Nayi Dhara Radio
Pratidin Ek Kavita
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
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Último episodio
12 de oct. de 2026
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Episodios
Bitiya Murmu Ke Liye | Nirmala Putul 17.09.2026 1:51
बिटिया मुर्मू के लिए | निर्मला पुतुल उठो कि अपने अँधेरे के ख़िलाफ़ उठो उठो अपने पीछे चल रही साज़िश के ख़िलाफ़ उठो, कि तुम जहाँ हो वहाँ से उठो जैसे तूफ़ान से बवण्डर उठता है उठती है जैसी राख में दबी चिनगारी देखो ! अपनी बस्ती के सीमान्त पर जहाँ धराशाई हो रहे हैं पेड़ कुल्हाड़ियों के सामने असहाय रोज़ नंगी होती बस्तियाँ एक रोज़ माँगेगी तुमसे तुम्हारी ख़ामोशी का जवाब सोचो- तुम्हारे पसीने से पुष्ट हुए द...
Santulan Ke Liye | Shayak Alok 16.09.2026 1:51
संतुलन के लिए । शायक आलोक वे जिस दुनिया में आए हैं वह है एक हँसती खिलखिलाती दुनिया। सब सुंदर है, लगे उन्हें इसलिए मैं मुस्कुरा देता हूँ नए बच्चों की तरफ़ आँखें मिचमिचा देता हूँ। एक दुख की कथा से दूसरे दुख के किरदार को मिलता है सहारा इसलिए मैंने अपवित्र पवित्रताओं को जीवन में उतारा। दुनिया के सार्वजनिक शोकागार में आँखें नम रखता हूँ संतुलन के कई पाठ रचे वे ही रहीं सबसे कम सुंदर स्त्रियाँ जिन्हें...
Koi Mere Saath Chale | Sarveshwar Dayal Saxena 15.09.2026 2:22
कोई मेरे साथ चले। सर्वेश्वरदयाल सक्सेना मैंने कब कहा कोई मेरे साथ चले चाहा ज़रूर! अक्सर दरख्तों के लिये जूते सिलवा लाया और उनके पास खडा रहा वे अपनी हरीयाली अपने फूल फूल पर इतराते अपनी चिडियों में उलझे रहे मैं आगे बढ गया अपने पैरों को उनकी तरह जडों में नहीं बदल पाया यह जानते हुए भी कि आगे बढना निरंतर कुछ खोते जाना और अकेले होते जाना है मैं यहाँ तक आ गया हूँ जहाँ दरख्तों की लंबी छायाएं मुझे घेरे हुए...
Ahaa Buddhimanon Ki Basti | Mahesh Anagh 14.09.2026 2:21
अहा बुद्धिमानों की बस्ती । महेश अनघ अहा बुद्धिमानों की बस्ती या तो चुप्पी या तकरार - कोने-कोने भूत बियाने सारा घर सन्नाटेदार । सूचीबद्ध हुई दिनचर्या मज़बूरी रेखांकित है चौके से चूल्हे की अनबन हर भांडा आतंकित है किसी ख़ास दिन ख़ास वजह से काग़ज़ पर लिखते हैं प्यार। यों तो इस भुतहा बाखर में कोई आएगा ही क्यों जिस धन से ख़ुशबू ग़ायब है उसे चुराएगा ही क्यों फिर भी ताला है, कुत्ता है और गोरखा चौकीदार । अ...
Maa Ke Liye Nahi Likhi Kavita | Tanwir Sheikh 'Ilham' 13.09.2026 2:11
माँ के लिए नहीं लिखी कविता । तनवीर शेख़ 'इल्हाम’ आज तक मैंने एक भी कविता माँ के लिए या उनके नाम पर नहीं लिखी लिखना भी चाहा तो नही लिख पाया बहुत कोशिश की हर भाषा हर बोली हर शब्द के आंगन गया पर वो अक्षर ढूंढ न सका जो माँ को परिभाषित कर सके जो माँ की ममता और उनके त्याग को रेखांकित कर सके मैं दूंढ़ ही नहीं पाया पूरी दुनिया की भाषाओं में जो ढाल सके माँ को कविताओं में अंतः मैंने इस प्रयास में पाया मुझे...
Sirf Pyar Karti Hain Titliyan | Jaiprakash Manas 12.09.2026 1:28
सिर्फ़ प्यार करती हैं तितलियाँ । जयप्रकाश मानस सिर्फ़ प्यार करती हैं तितलियाँ हाँ तितलियाँ फूलों से लता-वल्लरियों से अचीन्हे पराए मंजरियों से कहाँ परवाह कि झट झर जाएँगे पर नहीं झंझट कभी जा पहुँचें नभ पर तनिक न भय कि जीवन दो दिना बस यही सच प्यार है अर्थ—शब्द जीना धरा-विस्तार करती हैं तितलियाँ सिर्फ़ प्यार करती हैं तितलियाँ।
Kuch To Is Dil Ko Sazaa Di Jaye | Mohammad Alvi 11.09.2026 2:46
कुछ तो इस दिल को सज़ा दी जाए । मोहम्मद अल्वी कुछ तो इस दिल को सज़ा दी जाए उस की तस्वीर हटा दी जाए ढूँडने में भी मज़ा आता है कोई शय रख के भुला दी जाए नाम लिख लिख के तिरा काग़ज़ पर रौशनाई भी गिरा दी जाए नाव काग़ज़ की बना कर उस को बहते पानी में बहा दी जाए रात को चुपके से इक इक घर की क्यूँ न ज़ंजीर लगा दी जाए नींद में चौंक पड़ेगा कोई आओ उस दर पे सदा दी जाए आख़िरी साँस महक जाएगी उस के दामन की हवा दी जा...
Maskhari | Ashutosh Sharma 10.09.2026 2:15
मसखरी । आशुतोष शर्मा गए रोज़ इक दोस्त को मिल गयी उसकी खोई हुई प्रेमिका मुझे उसकी खोई हुई हंसी को पा जाने की थी ख़ुशी लौट आने का सुख सबको नहीं मिलता, हँसी मिल जाती है और भी कई बहानों से प्रेमिकाओं के चले जाने का दुःख सबको नहीं मिलता जिनको लगता है मैं हूँ एक हंसोल मसखरा संवेदना का मज़ाक उड़ाता हुआ उपेक्षा का एक भदेस चरवाहा तो हाँ , किसी रोज़ खो गई थी मेरी भी प्रेमिका और हँसी भी वो और बात है कि अक...
Jab Main Thaka Hua Ghar Aaun | Shakunt Mathur 09.09.2026 2:03
जब मैं थका हुआ घर आऊँ । शकुन्त माथुर जब मैं थका हुआ घर आऊँ, तुम सुन्दर हो घर सुन्दर हो। चाहे दिन भर बहें पसीने कितने भी हों कपड़े सीने बच्चा भी रोता हो गीला आलू भी हो आधा छीला जब मैं थका हुआ घर आऊँ, तुम सुन्दर हो घर सुन्दर हो सब तूफ़ान रुके हों घर के मुझको देखो आँखें भर के ना जूड़े में फूल सजाए ना तितली से वसन, न नखरे जब मैं थका हुआ घर आऊँ, तुम सुन्दर हो घर सुन्दर हो अधलेटी हो तुम सोफ़े पर फॉरेन...
Aaj Mujhse Door Duniya | Harivansh Rai Bachchan 08.09.2026 1:35
आज मुझसे दूर दुनिया । हरिवंशराय बच्चन आज मुझसे दूर दुनिया! भावनाओं से विनिर्मित, कल्पनाओं से सुसज्जित, कर चुकी मेरे हृदय का स्वप्न चकनाचूर दुनिया! आज मुझसे दूर दुनिया! ‘बात पिछली भूल जाओ, दूसरी नगरी बसाओ’— प्रेमियों के प्रति रही है, हाय, कितनी क्रूर दुनिया! आज मुझसे दूर दुनिया! वह समझ मुझको न पाती, और मेरा दिल जलाती, है चिता की राख कर मैं माँगती सिंदूर दुनिया! आज मुझसे दूर दुनिया!
Bhram | Sushma Kumari 07.09.2026 2:29
भ्रम । सुषमा कुमारी आसमान में अब बादल नहीं दिखता दिखता है बादल के होने का एक भ्रम पेड़ों पर अब चिड़ियाँ नहीं रहती रहता है उनके होने का एक भ्रम। फूर्लों पर अब मधुमक्खियाँ नहीं होतीं और सड़कों पर अब नहीं होते रास्ते! इसी तरह जंगल में अब जंगल नहीं बसता थाली में नहीं होती रोटी अख़बार में नहीं होता समाचार, जीवन में नहीं होता प्रेम! अब किसान की आत्मा में नहीं बची खेती युवाओं के आँखों में नहीं बचे सपने...
Main Duniya Ki Haqeeqat Jaanta Hun | Naqsh Lyallpuri 06.09.2026 2:30
मैं दुनिया की हक़ीक़त जानता हूँ | नक़्श लायलपुरी मैं दुनिया की हक़ीक़त जानता हूँ किसे मिलती है शोहरत जानता हूँ मिरी पहचान है शे'र-ओ-सुख़न से मैं अपनी क़द्र-ओ-क़ीमत जानता हूँ तेरी यादें हैं शब-बेदारियाँ हैं है आँखों को शिकायत जानता हूँ मैं रुस्वा हो गया हूँ शहर-भर में मगर किस की बदौलत जानता हूँ ग़ज़ल फूलों सी दिल सहराओं जैसा मैं अहल-ए-फ़न की हालत जानता हूँ तड़प कर और तड़पाएगी मुझ को शब-ए-ग़म तेरी फ...
Akoo (Main) | Khairul Anwar 05.09.2026 2:01
अकू | ख़ैरुल अनवर अनुवाद : जितेंद्र कुमार त्रिपाठी अगर मेरा अंतिम समय आ जाए तो मैं नहीं चाहूँगा कि कोई मुझे दिलासा दे तुम भी नहीं मुझे उन आँसुओं की ज़रूरत नहीं मैं भेड़िया हूँ अपने झुंड से अलग चीरने दो गोलियों को मेरी चर्बी मैं फिर भी डटा रहूँगा घाव और विष दोनों ही संग-साथ लेकर दौड़ता रहूँगा जब तक यह चुभता दर्द जाता नहीं और किंचित ही परवाह किए बिना मैं जीना चाहता हूँ एक हज़ार साल और… (अकू : इंडोनेशि...
Barsaati Jhonka | Dharamvir Bharti 04.09.2026 1:32
बरसाती झोंका | धर्मवीर भारती चूमता आषाढ़ की पहली घटाओं को, झूमता आता मलय का एक झोंका सर्द; छेड़ता मन की मुँदी मासूम कलियों को और ख़ुशबू-सा बिखर जाता हृदय का दर्द!
Sabhi Ped Ek Phool Hain | Anurag Tiwari 03.09.2026 1:47
सभी पेड़ इक फूल हैं। अनुराग तिवारी सभी पेड़ इक फूल हैं जो प्रेम में दिए गए उपहार हैं। जिसे दिया होगा एक प्रेमिका के रूप में पृथ्वी ने हाथ बढ़ा कर अपने प्रेमी आकाश को! सभी नदियां इक लम्बा खत हैं जिसे लिखा होगा इस छोर की प्रेमिका ने उस छोर के प्रेमी को सुनो, जो तुम फूलों को काट रहे हो इस संवेदनहीन होती दुनिया में प्रेम के लिए बढ़े हाथ को काट रहे हो.. कभी क्षमा नहीं किए जाओगे!
Aisa Bhi Ho Sakta Hai | Balli Singh Cheema 02.09.2026 2:13
ऐसा भी हो सकता है | बल्ली सिंह चीमा साज़िश में वो ख़ुद शामिल हो, ऐसा भी हो सकता है, मरने वाला ही क़ातिल हो, ऐसा भी हो सकता है । आज तुम्हारी मंज़िल हूँ मैं, मेरी मंज़िल और कोई, कल को अपनी इक मंज़िल हो, ऐसा भी हो सकता है । साहिल की चाहत है लेकिन, तैर रहा हूँ बीचों-बीच, मंझधारों में ही साहिल हो, ऐसा भी हो सकता है । तेरे दिल की धडकन मुझको लगे है अपनी-अपनी-सी, तेरा दिल ही मेरा दिल हो, ऐसा भी हो सकता ह...
Kya Wo Din Bhi Din Hain | Rahi Masoom Raza 01.09.2026 1:57
क्या वो दिन भी दिन हैं | राही मासूम रज़ा क्या वो दिन भी दिन हैं जिनमें दिन भर जी घबराए क्या वो रातें भी रातें हैं जिनमें नींद ना आए। हम भी कैसे दीवाने हैं किन लोगों में बैठे हैं जान पे खेलके जब सच बोलें तब झूठे कहलाए। इतने शोर में दिल से बातें करना है नामुमकिन जाने क्या बातें करते हैं आपस में हमसाए।। हम भी हैं बनवास में लेकिन राम नहीं हैं राही आए अब समझाकर हमको कोई घर ले जाए ।।
Akanksha | Nandkishore Acharya 31.08.2026 1:59
आकाँक्षा । नंदकिशोर आचार्य एक अतीत रक्त की भाँति प्रवाहित रहता है मुझमें एक भविष्य ने साँसों की तरह बाँध रखा है मुझे और मैं - घड़ी को सुई - भविष्य के अतीत में बदलने की सूचना मात्र देता रह जाता हूँ। क्या कभी नहीं हो सकता यह एक पल के लिए ही सही अतीत और भविष्य मुझमें न मिल पाएँ और तब मैं मेरा सहारा लेने के लिए हाथ फैलाते भयभीत ईश्वर और मृत्यु को शून्य में छटपटाते हुए देख लूँ!
Tum Sudhi Ban Bankar Baar Baar | Bhagwati Charan Verma 30.08.2026 2:05
तुम सुधि बन-बनकर बार-बार । भगवतीचरण वर्मा तुम सुधि बन-बनकर बार-बार क्यों कर जाती हो प्यार मुझे? फिर विस्मृति बन तन्मयता का दे जाती हो उपहार मुझे मैं करके पीड़ा को विलीन पीड़ा में स्वियं विलीन हुआ अब असह बन गया देवि, तुम्हारी अनुकम्पा का भार मुझे माना वह केवल सपना था, पर कितना सुन्दर सपना था जब मैं अपना था, और सुमुखि तुम अपनी थीं, जग अपना था जिसको समझा था प्यार, वही अधिकार बना पागलपन का अब म...
Gehri Raat Hai | Zeb Ghauri 29.08.2026 2:10
गहरी रात है । ज़ेब ग़ौरी गहरी रात है और तूफ़ान का शोर बहुत घर के दर-ओ-दीवार भी हैं कमज़ोर बहुत दर-ओ-दीवार: दरवाज़ा और दीवार तेरे सामने आते हुए घबराता हूँ लब पे तेरा इक़रार है दिल में चोर बहुत इक़रार: स्वीकार करना नक़्श कोई बाक़ी रह जाए मुश्किल है आज लहू की रवानी में है ज़ोर बहुत नक़्श: रेखाचित्र दिल के किसी कोने में पड़े होंगे अब भी एक खुला आकाश पतंगें डोर बहुत मुझ से बिछड़ कर होगा समुंदर भी बेचैन...
Tadap Kar Jigar Munh Ko Aa Jaye Hai | Firaaq Gorakhpuri 28.08.2026 2:00
तड़प कर जिगर मुँह को आ जाए है । फ़िराक़ गोरखपुरी तड़प कर जिगर मुँह को आ जाए है उसे देख कर कब रहा जाए है किसू ने न अब तक बताया हमें ग़म-ए-हिज्र में क्या किया जाए है मोहब्बत में ऐ मौत ऐ ज़िंदगी जिया जाए है या मरा जाए है रुमूज़-ए-बहाराँ जो पूछो हो तुम गुल अपने लहू में नहा जाए है मुझे पा के तन्हा मिरी बेकसी सर-ए-शाम बिस्तर लगा जाए है मुझे गुमरही का नहीं कोई ख़ौफ़ तिरे घर को हर रास्ता जाए है
Dhat | Krishna Mohan Jha 27.08.2026 2:15
धत । कृष्णमोहन झा चाय-बिस्कुट-नमकीन धत चुटकुलों और निन्दाओं और नक़ली ठहाको धत होड़ लेती विनम्रताओं और खोखली सुंदरताओं धत राजनीतिक रूप से सही कविताओं और पुरस्कार के लिए लार टपकाती जिह्वाओं धत बर्थडे-मैरेजडे-मदर्सडे-फ़ादर्सडे-चिल्ड्रेंसडे- टीचर्सडे- हेल्थडे-ड्रायडे आदि धत महँगाई-भत्ता और इन्क्रीमेंट धत जीवनबीमा और मेडिकल इंश्योरेंस धत होमलोन-आरडी-जीपीएफ-पीपीएफ धत शर्मा-वर्मा-कुमार- गुप्ता-मिश्रा...
O Chidiya | Aishwarya Tiwari 26.08.2026 2:30
ओ चिड़िया! । ऐश्वर्या तिवारी ओ चिड़िया आ बैठ खिड़की पे मैं मरीज़ इस दुनियादारी का देखा नहीं है आसमान का रंग अरसे से आ बैठ संग मेरे बता मुझे क्या रंग बटा है ऊपर-ऊपर? क्या इतनी ही उलझन है उधर? मैं क़ैदी हूँ कितने बंधन का क्या जानूँ जिसे छू लूँ उलझ जाए वो भी दो-एक डोर में। दिल का बीमार हूँ इतना कि बाज़ार से ले आपा था पिंजरा, वो कहते हैं जिससे होता है प्रेम उसे रखते हैं संग हमेशा रखा है अब भी वो किसी...
Seedhi Si Baat | Pablo Neruda | Translation - Manglesh Dabral 25.08.2026 1:51
सीधी सी बात। पाब्लो नेरुदा (अनुवाद: मंगलेश डबराल) शक्ति होती है मौन (पेड़ कहते हैं मुझसे) और गहराई भी (कहती हैं जड़ें) और पवित्रता भी (कहता है अन्न) पेड़ ने कभी नहीं कहा: ‘मैं सबसे ऊंचा हूँ!’ जड़ ने कभी नहीं कहा: ‘मैं बेहद गहराई से आयी हूँ!’ और रोटी कभी नहीं बोली: 'दुनिया में क्या है मुझसे अच्छा'
Drishya Aur Bimb | Rajesh Joshi 24.08.2026 1:38
दृश्य और बिम्ब। राजेश जोशी एक सिनेमा घर के सामने छूटी हुई जगह में एक नए मॉडल की चमचमाती कार एक विकलांग बच्चे को डरा रही है कार धीरे धीरे आगे सरक रही है और डरता, घबराता, गिरता पड़ता उल्टे पाँव दौड़ने की कोशिश कर रहा है बच्चा ड्राइवर मुस्कुरा रहा है और आसपास खड़े तमाशबीन अंदर ही अंदर डर रहे हैं तरस खा रहे हैं पर हँस रहे हैं। यह एक दृश्य है जो हमारे समय के बिम्ब में बदल रहा है ।
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