Nayi Dhara Radio
Pratidin Ek Kavita
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
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Último episódio
11 de jul de 2026
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Episódios
Ma Ka Ashirwaad | Ajay Jugran 04.12.2023 1:44
माँ का आशीर्वाद | अजेय जुगरान दोनों छोर पर ऊपर - नीची ढलान और घुमाव लिए बीच में कुछ सीधी सपाट सड़क और उस पर चलती मेरी माँ देने को लिए अनेकों आशीर्वाद। हर परिचित - अपरिचित बच्चे के नमस्ते - प्रणाम पर चाहे वो कितना ही सांकेतिक पास या दूर से हो “खुश रहो। जीते रहो।” स्थिर होकर सही दिशा में बोलती मानो निश्चित करना चाहती हो कि नज़र मिला आँखों से दिल में उतार दे अपना आशीर्वाद। इसके चलते कालोनी के बच्चों...
Kavita | Kunwar Narayan 03.12.2023 1:54
कविता | कुँवर नारायण कविता वक्तव्य नहीं गवाह है कभी हमारे सामने कभी हमसे पहले कभी हमारे बाद कोई चाहे भी तो रोक नहीं सकता भाषा में उसका बयान जिसका पूरा मतलब है सचाई जिसकी पूरी कोशिश है बेहतर इन्सान उसे कोई हड़बड़ी नहीं कि वह इश्तहारों की तरह चिपके जुलूसों की तरह निकले नारों की तरह लगे और चुनावों की तरह जीते वह आदमी की भाषा में कहीं किसी तरह ज़िंदा रहे, बस।
Choti Choti Icchayein | Badri Narayan 02.12.2023 1:54
छोटी-छोटी इच्छाएँ | बद्री नारायण मैं रात-दिन स्मरण करता हूँ अपनी उन छोटी इच्छाओं का जो पूरी हो गईं धीरे-धीरे जिन छोटी-छोटी इच्छाओं के चक्कर में अपनी बड़ी इच्छाओं से किनारा किया धिक्कार है मुझे कि मेरी धरी की धरी रह गई पहाड़ तोड़ने की इच्छा! काग़ज़ की नाव बनाकर मान लिया कि पूरी कर ली बड़ी-बड़ी लहरों से भरे समुद्र लांघने की इच्छा कुछ कविता लिखकर मैंने साध ली है प्रतिरोध करने की इच्छ...
Pustakein | Vishwanath Prasad Tiwari 01.12.2023 2:34
पुस्तकें | विश्वनाथ प्रसाद तिवारी नहीं, इस कमरे में नहीं उधर उस सीढ़ी के नीचे उस गैरेज के कोने में ले जाओ पुस्तकें वहाँ नहीं, जहाँ अँट सकती फ्रिज जहाँ नहीं लग सकता आदमकद शीशा बोरी में बाँधकर चट्टी से ढककर कुछ तख्ते के नीचे कुछ फूटे गमलों के ऊपर रख दो पुस्तकें ले जाओ इन्हें तक्षशिला-विक्रमशिला या चाहे जहाँ हमें उत्तराधिकार में नहीं चाहिए पुस्तकें कोई झपटेगा पासबुक पर कोई ढूँढ़ेगा लॉकर...
Ghar Rahenge | Kunwar Narayan 30.11.2023 2:09
घर रहेंगे - कुँवर नारायण घर रहेंगे, हमीं उनमें रह न पाएँगे : समय होगा, हम अचानक बीत जाएँगे : अनर्गल ज़िंदगी ढोते किसी दिन हम एक आशय तक पहुँच सहसा बहुत थक जाएँगे। मृत्यु होगी खड़ी सम्मुख राह रोके, हम जगेंगे यह विविधता, स्वप्न, खो के, और चलते भीड़ में कंधे रगड़ कर हम अचानक जा रहे होंगे कहीं सदियों अलग होके। प्रकृति औ' पाखंड के ये घने लिपटे बँटे, ऐंठे तार- जिनसे कहीं गहरा, कहीं सच्चा, मैं स...
Matrabhasha Ki Maut | Jacinta Kerketta 29.11.2023 1:46
मातृभाषा की मौत - जसिंता केरकेट्टा माँ के मुँह में ही मातृभाषा को क़ैद कर दिया गया और बच्चे उसकी रिहाई की माँग करते-करते बड़े हो गए। मातृभाषा ख़ुद नहीं मरी थी उसे मारा गया था पर, माँ यह कभी न जान सकी। रोटियों के सपने दिखाने वाली संभावनाओं के आगे अपने बच्चों के लिए उसने भींच लिए थे अपने दाँत और उन निवालों के सपनों के नीचे दब गई थी मातृभाषा। माँ को लगता है आज भी एक दुर्घटना थी मातृभाषा...
Kalpana | Hemant Devlekar 28.11.2023 1:22
कल्पना - हेमंत देवलेकर उसने काग़ज़ पर एक चौकुट्टा सा गोला बनाया और मन में कहा ‘चिड़िया’। फिर उसने उस गोले में कहीं एक बिंदी मांड दी और मन में कहा ‘आसमान’। सच, चिड़िया की आँखों में आसमान बिंदु भर ही तो होगा
Hum Apna Beetna Dekhte Hain | Yash Malviya 27.11.2023 1:58
हम अपना बीतना देखते हैं - यश मालवीय कल पर उड़ती नज़र फेंकते हैं हम अपना बीतना देखते हैं अपने से ही अनबन मगर तक़ाज़े हैं सपने खुले-खुले, जकड़े दरवाज़े हैं चलते-चलते बीच रास्ते में अपना ही रास्ता छेंकते हैं सुबहों के कुहरे को झीना करने की तारीख़ों को भीना-भीना करने की जीते जाने की उम्मीदों की, सँवलाई-सी धूप सेंकते हैं गलियों-सड़कों की धुँधली पहचान लिए अब तक लगी न ऐसी एक थकान लिए थक जाने के डर ही...
Aisi Bhasha | Bhagwat Rawat 26.11.2023 1:57
ऐसी भाषा | भगवत रावत | आरती जैन सारी उम्र बच्चों को पढ़ाई भाषा और विदा करते समय उनके पास में नहीं था एक ऐसा शब्द जिसे देकर कह सकता कि लो इसे सँभाल कर रखना यह संकट के समय काम आएगा या कि वह तुम्हें शर्मिंदगी से बचाएगा या कि वह तुम्हें गिरने से रोकेगा या कि ज़रूरत पड़ने पर यह तुम्हें टोकेगा या कि तुम इसके सहारे किसी भी नीचता का सामना कर सकोगे या इतना ही कि कभी-कभी तुम इससे अपना ख़ालीपन भर सक...
Lauta Main Is bade Sheher Me | Manglesh Dabral 25.11.2023 2:34
लौटा मैं इस बड़े शहर में | मंगलेश डबराल इस बड़े शहर में रहता मैं एक आदमी अदना-सा था उस छोटे क़स्बे में गया तो पाया मेरा क़द बहुत बड़ा था सभी देखते नज़र उठाकर मुझको किसी बड़ी-सी आशा में मैं भी पता नहीं क्या बोला उनसे भीषण भरकम भाषा में वाह वाह कर सुनते थे मेरी कविता कहते थोड़ी और पीजिए बड़े शहर में जब हम आएँ कृपया थोड़ा समय दीजिए मार्ग दिखाते रहें कहा उन्होंने नतमस्तक हो विदा समय चला वहा...
Usha | Shamsher Bahadur Singh 24.11.2023 1:29
उषा | शमशेर बहादुर सिंह | आरती जैन प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे भोर का नभ राख से लीपा हुआ चौका [अभी गीला पड़ा है] बहुत काली सिल ज़रा-से लाल केसर से कि जैसे धुल गई हो स्लेट पर या लाल खड़िया चाक मल दी हो किसी ने नील जल में या किसी की गौर झिलमिल देह जैसे हिल रही हो। और... जादू टूटता है इस उषा का अब सूर्योदय हो रहा है।
Pattiyan Ye Cheed KI | Naresh Saxena 23.11.2023 1:53
पत्तियाँ यह चीड़ की | नरेश सक्सेना सींक जैसी सरल और साधारण पत्तियाँ यदि न होतीं चीड़ की तो चीड़ कभी इतने सुंदर नहीं होते नीम या पीपल जैसी आकर्षक होतीं यदि पत्तियाँ चीड़ की तो चीड़ आकाश में तने हुए भालों से उर्जस्वित और तपस्वियों से स्थितिप्रज्ञ न होते सूखी और झड़ी हुई पत्तियाँ चीड़ की शीशम या महुए की पत्तियों सी पैरों तले दबने पर चुर्र-मुर्र नहीं होतीं बल्कि पैरों तले दबने पर आपको पटकनी दे सकती है...
Kahin Kabhi | Bhuwaneshwar 22.11.2023 1:36
कहीं कभी | भुवनेश्वर कहीं कभी सितारे अपने आपकी आवाज पा लेते हैं और आसपास उन्हें गुजरते छू लेते हैं… कहीं कभी रात घुल जाती है और मेरे जिगर के लाल-लाल गहरे रंग को छू लेते हैं, हालाँकि यह सब फालतू लगता है यह भागदौड़ और यह सब सब कुछ रूखा-सूखा है लेकिन एक बच्चे की किलकारी की तरह यह सब मधुर है लेकिन कहीं कभी एक शांत स्मृति में हम अपने सपनों का इंतजार कर रहे हैं
Ek Vaakiya | Sahir Ludhianvi 21.11.2023 2:06
एक वाक़िआ | साहिर लुधियानवी अँध्यारी रात के आँगन में ये सुब्ह के क़दमों की आहट ये भीगी भीगी सर्द हवा ये हल्की हल्की धुंदलाहट गाड़ी में हूँ तन्हा महव-ए-सफ़र और नींद नहीं है आँखों में भूले-बिसरे अरमानों के ख़्वाबों की ज़मीं है आँखों में अगले दिन हाथ हिलाते हैं पिछली पीतें याद आती हैं गुम-गश्ता ख़ुशियाँ आँखों में आँसू बन कर लहराती हैं सीने के वीराँ गोशों में इक टीस सी करवट लेती है नाकाम उमंगे...
Safal Aadmi | Bhagwat Rawat 20.11.2023 1:57
सफल आदमी | भगवत रावत सफल आदमी के चेहरे पर उसकी उम्र की जगह लिखा होता है सफल आदमी वह नायक बनकर निकलता है अपने बचपन से और याद करता है उन्हें जो पड़े रह गए वहीं के वहीं कि एक वही निकल पाया ऊपर केवल अपने बलबूते पर वह अक्सर सोचता है उन चीज़ों के बारे में जिन्हें होना चाहिए था केवल उसके जीवन में वह उस दौड़ में कभी शामिल नहीं होता जहाँ पराजय का सुख होता है सफल आदमी में इतनी प्रतिभा होती है ...
Jaise | Arun Kamal 19.11.2023 1:47
जैसे | अरुण कमल जैसे मैं बहुत सारी आवाज़ें नहीं सुन पा रहा हूँ चींटियों के शक्कर तोड़ने की आवाज़ पंखुड़ी के एक एक कर खुलने की आवाज़ गर्भ में जीवन बूँद गिरने की आवाज़ अपने ही शरीर में कोशिकाएँ टूटने की आवाज़ इस तेज़ बहुत तेज़ चलती पृथ्वी के अंधड़ में जैसे मैं बहुत सारी आवाज़ें नहीं सुन रहा हूँ वैसे ही तो होंगे वे लोग भी जो सुन नहीं पाते गोली चलने की आवाज़ ताबड़तोड़ और पूछते हैं - कहाँ है पृथ्वी पर चीख?
Phir Kya Hoga Uske Baad? | Balkrishna Rao 18.11.2023 2:28
फिर क्या होगा उसके बाद? | बालकृष्ण राव फिर क्या होगा उसके बाद? उत्सुक होकर शिशु ने पूछा, माँ, क्या होगा उसके बाद? रवि से उज्ज्वल, शशि से सुंदर, नव किसलय दल से कोमलतर वधू तुम्हारी घर आएगी उस विवाह उत्सव के बाद! पल भर मुख पर स्मित की रेखा, खेल गई, फिर माँ ने देखा— कर गंभीर मुखाकृति शिशु ने फिर पूछा, माँ क्या उसके बाद? फिर नभ के नक्षत्र मनोहर, स्वर्ग-लोक से उतर-उतरकर, तेरे शिशु बनने को,...
Apne Ko Dekhna Chahta Hoon | Chandrakant Devtale 17.11.2023 3:38
अपने को देखना चाहता हूँ | चंद्रकांत देवताले मैं अपने को खाते हुए देखना चाहता हूँ किस जानवर या परिंदे की तरह खाता हूँ मैं मिट्ठू जैसी हरी मिर्च कुतरता है या बंदर गड़ाता है भुट्टे पर दाँत या साँड़ जैसे मुँह मारता है छबड़े पर मैं अपने को सोए हुए देखना चाहता हूँ माँद में रीछ की तरह मछली पानी में सोती होती जैसे मैं धुँध में सोया हुआ हूँ हँस रहा हूँ नींद में मैं सपने में पतंग उड़ाते बच्चे की तर...
Prithvi Ka Mangal Ho | Ashok Vajpeyi 16.11.2023 3:14
पृथ्वी का मंगल हो | अशोक वाजपेयी सुबह की ठंडी हवा में अपनी असंख्य हरी रंगतों में चमक-काँप रही हैं अनार-नींबू-नीम-सप्रपर्णी-शिरीष-बोगेनबेलिया-जवाकुसुम-सहजन की पत्तियाँ : धूप उनकी हरीतिमा पर निश्छल फिसल रही है : मैं सुनता हूँ उनकी समवेत प्रार्थना : पृथ्वी का मंगल हो! एक हरा वृंदगान है विलम्बित वसंत के उकसाए जिसमें तरह-तरह के नामहीन फूल स्वरों की तरह कोमल आघात कर रहे हैं : सब गा-गुनगुना-बजा...
Abhirupa | Anamika 15.11.2023 2:58
अभिरूपा | अनामिका नहीं जानती मेरे जीवन का हासिल क्या मेरे वे सारे संबंध जो बन ही नहीं पाए वे मुलाकातें जो हुई ही नहीं वे रस्ते जो मुझसे छूट गए, या मैंने छोड़ दिये उड़ के दरवाज़े जो खोले नहीं मैंने शब्द जो उचारे नहीं और प्रस्ताव जो विचारे नहीं मेरे सगे थे वही जिनकी मैं सगी न हुई करते हैं मेरी परिचर्या इस घने जंगल में वे ही जब आधी रात को फूलती है वह कुमुदनी मेरी हताहत शिराओं में और टूट जाती है नींद एक...
Ye Baat Samajh Me Aayi Nahi | Ahmed Hatib Siddiqui 14.11.2023 3:23
ये बात समझ में आई नहीं | अहमद हातिब सिद्दीक़ी ये बात समझ में आई नहीं और अम्मी ने समझाई नहीं में कैसे मीठी बात करूँ जब मैं ने मिठाई खाई नहीं आपी भी पकाती हैं हलवा फिर वो भी क्यूँ हलवाई नहीं ये बात समझ में आई नहीं और अम्मी ने समझाई नहीं नानी के मियाँ तो नाना हैं दादी के मियाँ भी दादा हैं जब आपा से मैं ने ये पूछा बाजी के मियाँ क्या बाजा हैं वो हँस हँस कर ये कहने लगीं ऐ भाई नहीं ऐ भाई नही...
Zameen Ko Jaadu Aata Hai! | Gulzar 13.11.2023 3:12
ज़मीं को जादू आता है! | गुलज़ार ये मेरे बाग की मिट्टी में कुछ तो है ये जादुई ज़मीं है क्या? ज़मीं को जादू आता है! अगर अमरूद बीजूँ मैं, तो ये अमरूद देती है अगर जामुन की गुठली डालूँ तो जामुन भी देती है करेला तो करेला.....निम्बू तो निम्बू! अगर मैं फूल माँगू तो गुलाबी फूल देती है मैं जो रंग दूँ उसे, वो रंग देती है ये सारे रंग क्या उसने कहीं नीचे छुपा रक्खे हैं मिट्टी में बहुत खोदा मगर कुछ भी नहीं निकला.....
Muhana | Dr Damodar Khadse 12.11.2023 1:17
मुहाना | डॉ दामोदर खड़से मैं चाहता हूँ ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठकर लिखूं कविता... पर सोचता हूँ जो लिखता है कविता क्या नहीं होता वह ज्वालामुखी के मुहाने पर
Ma Ka Kargha | Dr Suryabala 11.11.2023 1:17
माँ का करघा | डॉ सूर्यबाला हीरे की कनियों से, मोती की लड़ियों से, चाँदी के तारों, बूटे, लाड़ दुलारों के, ख़ुशबू के धागों से, आँसू की धारों से इतने सपने, और सब सपने, इतने-इतने सारे सपने मेरी अम्माँ ने बुने झलमली आखों के हथकरघे पे
Vishwa Ki Vasundhara Suhagini Bani Rahe | Sheoraj Singh 'Bechain' 10.11.2023 2:23
विश्व की वसुंधरा सुहागिनी बनी रहे | श्यौराज सिंह ‘बेचैन गगन में सूर्य-चंद्र और चाँदनी बनी रहे चमन बना रहे चमन की स्वामिनी बनी रहे। कोयलों के कंठ की माधुरी बनी रहे। रागियों के– अधरों की रागिनी बनी रहे। गूँजते रहें भ्रमर किसलयों की चाह में, मेल-प्यार हो अपार, ज़िंदगी की राह में सब तरु सरस रहें, न पात टूट भू गहें। कली-कली– की गोद, नित सुगंध से भरी रहे। ये गिरी– शिखर बने रहें, ये सुरसुरी बनी रहे। भँवर...
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