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Pratidin Ek Kavita

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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

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Episódios

Unka Ghar | Hemant Deolekar 20.08.2025

उनका  घर | हेमंत देवलेकर  आग बरसाती दोपहर में तगारियाँ भर- भर कर माल चढ़ा रहे हैं जो ऊपर  घर मेरा बना रहे हैं। जिस छत को भरते हैं अपने हाड़ और पसीने से वे इसकी छाँव में सुस्ताने कभी नहीं आएंगे  इतनी तल्लीनता से एक- एक ईंट की रेत- मसाले की कर रहे तरी वे इस घर  में एक घूँट भर पानी  के लिये कभी नहीं आएंगे | दूर छाँव में खड़ेखड़े हो देखता हूँ  वे सब पक्षियों की तरह दिन रात जैसे अपना ही घोंसला बनाने में ज...

Prateeksha Mein Prem | Chitra Pawar 19.08.2025

प्रतीक्षा में प्रेम | चित्रा पंवार नीलगिरि की पहाड़ी बारह बरस बाद नीलकुरिंजी के खिलने पर ही करती है अपनी देह का शृंगार वह नहीं जाती चंपा, चमेली, गुलाब के पास अपने यौवन का सौंदर्य माँगने अयोध्या व उर्मिला के सत को विचलित नहीं करता चौदह साल का चिर वियोग जानती हैं वो एक दिन लौटेंगे राम अनुज लखन के साथ पार्वती कई जन्मों तक करती है तप बनाती है ख़ुद को राजकुमारी से अपर्णा अर्धनारीश्वर शिव की प्राण प्रिय...

Chipche Doodh Se Nahlate Hain | Gulzar 18.08.2025

चिपचे दूध से नहलाते हैं आँगन में खड़ा कर के तुम्हें | गुलज़ार चिपचे दूध से नहलाते हैं आँगन में खड़ा कर के तुम्हें शहद भी, तेल भी, हल्दी भी, न जाने क्या क्या घोल के सर पे लँढाते हैं गिलसियाँ भर के... औरतें गाती हैं जब तीवर सुरों में मिल कर पाँव पर पाँव लगाए खड़े रहते हो इक पथराई-सी मुस्कान लिए बुत नहीं हो तो, परेशानी तो होती होगी! जब धुआँ देता, लगाता पुजारी घी जलाता है कई तरह के छोंके देकर इक ज़रा...

Raat Kisi Ka Ghar Nahi | Rajesh Joshi 17.08.2025

रात किसी का घर नहीं | राजेश जोशी रात गए सड़कों पर अक्सर एक न एक आदमी ऐसा ज़रूर मिल जाता है जो अपने घर का रास्ता भूल गया होता है कभी-कभी कोई ऐसा भी होता है जो घर का रास्ता तो जानता है पर अपने घर जाना नहीं चाहता एक बूढ़ा मुझे अक्सर रास्ते में मिल जाता है कहता है कि उसके लड़कों ने उसे घर से निकाल दिया है। कि उसने पिछले तीन दिन से कुछ नहीं खाया है। लड़कों के बारे में बताते हुए वह अक्सर रुआँसा हो जाता...

Chipe Raho Bheetar Hi | Nilesh Raghuvanshi 16.08.2025

छिपे रहो भीतर ही | नीलेश रघुवंशी  फर्स्ट अप्रैल, शनिवार, 2000, आधी रात कुछ-कुछ हो रहा है मुझे, शायद तुम अब आने वाले हो सारी दुनिया के बच्चे, सबके सो जाने के बाद ही, क्यों सोचते हैं आने के बारे में मेरे एकदम पास, तुम्हारे पापा सोए हुए हैं क्या उन्हें जगाकर बता देना चाहिए कि तुम आने वाले हो बहुत गहरी नींद में हैं वो-अभी उनमें एक नन्हा-मुन्ना दिख रहा है परी नन्ही-सी या नन्हा-सा राजकुमार, फिर वही बात...

Dincharya | Shrikant Verma 15.08.2025

दिनचर्या | श्रीकांत वर्मा एक अदृश्य टाइपराइटर पर साफ़, सुथरे काग़ज़-सा चढ़ता हुआ दिन, तेज़ी से छपते मकान, घर, मनुष्य और पूँछ हिला गली से बाहर आता कोई कुत्ता। एक टाइपराइटर पृथ्वी पर रोज़-रोज़ छापता है दिल्ली, बंबई, कलकत्ता। कहीं पर एक पेड़ अकस्मात छप करता है सारा दिन स्याही में न घुलने का तप। कहीं पर एक स्त्री अकस्मात उभर करती है प्रार्थना हे ईश्वर! हे ईश्वर! ढले मत उमर। बस के अड्डे पर एक चाय की दु...

Badka Bhaiyya | Rupam Mishra 14.08.2025

 बड़का भइया | रूपम मिश्र  बड़का भइया मेरी मझिगवां वाली दीदी के चचेरे भाई हैं उनकी पीढ़ी में सबसे बड़े और पट्टीदारी में सबसे मातिवर  दीदी की हर सुंदर बात में बड़का भइया होते हैं जैसे कोई व्यक्ति सुंदर है तो वो ज़रूर बड़का भइया की तरह भभकता है  संसार की सारी सौंदर्य उपमायें बड़का भइया के निहोरे पर बनी थी  जैसे बड़का भइया का रंग कैसा है एकदम गोर-अंगार और आँखें आम की फांक दुनिया की जितनी आदर्श और श्रेठता की कह...

Pyaas | Ramdarash Mishra 13.08.2025

प्यास | रामदरश मिश्र  खड़ा हूँ नदी के किनारे प्यासा-प्यासा जल के पास होकर भी जल नहीं पी पा रहा हूँ मैने पूछा- "तुमने अपने पानी का यह क्या रूप बना दिया है नदी?” नदी दर्द से मुस्कराई, बोली "मैंने क्या किया है आदमी यह तो तुम्हारी ही गंदगी है। जो मुझमें झर-झर कर मुझे विषाक्त कर रही है अब तो मैं भी अपना जल नहीं पी पाती प्यासी-प्यासी बह रही हूँ ।"

Daro | Ghanshyam Kumar Devansh 12.08.2025

डरो | घनश्याम कुमार देवांश डरो लेकिन ईश्वर से नहीं एक हारे हुए मनुष्य से सूर्य से नहीं आकाश की नदी में पड़े मृत चंद्रमा से भारी व वज्र कठोर शब्दों से नहीं उनसे जो कोमल हैं और रात के तीसरे पहर धीमी आवाज़ में गाए जाते हैं डरो धार और नोक से नहीं एक नरम घास के मैदान की विशालता और हरियाली से साम्राज्य के विराट ललाट से नहीं एक वृद्ध की नम निष्कंप आँखों से

Jab Dost Ke Pita Marey | Kumar Ambuj 11.08.2025

जब दोस्त के पिता मरे | कुमार अम्बुज बारिश हो रही थी जब दोस्त के पिता मरे भीगते हुए निकली शवयात्रा बारिश की वजह से नहीं आए ज़्यादा लोग जो कंधा दे रहे थे वे एक तरफ़ से भीग रहे थे कम सबसे पहले बारिश होती थी दोस्त के पिता के शव पर दोस्त चल रहा था आगे-आगे निरीह बेहोशी से भरी डगमगाती हुई थी उसकी चाल शमशान में पहुँचकर लगा बारिश में बुझ जाएगी आग कई पुराने लोग थे वहाँ जो कह रहे थे नहीं बुझेगी चिता हम सबने...

Itvaar | Anup Sethi 10.08.2025

इतवार | अनूप सेठी आओ इतवार मनाएँ देर से उठें चाय पिएँ और चाय पिएँ अख़बार को सिर्फ़ उलट पलट लें हाथ न लगाएं सिर्फ़ चाय का गिलास घुमाएँ किसी को न बुलाएँ नहाना भी छोड़ दें खाना अकेले खाएँ बाजार खरीदारी स्थगित कर दें अगले हफ्ते तक केरोसिन ले लें दस रुपए ज़्यादा  देकर एक पुरसुकून दोपहर हो ढीलमढाल पसरे रहें पुरानी एलबम निकालें पहली सालगिरह याद करें बातें करें बचपन की, कालेज की, नाटक की कविताई की सारे सपनों...

Jitne Sabhya Hotey Hain | Vinod Kumar Shukla 09.08.2025

जितने सभ्य होते हैं | विनोद कुमार शुक्ल जितने सभ्य होते हैं उतने अस्वाभाविक। आदिवासी जो स्वाभाविक हैं उन्हें हमारी तरह सभ्य होना है हमारी तरह अस्वाभाविक । जंगल का चंद्रमा असभ्य चंद्रमा है इस बार पूर्णिमा के उजाले में आदिवासी खुले में इकट्ठे होने से डरे हुए हैं और पेड़ों के अंधेरे में दुबके विलाप कर रहे हैं क्योंकि एक हत्यारा शहर बिजली की रोशनी से जगमगाता हुआ सभ्यता के मंच पर बसा हुआ है ।

Gumshuda Guldaste | Adnan Kafeel Darwesh 08.08.2025

गुमशुदा गुलदस्ते | अदनान कफ़ील दरवेश  कुछ पेड़ हैं वहाँ पानी की तरह ठोस और हवा की तरह नर्म और आसमान-से हल्के-गुलाबी फूल उनमें खिलते काँटों-से बेशुमार दहकते शोलों-से दूर से चमकते... कच्चे रास्ते इशारों-से नाज़ुक झुके चले आते मेरी तरफ़ जहाँ तुम्हारी यादों के गुमशुदा गुलदस्ते ढूँढ़ते हैं मेरे पाँव... इन तुर्श अँधेरों में अपनी खोई उम्र को सोचता भटकता हूँ जहाँ बर्फ़ से भी तेज़  गल जाती हैं यादें..

Pratham Milan | Adnan Kafeel Darwesh 07.08.2025

प्रथम मिलन | अदनान कफ़ील दरवेश  एक दिन भाषा की चमकीली चप्पल उतार कर  आऊँगा तुम से मिलने  अपने प्रथम मिलन में मैं अधिक बोलने से परहेज़ करूँगा  और अपनी आत्मा का हर बोझ उतार कर तुमसे मिलना चाहूँगा  तुम्हारे मन के साँकल को हल्के-हल्के खटखटाउँगा  तुम्हारी देह भाषा को पढ़ने के बजाए  सुनना ज़्यादा पसंद करूँगा  तुम भी वक़्त लेकर आना मुझसे मिलने   एक सदी की गूँज हूँ  मैं अपने एकांत में  मुझे बूझने का भरपूर अवसर...

Tumhare Baare Mein | Bhawani Prasad Mishra 06.08.2025

तुम्हारे बारे में | भवानी प्रसाद मिश्र तुम्हारे बारे में, तुमसे ही कहूँ तुम्हें देखकर बढ़ जाती है मशालों की ज्योति मोती हो जाता है ज़्यादा पानी दार आभार-सा मानता हैं हर प्रकाश का पुंज  कुंज ज़्यादा हरे हो जाते हैं  नदी-नद ज़्यादा भरे हो जाते हैं वन हो पाते हैं उन्मन पवन उतना चंचल नहीं रहता सृष्टि का श्रम जिस दिन मेरे हाथ में आयेगा मैं हर जगह तुम्हें पेश कर दूँगा सारे अविशेषों को स्पर्श से तुम्हारे सरा...

Swapn Me Bhi Swapn Ke Bahar | Adnan Kafeel Darwesh 05.08.2025

स्वप्न में भी स्वप्न के बाहर | अदनान कफ़ील दरवेश  सोचो तो घर भी एक गुल्लक है। जिसमें बजते हैं तरल-ठोस दिन खड़-खड़ उदास... कागज़ हैं दीवारें जिन्हें सोख लिया है ढेर सारे समय का बजता पानी अहाते में हैं इमली और अमरूद के चमकदार दरख़्त दो बुज़ुर्गों की तरह खड़े शायद बच्चे हों बुत बने किसी बरहम हुए खेल के बीच रेहल पर धरा है कलाम-पाक हरे ग़िलाफ़ में बन्द रोककर समय की धार दीवार घड़ी मुँह फेरे टँगी है अलमारी क...

Samaj Unhe Mardana Kehta Hai | Ekta Verma 04.08.2025

समाज उन्हें मर्दाना कहता है | एकता वर्मा  जो राजाओं के युद्ध से लौटने का इन्तिज़ार नहीं करती  उनके पीछे जौहर नहीं करती  बल्कि निकलती हैं संतान को पीठ पर बाँध कर  तलवार खींच कर रणभूमि में  समाज उन्हें मर्दाना कहता है  जो थाली में छोड़ी गई जूठन से संतोष नहीं  धरती जो अपनी हथेलियों से दरेर कर तोड़ देती हैं भूख के जबड़े  जो खाती हैं घर के मर्दों से देवढी ख़ुराक  और पीती हैं लोटा भर पानी  समाज उन्हें मर्दान...

Churchgate Ka Platform | Anup Sethi 03.08.2025

चर्चगेट का प्लेट्फॉर्म | अनूप सेठी शाम के समय जब प्लेटफॉर्म बहुत व्यस्त होता है ढलती धूप के चौकोर टुकड़े पैरों से खचाखच भरते जाते हैं रीत जाते हैं फिर भर जाते हैं दीवारों पर लगे बड़े पँखों की हवा में साँस लेने पसीना सुखाने किसी का इंतज़ार करने को रुक जाते हैं कई लोग दो-दो मिनट में लोगों का रेला आता है दनदनाता धकियाता छूता आसपास गुजर जाता है जैसे टयूब वैल का बंबा छूटता है रुक रुक कर कलकल करता सिहरात...

Deh | Devi Prasad Mishra 02.08.2025

देह |  देवी प्रसाद मिश्र देह प्रेम के काम आती है। वह यातना देने और सहने के काम आती है। पीटने में जला देने में आत्मा को तबाह करने के लिये कई बार राज्य और धर्म देह को अधीन बनाते हैं बाज़ार भी करता है यह काम वह देह को इतना सजावटी बना देता है कि उसे सामान बना देता है बहुत दुःख की तुलना में बहुत सुख से ख़त्म होती है आत्मा

Ilahabad | Satyam Tiwari | Satyam Tiwari 01.08.2025

इलाहबाद | सत्यम तिवारी  तय तो यही हुआ था  घोर असहमति के साथ जब भी वर्षा होगी  हम यात्रा पर निकलेंगे  असबाब उतना ही रहेगा  जितना एक नाव पर सिमट आए  भटकाव की सहूलत मिलेगी  और निरपराध की भावना  फिर भी कैसे तुमने मेरे रेतीले अस्तित्व को पग पग पर भास्काया  जैसे रेत से घर नहीं बन सकता  जैसे हम चाहते भी तो उसमें रह नहीं पाते  तब से लेकर अब तक न जाने कितनी बरसातें बीतीं  इलाहबाद डूबता रहा आकंठ  और सिर्फ़ न...

Todna Aur Banana | Priyadarshan 31.07.2025

तोड़ना और बनाना | प्रियदर्शन बनाने में कुछ जाता है नष्ट करने में नहीं बनाने में मेहनत लगती है. बुद्धि लगती है, वक्त लगता है तोड़ने में बस थोड़ी सी ताकत और थोड़े से मंसूबे लगते हैं। इसके बावजूद बनाने वाले तोड़ने वालों पर भारी पड़ते हैं वे बनाते हुए जितना हांफते नहीं, उससे कहीं ज़्यादा तोड़ने वाले हांफते हैं। कभी किसी बनाने वाले के चेहरे पर थकान नहीं दिखती पसीना दिखता है, लेकिन मुस्कुराता हुआ, खरोंच...

Prashn | Kunwar Narayan 30.07.2025

प्रश्न | कुँवार नारायण तारों की अंध गलियों में  गूँजता हुआ उद्दंड उपहास...   वह मेरा प्रश्न है विशाल आडंबर, अभी चुभती दृष्टि की गर्म खोज में मैंने  प्रश्नाहत जिस विराट हिमपुरुष को गलते हुए देखा... क्या वह तेरा उत्तर था?

Mom Ka Ghoda | Dushyant Kumar 29.07.2025

मोम का घोड़ा | दुष्यंत कुमार मैने यह मोम का घोड़ा, बड़े जतन से जोड़ा, रक्त की बूँदों से पालकर सपनों में ढालकर बड़ा किया, फिर इसमें प्यास और स्पंदन गायन और क्रंदन सब कुछ भर दिया, औ’ जब विश्वास हो गया पूरा अपने सृजन पर, तब इसे लाकर आँगन में खड़ा किया! माँ ने देखा—बिगड़ीं; बाबूजी गरम हुए; किंतु समय गुज़रा... फिर नरम हुए। सोचा होगा—लड़का है, ऐसे ही स्वाँग रचा करता है। मुझे भरोसा था मेरा है, मेरे काम आए...

Ant Mein | Sarveshwar Dayal Saxena 28.07.2025

अन्त में | सर्वेश्वरदयाल सक्सेना अब मैं कुछ कहना नहीं चाहता, सुनना चाहता हूँ एक समर्थ सच्ची आवाज़ यदि कहीं हो। अन्यथा इसके पूर्व कि मेरा हर कथन हर मंथन हर अभिव्यक्ति शून्य से टकराकर फिर वापस लौट आए, उस अनंत मौन में समा जाना चाहता हूँ जो मृत्यु है। ‘वह बिना कहे मर गया’ यह अधिक गौरवशाली है यह कहे जाने से— ‘कि वह मरने के पहले कुछ कह रहा था जिसे किसी ने सुना नहीं।’

Dhoomil Ki Antim Kavita | Dhoomil 27.07.2025

 धूमिल की अंतिम कविता | धूमिल शब्द किस तरह कविता बनते हैं इसे देखो अक्षरों के बीच गिरे हुए आदमी को पढ़ो क्या तुमने सुना कि यह लोहे की आवाज़ है या मिट्टी में गिरे हुए ख़ून का रंग लोहे का स्वाद लोहार से मत पूछो उस घोड़े से पूछो जिसके मुँह में लगाम है।

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