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Pratidin Ek Kavita

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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

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Arts

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11 de jul de 2026

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Episódios

Khud Se | Renu Kashyap 07.04.2024

ख़ुद से | रेणु कश्यप गिरो कितनी भी बार मगर  उठो तो यूँ उठो  कि पंख पहले से लंबे हों  और उड़ान न सिर्फ़ ऊँची पर गहरी भी  हारना और डरना रहे  बस हिस्सा भर  एक लंबी उम्र का  और उम्मीद  और भरपूर मोहब्बत  हों परिभाषाएँ  जागो तो सुबह शाँत हो  ठीक जैसे मन भी हो  कि ख़ुद को देखो तो चूमो माथा  गले लगो ख़ुद से चिपककर  कि कब से  कितने वक़्त से,  सदियों से बल्कि  उधार चल रहा है अपने आपका  प्यार का जब हो ज़िक्र  तो...

Mera Mobile Number Delete Kar Dein Please | Uday Prakash 06.04.2024

 मेरा मोबाइल नम्बर डिलीट कर दें प्लीज़ - उदय प्रकाश सबसे पहले सिर्फ़ आवाज़ थी कोई नाद था और उसके सिवा कुछ भी नहीं उसी आवाज़ से पैदा हुआ था ब्रह्माण्ड आवाज़ जब गायब होती है तो कायनात किसी सननाटे में डूब जाती है जब आप फ़ोन करते हैं क्या पता चलता नहीं आपको कि सननाटे के महासागर में डूबे किसी बहुत प्राचीन अभागे जहाज को आप पुकार रहे हैं?  मेरा मोबाइल नम्बर डिलीट कर दें प्लीज़

Prem Me Prem Ki Ummeed | Mamta Barhath 05.04.2024

प्रेम में प्रेम की उम्मीद | ममता बारहठ जीवन से बचाकर  ले जाऊँगी देखना  प्रेम के कुछ क़तरे  मुट्ठियों में भींचकर  प्रेम की ये कुछ बूँदें  जो बची रह जाएँगी  छाया से मृत्यु की  बनेंगी समंदर और आसमान  मिट्टी और हवा  यही बनेंगी पहाड़ और जंगल और स्वप्न नए  देखना तुम  यह बचा हुआ प्रेम ही बनेगा  फिर नया जन्म मेरा! 

Duniya Me Acche Logon Ki Kami Nahi Hai | Vinod Kumar Shukla 04.04.2024

दुनिया में अच्छे लोगों की कमी नहीं है | विनोद कुमार शुक्ल  दुनिया में अच्छे लोगों की कमी नहीं है  कहकर मैं अपने घर से चला।  यहाँ पहुँचते तक  जगह-जगह मैंने यही कहा  और यही कहता हूँ  कि दुनिया में अच्छे लोगों की कमी नहीं है।  जहाँ पहुँचता हूँ  वहाँ से चला जाता हूँ।  दुनिया में अच्छे लोगों की कमी नहीं है—  बार-बार यही कह रहा हूँ  और कितना समय बीत गया है  लौटकर मैं घर नहीं  घर-घर पहुँचना चाहता हूँ  और...

Stree Ko Samajhne Ke Liye | Vishwanath Prasad Tiwari 03.04.2024

स्त्री को समझने के लिए - विश्वनाथ प्रसाद तिवारी  कैसे उतरता है स्तनों में दूध  कैसे झनकते हैं ममता के तार कैसे मरती हैं कामनाएँ कैसे झरती हैं दंतकथाएं कैसे टूटता है गुड़ियों का घर कैसे बसता है चूड़ियों का नगर कैसे चमकते हैं परियों के सपने... कैसे फड़कते हैं हिंस्र पशुओं के नथुने कितना गाढ़ा लांछन का रंग कितनी लम्बी चूल्हे की सुरंग  कितना गाढ़ा सृजन का अंधकार कितनी रहस्यमय मौन की पुकार स्त्री, तुम्हे...

Keerti ka Vihan Hun | Kanhaiya Lal Pandya 'Suman' 02.04.2024

कीर्ति का विहान हूँ | स्व. कन्हैया लाल पण्ड्या ‘सुमन’ मैं स्वतंत्र राष्ट्र की कीर्ति का विहान हूँ। काल ने कहा रुको शक्ति ने कहा झुको पाँव ने कहा थको किन्तु मैं न रुक सका, न झुक सका, न थक सका क्योंकि मैं प्रकृति प्रबोध का सतत् प्रमाण हूँ कीर्ति का विहान हूँ। भीत ने कहा डरो ज्वाल ने कहा जरो मृत्यु ने कहा मरो किन्तु मैं न डर सका, न जर सका, न मर सका क्योंकि राष्ट्र भाग्य-व्योम का ज्वलंत प्राण हूँ कीर्...

Tay To Yehi Hua Tha | Sharad Bilore 01.04.2024

तय तो यही हुआ था - शरद बिलाैरे सबसे पहले बायाँ हाथ कटा  फिर दोनों पैर लहूलुहान होते हुए  टुकड़ों में कटते चले गए  ख़ून दर्द के धक्के खा-खा कर  नशों से बाहर निकल आया था  तय तो यही हुआ था कि मैं  कबूतर की तौल के बराबर  अपने शरीर का मांस काट कर  बाज़ को सौंप दूँ  और वह कबूतर को छोड़ दे  सचमुच बड़ा असहनीय दर्द था  शरीर का एक बड़ा हिस्सा तराज़ू पर था  और कबूतर वाला पलड़ा फिर नीचे था  हार कर मैं  समूचा ही...

Pagdandiyan | Madan Kashyap 31.03.2024

पगडण्डियाँ - मदन कश्यप  हम नहीं जानते उन उन जगहों को वहाँ-वहाँ हमें ले जाती हैं पगडण्डियाँ जहाँ-जहाँ जाती हैं पगडण्डियाँ कभी खुले मैदान में तो कभी सघन झाड़ियों में कभी घाटियों में तो कभी पहाड़ियों में जाने कहाँ-कहाँ ले जाती हैं पगडण्डियों राजमार्गों की तरह पगडण्डियों का कोई बजट नहीं होता कोई योजना नहीं बनती बस बथान से बगान तक मेड़ से मचान तक खेत से खलिहान तक और टोले से सिवान तक चक्कर लगाने वाले का...

Ghar | Agyeya 30.03.2024

घर | अज्ञेय मेरा घर  दो दरवाज़ों को जोड़ता  एक घेरा है  मेरा घर  दो दरवाज़ों के बीच है  उसमें  किधर से भी झाँको  तुम दरवाज़े से बाहर देख रहे होंगे  तुम्हें पार का दृश्य दिख जाएगा  घर नहीं दिखेगा।  मैं ही मेरा घर हूँ। मेरे घर में कोई नहीं रहता  मैं भी क्या  मेरे घर में रहता हूँ  मेरे घर में  जिधर से भी झाँको...

Abhuwata Samaj | Rupam Mishra 29.03.2024

अभुवाता समाज | रूपम मिश्र  वे शीशे-बासे से नहीं हरी कनई मिट्टी से बनी थीं जिसमें इतनी नमी थी कि एक सत्ता की चाक पर मनचाहा ढाल दिया जाता नाचती हुई एक स्त्री को अचानक कुछ याद आ जाता है सहम कर खड़ी हो जाती है माथे के पल्‍्लू को और खींच कर दर्द को दबा कर एक भरभराई-सी हँसी हँसती है हमार मालिक बहुत रिसिकट हैं हमरा नाचना उनका नाहीं नीक लगता साथ पुराती दूसरी स्त्री भी चुप हो जाती ये वही आखी-पाखी लड़कियाँ...

Hum Auratein hain Mukhautey Nahi | Anupam Singh 28.03.2024

हम औरतें हैं मुखौटे नहीं - अनुपम सिंह वह अपनी भट्ठियों में मुखौटे तैयार करता है  उन पर लेबुल लगाकर सूखने के लिए  लग्गियों के सहारे टाँग देता है  सूखने के बाद उनको  अनेक रासायनिक क्रियाओं से गुज़ारता है  कभी सबसे तेज़ तापमान पर रखता है  तो कभी सबसे कम  ऐसा लगातार करने से  अप्रत्याशित चमक आ जाती है उनमें  विस्फोटक हथियारों से लैस उनके सिपाही  घर-घर घूम रहे हैं  कभी दृश्य तो कभी अदृश्य  घरों से घसीटते...

Krantipurush | Chitra Pawar 27.03.2024

क्रांतिपुरुष | चित्रा पँवार  कल रात सपने के बगीचे में हवाखोरी करते भगत सिंह से मुलाकात हो गई मैंने पूछा शहीव-ए-आज़म! तुम क्रांतिकारी ना होते तो क्‍या होते? वह ठहाका मारकर हँसे फिर भी क्रांतिकारी ही होता पगली ! खेतों में धान त्रगाता हल चलाता और भूख के विरुद्ध कर देता क्रांति मगर सोचो अगर खेत भी ना होते तुम्हारे पास! तब क्‍या करते!! फिर,,ऐसे में कल्रम उठाता निर्धन, मजबूर के हक़ हिस्से की मांग करता र...

Sheetleheri Mein Ek Boodhe Aadmi Ki Prathna | Kedarnath Singh 26.03.2024

शीतलहरी में एक बूढ़े आदमी की प्रार्थना | केदारनाथ सिंह ईश्वर इस भयानक ठंड में  जहाँ पेड़ के पत्ते तक ठिठुर रहे हैं  मुझे कहाँ मिलेगा वह कोयला  जिस पर इन्सानियत का खून गरमाया जाता है  एक ज़िन्दा  लाल  दहकता हुआ कोयला  मेरी अँगीठी के लिए बेहद ज़रूरी  और हमदर्द कोयला  मुझे कहाँ मिलेगा इस ठंड से अकड़े हुए शहर में  जहाँ वह हमेशा छिपाकर रखा जाता है  घर के पिछवाड़े  या ग़ुसलख़ाने की बग़ल में  हथेलियों की रग...

Tum Apne Rang Me Rang Lo To Holi Hai | Harivansh Rai Bachchan 25.03.2024

तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है | हरिवंशराय बच्चन तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है। देखी मैंने बहुत दिनों तक दुनिया की रंगीनी, किंतु रही कोरी की कोरी मेरी चादर झीनी, तन के तार छूए बहुतों ने मन का तार न भीगा, तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है। अंबर ने ओढ़ी है तन पर चादर नीली-नीली, हरित धरित्री के आँगन में सरसों पीली-पीली, सिंदूरी मंजरियों से है अंबा शीश सजाए, रोलीमय संध्या ऊषा की चोली है। तुम...

Dharti ka Shaap | Anupam Singh 24.03.2024

धरती का शाप | अनुपम सिंह मौत की ओर अग्रसर है धरती  मुड़-मुड़कर देख रही है पीछे की ओर  उसकी आँखें खोज रही हैं  आदिम पुरखिनों के पद-चिह्न  उन सखियों को खोज रही हैं  जिनके साथ बड़ी होती  फैली थी गंगा के मैदानों तक उसकी यादों में घुल रही हैं मलयानिल की हवाएँ  जबकि नदियाँ मृत पड़ी हैं  उसकी राहों में  नदियों के कंकाल बटोरती  मौत की ओर अग्रसर है धरती वह ले जा रही है अपने बचे खुचे पहाड़  अपने बटुए में रख...

Peet Kamal | Nandkishore Acharya 23.03.2024

पीत कमल | नन्दकिशोर आचार्य  जल ही जल की  नीली-दर-नीली गहराई के नीचे  जमे हुए काले दलदल ही दलदल में  अपनी ही पूँछ पर सर टिका कर  सो रहा था वह :  उचटा अचानक  भूला हुआ कुछ कहीं जैसे सुगबुगाने लगे। कुछ देर उन्मन, याद करता-सा  उसी बिसरी राग की धुन  जल के दबावों में कहीं घुटती हुई एक-एक कर लगीं खुलने  सलवटें सारी तरंग-सी व्याप गयी जल में :  अपनी ही पूँछ के बल खड़ा  झूमता था वह  फण खिला था राग की मानिन्द...

Unka Jeevan | Anupam Singh 22.03.2024

उनका जीवन | अनुपम सिंह  ख़ाली कनस्तर-सा उदास दिन  बीतता ही नहीं  रात रज़ाइयों में चीख़ती हैं  कपास की आत्माएँ  जैसे रुइयाँ नहीं  आत्माएँ ही धुनी गई हों  गहरी होती बिवाइयों में  झलझलाता है नर्म ख़ून  किसी चूल्हे की गर्म महक  लाई है पछुआ बयार  अंतड़ियों की बेजान ध्वनियों से  फूट जाती है नकसीर  भूख और भोजन के बीच ही  वे लड़ रहे हैं लड़ाई  बाइस्कोप की रील-सा  बस! यहीं उलझ गया है उनका जीवन। 

Lekar Seedha Naara | Shamsher Bahadur Singh 21.03.2024

लेकर सीधा नारा | शमशेर बहादुर सिंह लेकर सीधा नारा  कौन पुकारा  अंतिम आशाओं की संध्याओं से?  पलकें डूबी ही-सी थीं—  पर अभी नहीं;  कोई सुनता-सा था मुझे  कहीं;  फिर किसने यह, सातों सागर के पार  एकाकीपन से ही, मानो—हार,  एकाकी उठ मुझे पुकारा  कई बार?  मैं समाज तो नहीं; न मैं कुल  जीवन;  कण-समूह में हूँ मैं केवल  एक कण।  —कौन सहारा!  मेरा कौन सहारा! 

Azadi Abhi Adhoori Hai | Sheoraj Singh Bechain 20.03.2024

आज़ादी अभी अधूरी है- सच है यह बात समझ प्यारे। कुछ सुविधाओं के टुकड़े खा- मत नौ-नौ बाँस उछल प्यारे। गोरे गैरों का जुल्म था कल अब सितम हमारे अपनों का ये कुछ भी कहें, पर देश बना नहीं भीमराव के सपनों का। एक डाल ही क्यों? एक फूल ही क्‍यों? सारा उद्यान बदल प्यारे। आज़ादी अभी अधूरी है। सच है ये बात समझ प्यारे। है जिसका लहू मयखाने में वो वसर आज तसना-लव है कुत्तों की हालत बदली है दलितों की ज़िन्दगी बदतर है।...

Maine Dekha | Jyoti Pandey 19.03.2024

मैंने देखा | ज्योति पांडेय  मैंने देखा,  वाष्प को मेघ बनते  और मेघ को जल।   पैरों में पृथ्वी पहन  उल्काओं की सँकरी गलियों में जाते उसे  मैंने देखा।  वह नाप रहा था  जीवन की परिधि।  और माप रहा था  मृत्यु का विस्तार;  मैंने देखा।  वह ताक रहा था आकाश  और तकते-तकते  अनंत हुआ जा रहा था।  वह लाँघ रहा था समुद्र  और लाँघते-लाँघते  जल हुआ जा रहा था।  वह ताप रहा था आग  और तपते-तपते  पिघला जा रहा था;  मैंने द...

Kasautiyan | Vishwanath Prasad Tiwari 18.03.2024

कसौटियाँ | विश्वनाथ प्रसाद तिवारी 'जो एक का सत्य है  वही सबका सत्य है' —यह बात बहुत सीधी थी  लेकिन वे चीजों पर उलटा विचार करते थे उन्होंने सबके लिए एक आचार—संहिता तैयार की थी  लेकिन खुद अपने विशेषाधिकार में जीते थे उनकी कसौटियाँ झाँवें की तरह खुरदरी थीं  जिसे वे आदमियों की त्वचा पर रगड़ते थे  और इस तरह कसते थे आदमी को आदमी बड़ा था और कसौटियाँ छोटी  इस पर वे झुंझलाते थे  और आदमी को रगड़—रगड़कर  छोट...

Ziladheesh | Alok Dhanwa 17.03.2024

ज़िलाधीश | आलोक धन्वा  तुम एक पिछड़े हुए वक्ता हो।  तुम एक ऐसे विरोध की भाषा में बोलते हो  जैसे राजाओं का विरोध कर रहे हो!  एक ऐसे समय की भाषा  जब संसद का जन्म नहीं हुआ था!  तुम क्या सोचते हो  संसद ने विरोध की भाषा और सामग्री को  वैसा ही रहने दिया  जैसी वह राजाओं के ज़माने में थी? यह जो आदमी मेज़ की दूसरी ओर सुन रह है तुम्हें कितने करीब और ध्यान से यह राजा नहीं जिलाधीश है! यह जिलाधीश है जो राजाओं...

Tirohit Sitar | Damodar Khadse 16.03.2024

तिरोहित सितार | दामोदर खड़से खूँखार समय के घनघोर जंगल में  बहरा एकांत जब  देख नहीं पाता  अपना आसपास... तब अगली पीढ़ी की देहरी पर  कोई तिरोहित सितार  अपने विसर्जन की  कातर याचना करती है  यादों पर चढ़ी  धूल हटाने वाला  कोई भी तो नहीं होता तब  जब आँसू दस्तक देते हैं– बेहिसाब! मकान छोटा होता जाता है और सितार  ढकेल दी जाती है  कूड़े में  आदमी की तरह... सितार के अंतर में अमिट प्रतिबिंब बार-बार उन अँगुलिय...

Seekh | Balraj Sahni 15.03.2024

सीख | बलराज साहनी  वैज्ञानिकों का कथन है कि डरे हुए मनुष्य के शरीर से एक प्रकार की बास निकलती है जिसे कुत्ता झट सूँघ लेता है और काटने दौड़ता है। और अगर आदमी न डरे तो कुत्ता मुँह खोल मुस्कुराता, पूँछ हिलाता मित्र ही नहीं, मनुष्य का ग़ुलाम भी बन जाता है। तो प्यारे! अगर जीने की चाह है, जीवन को बदलने की चाह है तो इस तत्व से लाभ उठाएँ, इस मंत्र की महिमा गाएँ, इस तत्व को मानवी स्तर पर ले जाएँ! जब भी मनुष्...

Kuch Bann Jaate Hain | Uday Prakash 14.03.2024

कुछ बन जाते हैं | उदय प्रकाश कुछ बन जाते हैं तुम मिसरी की डली बन जाओ  मैं दूध बन जाता हूँ  तुम मुझमें  घुल जाओ। तुम ढाई साल की बच्ची बन जाओ मैं मिसरी घुला दूध हूँ मीठा मुझे एक साँस में पी जाओ। अब मैं मैदान हूँ  तुम्हारे सामने दूर तक फैला हुआ।  मुझमें दौड़ो। मैं पहाड़ हूँ।  मेरे कंधों पर चढ़ो और फिसलो ।  मैं सेमल का पेड़ हूँ  मुझे ज़ोर-ज़ोर से झकझोरो और  मेरी रुई को हवा की तमाम परतों में  बादलों के...

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