Nayi Dhara Radio
Pratidin Ek Kavita
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
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Último episódio
11 de jul de 2026
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Episódios
Surya Dhalta Hi Nahi | Ramdarash Mishra 13.03.2024 2:14
सूर्य ढलता ही नहीं | रामदरश मिश्र | आरती जैन चाहता हूँ, कुछ लिखूँ, पर कुछ निकलता ही नहीं है दोस्त, भीतर आपके कोई विकलता ही नहीं है! आप बैठे हैं अंधेरे में लदे टूटे पलों से बंद अपने में अकेले, दूर सारी हलचलों से हैं जलाए जा रहे बिन तेल का दीपक निरन्तर चिड़चिड़ाकर कह रहे- ‘कम्बख़्त, जलता ही नहीं है!’ बदलियाँ घिरतीं, हवाएँ काँपती, रोता अंधेरा लोग गिरते, टूटते हैं, खोजते फिरते बसेरा किन्तु रह-रहकर सफ़...
Tedhi Kamar KI Auratein | Aishwarya Vijay Amrit Raj 12.03.2024 4:26
टेढ़ी कमर की औरतें | ऐश्वर्य विजय अमृत राज छः-सात साल की लड़कियाँ छोटे भाइयों/बड़े भाई के बच्चे के साथ/ सोलह साल की सालभर पुरानी कन्याएँ अपने बच्चे/जेठानी के बच्चे के साथ चालीस-साठ की दादी/नानी कमर एक तरफ निकालकर बच्चे को लटकाए कुल्हे की हड्डी से, हो जाती हैं पेड़ के किसी टेढ़े तने सी तिरछी, और ठोंस, किसी पुरानी सभ्यता की मूर्ति सी, जो टिकी-बची हो हर मौसम व समय की मार से। कमर टेढ़ी किये ये औरतें धड़फड़ा...
Qile Mein Bacche | Naresh Saxena 11.03.2024 2:07
क़िले में बच्चे | नरेश सक्सेना क़िले के फाटक खुले पड़े हैं और पहरेदार गायब ड्योढ़ी में चमगादड़ें दीवाने ख़ास में जाले और हरम बेपर्दा हैं सुल्तान दौड़ो! आज किले में भर गए हैं बच्चे उन्होंने तुम्हारी बुर्जियों, मेहराबों, खंभों और कंगूरों पर लिख दिए हैं अपने नाम कक्षाएँ और स्कूल के पते अब वे पूछ रहे हैं सवाल कि सुल्तान के घर का इतना बड़ा दरवाज़ा उसकी इतनी ऊँची दीवारें उनके चारों तरफ़ इतनी सार...
Chunav Ki Chot | Kaka Hathrasi 10.03.2024 1:27
चुनाव की चोट | काका हाथरसी हार गए वे, लग गई इलेक्शन में चोट। अपना अपना भाग्य है, वोटर का क्या खोट? वोटर का क्या खोट, ज़मानत ज़ब्त हो गई। उस दिन से ही लालाजी को ख़ब्त हो गई॥ कह ‘काका’ कवि, बर्राते हैं सोते सोते। रोज़ रात को लें, हिचकियाँ रोते रोते॥
Jo Kuch Dekha-Suna, Samjha, Likh Diya | Nirmala Putul 09.03.2024 2:28
जो कुछ देखा-सुना, समझा, लिख दिया | निर्मला पुतुल बिना किसी लाग-लपेट के तुम्हें अच्छा लगे, ना लगे, तुम जानो चिकनी-चुपड़ी भाषा की उम्मीद न करो मुझसे जीवन के ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर चलते मेरी भाषा भी रूखड़ी हो गई है मैं नहीं जानती कविता की परिभाषा छंद, लय, तुक का कोई ज्ञान नहीं मुझे और न ही शब्दों और भाषाओं में है मेरी पकड़ घर-गृहस्थी सँभालते लड़ते अपने हिस्से की लड़ाई जो कुछ देखा-सुना-भोगा ब...
Jo Mere Ghar Kabhi Nahi Ayenge | Vinod Kumar Shukla 08.03.2024 1:55
जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे | विनोद कुमार शुक्ल जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे मैं उनसे मिलने उनके पास चला जाऊँगा। एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी मेरे घर नदी जैसे लोगों से मिलने नदी किनारे जाऊँगा कुछ तैरूँगा और डूब जाऊँगा पहाड़, टीले, चट्टानें, तालाब असंख्य पेड़ खेत कभी नहीं आएँगे मेरे घर खेत-खलिहानों जैसे लोगों से मिलने गाँव-गाँव, जंगल-गलियाँ जाऊँगा। जो लगातार काम में लगे हैं मैं फ़ुरसत से नही...
Baarish Ke Kandhe Par Sar rakhta Hun 07.03.2024 2:43
बारिश के काँधे पर सिर रखता हूँ | शहंशाह आलम पीड़ा में पेड़ जब दुःख बतियाते हैं दूसरे पेड़ से मैं बारिश के काँधे पर सिर रखता हूँ अपना आदमी बमुश्किल दूसरे का दुःख सुनना पसंद करता है बारिश लेकिन मेरा दुखड़ा सुनने ठहर जाती है कभी खिड़की के पास कभी दरवाज़े पर तो कभी ओसारे में कवि होना कितना कठिन है आज के समय में और गिरहकट होना कितना आसान काम है हत्यारा होना तो और भी आसान होता है बस चाकू निकाला और घोंप...
Ek Ma Ki Bebasi | Kunwar Narayan 06.03.2024 1:55
एक माँ की बेबसी | कुँवर नारायण न जाने किस अदृश्य पड़ोस से निकल कर आता था वह खेलने हमारे साथ— रतन, जो बोल नहीं सकता था खेलता था हमारे साथ एक टूटे खिलौने की तरह देखने में हम बच्चों की ही तरह था वह भी एक बच्चा। लेकिन हम बच्चों के लिए अजूबा था क्योंकि हमसे भिन्न था। थोड़ा घबराते भी थे हम उससे क्योंकि समझ नहीं पाते थे उसकी घबराहटों को, न इशारों में कही उसकी बातों को, न उसकी भयभीत आँखों म...
Ek Ashwasti - Halki Phulki | Prem Vats 05.03.2024 4:49
एक आश्वस्ति - हल्की फुलकी | प्रेम वत्स एक हल्का घुला हुआ गुलाबीपन पंखुरियों की भाँति चिपक-सा जाता है उसके हल्के रोंयेदार गालों के दोनों उट्ठलों से जो हल्का-सा भी अप्रत्याशित होने पर उठ खड़े होते हैं खरगोशी कान जैसे प्रेम में अक्सर उसे भी तुम प्रेम ही कहो जब वह अपनी ठुड्ढी पर तड़के आए हल्के नर्म बालों को वजह-बेवजह अपनी उंगलियों से पुचकारता रहता है और ख़यालों में खोए उस महाशय से जब तुम कुछ पूछते हो ...
Amma Bachpan Ko Laut Rahi Hai | Ajay Jugran 04.03.2024 2:05
अम्मा बचपन को लौट रही है | अजेय जुगरान उठने को सहारा चाहे अम्मा बचपन को लौट रही है। चलने को सहारा चाहे अम्मा छुटपन को लौट रही है। बैठने को सहारा चाहे अम्मा शिशुपन को लौट रही है। ज़िद्द से न किनारा पाए अम्मा बालपन को लौट रही है। खाते खाना गिराए अम्मा बचपन को लौट रही है। सोने को टी वी चलाए अम्मा छुटपन को लौट रही है। नितकर्म को टालती जाए अम्मा शिशुपन को लौट रही है। बातों को दोहराती जाए अम्मा बालपन क...
Bhookhdaan | Mehboob 03.03.2024 2:25
भूखदान | महबूब शांत अंधेरे सन्नाटे के बीच चीखती गुजरती एक आवाज़ लोहे के लोहे से टकराने की या उस भूखे पेट के गुर्राने की जो लेटा है उसी लोहे के सड़क किनारे किसी भिनभिनाती-सी जगह पर खेल रही हैं कुछ मक्खियाँ उसके मुख पर जैसे वो जानती हों कि गरीब यहाँ सिर्फ खेलने की चीज है इस बीच कुछ लोग गुज़रे उधर से उसे निहारते हुए कोई हँसा कोई मुस्कुराया किसी को घृणा हुई किसी ने अफसोस जताया आखिर करते भी क्य...
Ye Kaisi Vivashta Hai? | Kunwar Narayan 02.03.2024 1:35
यह कैसी विवशता है? | कुँवर नारायण यह कैसी विवशता है— किसी पर वार करो वह हँसता रहता या विवाद करता। यह कैसी पराजय है— कहीं घाव करें रक्त नहीं केवल मवाद बहता। अजीब वक़्त है— बिना लड़े ही एक देश का देश स्वीकार करता चला जाता अपनी ही तुच्छताओं की अधीनता! कुछ तो फ़र्क़ बचता धर्मयुद्ध और कीटयुद्ध में— कोई तो हार-जीत के नियमों में स्वाभिमान के अर्थ को फिर से ईजाद करता।
Kya Aapko Prem Pasand Hai | Shraddha Upadhyay 01.03.2024 1:43
क्या आपको प्रेम पसंद है ? | श्रद्धा उपाध्याय मैं पहले भी खो गई थी एक खाई की गहराई के भय में मैं नहीं सुन पाई थी झरने का संगीत शोकगीत लिखने की व्यस्तता में सूरज से आँख ना मिला पाने की निराशा में मैंने फोड़ी ही अपनी आँखें कृत्रिम रौशनियों को घूरकर अतीत के घाव जिन पर लगनी थी समय की मरहम उनको लेकर बेवक्त भागी और तोड़े अपने पैर क्या मैं हमेशा मुँह धोउंगी आँसुओं से और समाज सदा रणभूमि होगा मैं प्र...
Ma | Mamta Kalia 29.02.2024 2:26
माँ - ममता कालिया पुराने तख़्त पर यों बैठती हैं जैसे वह हो सिंहासन बत्तीसी। हम सब उनके सामने नीची चौकियों पर टिक जाते हैं या खड़े रहते हैं अक्सर। माँ का कमरा उनका साम्राज्य है। उन्हें पता है यहाँ कहाँ सौंफ की डिबिया है और कहाँ ग्रन्थ साहब कमरे में कोई चौकीदार नहीं है पर यहाँ कुछ भी बगैर इजाज़त छूना मना है। माँ जब ख़ुश होती हैं मर्तबान से निकालकर थोड़े से मखाने दे देती हैं मुट्ठी में। हम उनके कमरे...
Nritya | Nidhi Sharma 28.02.2024 2:24
नृत्य - निधि शर्मा मैं नाचती हूं, अपने दुखों के गीत पर। मैं मुस्कुराती हूं जब तुम मुझे छोड़ कर चले जाते हो। मेरे रोम रोम में बजता है विरह का संगीत। और उसमे रस घोलती है मेरे प्राणों की बांसुरी। हर दफा हर दुख के पश्चात् मैं जन्म लेती हृ। पहले से कुछ अलग, पहले से कोमल हृदय और मजबूत भावनाओं के साथ। दुःख के प्रत्येक क्षण को संजो लेती हूं अपने बालों के जूड़े में आंसुओं के मोती टांक देती हूं अपने आंचल म...
Thodi Si Umeed Chahiye | Gagan Gill 27.02.2024 1:39
थोड़ी-सी उम्मीद चाहिए | गगन गिल जैसे मिट्टी में चमकती किरण सूर्य की जैसे पानी में स्वाद भीगे पत्थर का जैसे भीगी हुई रेत पर मछली में तड़पन थोड़ी-सी उम्मीद चाहिए जैसे गूँगे के कंठ में याद आया गीत जैसे हल्की-सी साँस सीने में अटकी जैसे काँच से चिपटे कीट में लालसा जैसे नदी की तह में डूबी हुई प्यास थोड़ी-सी उम्मीद चाहिए
Sankraman | Satyam Tiwari 26.02.2024 2:22
संक्रमण | सत्यम तिवारी रेखा के उस पार सब संदिग्ध थे इस तरह वह लंपट था और मुँहफट सूचियों से नदारद चौकसी से अंजान वह जिस देवता को फूल चढ़ाता उसकी कृपा चट्टानी पत्थरों के बरक्स ढुलकती उसकी प्रार्थना अँधेरी काली सड़कों-सी अंतहीन जहाँ नीचे वाला ही ऊपर वाला हो वहाँ फाँसी के फंदे पर गिलोटिन के तख्ते पर उन्मादियों के झंडे पर वह किसके भरोसे चढ़ा? अगर उसे अपने ही गुनाहों की सजा मिली तो उसका होना इतना भी बुरा...
Khichdi | Anamika 25.02.2024 2:53
खिचड़ी | अनामिका इतने बरस बीते, इतने बरस ! सन्तोष है तो बस इतना कि मैंने ये बाल धूप में तो सफेद नहीं किए ! इन खिचड़ी बालों का वास्ता, देखा है संसार मैंने भी थोड़ा-सा ! दुनिया के हर कोने क्या जाने क्या-क्या खिचड़ी पक रही है : संसद में, निर्णायक मंडल में, दूर वहाँ इतिहास के खंडहरों में ! 'चाणक्य की खिचड़ी' से लेकर 'बीरबल की खिचड़ी' तक सल्तनतें हैं और रणकौशल ! मुझे खिचड़ी-भाषा से कोई शिकाय...
Loktantra Se Umeed | Mayank Aswal 24.02.2024 1:49
लोकतंत्र से उम्मीद | मयंक असवाल एक देश की संसद को कीचड़ के बीचों बीच होना चाहिए ताकि अपने हर अभिभाषण के बाद संसद से निकलते ही एक राजनेता को पुल बनाना याद रहे। एक लोकतांत्रिक कविता को गाँव, मोहल्ले और शहर के हर चौराहे पर होना चाहिए ताकि जनता के बीच आजादी और तानाशाही का अंतर स्पष्ट रहें। एक लेखक को प्रतिपक्ष की कविता लिखने की समझ होनी चाहिए ताकि सिर्फ किताबों के बीच न सिमटकर वो मंचों...
Chup Ki Saazish | Amrita Pritam 23.02.2024 1:31
चुप की साज़िश | अमृता प्रीतम रात ऊँघ रही है... किसी ने इनसान की छाती में सेंध लगायी है हर चोरी से भयानक यह सपनों की चोरी है। चोरों के निशान - हर देश के हर शहर की हर सड़क पर बैठे हैं पर कोई आँख देखती नहीं, न चौंकती है। सिर्फ़ एक कुत्ते की तरह एक जंजीर से बंधी किसी वक़्त किसी की कोई नज़्म भौंकती है।
Kavitayein | Naresh Saxena 22.02.2024 1:52
कविताएं | नरेश सक्सेना जैसे चिड़ियों की उड़ान में शामिल होते हैं पेड़ क्या कविताएँ होंगी मुसीबत में हमारे साथ? जैसे युद्ध में काम आए सैनिक की वर्दी और शस्त्रों के साथ खून में डूबी मिलती है उसके बच्चे की तस्वीर क्या कोई पंक्ति डूबेगी खून में? जैसे चिड़ियों की उड़ान में शामिल होते हैं पेड़ मुसीबत के वक्त कौन सी कविताएँ होंगी हमारे साथ लड़ाई के लिए उठे हाथों में कौन से शब्द होंगे?
Gayatri | Kushagra Adwait 21.02.2024 2:56
गायत्री | कुशाग्र अद्वैत तुमसे कभी मिला नहीं कभी बातचीत नहीं हुई कहने को कह सकते हैं तुम्हारे बारे में कुछ नहीं जानता ऐसा भी नहीं कि एकदम नहीं जानता ख़बर है कि इस नगर में नई आई हो इधर एक कामचलाऊ कमरा ढूँढ़ने में व्यस्त रही और रोज़गार की दुश्चिंताएँ कुतरती रहीं तुमको रात के इस पहर तुम्हारे नाम कविता लिखने बैठ जाऊँ ऐसी हिमाक़त करने जितना तो शायद नहीं जानता मेरा एक दोस्त तुम्हारा नाम गुनता र...
Hindi Si Ma | Ajay Jugran 20.02.2024 1:34
हिंदी सी माँ | अजेय जुगरान जब पर्दे खोलने पर ठंड की नर्म धूप पलंग तक आ गई तो बड़ा भाई गेट पर अटका हिंदी अख़बार ले आया माँ के लिए। तेज़ी से वर्तमान भूल रही माँ अब रज़ाई के भीतर ही बैठ तीन तकियों पर टिका पीठ होने लगी तैयार उसे पढ़ने को। सर पर पल्लू माथे पर बिंदी हृदय में भाषा मन में जिज्ञासा हाथ में हिंदी अख़बार और उसे पढ़ने को भूली ऐनक ढूँढती मेरी माँ हिंदी कदाचित् नहीं भूलती मातृभाषा सी प्यारी मेरी...
Abki Agar Lauta To | Kunwar Narayan 19.02.2024 1:47
अबकी अगर लौटा तो | कुँवर नारायण अबकी अगर लौटा तो बृहत्तर लौटूंगा चेहरे पर लगाए नोकदार मूँछे नहीं कमर में बाँधे लोहे की पूँछें नहीं जगह दूँगा साथ चल रहे लोगों को तरेर कर न देखूँगा उन्हें भूखी शेर-आँखों से अबकी अगर लौटा तो मनुष्यतर लौटूंगा घर से निकलते सड़कों पर चलते बसों पर चढ़ते ट्रेनें पकड़ते जगह-बेजगह कुचला पड़ा पिद्दी-सा जानवर नहीं अगर बचा रहा तो कृतज्ञतर लौटूंगा अबकी अगर लौटा तो हताह...
Haare Hue Budhhijeevi Ka Vaktavya 18.02.2024 2:09
हारे हुए बुद्धिजीवी का वक्तव्य | सत्यम तिवारी हारे हुए बुद्धि जीवी का वक्तव्य मैं माफ़ी माँगता हूँ जैसे हिम्मत माँगता हूँ मेरे कंधे पर बेलगाम वितृष्णाएँ मेरा चेहरा हारे हुए राजा का रनिवास में जाते हुए मेरी मुद्रा भाड़ में जाते मुल्क की नाव जले सैनिक का मेरा नैराश्य मैं अपना हिस्सा सिर्फ़ इसलिए नहीं छोडूँगा कि संतोष परम सुख है या मृत्यु में ही मुक्ति मिलती है मैं खुली आँख से जीना और बंद आँखों से मर...
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