Nayi Dhara Radio

Pratidin Ek Kavita

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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

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Categoria

Arts

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11 de jul de 2026

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Episódios

Bolne Mein Kam Se Kam Bolun | Vinod Kumar Shukla 14.09.2025

बोलने में कम से कम बोलूँ | विनोद कुमार शुक्ल बोलने में कम से कम बोलूँ कभी बोलूँ, अधिकतम न बोलूँ इतना कम कि किसी दिन एक बात बार-बार बोलूँ जैसे कोयल की बार-बार की कूक फिर चुप। मेरे अधिकतम चुप को सब जान लें जो कहा नहीं गया, सब कह दिया गया का चुप। पहाड़, आकाश, सूर्य, चंद्रमा के बरक्स एक छोटा सा टिम-टिमाता मेरा भी शाश्वत छोटा-सा चुप। ग़लत पर घात लगाकर हमला करने के सन्नाटे में मेरा एक चुप- चलने के पहले...

Ghar Ki Ore | Naresh Mehta 13.09.2025

घर की ओर | नरेश मेहता  वह- जिसकी पीठ हमारी ओर है अपने घर की ओर मुँह किये जा रहा है जाने दो उसे अपने घर। हमारी ओर उसकी पीठ- ठीक ही तो है मुँह यदि होता तो भी, हमारे लिए वह सिवाय एक अनाम व्यक्ति के और हो ही क्या सकता था? पर अपने घर-परिवार के लिए तो वह केवल मुँह नहीं एक सम्भावनाओं वाली ऐसी संज्ञा जिसके साथ सम्बन्धों का इतिहास होगा और होगी प्रतीक्षा करती राग की एक सम्पूर्ण भागवत-कथा। तभी तो वह- हाथ में...

Gaza Mein Ramzaan | Shahanshah Alam 12.09.2025

ग़ज़ा में रमज़ान | शहंशाह आलम ग़ज़ा में रमज़ान का चाँद निकला है यह चाँद कितने चक्कर के बाद बला का ख़ूबसूरत दिखाई देता है किसी खगोल विज्ञानी को मालूम होगा उस लड़की को भी मालूम होगा जिसके जूड़े में पिछली ईद वाली रात टांक दिया था मैंने यही चाँद लेकिन ग़ज़ा में निकला यह चाँद ग़ज़ा की प्रेम करने वाली लड़कियों को उतना ही ख़ूबसूरत दिखाई देता होगा जितना मुझसे प्रेम करने वाली लड़की को या उन्हें चाँद की जगह...

Bahut Dinon Se | Muktibodh 11.09.2025

बहुत दिनों से | गजानन माधव मुक्तिबोध मैं बहुत दिनों से बहुत दिनों से बहुत-बहुत सी बातें तुमसे चाह रहा था कहना और कि साथ यों साथ-साथ फिर बहना बहना बहना मेघों की आवाज़ों से कुहरे की भाषाओं से रंगों के उद्भासों से ज्यों नभ का कोना-कोना है बोल रहा धरती से जी खोल रहा धरती से त्यों चाह रहा कहना उपमा संकेतों से रूपक से, मौन प्रतीकों से मैं बहुत दिनों से बहुत-बहुत-सी बातें तुमसे चाह रहा था कहना! जैसे मैदा...

Safar Mein Dhoop To Hogi | Nida Fazli 10.09.2025

सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो | निदा फ़ाज़ली सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो कहीं नहीं कोई सूरज धुआँ धुआँ है फ़ज़ा ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें इन्हीं खिल...

Preeti-Bhaint | Shrikant Verma 09.09.2025

प्रीति-भेंट | श्रीकांत वर्मा इतने दिनों के बाद अकस्मात मिले तो आँसुओं ने उसके उसे, मेरे मुझे भरमा दिया, आँसू जब थमे तो मैं कुछ और था, वह कुछ और- वह मेरी आँखों में, मैं उसकी आँखों में ढूँढ़ रहा था शंका, अविश्वास और याचना से ठौर!

Havan | Shrikant Verma 08.09.2025

हवन | श्रीकांत वर्मा चाहता तो बच सकता था मगर कैसे बच सकता था जो बचेगा कैसे रचेगा पहले मैं झुलसा फिर धधका चिटखने लगा कराह सकता था मगर कैसे कराह सकता था जो कराहेगा कैसे निबाहेगा न यह शहादत थी न यह उत्सर्ग था न यह आत्मपीड़न था न यह सज़ा थी तब क्या था यह किसी के मत्थे मढ़ सकता था मगर कैसे मढ़ सकता था जो मढ़ेगा कैसे गढ़ेगा।

Tumse Milne Par | Sunil Gangopadhyay 07.09.2025

तुमसे मिलने पर | सुनील गंगोपाध्याय अनुवाद : रोहित प्रसाद पथिक तुमसे मिलने पर मैं पूछता हूँ : तुम मनुष्य से प्रेम नहीं करते हो, पर देश से क्यों प्रेम करते हो? देश तुम्हें क्या देगा? देश क्या ईश्वर के जैसा है कुछ? तुमसे मिलने पर मैं पूछता हूँ : बंदूक़ की गोली ख़रीदने के बाद प्राण देने पर देश कहाँ पर होगा? देश क्या जन्म-स्थान की मिट्टी है या कि काँटेदार तार की सीमा? बस से उतरकर जिसकी तुमने हत्या की क्य...

Amramanjariyon Ki Gandh | Gyanendrapati 06.09.2025

आम्र-मंजरियों की गंध | ज्ञानेन्द्रपति  आम्र-मंजरियों की गंध बसी रही मेरे घर में तुम्हारे जाने के बाद पिछली बार अबके तो तुम्हारे जाने के बाद आम्र-मंजरियों की गंध उठने लगी है मुझ से भीनी-भीनी 

Nahi Dikhegi Ma | Vishwanath Prasad Tiwari 05.09.2025

नहीं दिखेगी माँ | विश्वनाथ प्रसाद तिवारी  नहीं दिखेगी माँ फिर कभी इस रूप में भोर होगा भिनुसार चिरैया एक बोलेगी तिलक चढ़ेगा यज्ञोपवीत होगा कन्यादान बस माँ नहीं होगी पराती गाने के लिए घिरेगी संझा चौखट पर जलेगा दीया आकाश में उगेंगे चंदामामा बस माँ नहीं होगी उन्हें दूध-भात खिलाने के लिए बरसेंगी रातें आँगन में झमाझम धूप में धू- धू जलेगा गाँव चलेंगी पुरवा और पछुआ हवाएँ मृग की आँखों-सी चमकेगी बिजली उत्तर...

Ek Fantasy | Dharamvir Bharti 04.09.2025

एक फ़ैंटसी | धर्मवीर भारती साँझ के झुटपुटे में, जब कि दूर आस्माँ पर एक धुआँ-सा छा रहा था, तारे अकुला रहे थे, चाँद थर्रा रहा था चोट इतनी गहरी थी, कि बादलों के सीने से ख़ून उबला आ रहा था, पास की पगडंडी से एक राही कंधों पर अपनी ही लाश लादे धीमे-धीमे जा रहा था गीतों के कंकाल झूठे प्यार के मसान में, धधकती चिताओं के पास बैठे गा रहे थे, अपने सूखे हाथों से, अपनी पसलियों को तोड़-तोड़ चूर-चूर कर चिताओं पर ब...

Bhoolna | Rachit 03.09.2025

भूलना | रचित कितना भयावह है भूलने के बाद सिर्फ़ यह याद रहना कि कुछ भूल गए हैं उससे भी ज़्यादा पीड़ादायक है यह अनुभूति कि वह भूला हुआ जब भी याद आएगा हम जान नहीं पाएँगे कि यही तो भूले थे किसी उदास दिन।

Wahi Nahi Tha Premi | Anupam Singh 02.09.2025

वही नहीं था प्रेमी | अनुपम सिंह किसी दिन तुम पूछोगे मेरे प्रेमियों के नाम मैं अपना निजी कहकर टाल जाऊँगी लेकिन प्रेमी वही नहीं था जिसने कोई वादा किया और निभाया भी जिसके साथ मैं पाई गई सिविल लाइंस के कॉफी हाउस में जिसके साथ बहुत सारी कहानियाँ बनीं और शहर की दीवार पर गाली की तरह चस्पां की गई वह भी था जिसके आगोश में जाड़े की आग मुझे पहली बार प्रिय लगी जिसने कोई वादा नहीं किया और स्वप्न टूटने से पहले ह...

Raat ka Ped | Rahi Masoom Raza 01.09.2025

रात का पेड़ | राही मासूम रज़ा रास्ते चाँदनी ओढ़ कर सो गए झील पर नींद की सिलवटें पड़ गईं आहटें पहले पीली पड़ीं और फिर एक-एक करके सब झड़ गईं रात का पेड़ दस्ते-दुआ बन गया अपनी ही ज़ात से अपने ही आपके बीच का फ़ासिला बन गया दर्द का रास्ता बन गया एक बूढ़ा पुर-असरार दरवेश जो सैकड़ों हाथ अपने उठाए हुए आसमाँ की तरफ़ देखते-देखते थक गया आसमाँ चुप रहा रात के पेड़ के हाथ दुखने लगे फिर वही पेड़ वहशत का इक सिलसि...

Saanp | Farhat Ehsaas 31.08.2025

साँप | फ़रहत एहसास साँप लपेटे घूम रहा हूँ दुनिया मुझ से ख़ौफ़-ज़दा है सब मुझ को अच्छे लगते हैं लेकिन यूँ है जिस लड़की को चाहा मैं ने जिस लड़के को दोस्त बनाया जिस घर में माँ बाप बनाए जिस मस्जिद में घुटने टेके सब ने मेरा साँप ही देखा मुझ को कोई देख न पाया मैं सब को कैसे समझाऊँ ये दुनिया का साँप नहीं है मेरे साथ पला पोसा है ये मेरा माँ जाया बस मुझ को डसता है

Dil Dukhta Hai | Mohsin Naqvi 30.08.2025

दिल दुखता है | मोहसिन नक़वी दिल दुखता है आबाद घरों से दूर कहीं जब बंजर बन में आग जले दिल दुखता है परदेस की बोझल राहों में जब शाम ढले दिल दुखता है जब रात का क़ातिल सन्नाटा पुर-हौल फ़ज़ा के वहम लिए क़दमों की चाप के साथ चले दिल दुखता है

Depression | Mohammad Alvi 29.08.2025

डिप्रेशन | मोहम्मद अल्वी कोई हादसा कोई सानेहा*  कोई बहुत ही बुरी ख़बर अभी कहीं से आएगी! ऐसी जाँ-लेवा फ़िक्रों में सारा दिन डूबा रहता हूँ रात को सोने से पहले अपने-आप से कहता हूँ भाई मिरे दिन ख़ैर से गुज़रा घर में सब आराम से हैं कल की फ़िक्रें कल के लिए उठा रक्खो मुमकिन हो तो अपने-आप को मौत की नींद सुला रक्खो!! *अप्रिय घटना

Deewar | Zbigniew Herbert | Translation-Agnieszka Kuczkiewicz-Fraś and Kunwar Narayan 28.08.2025

दीवार/ ज़्बीग्न्येव हेर्बेर्त अनुवादक आग्नयेष्का कूच्क्येविच-फ़्राश और कुँवर नारायण हम सब दीवार से लगकर खड़े हैं।  हमारी जवानी क़ैदियों की क़मीज़ की तरह उतरवा ली गई हैं।  हम प्रतीक्षा कर रहे हैं।  एक चिपचिपी गोली गुद्दी पर लगने से पहले दस-बीस वर्ष गुज़र रहे।  दीवार ऊँची और मज़बूत है।  दीवार के पीछे एक पेड़ है और एक सितारा।  पेड़ की जड़ें दीवार के नीचे धँस कर उसे फोड़ रहीं।  सितारा पत्थर को एक चूहे क...

Agni Desh Se Aata Hun Main | Harivansh Rai Bachchan 27.08.2025

अग्नि देश से आता हूँ मैं |  हरिवंशराय बच्चन अग्नि देश से आता हूँ मैं! झुलस गया तन, झुलस गया मन, झुलस गया कवि-कोमल जीवन, किंतु अग्नि वीणा पर अपने,  दग्ध कंठ से गाता हूँ मैं! अग्नि देश से आता हूँ मैं! कंचन ही था जो बच पाया  उसे लुटाता मग में आया, दीनों का मैं वेश किए  हूँ ,  दीन नहीं हूँ, दाता हूँ मैं! अग्नि देश से आता हूँ मैं! तुमने अपने कर फैलाए, लेकिन देर बड़ी कर आए, कंचन तो लुटा चुका, पथिक,  अब...

Pret Lok Mein | Maksim Tank | Translation - Ramesh Kaushik 26.08.2025

प्रेत लोक में/ मक्सिम तान्क अनुवाद: रमेश कौशिक एक बार मैं प्रेत-लोक में गया दांते के संग उसके अँधियारे घेरों में घूम रहे थे हम तभी कवि रुक गया अचम्भे में आ विश्वास नहीं था जो कुछ उसने देखा पहली बार अँधेरे की वह दुनिया दुःख से बोझिल प्रेतों की दुनिया जब देखी थी उसने तब से अब तक जाने कितने और नए घेरे बन आए जो प्राचीन काल में अनजाने थे।

Bura Kshan | Rafael Alberti | Jeetendra Kumar 25.08.2025

बुरा क्षण/ रफ़ाइल अलबर्ती अनुवाद : जितेंद्र कुमार उन दिनों जब मैं सोचा करता था कि गेहूँ के खेतों में देवताओं और सितारों का निवास है और कुहरा हिरनी की आँख का आँसू किसी ने मेरे सीने और छाया को पोत दिया ऐसे में चला गया यह वह क्षण था जब बंदूक़ की गोलियाँ पगला उठी थीं समुद्र उन लोगों को बहाकर ले गया जो चिड़िया बनना चाहते थे बेतार संदेश बुरी ख़बरें ही लाते थे ख़ून की और उस जल की मृत्यु की जो सदा से आकांश ता...

Bairang Benaam Chithiyaan | Ramdarash Mishra 24.08.2025

बैरंग बेनाम चिट्ठियाँ | रामदरश मिश्र कब से यह बैरंग बेनाम चिट्ठी लिये हुए यह डाकिया दर-दर घूम रहा है  कोई नहीं है वारिस इस चिट्ठी का कौन जाने किसका अनकहा दर्द किसके नाम इस बन्द लिफाफे में पत्ते की तरह काँप रहा है? मैंने भी तो एक बैरंग चिट्ठी छोड़ी है पता नहीं किसके नाम? शायद वह भी इसी तरह सतरों के होंठों में अपने दर्द कसे यहाँ-वहाँ घूम रही होगी मित्रों! हमारी तुम्हारी ये बैरंग लावारिस चिट्टठियाँ प...

Jeevan | Malay 23.08.2025

जीवन/ मलय अथाह गहराइयों की आँख से देखता हूँ ब्रह्मांड सतह पर तैरता यह जीवन छोटे से छोटा है

Ichha | Shubha 22.08.2025

इच्छा | शुभा मैं चाहती हूँ कुछ अव्यवहारिक लोग एक गोष्ठी करें कि समस्याओं को कैसे बचाया जाए उन्हें जन्म लेने दिया जाए वे अपना पूरा क़द पाएँ वे खड़ी हों और दिखाई दें उनकी एक भाषा हो और कोई उन्हें सुने

Ishq Mein Referee Nahi Hota | Gulzar 21.08.2025

इश्क़ में ‘रेफ़री’ नहीं होता! | गुलज़ार इश्क़ में ‘रेफ़री’ नहीं होता ‘फ़ाउल’ होते हैं बेशुमार मगर ‘पेनल्टी कॉर्नर’ नहीं मिलता! दोनों टीमें जुनूँ में दौड़ती, दौड़ाए रहती हैं छीना-झपटी भी, धौल-धप्पा भी बात बात पे ‘फ़्री किक’ भी मार लेते हैं और दोनों ही ‘गोल’ करते हैं! इश्क़ में जो भी हो वो जाईज़ है इश्क़ में ‘रेफ़री’ नहीं होता!

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