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Pratidin Ek Kavita

Arts HI ↓ 1195 episódios

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

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Arts

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11 de jul de 2026

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Episódios

Ek Samay Tha | Raghuvir Sahay 01.02.2025

एक समय था- रघुवीर सहाय एक समय था मैं बताता था कितना नष्ट हो गया है अब मेरा पूरा समाज तब मुझे ज्ञात था कि लोग अभी व्यग्न हैं बनाने को फिर अपना परसों कल और आज आज पतन की दिशा बताने पर शक्तिवान करते हैं कोलाहल तोड़ दो तोड़ दो तोड़ दो झोंपड़ी जो खड़ी है अधबनी फ़िज़ूल था बनाना ज़िद समता की छोड़ दो एक दूसरा समाज बलवान लोगों का आज बनाना ही पुनर्निर्माण है जिनका अधिकार छीन जिन्हें किया पराधीन उनको जी लेने का...

Desh Ho Tum | Arunabh Saurabh 31.01.2025

देश हो तुम | अरुणाभ सौरभ  में तुम्हारी कोख से नहीं तुम्हारी देह के मैल से उत्पन्न हुआ हूँ भारतमाता विघ्नहरत्ता नहीं बना सकती माँ तुम पर इतनी शक्ति दो कि भय-भूख से मुत्ति का रास्ता खोज सकूँ बुद्ध-सी करुणा देकर संसार में अहिंसा - शांति-त्याग की स्थापना हो में तुम्हारा हनु पवन पुत्र मेरी भुजाओं को वज्र शक्ति से भर दो कि संभव रहे कुछ अमरत्व और पूजा नहीं हमें दे दो अनथक कर्म निर्भीक शक्ति से बोलने की स...

Hum Milte Hain Bina Mile Hi | Kedarnath Aggarwal 30.01.2025

हम मिलते हैं बिना मिले ही  |  केदारनाथ अग्रवाल हे मेरी तुम! हम मिलते हैं बिना मिले ही मिलने के एहसास में जैसे दुख के भीतर सुख की दबी याद में। हे मेरी तुम! हम जीते हैं बिना जिये ही जीने के एहसास में जैसे फल के भीतर फल के पके स्वाद में।

Kam Se Kam Ek Darwaza | Sudha Arora 29.01.2025

कम से कम एक दरवाज़ा  | सुधा अरोड़ा चाहे नक़्क़ाशीदार एंटीक दरवाज़ा हो या लकड़ी के चिरे हुए फट्टों से बना उस पर खूबसूरत हैंडल जड़ा हो या लोहे का कुंडा वह दरवाज़ा ऐसे घर का हो जहाँ माँ बाप की रज़ामंदी के बग़ैर अपने प्रेमी के साथ भागी हुई बेटी से माता पिता कह सकें - 'जानते हैं, तुमने ग़लत फ़ैसला लिया फिर भी हमारी यही दुआ है ख़ुश रहो उसके साथ जिसे तुमने वरा है यह मत भूलना कभी यह फ़ैसला भारी पड़े और पाँव लौटने क...

Suno Kabir | Nasira Sharma 28.01.2025

सुनो कबीर ! | नासिरा शर्मा  सुनो कबीर,  चलो मेरे साथ वहाँ जहाँ तुम्हारी प्रताड़ना के बावजूद  डूब रहे हैं दोनों पक्ष ज़रूरत है उन्हें तुम्हारी फटकार की वह नहीं सुन रहे हैं हमारी बातें हमारी चेतावनी, कर रहे हैं मनमानी अंधविश्वास की पट्टी बंध चुकी है उनकी रौशन आँखों पर और  आगे का रास्ता भूल , वह भटक रहे हैं  पीछे बहुत पीछे अतीत की ओर  तुम्हीं सिखा सकते हो,  उनकी चेतना को जगा सकते हो ऐसा मेरा विश्वास...

Suryasth Ke Aasmaan | Alok Dhanwa 27.01.2025

सूर्यास्त के आसमान | आलोक धन्वा उतने सूर्यास्त के उतने आसमान उनके उतने रंग लम्बी सडकों पर शाम धीरे बहुत धीरे छा रही शाम होटलों के आसपास खिली हुई रौशनी लोगों की भीड़ दूर तक दिखाई देते उनके चेहरे उनके कंधे जानी -पह्चानी आवाज़ें कभी लिखेंगें कवि इसी देश में इन्हें भी घटनाओं की तरह!

Pehle Bachhe Ke Janam Se Pehle 26.01.2025

पहले बच्चे के जन्म से पहले | नरेश सक्सेना साँप के मुँह में दो ज़ुबानें होती हैं। मेरे मुँह में कितनी हैं अपने बच्चे को दुआ किस ज़ुबान से दूँगा खून सनी उँगलियाँ झर तो नहीं जाएँगी पतझर में अपनी कौन-सी उँगली उसे पकड़ाऊँगा सात रंग बदलता है गिरगिट मैं कितने बदलता हूँ किस रंग की रोशनी का पाठ उसे पढ़ाऊँगा आओ मेरे बच्चे मुझे पुनर्जन्म देते हुए आओ मेरे मैल पर तेज़ाब की तरह!

Is Samay | Nilesh Raghuvanshi 25.01.2025

इस समय | नीलेश रघुवंशी एक कोने में बिल्ली अपने बच्चों को दूध पिला रही है। छोटे-छोटे बच्चे और बिल्ली इतने सटे हुए हैं आपस में मुश्किल है उन्हें गिननाq एक औरत पेड़ में रस्सी का झुला डाल, झुला रही है बच्चे को साथ-साथ बच्चे के-औरत भी जा रही है धीरे-धीरे नींद में इस समय एक पत्ता भी नहीं खड़कना चाहिए।

Maine Poocha Kya Kar Rahi Ho | Agyeya 24.01.2025

मैंने पूछा क्या कर रही हो | अज्ञेय  मैंने पूछा यह क्या बना रही हो? उसने आँखों से कहा धुआँ पोंछते हुए कहा- मुझे क्या बनाना है! सब-कुछ अपने आप बनता है। मैने तो यही जाना है। कह लो भगवान ने मुझे यही दिया है। मेरी सहानुभूति में हठ था- मैंने कहा- कुछ तो बना रही हो या जाने दो, न सही बना नहीं रही क्या कर रही हो? वह बोली- देख तो रहे हो छीलती हूँ नमक छिड़कती हूँ मसलती हूँ निचोड़ती हूँ कोड़ती हूँ कसती हूँ फो...

Gharaunda | Ekta Verma 23.01.2025

घरौंदा | एकता वर्मा  धूल में नहाए शैतान बच्चे खेल रहे हैं घरौंदा-घरौंदा। जोड़ रहे हैं ईट के टुकडे, पत्थर, सीमेंट के गुटके बना रहे हैं नन्हे-न्हे घर हँस रहे हैं, तालियाँ पीट रहे हैं। यह फ़िलिस्तीन का दुर्भाग्य है कि उसके बच्चे अपने न्हे घरों को बनाने के लिए चुन रहे हैं मलबा पड़ोसियों के ज़मीदोज़ हुए मकानों से। मैंने पूछा क्या कर रहे हो? 

Ek Bosa | Kaifi Azmi 22.01.2025

एक बोसा | कैफ़ी आज़मी जब भी चूम लेता हूँ उन हसीन आँखों को सौ चराग अँधेरे में जगमगाने लगते हैं फूल क्या शगूफे क्या चाँद क्या सितारे क्या सब रकीब कदमों पर सर झुकाने लगते हैं रक्स करने लगतीं हैं मूरतें अजन्ता की मुद्दतों के लब-बस्ता ग़ार गाने लगते हैं फूल खिलने लगते हैं उजड़े उजड़े गुलशन में प्यासी प्यासी धरती पर अब्र छाने लगते हैं लम्हें भर को ये दुनिया ज़ुल्म छोड़ देती है लम्हें भर को सब पत्थर मुस्...

Ghisi Pencil | Raghuvir Sahay 21.01.2025

घिसी पेंसिल | रघुवीर सहाय  फिर रात आ रही है। फिर वक्त आ रहा है। जब नींद दुःख दिन को संपूर्ण कर चलेंगे एकांत उपस्थत हो, 'सोने चलो' कहेगा क्या चीज़ दे रही है यह शांति इस घड़ी में ? एकांत या कि बिस्तर या फिर थकान मेरी ? या एक मुड़े कागज़ पर एक घिसी पेंसिल तकिये तले दबाकर जिसको कि सो गया हूँ ?

Seekho | Shrinath Singh 20.01.2025

सीखो | श्रीनाथ सिंह फूलों से नित हँसना सीखो, भौंरों से नित गाना। तरु की झुकी डालियों से नित, सीखो शीश झुकाना! सीख हवा के झोकों से लो, हिलना, जगत हिलाना! दूध और पानी से सीखो, मिलना और मिलाना! सूरज की किरणों से सीखो, जगना और जगाना! लता और पेड़ों से सीखो, सबको गले लगाना! वर्षा की बूँदों से सीखो, सबसे प्रेम बढ़ाना! मेहँदी से सीखो सब ही पर, अपना रंग चढ़ाना! मछली से सीखो स्वदेश के लिए तड़पकर मरना! पतझड़...

Apahij Vyatha | Dushyant Kumar 19.01.2025

अपाहिज व्यथा | दुष्यंत कुमार ‎ अपाहिज व्यथा को सहन कर रहा हूँ, तुम्हारी कहन थी, कहन कर रहा हूँ । ये दरवाज़ा खोलो तो खुलता नहीं है, इसे तोड़ने का जतन कर रहा हूँ । अँधेरे में कुछ ज़िन्दगी होम कर दी, उजाले में अब ये हवन कर रहा हूँ । वे सम्बन्ध अब तक बहस में टँगे हैं, जिन्हें रात-दिन स्मरण कर रहा हूँ । तुम्हारी थकन ने मुझे तोड़ डाला, तुम्हें क्या पता क्या सहन कर रहा हूँ । मैं अहसास तक भर गया हूँ लबालब...

Dhool | Hemant Deolekar 18.01.2025

धूल | हेमंत देवलेकर  धीरे-धीरे साथ छोड़ने लगते हैं लोग तब उन बेसहारा और यतीम होती चीज़ों को धूल अपनी पनाह में लेती है। धूल से ज़्यादा करुण और कोई नहीं संसार का सबसे संजीदा अनाथालय धूल चलाती है काश हम कभी धूल बन पाते यूं तो मिट्टी के छिलके से ज़्यादा हस्ती उसकी क्या पर उसके छूने से चीज़ें इतिहास होने लगती हैं। समय के साथ गाढ़ी होते जाना - धूल को प्रेम की तरह महान बनाता  है ओह, हम हमेशा उसे झाड़ देते रहे...

Donon Jahan Teri Mohabbat Me Haar Ke | Faiz Ahmed Faiz 17.01.2025

दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के | फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के वीराँ है मय-कदा ख़ुम-ओ-साग़र उदास हैं तुम क्या गए कि रूठ गए दिन बहार के इक फ़ुर्सत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिन देखे हैं हम ने हौसले पर्वरदिगार के दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया तुझ से भी दिल-फ़रेब हैं ग़म रोज़गार के भूले से मुस्कुरा तो दिए थे वो आज 'फ़ैज़' मत पूछ वलवले...

Berozgaar Hum | Shanti Suman 16.01.2025

बेरोज़गार हम / शांति सुमन पिता किसान अनपढ़ माँ बेरोज़गार हैं हम जाने राम कहाँ से होगी घर की चिन्ता कम आँगन की तुलसी-सी बढ़ती घर में बहन कुमारी आसमान में चिड़िया-सी उड़ती इच्छा सुकुमारी छोटा भाई दिल्ली जाने का भरता है दम । पटवन के पैसे होते तो बिकती नहीं ज़मीन और तकाज़े मुखिया के ले जाते सुख को छीन पतले होते मेड़ों पर आँखें जाती है थम । जहाँ-तहाँ फटने को है साड़ी पिछली होली की झुकी हुई आँखें लगती है...

Tumse Milkar | Gaurav Tiwari 15.01.2025

तुमसे मिलकर | गौरव तिवारी  नदी अकेली होती है, पर उतनी नहीं जितनी अकेली हो जाती है सागर से मिलने के बाद। धरा अत्यधिक अकेली होती है क्षितिज पर, क्योंकि वहाँ मान लिया जाता है उसका मिलन नभ से। भँवरा भी तब तक नहीं होता तन्हा जब तक आकर्षित नहीं होता किसी फूल से। गलत है यह धारणा कि प्रेम कर देता है मनुष्य को पूरा  मैं और भी अकेला हो गया हूँ, तुमसे मिलकर।

Ek Dua | Kaifi Azmi 13.01.2025

एक दुआ | कैफ़ी आज़मी   अब और क्या तेरा बीमार बाप देगा तुझे बस एक दुआ कि ख़ुदा तुझको कामयाब करे वो टाँक दे तेरे आँचल में चाँद और तारे तू अपने वास्ते जिस को भी इंतख़ाब करे

Ghat ti Hui Oxygen | Manglesh Dabral 13.01.2025

घटती हुई ऑक्सीजन | मंगलेश डबराल अकसर पढ़ने में आता है दुनिया में ऑक्सीजन कम हो रही है। कभी ऐन सामने दिखाई दे जाता है कि वह कितनी तेज़ी से घट रही है रास्तों पर चलता हूँ खाना खाता हूँ पढ़ता हूँ सोकर उठता हूँ  एक लम्बी जम्हाई आती है जैसे ही किसी बन्द वातानुकूलित जगह में बैठता हूँ। उबासी का एक झोका भीतर से बाहर आता है एक ताक़तवर आदमी के पास जाता  हूँ  तो तत्काल ऑक्सीजन की ज़रूरत महसूस होती है बढ़ रहे...

Hum Auratein | Viren Dangwal 12.01.2025

हम औरतें | वीरेन डंगवाल रक्त से भरा तसला है रिसता हुआ घर के कोने-अंतरों में हम हैं सूजे हुए पपोटे प्यार किए जाने की अभिलाषा सब्जी काटते हुए भी पार्क में अपने बच्चों पर निगाह रखती हुई प्रेतात्माएँ हम नींद में भी दरवाज़े पर लगा हुआ कान हैं दरवाज़ा खोलते ही अपने उड़े-उड़े बालों और फीकी शक्ल पर पैदा होने वाला बेधक अपमान हैं हम हैं इच्छा-मृग वंचित स्वप्नों की चरागाह में तो चौकड़ियाँ मार लेने दो हमें कम...

Naagrik Parabhav | Kumar Ambuj 11.01.2025

नागरिक पराभव | कुमार अम्बुज बहुत पहले से प्रारंभ करूँ तो उससे डरता हूँ जो अत्यंत विनम्र है कोई भी घटना जिसे क्रोधित नहीं करती बात-बात में ईश्वर को याद करता है जो बहुत डरता हूँ अति धार्मिक आदमी से जो मारा जाएगा अगले दिन की बर्बरता में उसे प्यार करना चाहता हूँ कक्षा तीन में पढ़ रही पड़ोस की बच्ची को नहीं पता आने वाले समाज की भयावहता उसे नहीं पता उसके कर्णफूल गिरवी रखे जा चुके हैं विश्व-बैंक में चिंत...

Karun Prem Khud Se | Shivani Sharma 10.01.2025

करूँ प्रेम ख़ुद से | शिवानी शर्मा  किसी के लिए हूँ मैं ममता की मूरत, किसी के लिए अब भी छोटी सी बेटी ll तजुर्बों ने किया संजीदा मुझको , पर किसी के लिए अब भी अल्हड़ सी छोटी॥ कहीं पे हूँ माहिर, कहीं पे अनाड़ी, कभी लाँघ जाऊँ मुश्किलों की पहाड़ी॥ कभी अनगिनत यूँ ही यादें पिरोती, कभी होके मायूस पलकें भिगोती॥ कभी संग अपनों के बाँटू मैं खुशियाँ, अकेले कभी ढेरों सपने संजोती॥ कभी यूँ लगे जैसे सब कुछ है मेरा,...

Do Minute Ka Maun | Kedarnath Singh 09.01.2025

दो मिनट का मौन | केदारनाथ सिंह  भाइयो और बहनों  यह दिन डूब रहा है। इस डूबते हुए दिन पर दो मिनट का मौन जाते हुए पक्षी पर रुके हुए जल पर घिरती हुई रात पर दो मिनट का मौन जो है उस पर जो नहीं है उस पर जो हो सकता था उस पर दो मिनट का मौन गिरे हुए छिलके पर टूटी हुई घास पर हर योजना पर हर विकास पर दो मिनट का मौन इस महान शताब्दी पर महान शताब्दी के महान इरादों पर महान शब्दों पर और महान वादों पर दो मिनट का मौन...

Bechain Baharon Me Kya Kya Hai | Qateel 08.01.2025

बेचैन बहारों में क्या-क्या है / क़तील बेचैन बहारों में क्या-क्या है जान की ख़ुश्बू आती है जो फूल महकता है उससे तूफ़ान की ख़ुश्बू आती है कल रात दिखा के ख़्वाब-ए-तरब जो सेज को सूना छोड़ गया हर सिलवट से फिर आज उसी मेहमान की ख़ुश्बू आती है तल्कीन-ए-इबादत की है मुझे यूँ तेरी मुक़द्दस आँखों ने मंदिर के दरीचों से जैसे लोबान की ख़ुश्बू आती है कुछ और भी साँसें लेने पर मजबूर-सा मैं हो जाता हूँ जब इतने बड़े...

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