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Pratidin Ek Kavita

Arts HI ↓ 1195 episódios

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

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Arts

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11 de jul de 2026

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Episódios

Waapsi | Kedarnath Singh 17.02.2024

वापसी | केदारनाथ सिंह आज उस पक्षी को फिर देखा  जिसे पिछले साल देखा था  लगभग इन्हीं दिनों  इसी शहर में क्या नाम है उसका  खंजन  टिटिहिरी, नीलकंठ  मुझे कुछ भी याद नहीं  मैं कितनी आसानी से भूलता जा रहा हूँ  पक्षियों के नाम  मुझे सोचकर डर लगा आख़िर क्या नाम है उसका  मैं खड़ा-खड़ा सोचता रहा  और सिर खुजलाता रहा  और यह मेरे शहर में  एक छोटे-से पक्षी के लौट आने का विस्फोट था  जो भरी सड़क पर  मुझे देर तक हि...

Avikalp | Kinshuk Gupta 16.02.2024

(अ)विकल्प | किंशुक गुप्ता तुम्हारी महत्वकांक्षाओं से माँ  चटक गई है  मेरी रीढ़ की हड्डी  जिस लहज़े से तुमने पिता  सुनाया था फ़रमान  कि रेप में लड़की की गलती ज़रूर होगी मैं समझ गया था  मेरे धुकधुकाते दिल को किसी भी दिन  घोषित कर दोगे टाइम बम  मेरे आकाश के सभी नक्षत्र  अनाथ होते जा रहे हैं चीटियों की बेतरतीब लकीरों से  काली पड़ रही है  सफेद पक्षी की देह  चोंच के हर प्रहार से कठफोड़वा  खोखला कर रहा है ...

Nat | Rajesh Joshi 15.02.2024

नट | राजेश जोशी दीमकें जगह-जगह से खा चुकी हैं तुम्हारे बाँसों को  भूख खा चुकी है तुम्हारा सारा बदन क़दमों को साधकर चलते हो जिस रस्सी पर  इस छोर से उस छोर  टूट चुके हैं उसके रेशे, जर्जर हो चुकी है वो रस्सी  जब-जब शुरू करते हो तुम अपना खेल  कहीं बहुत क़रीब से आती है  यम के भैंसे के खुरों की आवाज़  कहीं बहुत पास सुनाई पड़ती हैं  उसके गले में लटकी घंटियाँ। नट! क्या कभी डर नहीं लगता तुम्हें? आशंका से क...

Basant Aaya | Kedarnath Aggarwal 14.02.2024

बसंत आया | केदारनाथ अग्रवाल बसंत आया :  पलास के बूढ़े वृक्षों ने  टेसू की लाल मौर सिर पर धर ली!  विकराल वनखंडी  लजवंती दुलहिन बन गई,  फूलों के आभूषण पहन आकर्षक बन गई।  अनंग के  धनु-गुण के भौरे गुनगुनाने लगे,  समीर की तितिलियों के पंख गुदगुदाने लगे।  आम के अंग  बौरों की सुगंध से महक उठे,  मंगल-गान के सब गायक पखेरू चहक उठे।  विकराल : भयंकर, भयानक वनखंडी: वन का एक छोटा भाग या हिस्सा समीर:  मंद हवा, ह...

Titliyon Ki Bhasha | Mayank Aswal 13.02.2024

तितलियों की भाषा | मयंक असवाल यदि मुझे तितलियों कि भाषा आती  मैं उनसे कहता  तुम्हारी पीठ पर जाकर बैठ जाएं बिखेर दें अपने पंखों के रंग  जहाँ जहाँ मेरे चुम्बन की स्मृतियाँ  शेष बची हैं  ताकि वो जगह  इस जीवन के अंत तक  महफूज रहे। महफूज़ रहे, वो हर एक कविता  जिन्होंने अपनी यात्राएँ  तुम्हारी पीठ से होकर की  जिनकी उत्पत्ति तुमसे हुई  और अंत तुम्हारे प्रेम के साथ यदि मौन की कोई  साहित्यिक भाषा होती  तो...

Log Kehte Hain | Mamta Kalia 12.02.2024

लोग कहते है | ममता कालिया लोग कहते हैं मैं अपना ग़ुस्सा कम करूँ समझदार औरतों की तरह सहूँ और चुप रहूँ। ग़ुस्सा कैसे कम किया जाता है? क्या यह चाट के ऊपर पड़ने वाला मसाला है या रेडियो का बटन? जिसे कभी भी कर दो ज़्यादा या कम। यह तो मेरे अन्दर की आग है। एक खौलता कढ़ाह, मेरा दिमाग़ है। मैं एक दहका हुआ कोयला जिस पर जिन्होंने ईंधन डाला है और तेल, फिर हवा भी की है, उन्होंने ही उँगली ठोढ़ी पर टिका चकित होने का...

Ghor Andhkaar Hai | Dr Sheoraj Singh 'Bechain' 11.02.2024

घोर अंधकार है | डॉ. श्यौराज सिंह 'बेचैन' घोर अन्धकार है बड़ी उदास रात है  न मेल है न प्यार है।  जलाओ दीप साथियो  कि घोर अन्धकार है।  सिसक रहा है चाँद अब  तड़प रही है चाँदनी।  गली-गली दरिद्रता  सुना रही है रागनी।  ज़िन्दगी गरीब की  अमीर का शिकार है।  जलाओ दीप....  कहाँ स्वतन्त्रता, कहाँ  समाजवाद की लहर  देश तेरी धमनियों में  भर दिया गया है ज़हर  कली-कली उदास  बागवाँ ये क्या बहार है।  जलाओ दीप...  स...

Ye Chetavni Hai | Vinod Kumar Shukla 10.02.2024

ये चेतावनी है | विनोद कुमार शुक्ल यह चेतावनी है कि एक छोटा बच्चा है यह चेतावनी है  कि चार फूल खिले हैं यह चेतावनी है  कि खुशी है  और घड़े में भरा हुआ पानी  पीने के लायक है,  हवा में साँस ली जा सकती है। यह चेतावनी है कि दुनिया है बची दुनिया में मैं बचा हुआ यह चेतावनी है मैं बचा हुआ हूँ किसी होने वाले युद्ध से  जीवित बच निकलकर  मैं अपनी  अहमियत से मरना चाहता हूँ कि मरने के आखिरी क्षणों तक  अनन्तकाल...

Kitna Lamba Hoga Jharna | Gulzar 09.02.2024

कितना लंबा होगा झरना | गुलज़ार कितना लंबा होगा झरना  सारा दिन कोहसार पकड़ के नीचे उतरता रहता है  फिर भी ख़त्म नहीं होता...! सारा दिन ही बादलों में, ये वादी चलती रहती है  न रुकती है, न थमती है  बारिश का बर्बत भी बजता रहता है  लंबी लंबी हवा की उंगलियाँ थकतीं नहीं  जंगल में आवाज़ नदी की  बोलते बोलते बैठ गई है  भारी लगती है आवाज़ नदी की!! कोहसार - पर्वतीय शृंखला बर्बत -(शाब्दिक) बत्तख़ अर्थात हंस का सीना...

Bada Beta | Kinshuk Gupta 08.02.2024

बड़ा बेटा | किंशुक गुप्ता पिता हृदयाघात से ऐसे गए जैसे साबुन की घिसी हुई टिकिया हाथ से छिटक कर गिर जाती है नाली में या पत्थर लगने से अचानक चली जाती है मोबाइल की रोशनी अचानक मैं बड़ा हो गया अनिद्रा के शिकार मेरे पिता को न बक्शी गई गद्दे की नर्माई या कंबल की गरमाई पटक दिया गया कमरे के बाहर जैसे बिल्ली के लिए कसोरे में छोड़ दिया जाता है दूध पूरी रात माँ की पुतलियों में शोक से कहीं ज़्यादा ठहरा रहा भव...

Shamil Hota Hun | Malay 07.02.2024

शामिल होता हूँ | मलय मैं चाँद की तरह रात के माथे पर चिपका नहीं हूँ, ज़मीन में दबा हुआ गीला हूँ गरम हूँ फटता हूँ अपने अंदर अंकुर की उठती ललक को महसूसता देखने और रचने के सुख में थरथराते पानी में उगते सूर्य की तरह सड़क पर निकला हूँ पूरे आकाश पर नज़र रखे, भाषा की सुबह मेरे रोम-रोम में हरी दूब की तरह हज़ार-हज़ार आँखों से खुली है ज़मीन में दबा हुआ गीला हूँ गरम हूँ मैं शामिल होता हूँ तुम सब में डूबकर चलत...

In Sardiyon Mein | Manglesh Dabral 06.02.2024

इन सर्दियों में | मंगलेश डबराल पिछली सर्दियाँ बहुत कठिन थीं उन्हें याद करने पर मैं इन सर्दियों में भी सिहरता हूँ  हालाँकि इस बार दिन उतने कठोर नहीं पिछली सर्दियों में मेरी माँ चली गई थी मुझसे एक प्रेमपत्र खो गया था एक नौकरी छूट गई थी  रातों को पता नहीं कहाँ-कहाँ भटकता रहा  कहाँ-कहाँ करता रहा टेलीफ़ोन पिछली सर्दियों में  मेरी ही चीजें गिरती थीं मुझ पर इन सर्दियों में पिछली सर्दियों के कपड़े निकालता...

Atmahatya | Shashwat Upadhyay 05.02.2024

आत्महत्या | शाश्वत उपाध्याय सात आसमानों के पार आठवें आसमान पर  जहाँ आकर चाँद रुक जाता है  सूरज की रौशनी पर टूटे सपनों के किरचें चमकते हैं  दिन और रात की परिभाषायें रद्द हो जाती हैं कि आत्महत्या ऊपर उठती दुनिया की सबसे आखिरी मंज़िल है  प्यार के भी बाद किया जाने वाला सबसे तिलिस्मी काम।  कोई है जिसके पास काफी कुछ है  सुबह है उम्मीद से जगमगाई हुई  शाम है चाँदनी की परत लिए हुए  वह खुद है मैं से हम होकर...

Apne Bajaye | Kunwar Narayan 04.02.2024

अपने बजाय | कुँवर नारायण रफ़्तार से जीते  दृश्यों की लीलाप्रद दूरी को लाँघते हुए : या  एक ही कमरे में उड़ते-टूटते लथपथ  दीवारों के बीच  अपने को रोक कर सोचता जब  तेज़ से तेज़तर के बीच समय में  किसी दुनियादार आदमी की दुनिया से  हटाकर ध्यान  किसी ध्यान देने वाली बात को,  तब ज़रूरी लगता है ज़िंदा रखना  उस नैतिक अकेलेपन को  जिसमें बंद होकर  प्रार्थना की जाती है  या अपने से सच कहा जाता है  अपने से भागते...

Band Kamre Mein | Prabha Khaitan 03.02.2024

बन्द कमरे में | प्रभा खेतान बन्द कमरे में मेरी सब चीज़ें अपना परिचय खोने लगती हैं दीवारों के रंग धूमिल नीले पर्दे फीके छत पर घूमता पंखा गतिहीन। तब मैं निकल पड़ती हूँ—बाहर, फुटपाथ पर मूँगफली बेचनेवाला परिचय की मुस्कान देता है और सामने पानवाले की दुकान पर घरवाली का हाल पूछना कहीं अधिक अपना लगता है। चौराहों पर भीड़ के साथ रास्ता पार करना मुझे अकेला नहीं करता। बहुत से लोग हैं इस महानगर में, जो मेरी ही...

Atmasweekar | Gaurav Singh 02.02.2024

आत्मस्वीकार | गौरव सिंह जो अपराध मैंने किये, वो जीवन जीने की न्यूनतम ज़रूरत की तरह लगे! मैंने चोर निगाहों से स्त्रियों के वक्ष देखे और कई बार एक लड़की का हृदय ना समझ सकने की शर्म के साथ सोया मुझे परिजनों की मौत पर रुलाई नहीं फूटी और कई दफ़े चिड़ियों की चोट पर फफककर रोया मैं अपने लोगों के बीच एक लम्बी ऊब के साथ रहा और चाय बेचती एक औरत का सारा दुःख जान लेना चाहा मैंने रातभर जागकर लड़कियों के दुःख सुने पर...

Chattan Ko Todo, Vah Sunder Ho Jayegi 01.02.2024

चट्टान को तोड़ो वह सुंदर हो जाएगी | केदारनाथ सिंह चट्टान को तोड़ो  वह सुंदर हो जाएगी  उसे और तोड़ो  वह और, और सुंदर होती जाएगी  अब उसे उठाओ  रख लो कंधे पर  ले जाओ किसी शहर या क़स्बे में  डाल दो किसी चौराहे पर  तेज़ धूप में तपने दो उसे  जब बच्चे आएँगे  उसमें अपने चेहरे तलाश करेंगे  अब उसे फिर से उठाओ  अबकी ले जाओ किसी नदी या समुद्र के किनारे  छोड़ दो पानी में  उस पर लिख दो वह नाम  जो तुम्हारे अंदर...

Achanak Nahi Gayi Ma | Vishwanath Prasad Tiwari 31.01.2024

अचानक नहीं गई माँ | विश्वनाथ प्रसाद तिवारी  अचानक नहीं गई माँ  जैसे चला जाता है टोंटी का पानी  या तानाशाह का सिंहासन  थोड़ा-थोड़ा रोज गई वह  जैसे जाती है कलम से स्याही  जैसे घिसता है शब्द से अर्थ सुकवा और षटमचिया से नापे थे उसने  समय के सत्तर वर्ष  जीवन को कुतरती धीरे-धीरे  गिलहरी-सी चढ़ती-उतरती  काल वृक्ष पर गीली-सूखी लकड़ी-सी चूल्हे की  धुआँ देती सुलगती जलती रात काटने के लिए  परियों के किस्से  स...

Sach Choocha Hota Hai | Amitava Kumar 30.01.2024

सच छूछा होता है।- अमिताव कुमार   महात्मा गाँधी की आत्मकथा में मौसम का कहीं ज़िक्र नहीं, लंदन की किसी ईमारत या सड़क के बारे में कोई बयान नहीं, किसी कमरे की, कभी एकत्रित भीड़ या यातायात के किसी साधन की कहीं कोई चर्चा नहीं– यह वी. एस. नायपॉल की आलोचना है। लेकिन मौसम तो गांधीजी के अंदर था! तूफान से जूझती एक अडिग आत्मा– नैतिकता की पतली पगडण्डी पर ठोकर खाता, संभलता, रास्ता बनाता बढ़ता हुआ इन्सान! अगर आप...

Gaon Gaya Tha, Gaon Se Bhaaga | Kailash Gautam 29.01.2024

गाँव गया था, गाँव से भागा | कैलाश गौतम  गाँव गया था गाँव से भागा। रामराज का हाल देखकर पंचायत की चाल देखकर आँगन में दीवाल देखकर सिर पर आती डाल देखकर नदी का पानी लाल देखकर और आँख में बाल देखकर गाँव गया था गाँव से भागा। गाँव गया था गाँव से भागा। सरकारी स्कीम देखकर बालू में से क्रीम देखकर देह बनाती टीम देखकर हवा में उड़ता भीम देखकर सौ-सौ नीम हकीम देखकर गिरवी राम-रहीम देखकर गाँव गया था गाँव से भागा। गा...

Kavi Ki Atmahatya | Devansh Ekant 28.01.2024

कवि की आत्महत्या | देवांश एकांत  अभिनेता अभिनय करते-करते  मृत्यु का मंचन करने लगता है आप उन्मत्त होते हैं अभिनय देख पीटना चाहते हैं तालियाँ  मगर इस बार वह नही उठता क्योंकि जीवन के रंगमंच में  एक ही ‘कट-इट’ होता है कोई हँसते-हँसाते  शहर के पुल से छलाँग लगा देता है  और तब पिता के साथ  नवका विहार में आया लड़का जान पाता है पानी की सतह पर मछलियाँ ही नहीं आदमी भी तैरता है हर वजन को अपनी हद में रखने वाला...

Khudaon Se Keh Do | Kishwar Naheed 27.01.2024

ख़ुदाओं से कह दो | किश्वर नाहीद  जिस दिन मुझे मौत आए उस दिन बारिश की वो झड़ी लगे जिसे थमना न आता हो, लोग बारिश और आँसुओं में तमीज़ न कर सकें जिस दिन मुझे मौत आए इतने फूल ज़मीन पर खिलें कि किसी और चीज़ पर नज़र न ठहर सके, चराग़ों की लवें दिए छोड़कर मेरे साथ-साथ चलें बातें करती हुई मुस्कुराती हुई जिस दिन मुझे मौत आए उस दिन सारे घोंसलों में सारे परिंदों के बच्चों के पर निकल आएँ, सारी सरगोशियाँ जल-तरंग...

Pushp Ki Abhilasha | Makhanlal Chaturvedi 26.01.2024

पुष्प की अभिलाषा - माखनलाल चतुर्वेदी चाह नहीं, मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ।  चाह नहीं, प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ॥  चाह नहीं, सम्राटों के शव पर, हे हरि, डाला जाऊँ।  चाह नहीं, देवों के सिर पर चढूँ, भाग्य पर इठलाऊँ॥  मुझे तोड़ लेना वनमाली।  उस पथ में देना तुम फेंक॥  मातृ-भूमि पर शीश चढ़ाने।  जिस पथ जावें वीर अनेक॥ 

Tera Naam Nahi | Nida Fazli 25.01.2024

तेरा नाम नहीं | निदा फ़ाज़ली  तेरे पैरों चला नहीं जो धूप छाँव में ढला नहीं जो वह तेरा सच कैसे, जिस पर तेरा नाम नहीं? तुझसे पहले बीत गया जो वह इतिहास है तेरा तुझको ही पूरा करना है जो बनवास है तेरा तेरी साँसें जिया नहीं जो घर आँगन का दिया नहीं जो वो तुलसी की रामायण है तेरा राम नहीं तेरा ही तन पूजा घर है कोई मूरत गढ़ ले कोई पुस्तक साथ न देगी चाहे जितना पढ़ ले तेरे सुर में सजा नहीं जो इकतारे पर बजा नह...

Gawaiyya | Shahanshah Alam 24.01.2024

गवैया | शहंशाह आलम  गवैया अपनी पीड़ा को पूरी लय के साथ गाता है आज वह न दुःख को बाँधता है न उदासी को न धूप को न बादल को न अपनी आत्मा को गवैया सेतु को गाता है उसके नीचे बहते जल को गाता है रंग को गाता है शहद को गाता है नमक को गाता है महुआ को गाता है जामुन को गाता है नीम को गाता है गवैया अपनी धुन की गति और उतार-चढ़ाव में गायन की शैली में बस अपने समय को गाता है समय का यह रूपक किसका है जो दुःख से भरा है...

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