Nayi Dhara Radio

Pratidin Ek Kavita

Arts HI ↓ 1288 episodios

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

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Arts

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Último episodio

12 de oct. de 2026

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Episodios

Khut Jayein | Nilesh Raghuvanshi 12.10.2026

खुट जाएँ । नीलेश रघुवंशी  नए साल के आगमन पर पूछा गया सिंघाड़े बेचने वाली से नए साल के बारे में क्या सोचा है तुमने सिंघाड़े बेचती स्त्री ने कहा नए साल में हम खुट जाएँ खुट जाएँ मतलब.. खुट जाएँ मतलब खुट जाएँ याने हम मर जाएँ ही ही हा हा ही हा अरे अरे ए ऐसा नहीं कहते हँसी ठसक से सिंघाड़े वाली मुश्किल से जबरिया हँसी को रोकती बोली क्यों खुटने से डरते हो ??? हम तो रोज़ खुटते हैं…

Ek Baar | Rajula Shah 11.10.2026

एक बार । राजुला शाह बह जाने देना उड़ जाने देना अपने आप को एक बार तुम भी। गुब्बारे-सा हवा के बुलबुले-सा हल्का होगा तुम्हारा मन और कहीं भी जा सकेगा बिला रोक-टोक फिर- प्रेम से इन्तज़ार में इन्तज़ार से मौन में मौन से निपट शून्य में और तुम्हें लगेगा, सबसे ताकतवर हो तुम ऊपर और ऊपर और ऊपर उठते हुए....

Chandini | Ramvilas Sharma 10.10.2026

चाँदनी । रामविलास शर्मा चाँदी की झीनी चादर-सी फैली है वन पर चाँदनी। चाँदी का झूठा पानी है यह माह-पूस की चाँदनी। खेतों पर ओस-भरा कुहरा, कुहरे पर भीगी चाँदनी; आँखों में बादल-से आँसू, हँसती है उन पर चाँदनी। दु:ख की दनिया पर बुनती है माया के सपने चाँदनी। मीठी मुस्कान बिछाती है भीगी पलकों पर चाँदनी। लोहे की हथकड़ियों-सा दु:ख, सपनों-सी झूठी चाँदनी; लोहे से दु:ख को काटे क्या सपनों-सी मीठी चाँदनी। यह चाँद...

Parcham | Kumar Ambuj 09.10.2026

परचम।  कुमार अम्बुज  वहाँ एक फूल खिला हुआ है अकेला  कोई उसे छू भी नहीं रहा है  किसी सुबह शाम में वह झर जाएगा  लेकिन देखो, वह खिला हुआ है बारिश, धूल और यातनाओं को और ऋतुओं को  जज़्ब करते हुए  एक पत्थर भी है वहाँ किसी की प्रतीक्षा में  आसपास की हर चीज़ इशारा करती है  तालाब किनारे अँधेरी झाड़ियों में चमकते हैं जुगनू  दुर्दिनों के किनारे शब्द मुझे प्यास लग आयी है और यह सपना नहीं है  जैसे पेड़ की यह छा...

Buri Aurat Ke Sapnon Mein | Kailash Manhar 08.10.2026

बुरी औरत के सपनों में । कैलाश मनहर बुरी औरत के सपनों में नहीं होता पति और चरित्र और मर्यादाएँ बन्द खिड़कियों वाला पिंजरेनुमा घर बुरी औरत के सपनों में नहीं होती बदन को धरती बनाकर धान कुटवाने वाली निर्जीव सहन-शक्ति बचपन के प्रेम को भूल जाने वाला परिवार की प्रतिष्ठा के नाम का पाखण्ड-पर्व कभी नहीं होता बुरी औरत के सपनों में दुनियादारी के घुटते हुए अँधेरे की चहारदीवारी में आत्महत्या का अनायास आदर्श नही...

Prem Ki Anivaaryata | Hemant Deolekar 07.10.2026

प्रेम की अनिवार्थता ।  हेमंत देवलेकर बहुत असंभव-से आविष्कार किए प्रेम ने और अंततः हमें मनुष्य बनाया लेकिन अस्वीकार की गहरी पीड़ा उस प्रेम के हर उपकार का ध्वंस करने पर तुली दिया जिसने सब कुछ न्यौछावर कर देने का भोलापन, तर्क न करने की सहजता और रोने की मानवीय उपलब्धि प्रेम ने हमारी ऊबड़ - खाबड़, जाहिल-सी भाषा को कविता की कला सिखाई और ज़िन्दगी के घोर कोलाहल में एकांत की दुआ मांगना संभव नहीं था प्रेम के...

Sandhya Vandana | Sumitranandan Pant 06.10.2026

सांध्य वंदना । सुमित्रानंदन पंत जीवन का श्रम ताप हरो हे! सुख सुषुमा के मधुर स्वर्ण हे! सूने जग गृह द्वार भरो हे! लौटे गृह सब श्रान्त चराचर नीरव, तरु अधरों पर मर्मर, करुणानत निज कर पल्लव से विश्व नीड प्रच्छाय करो हे! उदित शुक्र अब, अस्त भनु बल, स्तब्ध पवन, नत नयन पद्म दल तन्द्रिल पलकों में, निशि के शशि! सुखद स्वप्न वन कर विचरो हे!

Aaj Shaam Hai Bahut Udaas | Bhagwati Charan Verma 05.10.2026

आज शाम है बहुत उदास । भगवतीचरण वर्मा आज शाम है बहुत उदास केवल मैं हूँ अपने पास । दूर कहीं पर हास-विलास दूर कहीं उत्सव-उल्लास दूर छिटक कर कहीं खो गया मेरा चिर-संचित विश्वास । कुछ भूला सा और भ्रमा सा केवल मैं हूँ अपने पास एक धुन्ध में कुछ सहमी सी आज शाम है बहुत उदास । एकाकीपन का एकान्त कितना निष्प्रभ, कितना क्लान्त । थकी-थकी सी मेरी साँसें पवन घुटन से भरा अशान्त, ऐसा लगता अवरोधों से यह अस्तित्व स्वय...

Pin Bahut Saare | Kunwar Bechain 04.10.2026

पिन बहुत सारे। कुँअर बेचैन जिंदगी का अर्थ मरना हो गया है और जीने के लिये हैं दिन बहुत सारे । इस समय की मेज़ पर रक्खी हुई जिंदगी है 'पिन-कुशन' जैसी दोस्ती का अर्थ चुभना हो गया है और चुभने के लिए हैं पिन बहुत सारे। निम्न-मध्यमवर्ग के परिवार की अल्पमासिक आय-सी है जिंदगी वेतनों का अर्थ चुकना हो गया है और चुकने के लिए हैं ऋण बहुत सारे।

Baaghi Biyabaan Auratein | Aishwarya Tiwari 03.10.2026

बागी बियाबान औरतें।  ऐश्वर्या तिवारी   लोग कहते हैं वो औरत है ही कहाँ, ज़्यादा  सही शब्द है आफ़त। उसके गले में कोई मंगलसूत्र नहीं, एक सूखी नदी लटकी है जिस पर कभी किसी ने नाव चलाने की ज़िद की थी और आधे में ही डर गया। वो हँसती है तो लगता है जैसे किसी पुराने मकान की दीवार अचानक गिर पडी हो - लोग भागते हैं मलबा बचाने, वो बस अपनी हँसी से धूल झाड़ती है। उसकी देह पर कपड़े कम हैं, किस्से ज़्यादा। हर तह से को...

Pyaar | Sarveshwar Dayal Saxena 02.10.2026

प्यार । सर्वेश्वरदयाल सक्सेना इस पेड में कल जहाँ पत्तियाँ थीं आज वहाँ फूल हैं जहाँ फूल थे वहाँ फल हैं जहाँ फल थे वहाँ संगीत के तमाम निर्झर झर रहे हैं उन निर्झरों में जहाँ शिला खंड थे वहाँ चाँद तारे हैं उन चाँद तारों में जहाँ तुम थीं वहाँ आज मैं हूँ और मुझमें जहाँ अँधेरा था वहाँ अनंत आलोक फैला हुआ है लेकिन उस आलोक में हर क्षण उन पत्तियों को ही मैं खोज रहा हूँ जहाँ से मैंने- तुम्हें पाना शुरु किया थ...

Mera Uska Parichay Itna | Ansar Kambari 01.10.2026

मेरा उसका परिचय इतना । अंसार कम्बरी मेरा उसका परिचय इतना वो नदिया है, मैं मरुथल हूँ। उसकी सीमा सागर तक है मेरा कोई छोर नहीं है। मेरी प्यास चुरा ले जाए ऐसा कोई चोर नहीं है। मेरा उसका इतना नाता वो ख़ुशबू है, मैं संदल हूँ। उस पर तैरें दीप शिखाएँ सूनी सूनी मेरी राहें। उसके तट पर भीड़ लगी है कौन करेगा मुझसे बातें। मेरा उसका अंतर इतना वो बस्ती है, मैं जंगल हूँ। उसमें एक निरन्तरता है मैं तो स्थिर हूँ जनम...

Idhar Se Dekhein To Apna Makaan Lagta Hai | Shamsur Rehman Farooqi 30.09.2026

इधर से देखें तो अपना मकान लगता है । शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी इधर से देखें तो अपना मकान लगता है इक और ज़ाविए से आसमान लगता है जो तुम हो पास तो कहता है मुझ को चीर के फेंक वो दिल जो वक़्त-ए-दुआ बे-ज़बान लगता है शुरू-ए-इश्क़ में सब ज़ुल्फ़ ओ ख़त से डरते हैं अख़ीर उम्र में इन ही में ध्यान लगता है सरकने लगती है तब ही क़दम तले से ज़मीन जब अपने हाथ में सारा जहान लगता है दो चार घाटियाँ इक दश्त कुछ नदी नाले बस इ...

Hawa Jab Aayegi | Champa Vaid 29.09.2026

हवा जब आएगी | चंपा वैद  हवा जल आएगी अकेली बैठा लूँगी अपने पास चले चलेंगे हम दोनों उस कविता के पर्वत पर उड़ते, पेड़ लगाते, एक हज़ार चश्मों से एकत्रित कर जल और सूरज के प्रबल प्रकाश मैं भी धूप बटोरूँगी दिन भर हवा तुम्हारे साथ

Lehron Ka Geet | Sumitranandan Pant 28.09.2026

लहरों का गीत । सुमित्रानंदन पंत अपने ही सुख से चिर चंचल हम खिल खिल पडती हैं प्रतिपल, जीवन के फेनिल मोती को ले ले चल करतल में टलमल! छू छू मृदु मलयानिल रह रह करता प्राणों को पुलकाकुल; जीवन की लतिका में लहलह विकसा इच्छा के नव नव दल! सुन मधुर मरुत मुरली की ध्वनी गृह-पुलिन नांध, सुख से विह्वल, हम हुलस नृत्य करतीं हिल हिल खस खस पडता उर से अंचल! चिर जन्म-मरण को हँस हँस कर हम आलिंगन करती पल पल, फिर फिर अस...

Tabla | Vivek Nirala 27.09.2026

तबला ।  विवेक निराला   किसी की खाल है जो खींच कर मढ़ दी गई है मढ़ी हुई है मृतक की जीवन्त भाषा। मृतक के परिजनों का विलाप कस गया है इस खाल के साथ। वादक की फूँक से नहीं खाल के मालिक की आख़िरी साँस से बज रही है वह बाँसुरी जो सँगत पर है। धा-धा-धिन-धा और तिरकिट के पीछे एक विषादी स्वर है।

Prem Samandar | Pallavi Vinod 26.09.2026

प्रेम समंदर।  पल्लवी विनोद प्रेम समंदर-सा ही है धरती पर इतना कि सब डूब जाए इतना कि प्यास ही ना बुझे इतना कि डूबकर भी उतराता रहे निकल बाहर फिर इसी में समाता रहे प्रेम को पाना हो तो मछली बन जाना सीपी बन जाना, चाहें बन जाना कोई डूबा जहाज़ अगर मनुष्य बनोगे तो समंदर आश्चर्य देगा वैविध्य देगा गहराई देगा टापू देगा बस ख़ुद को नहीं दे पाएगा।

Bilbilaata Surya | Wazda Khan 25.09.2026

बिलबिलाता सूर्य।  वाज़दा खान  डर और दबाव के  घटाटोप अनधकार में बिलबिलाता सूर्य, कितना भीतर से जन्मा है सृष्टि के? भरी दुपहरी के आखिरी पलों में भी चढ़ नहीं पाया आकाश बन जाता आकाश सुनहरा तो सूर्य की रश्मियां अपराजेय हो जातीं पहुंच जातीं उन नसों में जहां डर, दबाव और ख़ून एकमेक होकर बहता है।

Prem Ke Baare Mein | Savita Singh 24.09.2026

प्रेम के बारे में । सविता सिंह  सिल्विया प्लाथ आओ मेरी आत्मा में बसो निश्चिंतता महसूस करो यहाँ अकेलापन कोई यातना नहीं जो ले जाए तुम्हें गैस स्टोव तक नहीं प्रेम के बदले नहीं मिला प्रेम कोई महादुख यहाँ जीवन की हल्की रोशनी में फूलों की तरह खिली हुई मिलेंगी जीवन जीने की अमूल्य सलाहें अब एक फूल जिनमें से तुम्हें भी जीवित करेगा अपनी अद्भुत सुगंध से आओ सिल्विया प्लाथ मुझमें बसो निश्चिंतता महसूस करो यहाँ...

Tumse Alag Hokar | Sarveshwar Dayal Saxena 23.09.2026

तुमसे अलग होकर। सर्वेश्वरदयाल सक्सेना तुमसे अलग होकर लगता है अचानक मेरे पंख छोटे हो गए हैं, और मैं नीचे एक सीमाहीन सागर में गिरता जा रहा हूँ। अब कहीं कोई यात्रा नहीं है, न अर्थमय, न अर्थहीन; गिरने और उठने के बीच कोई अंतर नहीं। तुमसे अलग होकर हर चीज़ में कुछ खोजने का बोध हर चीज़ में कुछ पाने की अभिलाषा जाती रही सारा अस्तित्व रेल की पटरी-सा बिछा है हर क्षण धड़धड़ाता हुआ निकल जाता है। तुमसे अलग होकर...

Gaon Dehaat Ki Betiyaan | Neera Parmar 22.09.2026

गांव-देहात की बेटियां । नीरा परमार लू के थपेड़े हाड़ कंपाते जाड़े भरी बरसात में जंगल-पहाड़ नदी-नाले को लांघकर स्कूल जाती हैं दूर-दराज बियाबान में बसे गांव-देहात की बेटियां न तन ढंकने लायक कपड़े न पैरों में ढंग की चप्पल पौ फटते दो कौर बासी भात पेट में डाल घर गृहस्थी छोटे भाई-बहन मां-बाप के सौ टंटे बोरे बदरंग तख्ती के संग ब्लैकबोर्ड पर उभरते ककहरे से जोड़ नाता अंधेरे में उम्मीद की कंदील जलाती हैं!

Teddy Bear Main Bache Hue Bhalu | Gyanendrapati 21.09.2026

टेडी  बियर में बचे हुए भालू।  ज्ञानेन्द्रपति  बच्चियाँ जब अपने टेडी बियर  को छाती से चिपकाए दुलार रही होंगी छीज रहे भारतीय जंगलों में और खोजी दलों और अनुसंधान-स्टेशनों के कचरालय बने जा रहे ध्रुवीय प्रदेशों में बेमौत मारे जा रहे होंगे भालू काले भालू और भूरे भालू बगैर किसी रंग-भेद के कौन मार रहा होगा उन्हें  अपने टेडी बियर को छाती से लगाए सो जानेवाली बच्चियाँ क्या कभी सपने में भी जान सकेंगी इसे निहा...

Bachcha | Indu Jain 20.09.2026

बच्चा । इन्दु जैन औरत के सिर पर गठरी है कमर पर बच्चा मर्द हाथ में बक्सा लटकाये है बच्चा रो रहा है लगातार हाथ-पाँव पटक रहा बार-बार औरत के समझाने मर्द के झुँझलाने के बावजूद वह पैर-पैर चलना चाहता है और गठरी अपने सिर पर उठाना चाहता है।

Kavitayein | Dharmesh 19.09.2026

कविताएँ । धर्मेश ख़त्म हो चुकी हैं कविताएँ शब्दों ने कर ली है सामूहिक आत्महत्या मजनूँ के क़त्ल हो जाने के डर से लैला ने तिलांजलि दे दी है अपने प्रेम की जंगल की हत्या पर आमादा शहर चीर चुका है नदी का हृदय सियारों को गाली देने वाले आदमी ने नोच खाया है एक और आदमी को मेरी आँखों में अब भी बचा है प्रेम ये इस दुनिया की तबाही का सूत्र है

Angootha Chaap Neta | Kaka Hathrasi 18.09.2026

अँगूठा छाप नेता । काका हाथरसी चपरासी या कलर्क जब करना पड़े तलाश। पूछा जाता—क्या पढ़े, कौन क्लास हो पास? कौन क्लास हो पास, विवाहित हो या क्वारे। शामिल रहते हो या मात-पिता से न्यारे? कह ‘काका’ कवि, छान-बीन काफ़ी की जाती। साथ सिफ़ारिश हो, तब ही सर्विस मिल पाती॥ कर्मचारियों के लिए, है अनेक दुख-द्वंद्व। नेताजी के वास्ते, एक नहीं प्रतिबंध॥ एक नहीं प्रतिबंध, मंच पर झाड़े लेक्चर। वैसे उनकी भैंस बराबर काला...

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