख्याएँ भी निर्मित होती जा रही थीं एक हमारी देह की इकाई की वो सँख्या है जिसमें समाहित हैं सारी सँख्याएँ दो आँखों में स्थित है दो तीन है उँगलियों के तीन जड़ों में हृदय के हिस्से हैं चार और पाँच का निवास पाँच उँगलियों में है आगे की सारी सँ...

Khidkiyan | Kumar Vikal 20.05.2023

खिड़कियाँ -  कुमार विकल जिन घरों में खिड़कियाँ नहीं होतीं उनमें रहने वाले बच्चों का सूरज के साथ किस तरह का रिश्ता होता है? सूरज उन्हें उस अमीर मेहमान —सा लगता है जो किसी सुदूर शहर से कभी —कभार आता है एकाध दिन के लिए घर में रुकता है सारा वक्त माँ से हँस—हँस के बतियाता है और जाते समय उन सबकी मुठ्ठियों में कुछ रुपये ठूँस जाता है| जिन घरों में खिड़कियाँ नहीं होतीं वहाँ से धूप बाहर की दीवार से लौट जाती...

Democracy Kya Hoti Hai | Ashok Chakradhar | Varun Grover 19.05.2023

डेमोक्रेसी क्या होती है? - अशोक चक्रधर पार्क के कोने में  घास के बिछौने पर लेटे-लेटे  हम अपनी प्रियसी से पूछ बैठे—  क्यों डियर!  डेमोक्रेसी क्या होती है?  वह बोलीं—  तुम्हारे वादों जैसी होती है!  इंतज़ार में,  बहुत तड़पाती है,  झूठ बोलती है  सताती है,  तुम तो आ भी जाते हो,  ये कभी नहीं आती है!  एक विद्वान से पूछा  वह बोले—  हमने राजनीति-शास्त्र  सारा पढ़ मारा,  डेमोक्रेसी का मतलब है—  आज़ादी, समान...

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