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Pratidin Ek Kavita

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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

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11 de jul de 2026

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Episódios

Daud | Ramdarash Mishra 07.01.2025

दौड़ | रामदरश मिश्र वह आगे-आगे था मैं उसके पीछे-पीछे मेरे पीछे अनेक लोग थे हाँ, यह दौड़-प्रतिस्पर्धा थी लक्ष्य से कुछ ही दूर पहले एकाएक उसकी चाल धीमी पड़ गयी और रुक गया मैं आगे निकल गया जीत के गर्वीले सुख के उन्माद से मैं झूम उठा  उसके हार-जन्य दुख की कल्पना से मेरा सुख और भी उन्मत्त हो उठा मूर्ख कहीं का मैं मन ही मन भुनभुनाया उन्माद की हँसी हँसता हआ मैं लौटा तो देखा वह किसी गिरे हुए आदमी को उठा र...

Jaise Jab Se Tara Dekha | Agyeya 06.01.2025

जैसे जब से तारा देखा | अज्ञेय   क्या दिया-लिया? जैसे जब तारा देखा सद्यःउदित —शुक्र, स्वाति, लुब्धक— कभी क्षण-भर यह बिसर गया मैं मिट्टी हूँ; जब से प्यार किया, जब भी उभरा यह बोध कि तुम प्रिय हो— सद्यःसाक्षात् हुआ— सहसा देने के अहंकार पाने की ईहा से होने के अपनेपन (एकाकीपन!) से उबर गया। जब-जब यों भूला, धुल कर मंज कर एकाकी से एक हुआ। जिया।

Saal Mubarak | Asheesh Pandya 05.01.2025

साल मुबारक! | आशीष पण्ड्या  साल मुबारक! भगवा हो या लाल, मुबारक! साल मुबारक! आज नया कल हुआ पुराना, टिक टिक करता काल मुबारक! पैसे की भूखी दुनिया को, थाल में रोटी-दाल मुबारक! चिंताओं से लदी चाँद पर, बचे खुचे कुछ बाल मुबारक! यहाँ पड़े हैं जान के लाले, वो कहते लोकपाल मुबारक! काली करतूतों की गठरी, धवल रेशमी शाल मुबारक! ग़ैरत! इज्ज़त! शर्म? निरर्थक, अब तो मोटी खाल मुबारक! आँख का पानी सूख चुका कब बना टपकती...

Jeevan Bacha Hai Abhi | Shalabh Shriram Singh 04.01.2025

जीवन बचा है अभी | शलभ श्रीराम सिंह  जीवन बचा है अभी ज़मीन के भीतर नमी बरक़रार है बरकरार है पत्थर के भीतर आग हरापन जड़ों के अन्दर साँस ले रहा है! जीवन बचा है अभी रोशनी खाकर भी हरकत में हैं पुतलियाँ दिमाग सोच रहा है जीवन के बारे में ख़ून दिल तक पहुँचने की कोशिश में है! जीवन बचा है अभी सूख गए फूल के आसपास है ख़ुशबू आदमी को छोड़कर भागे नहीं हैं सपने भाषा शिशुओं के मुँह में आकार ले रही है! जीवन बचा है...

Ishwar Ke Bacche | Alok Azad 03.01.2025

ईश्वर के बच्चे | आलोक आज़ाद  क्या आपने ईश्वर के बच्चों को देखा है? ये अक्सर सीरिया और अफ्रीका के खुले मैदानों में धरती से क्षितिज की और दौड़ लगा रहे होते हैं ये अपनी माँ की कोख से ही मज़दूर है। और अपने पिता के पहले स्पर्श से ही युद्धरत है। ये किसी चमत्कार की तरह युद्ध में गिराए जा रहे खाने के थैलों के पास प्रकट हो जाते हैं। और किसी चमत्कार की तरह ही अट्श्य हो जाते हैं। ये संसद और देवताओं के सामूहिक...

Sukh Ka Dukh | Bhavani Prasad Mishra 02.01.2025

सुख का दुख / भवानीप्रसाद मिश्र ज़िन्दगी में कोई बड़ा सुख नहीं है, इस बात का मुझे बड़ा दु:ख नहीं है, क्योंकि मैं छोटा आदमी हूँ, बड़े सुख आ जाएँ घर में तो कोई ऎसा कमरा नहीं है जिसमें उसे टिका दूँ। यहाँ एक बात इससे भी बड़ी दर्दनाक बात यह है कि, बड़े सुखों को देखकर मेरे बच्चे सहम जाते हैं, मैंने बड़ी कोशिश की है उन्हें सिखा दूँ कि सुख कोई डरने की चीज़ नहीं है। मगर नहीं मैंने देखा है कि जब कभी कोई बड़ा स...

Vah Mujhi Main Hai Bhay | Nandkishore Acharya 01.01.2025

वह मुझी में है भय | नंदकिशोर आचार्य  एक अनन्त शून्य ही हो यदि तुम तो मुझे भय क्यों है ? कुछ है ही नहीं जब जिस पर जा गिरूँ चूर-चूर हो छितर जाऊँ उड़ जायें मेरे परखच्चे तब क्यों डरूँ? नहीं, तुम नहीं वह मुझी में है भय मुझ को जो मार देता है। और इसलिए वह रूप भी जो तुम्हें आकार देता है।

Ek Aadmi Do Pahadon Ko Kuhniyon Se Thelta | Shamsher Bahadur Singh 31.12.2024

एक आदमी दो पहाड़ों को कुहनियों से ठेलता | शमशेर बहादुर सिंह एक आदमी दो पहाड़ों को कुहनियों से ठेलता पूरब से पच्छिम को एक क़दम से नापता बढ़ रहा है कितनी ऊँची घासें चाँद-तारों को छूने-छूने को हैं जिनसे घुटनों को निकालता वह बढ़ रहा है अपनी शाम को सुबह से मिलाता हुआ फिर क्यों दो बादलों के तार उसे महज़ उलझा रहे हैं?

Ma, Mozey Aur Khwab | Prashant Purohit 30.12.2024

माँ, मोज़े, और ख़्वाब | प्रशांत पुरोहित  माँ के हाथों से बुने मोज़े  मैं अपने  पाँवों में पहनता हूँ, सिर पे रखता हूँ।  मेरे बचपन से कुछ बुनती आ रही है, सब उसी के ख़्वाब हैं  जो दिल में रखता हूँ।  पाँव बढ़ते गए,  मोज़े घिसते-फटते गए, हर माहे-पूस में  एक और ले रखता हूँ।  मैं माँगता जाता हूँ,  वो फिर दे देती है - और एक नया ख़्वाब  नए रंगो-डिज़ाइन में  मेरे सब जाड़े नए-नए  फूले-फूले, गर्म-गर्म  ताज़े...

Dukh | Madan Kashyap 29.12.2024

दुख | मदन कश्यप  दुख इतना था उसके जीवन में कि प्यार में भी दुख ही था उसकी आँखों में झाँका  दुख तालाब के जल की तरह ठहरा हुआ था उसे बाँहों में कसा पीठ पर दुख दागने के निशान की तरह दिखा उसे चूमना चाहा दुख होंठों पर पपड़ियों की तरह जमा था उसे निर्वस्त्र करना चाहा उसने दुख पहन रखा था जिसे उतारना संभव नहीं था।

Bachpan Ki Wah Nadi | Nasira Sharma 28.12.2024

बचपन की वह नदी | नासिरा शर्मा   बचपन की वह नदी जो बहती थी मेरी नसों में जाने कितनी बार उतारा है मैंने उसे अक्षरों में पढ़ने वाले करते हैं शिकायत यह नदी कहाँ है जिसका ज़िक्र है अकसर आपकी कहानियों में? कैसे कहूँ कि यादों  का भी एक सच होता है जो वर्तमान में कहीं नज़र नहीं आता वर्तमान का अतीत हो जाना भी समय के बहने जैसा है जैसे वह नदी बहती थी कभी पिघली चाँदी जैसी अभी अलसाई सी पड़ी रहती है तलहटी में शा...

Daily Passenger | Arun Kamal 27.12.2024

डेली पैसेंजर | अरुण कमल मैंने उसे कुछ भी तो नहीं दिया इसे प्यार भी तो नहीं कहेंगे एक धुँधले-से स्टेशन पर वह हमारे डब्बे में चढ़ी और भीड़ में खड़ी रही कुछ देर सीकड़ पकड़े पाँव बदलती फिर मेरी ओर देखा और मैंने पाँव सीट से नीचे कर लिए और नीचे उतार दिया झोला उसने कुछ कहा तो नहीं था वह आ गई और मेरी बग़ल में बैठ गई धीरे से पीठ तख़्ते से टिकाई और लंबी साँस ली ट्रेन बहुत तेज़ चल रही थी आवाज़ से लगता था ट्रे...

Dehri | Geetu Garg 26.12.2024

देहरी | गीतू गर्ग  बुढ़ा जाती है  मायके की  ढ्योडियॉं अशक्त होती  मॉं के साथ.. अकेलेपन को सीने की कसमसाहट में  भरने की आतुरता  निढाल आशंकाओं में  झूलती उतराती.. थाली में परसी  एक तरकारी और दाल देती है गवाही  दीवारों पर चस्पाँ  कैफ़ियत की अब इनकी उम्र को लच्छेदार भोजन नहीं पचता  मन को चलाना  इस उमर में नहीं सजता  होंठ भीतर ही भीतर  फड़फड़ाते हैं  बिटिया को खीर पसंद है और सबसे बाद में  करारा सा पराठ...

Pura Din | Gulzar 25.12.2024

पूरा दिन | गुलज़ार मुझे खर्ची में पूरा एक दिन, हर रोज़ मिलता है मगर हर रोज़ कोई छीन लेता है, झपट लेता है, अंटी से कभी खीसे से गिर पड़ता है तो गिरने की आहट भी नहीं होती, खरे दिन को भी खोटा समझ के भूल जाता हूँ मैं गिरेबान से पकड़ कर मांगने वाले भी मिलते हैं "तेरी गुज़री हुई पुश्तों का कर्जा है, तुझे किश्तें चुकानी है " ज़बरदस्ती कोई गिरवी रख लेता है, ये कह कर अभी 2-4 लम्हें खर्च करने के लिए रख ले, बक...

Onth | Ashok Vajpeyi 24.12.2024

ओंठ | अशोक वाजपेयी तराशने में लगा होगा एक जन्मांतर पर अभी-अभी उगी पत्तियों की तरह ताज़े हैं। उन पर आयु की झीनी ओस हमेशा नम है उसी रास्ते आती है हँसी मुस्कुराहट वहीं खिलते हैं शब्द बिना कविता बने वहीं पर छाप खिलती है दूसरे ओठों की वह गुनगुनाती है समय की अँधेरी कंदरा में बैठा कालदेवता सुनता है वह हंसती है। बर्फ़ में  ढँकी वनराशि सुगबुगाती है वह चूमती है। सदियों की विजड़ित प्राचीनता पिघलती है रति में...

Saundarya Ka Aashcharyalok | Savita Singh 23.12.2024

सौंदर्य का आश्चर्यलोक | सविता सिंह बचपन में घंटों माँ को निहारा करती थी मुझे वह बेहद सुंदर लगती थी उसके हाथ कोमल गुलाबी फूलों की तरह थे पाँव ख़रगोश के पाँव जैसे उसकी आँखें सदा सपनों से सराबोर दिखतीं उसके लंबे काले बाल हर पल उलझाए रखते मुझे याद है सबसे ज़्यादा मैं उसके बालों से ही खेला करती थी उसे गूँथती फिर खोलती थी जब माँ नहा-धोकर तैयार होती साड़ी बाँधती मेरे लिए वह विश्व का सुंदरतम दृश्य होता जिस...

Sankat | Madan Kashyap 22.12.2024

संकट | मदन कश्यप   अक्सर ताला उसकी ज़ुबान पर लगा होता है  जो बहुत ज़्यादा सोचता है जो बहुत बोलता है  उसके दिमाग पर ताला लगा होता है संकट तब बढ़ जाता है जब चुप्पा आदमी इतना चुप हो जाए  कि सोचना छोड़ दे  और बोलने वाला ऐसा शोर मचाये  कि उसकी भाषा से विचार ही नहीं,  शब्द भी गुम हो जाएँ!

Hum Nadi Ke Saath Saath | Agyeya 21.12.2024

हम नदी के साथ-साथ | अज्ञेय हम नदी के साथ-साथ सागर की ओर गए पर नदी सागर में मिली हम छोर रहे: नारियल के खड़े तने हमें लहरों से अलगाते रहे बालू के ढूहों से जहाँ-तहाँ चिपटे रंग-बिरंग तृण-फूल-शूल हमारा मन उलझाते रहे नदी की नाव न जाने कब खुल गई नदी ही सागर में घुल गई हमारी ही गाँठ न खुली दीठ न धुली हम फिर, लौट कर फिर गली-गली अपनी पुरानी अस्ति की टोह में भरमाते रहे।

Sui | Ramdarash Mishra 20.12.2024

सूई | रामदरश मिश्रा  अभी-अभी लौटी हूँ अपनी जगह पर परिवार के एक पाँव में चुभा हुआ काँटा निकालकर फिर खोंस दी गयी हूँ धागे की रील में जहाँ पड़ी रहूंगी चुपचाप परिवार की हलचलों में अस्तित्वहीन-सी अदृश्य एकाएक याद आएगी नव गृहिणी को मेरी जब ऑफिस जाता उसका पति झल्लाएगा- अरे, कमीज़ का बटन टूटा हुआ है" गृहिणी हँसती हुई आएगी रसोईघर से और मुझे लेकर बटन टाँकने लगेगी पति सिसकारी भर उठेगा "क्यों क्या हुआ, चुभ गय...

Daraar mein Ugaa Peepal | Arvind Awasthi 19.12.2024

दरार में उगा पीपल | अरविन्द अवस्थी ज़मीन से बीस फीट ऊपर किले की दीवार की दरार में उगा पीपल महत्वकांक्षा की डोर पकड़ लगा है कोशिश में ऊपर और ऊपर जाने की जीने के लिए खींच ले रहा है हवा से नमी सूरज से रोशनी अपने हिस्से की पत्तियाँ लहराकर दे रहा है सबूत अपने होने का

Kya Karun Kora Hi Chhor Jaun Kaagaz? | Anup Sethi 18.12.2024

क्या करूँ कोरा ही छोड़ जाऊँ काग़ज़? | अनूप सेठी क से लिखता हूँ कव्वा कर्कश क से कपोत छूट जाता है पंख फड़फड़ाता हुआ लिखना चाहता हूँ कला कल बनकर उत्पादन करने लगती है लिखता हूँ कर्मठ पढ़ा जाता है कायर डर जाता हूँ लिखूँगा क़ायदा अवतार लेगा उसमें से क़ातिल कैसा है यह काल कैसी काल की रचना-विरचना और कैसा मेरा काल का बोध बटी हुई रस्सी की तरह उलझते, छिटकते, टूटते-फूटते पहचान बदलते चले जाते हैं शब्द, अर्थ, विचार...

Itna Mat Door Raho Gandh Kahin Kho Jaye | Girija Kumar Mathur 17.12.2024

इतना मत दूर रहो गन्ध कहीं खो जाए | गिरिजाकुमार माथुर इतना मत दूर रहो गन्ध कहीं खो जाए आने दो आँच रोशनी न मन्द हो जाए देखा तुमको मैंने कितने जन्मों के बाद चम्पे की बदली सी धूप-छाँह आसपास घूम-सी गई दुनिया यह भी न रहा याद बह गया है वक़्त लिए मेरे सारे पलाश ले लो ये शब्द गीत भी कहीं न सो जाए आने दो आँच रोशनी न मन्द हो जाए उत्सव से तन पर सजा ललचाती मेहराबें खींच लीं मिठास पर क्यों शीशे की दीवारें टकराक...

Mit Mit Kar Main Seekh Raha Hun | Kedarnath Agarwal 16.12.2024

मिट मिट कर मैं सीख रहा हूँ | केदारनाथ अग्रवाल दूर कटा कवि मैं जनता का, कच-कच करता कचर रहा हूँ अपनी माटी; मिट-मिट कर मैं सीख रहा हूँ  प्रतिपल जीने की परिपाटी कानूनी करतब से मारा जितना जीता उतना हारा न्याय-नेह सब समय खा गया भीतर बाहर धुआँ छा गया धन भी पैदा नहीं कर सका पेट-खलीसा नहीं भर सका लूट खसोट जहाँ होती है  मेरी ताव वहाँ खोटी है मिली कचहरी इज़्ज़त थोपी पहना चोंगा उतरी टोपी लिये हृदय में कविता थात...

Isliye To Tum Pahad Ho | Rajesh Joshi 15.12.2024

इसीलिए तो तुम पहाड़ हो | राजेश जोशी   शिवालिक की पहाड़ियों पर चढ़ते हुए हाँफ जाता हूँ  साँस के सन्तुलित होने तक पौड़ियों पर कई-कई बार रुकता हूँ आने को तो मैं भी आया हूँ यहाँ एक पहाड़ी गाँव से विंध्याचल की पहाड़ियों से घिरा है जो चारों ओर से मेरा बचपन भी गुज़रा है पहाड़ियों को धाँगते अवान्तर दिशाओं की पसलियों को टटोलते और पहाड़ी के छोर से उगती यज्ञ-अश्व की खोपड़ी जैसी उषाएँ देखते हुए सब कहते हैं वि...

Humare Sheher Ki Streeyan | Anup Sethi 14.12.2024

हमारे शहर की स्त्रियाँ | अनूप सेठी एक साथ कई स्त्रियाँ बस में चढ़ती हैं एक हाथ से संतुलन बनाए एक हाथ में रुपए का सिक्का थामे बिना धक्का खाए काम पर पहुँचना है उन्हें दिन भर जुटे रहना है उन्हें टाइप मशीन पर, फ़ाइलों में साढ़े तीन पर रंजना सावंत ज़रा विचलित होंगी दफ़्तर से तीस मील दूर सात साल का अशोक सावंत स्कूल से लौट रहा है गर्मी से लाल हुआ पड़ोसिन से चाबी लेकर घर में घुस जाएगा रंजना सावंत उँगलियाँ चटका...

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