Nayi Dhara Radio

Pratidin Ek Kavita

Arts HI ↓ 1195 episódios

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

Não deixe de visitar o site do podcast e apoiar quem o produz: nayidhara.in

Autor

Nayi Dhara Radio

Categoria

Arts

Site do podcast

nayidhara.in

Último episódio

11 de jul de 2026

Onde ouvir?

Podcasts no app Replaio Radio Em breve

Os podcasts estão chegando ao app. Instale agora e seja o primeiro a descobrir um jeito totalmente novo de curtir podcasts

Baixe no Google Play Instale grátis Android 5 mi+ downloads · nota 4,8 iOS em breve

Episódios

Ulahna | Agyeya 03.11.2025

उलाहना।अज्ञेय नहीं, नहीं, नहीं! मैंने तुम्हें आँखों की ओट किया पर क्या भुलाने को? मैंने अपने दर्द को सहलाया पर क्या उसे सुलाने को? मेरा हर मर्माहत उलाहना साक्षी हुआ कि मैंने अंत तक तुम्हें पुकारा! ओ मेरे प्यार! मैंने तुम्हें बार-बार, बार-बार असीसा तो यों नहीं कि मैंने बिछोह को कभी भी स्वीकारा। नहीं, नहीं, नहीं!

Pansokha Hai Indradhanush | Madan Kashyap 02.11.2025

पनसोखा है इन्द्रधनुष - मदन कश्यप  पनसोखा है इन्द्रधनुष आसमान के नीले टाट पर मखमली पैबन्द की तरह फैला है।  कहीं यह तुम्हारा वही सतरंगा दुपट्टा तो नहीं  जो कुछ ऐसे ही गिर पड़ा था मेरे अधलेटे बदन पर  तेज़ साँसों से फूल-फूल जा रहे थे तुम्हारे नथने  लाल मिर्च से दहकते होंठ धीरे-धीरे बढ़ रहे थे मेरी ओर  एक मादा गेहूँअन फुंफकार रही थी  क़रीब आता एक डरावना आकर्षण था  मेरी आत्मा खिंचती चली जा रही थी जिसकी ओर...

Buddhu | Shankh Ghosh 01.11.2025

बुद्धू।शंख घोष मूल बंगला से अनुवाद : प्रयाग शुक्ल कोई हो जाये यदि बुद्धू अकस्मात, यह तो वह जान नहीं पाएगा खुद से। जान यदि पाता यह फिर तो वह कहलाता बुद्धिमान ही। तो फिर तुम बुद्धू नहीं हो यह तुमने कैसे है लिया जान?

Meri Khata | Amrita Pritam 31.10.2025

मेरी ख़ता । अमृता प्रीतम अनुवाद : अमिया कुँवर जाने किन रास्तों से होती और कब की चली मैं उन रास्तों पर पहुँची जहाँ फूलों लदे पेड़ थे और इतनी महक थी— कि साँसों से भी महक आती थी अचानक दरख़्तों के दरमियान एक सरोवर देखा जिसका नीला और शफ़्फ़ाफ़ पानी दूर तक दिखता था— मैं किनारे पर खड़ी थी तो दिल किया सरोवर में नहा लूँ मन भर कर नहाई और किनारे पर खड़ी जिस्म सुखा रही थी कि एक आसमानी आवाज़ आई यह शिव जी का सर...

Purani Baatein | Shraddha Upadhyay 30.10.2025

पुरानी बातें | श्रद्धा उपाध्याय  पहले सिर्फ़ पुरानी बातें पुरानी लगती थीं  अब नई बातें भी पुरानी हो गई हैं  मैंने सिरके में डाल दिए हैं कॉलेज के कई दिन  बचपन की यादें लगता था सड़ जाएँगी  फिर किताबों के बीच रखी रखी सूख गईं  कितनी तरह की प्रेम कहानियाँ  उन पर नमक घिस कर धूप दिखा दी है  ज़रुरत होगी तो तल कर परोस दी जाएँगी और इतना कुछ फ़िसल हुआ हाथों से  क्योंकि नहीं आता था उन्हें कोई हुनर

Khali Makaan | Mohammad Alvi 29.10.2025

ख़ाली मकान।मोहम्मद अल्वी जाले तने हुए हैं घर में कोई नहीं ''कोई नहीं'' इक इक कोना चिल्लाता है दीवारें उठ कर कहती हैं ''कोई नहीं'' ''कोई नहीं'' दरवाज़ा शोर मचाता है कोई नहीं इस घर में कोई नहीं लेकिन कोई मुझे इस घर में रोज़ बुलाता है रोज़ यहाँ मैं आता हूँ हर रोज़ कोई मेरे कान में चुपके से कह जाता है ''कोई नहीं इस घर में कोई नहीं पगले किस से मिलने रोज़ यहाँ तू आता है''

Kahan Tak Waqt Ke Dariya Ko | Shahryar 28.10.2025

कहाँ तक वक़्त के दरिया को । शहरयार कहाँ तक वक़्त के दरिया को हम ठहरा हुआ देखें ये हसरत है कि इन आँखों से कुछ होता हुआ देखें बहुत मुद्दत हुई ये आरज़ू करते हुए हम को कभी मंज़र कहीं हम कोई अन-देखा हुआ देखें सुकूत-ए-शाम से पहले की मंज़िल सख़्त होती है कहो लोगों से सूरज को न यूँ ढलता हुआ देखें हवाएँ बादबाँ खोलीं लहू-आसार बारिश हो ज़मीन-ए-सख़्त तुझ को फूलता-फलता हुआ देखें धुएँ के बादलों में छुप गए उजले...

Kharab Television Par Pasandeeda Programme | Satyam Tiwari 27.10.2025

ख़राब टेलीविज़न पर पसंदीदा प्रोग्राम देखते हुए | सत्यम तिवारी  दीवारों पर उनके लिए कोई जगह न थी  और नए का प्रदर्शन भी आवश्यक था  इस तरह वे बिल्लियों के रास्ते में आए  और वहाँ से हटने को तैयार न हुए  यहीं से उनकी दुर्गति शुरू हुई  उनका सुसज्जित थोबड़ा बिना ईमान के डर से बिगड़ गया  अपने आधे चेहरे से आदेशवत हँसते हुए  वे बिल्कुल उस शोकाकुल परिवार की तरह लगते  जिनके घर कोई नेता खेद व्यक्त करने पहुँच जात...

Free Will | Darpan Sah 26.10.2025

 फ़्री विल । दर्पण साह  अगस्त का महिना हमेशा जुलाई के बाद आता है, ये साइबेरियन पक्षियों को नहीं मालूम मैं कोई निश्चित समय-अंतराल नहीं रखता दो सिगरेटों के बीच खाना ठीक समय पर खाता हूँ और सोता भी अपने निश्चित समय पर हूँ अपने निश्चित समय पर क्रमशः जब नींद आती है और जब भूख लगती है इससे ज़्यादा ठीक समय का ज्ञान नहीं मुझे जब चीटियों की मौत आती है, तब उनके पंख उगते हैं और जब मेरी इच्छा होती है तब दिल्ली म...

Prarthna | Antonio Rinaldi | Translation - Dharamvir Bharti 25.10.2025

प्रार्थना। अन्तोन्यो रिनाल्दी अनुवाद : धर्मवीर भारती सई साँझ आँखें पलकों में सो जाती हैं अबाबीलें घोसलों में और ढलते दिन में से आती हुई एक आवाज़ बतलाती है मुझे अँधेरे में भी एक संपूर्ण दृष्टि है मैं भी थक कर पड़ रहा हूँ जैसे उदास घास की गोद में फूल धूप के साथ सोने के लिए हवा हमारी रखवाली करे— हमें जीत ले यह आस्मान की निचाट ज़िंदगी जो हर दर्द को धारण करती है

Lagta Nahi Hai Dil Mera | Bahadur Shah Zafar 24.10.2025

लगता नहीं है दिल मिरा उजड़े दयार में । बहादुर शाह ज़फ़र लगता नहीं है दिल मिरा उजड़े दयार में किस की बनी है आलम-ए-ना-पाएदार में इन हसरतों से कह दो कहीं और जा बसें इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़-दार में काँटों को मत निकाल चमन से ओ बाग़बाँ ये भी गुलों के साथ पले हैं बहार में बुलबुल को बाग़बाँ से न सय्याद से गिला क़िस्मत में क़ैद लिक्खी थी फ़स्ल-ए-बहार में कितना है बद-नसीब 'ज़फ़र' दफ़्न के लिए दो गज़ ज़म...

Ghaas | Carl Sandburg | Translation - Dharamvir Bharti 23.10.2025

घास । कार्ल सैंडबर्ग अनुवाद : धर्मवीर भारती आस्टरलिज़ हो या वाटरलू लाशों का ऊँचे से ऊँचा ढेर हो— दफ़ना दो; और मुझे अपना काम करने दो! मैं घास हूँ, मैं सबको ढँक लूँगी और युद्ध का छोटा मैदान हो या बड़ा और युद्ध नया हो या पुराना ढेर ऊँचे से ऊँचा हो, बस मुझे मौक़ा भर मिले दो बरस, दस बरस—और फिर उधर से गुज़रने वाली बस के मुसाफ़िर पूछेंगे : यह कौन सी जगह है? हम कहाँ से होकर गुज़र रहे हैं? यह घास का मैदान कैसा...

Jo Ulajh Kar Rah Gayi Filon Ke Jaal Mein | Adam Gondvi 22.10.2025

जो उलझकर रह गई है फ़ाइलों के जाल में । अदम गोंडवी जो उलझकर रह गई है फ़ाइलों के जाल में गाँव तक वह रौशनी आएगी कितने साल में बूढ़ा बरगद साक्षी है किस तरह से खो गई रमसुधी की झोंपड़ी सरपंच की चौपाल में खेत जो सीलिंग के थे सब चक में शामिल हो गए हमको पट्टे की सनद मिलती भी है तो ताल में जिसकी क़ीमत कुछ न हो इस भीड़ के माहौल में ऐसा सिक्का ढालिए मत जिस्म की टकसाल में

Aastha | Priyankshi Mohan 21.10.2025

 आस्था | प्रियाँक्षी मोहन इस दुनिया को युद्धों ने उतना  तबाह नहीं किया  जितना तबाह कर दिया प्यार करने की झूठी तमीज़ ने प्यार जो पूरी दुनिया में वैसे तो एक सा ही  था पर उसे करने की सभी ने अपनी अपनी शर्त रखी  और प्यार को कई नाम,  कविताओं, कहानियों,  फूलों, चांद तारों और जाने किन किन उपमाओं में बांट दिया जबकि प्यार को उतना ही नग्न और निहत्था होना था जितना किसी पर अटूट  आस्था रखना होता है वह सच्ची आस्...

Anubhav | Nilesh Raghuvanshi 20.10.2025

अनुभव | नीलेश रघुवंशी  तो चलूँ मैं अनुभवों की पोटली पीठ पर लादकर बनने लेखक लेकिन  मैंने कभी कोई युद्ध नहीं देखा खदेड़ा नहीं गया कभी मुझे अपनी जगह से नहीं थर्राया घर कभी झटकों से भूकंप के पानी आया जीवन में घड़ा और बारिश बनकर विपदा बनकर कभी नहीं आई बारिश दंगों में नहीं खोया कुछ भी न खुद को न अपनों को किसी के काम न आया कैसा हलका जीवन है मेरा तिस पर  मुझे कागज़ की पुड़िया बाँधना नहीं आता  लाख कोशिश कर...

Stree Ka Chehra | Anita Verma 19.10.2025

स्त्री का चेहरा। अनीता वर्मा इस चेहरे पर जीवन भर की कमाई दिखती है पहले दुख की एक परत फिर एक परत प्रसन्नता की सहनशीलता की एक और परत एक परत सुंदरता कितनी किताबें यहाँ इकट्ठा हैं दुनिया को बेहतर बनाने का इरादा और ख़ुशी को बचा लेने की ज़िद एक हँसी है जो पछतावे जैसी है और मायूसी उम्मीद की तरह एक सरलता है जो सिर्फ़ झुकना जानती है एक घृणा जो कभी प्रेम का विरोध नहीं करती आईने की तरह है स्त्री का चेहरा जिस...

Jeb Mein Sirf Do Rupaye | Kumar Ambuj 18.10.2025

जेब में सिर्फ़ दो रुपये - कुमार अम्बुज  घर से दूर निकल आने के बाद  अचानक आया याद  कि जेब में हैं सिर्फ दो रुपये  सिर्फ़ दो रुपये  होने की असहायता ने घेर लिया मुझे  डर गया मैं इतना कि हो गया सड़क से एक किनारे  एक व्यापारिक शहर के बीचोबीच  खड़े होकर यह जानना कितना भयावह है  कि जेब में है कुल दो रुपये आस पास से जा रहे थे सैकड़ों लोग  उनमें से एक-दो ने तो किया मुझे नमस्कार भी   जिससे और ज़्यादा डरा मैं   उन...

18 Number Bench Par | Doodhnath Singh 17.10.2025

18 नम्बर बेंच पर।  दूधनाथ सिंह 18 नम्बर बेंच पर कोई निशान नहीं चारों ओर घासफूस –- जंगली हरियाली कीड़े-मकोड़े मच्छर अँधेरा   वर्षा से धुली हरी-चिकनी काई की लसलस चींटियों के भुरेभुरे बिल –- सन्नाटा बैठा सन्नाटा । क्षण वह धुल-पुँछ बराबर कौन यहाँ आया बदलती प्रकृति के अलावा प्रशासनिक भवन से दूर कुलसचिव के सुरक्षा-गॉर्ड की नज़रों से बाहर ऋत्विक घटक की डोलती दुबली छाया से उतर कौन यहाँ आया एकान्त की मृत्य...

Nanhi Pujaran | Asrar-Ul-Haq-Majaz 16.10.2025

नन्ही पुजारन।असरार-उल-हक़ मजाज़ इक नन्ही मुन्नी सी पुजारन पतली बाँहें पतली गर्दन भोर भए मंदिर आई है आई नहीं है माँ लाई है वक़्त से पहले जाग उठी है नींद अभी आँखों में भरी है ठोड़ी तक लट आई हुई है यूँही सी लहराई हुई है आँखों में तारों की चमक है मुखड़े पे चाँदी की झलक है कैसी सुंदर है क्या कहिए नन्ही सी इक सीता कहिए धूप चढ़े तारा चमका है पत्थर पर इक फूल खिला है चाँद का टुकड़ा फूल की डाली कम-सिन सीधी...

Mujhe Sneh Kya Mil Na Sakega? | Suryakant Tripathi Nirala 15.10.2025

मुझे स्नेह क्या मिल न सकेगा?। सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' मुझे स्नेह क्या मिल न सकेगा? स्तब्ध, दग्ध मेरे मरु का तरु क्या करुणाकर खिल न सकेगा? जग के दूषित बीज नष्ट कर, पुलक-स्पंद भर, खिला स्पष्टतर, कृपा-समीरण बहने पर, क्या कठिन हृदय यह हिल न सकेगा? मेरे दु:ख का भार, झुक रहा, इसीलिए प्रति चरण रुक रहा, स्पर्श तुम्हारा मिलने पर, क्या महाभार यह झिल न सकेगा?

Shuddhikaran | Hemant Deolekar 14.10.2025

शुद्धिकरण | हेमंत देवलेकर   इतनी बेरहमी से निकाले जा रहे छिलके पानी के कि ख़ून निकल आया पानी का उसकी आत्मा तक को छील डाला रंदे से यह पानी को छानने का नहीं उसे मारने का दृश्य है एक सेल्समैन घुसता है हमारे घरों में भयानक चेतावनी की भाषा में कि संकट में हैं आप के प्राण और हम अपने ही पानी पर कर बैठते हैं संदेह जब वह कांच के गिलास में पानी को बांट देता है दो रंगों में हम देख नहीं पाते "फूट डालो और राज क...

Prem Aur Ghruna | Natasha 13.10.2025

प्रेम और घृणा | नताशा तुम भेजना प्रेम बार-बार भेजना भले ही मैं वापस कर दूँ लौटेगा प्रेम ही तुम्हारे पास पर मत भेजना कभी घृणा घृणा बंद कर देती है दरवाज़े अँधेरे में क़ैद कर लेती है हम प्रेम सँजो नहीं पाते और घृणा पाल बैठते हैं प्रेम के बदले न भी लौटा प्रेम तो लौटेगी चुप्पी बेबसी प्रेम अपरिभाषित ही सही घृणा परिभाषा से भी ज़्यादा कट्टर होती है!

Antardwand | Alain Bosquet | Translation - Dharamvir Bharti 12.10.2025

अंतर्द्वंद | आलेन बास्केट अनुवाद : धर्मवीर भारती मेरा बायाँ हाथ मुझे प्राणदंड देता है मेरा दायाँ हाथ मेरी रक्षा करता है मेरी आँखें मुझे निर्वासन देती हैं मेरी वाणी मुझे प्रताड़ित करती है : अब समय आ गया है कि तुम अपने साथ संधिपत्र पर हस्ताक्षर कर दो! और इस पुराने हृदय में हज़ारों लड़ाइयाँ लड़ी जा रही हैं मेरे शत्रु और मेरे हताश मित्रों के बीच जो अंत में समझौता कर लेंगे। और ऐसी शांति का नया संसार बसा...

Jahaz Ka Panchhi | Krishna Mohan Jha 11.10.2025

जहाज़ का पंछी | कृष्णमोहन झा जैसे जहाज़ का पंछी अनंत से हारकर फिर लौट आता है जहाज़ पर इस जीवन के विषन्न पठार पर भटकता हुआ मैं फिर तुम्हारे पास लौट आया हूँ स्मृतियाँ भाग रही हैं पीछे की तरफ़ समय दौड़ रहा आगे धप्-धप् और बीच में प्रकंपित मैं अपने छ्लछ्ल हृदय और अश्रुसिक्त चेहरे के साथ तुम्हारी गोद में ऐसे झुका हूँ जैसे बहते हुए पानी में पेड़ों के प्रतिबिम्ब थरथराते हैं… नहीं दुःख कतई नहीं है यह और कह...

Pyar Ke Bahut Chehre Hain | Navin Sagar 10.10.2025

प्यार के बहुत चेहरे हैं / नवीन सागर मैं उसे प्यार करता यदि वह ख़ुद वह होती मैं अपना हृदय खोल देता यदि वह अपने भीतर खुल जाती मैं उसे छूता यदि वह देह होती और मेरे हाथ होते मेरे भाव! मैं उसे प्यार करता यदि मैं पत्ता या हवा होता या मैं ख़ुद को नहीं जानता मैं जब डूब रहा था वह उभर रही थी जिस पल उसकी झलक दिखी मैं कभी-कभी डूब रहा हूँ वह अभी-अभी अपने भीतर उभर रही है मैं उसे प्यार करता यदि वह जानती मैं ख़ाम...

Ouça o podcast Pratidin Ek Kavita no Replaio

Rádio e podcasts em um só app - grátis e sem cadastro. Instale hoje e não perca o lançamento

Baixe no Google Play

O Replaio não é o publicador dos podcasts; os nomes dos programas, as capas e o áudio pertencem aos seus autores e são distribuídos por feeds RSS públicos