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Pratidin Ek Kavita

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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

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Categoria

Arts

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11 de jul de 2026

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Episódios

Ankhein Dekhkar | Gorakh Pandey 28.11.2025

आँखें देखकर । गोरख पांडेय ये आँखें हैं तुम्हारी तकलीफ़ का उमड़ता हुआ समुंदर इस दुनिया को जितनी जल्दी हो बदल देना चाहिए।

Vidroh Karo Vidroh Karo | Shivmangal Singh Suman 27.11.2025

विद्रोह करो, विद्रोह करो। शिवमंगल सिंह 'सुमन' आओ वीरोचित कर्म करो मानव हो कुछ तो शर्म करो यों कब तक सहते जाओगे, इस परवशता के जीवन से विद्रोह करो, विद्रोह करो। जिसने निज स्वार्थ सदा साधा जिसने सीमाओं में बाँधा आओ उससे, उसकी निर्मित जगती के अणु-अणु कण-कण से विद्रोह करो, विद्रोह करो। मनमानी सहना हमें नहीं पशु बनकर रहना हमें नहीं विधि के मत्थे पर भाग्य पटक, इस नियति नटी की उलझन से विद्रोह करो, विद्रोह...

Mujhe Ab Darr Nahi Lagta | Mohsin Naqvi 26.11.2025

मुझे अब डर नहीं लगता | मोहसिन नक़वी किसी के दूर जाने से तअ'ल्लुक़ टूट जाने से किसी के मान जाने से किसी के रूठ जाने से मुझे अब डर नहीं लगता किसी को आज़माने से किसी के आज़माने से किसी को याद रखने से किसी को भूल जाने से मुझे अब डर नहीं लगता किसी को छोड़ देने से किसी के छोड़ जाने से ना शम्अ' को जलाने से ना शम्अ' को बुझाने से मुझे अब डर नहीं लगता अकेले मुस्कुराने से कभी आँसू बहाने से ना इस सारे ज़माने स...

Purana Ghar | Gobind Prasad 25.11.2025

पुराना घर। गोबिंद प्रसाद पुराना घर इतना पुराना कि कभी पुराना नहीं होता कविता की उस किताब की तरह पंक्तियों के बीच ठहरे हुए किसी अनबीते की तरह मन में बसा रहता है यह पुराना घर पुराना घर आज भी कितना नया है इन आँखों में और आँखें ख़ुद कितनी नई हैं घर के इस पुरानेपन को देखने के लिए इसे कौन जानता है सिवा पुराने घर के...।

Dukh | Priyankshi Mohan 24.11.2025

दुख | प्रियाँक्षी मोहन पिताओं के दुख माँओं के दुखों से मुख़्तलिफ़ होते हैं। वे कभी भी प्रत्यक्ष रूप से नहीं दिखते वे चूहों से झाँकते हैं अधजली सिगरेटों से खूटियों पर टंगी हुई थकी कमीज़ों से, पुरानी ऐनकों से, और बिजली व जल विभाग के निरंतर बह रहे बिलों से

Phoole Kadamb | Nagarjun 23.11.2025

फूले कदंब । नागार्जुन फूले कदंब टहनी-टहनी में कंदुक सम झूले कदंब फूले कदंब। सावन बीता बादल का कोप नहीं रीता जाने कब से तू बरस रहा ललचाई आँखों से नाहक जाने कब से तू तरस रहा मन कहता है,छू ले कदंब फूले कदंब फूले कदंब।

Nafi | Kishwar Naheed 22.11.2025

नफ़ी | किश्वर नाहीद मैं थी आईना फ़रोश* (विक्रेता) कोह-ए-उम्मीद* (आशा का पहाड़) के दामन में अकेली थी ज़ियाँ* (नुक़्सान) कोशिश सुरय्या की थी हम-दोश मुझे हर रोज़ हमा-वक़्त* (हर समय) थी बस अपनी ख़बर मैं थी ख़ुद अपने में मदहोश मैं वो तन्हा थी जिसे पैर मिलाने का सलीक़ा भी न था मैं वो ख़ुद-बीं* (आत्म-मुग्ध) थी जिसे अपने हर इक रुख़ से मोहब्बत थी बहुत मैं वो ख़ुद-सर* (अवज्ञाकारी) थी जिसे हाँ के उजालों से बह...

Ma | Srinaresh Mehta 21.11.2025

माँ । श्रीनरेश मेहता मैं नहीं जानता क्योंकि नहीं देखा है कभी— पर, जो भी जहाँ भी लीपता होता है गोबर के घर-आँगन, जो भी जहाँ भी प्रतिदिन दुआरे बनाता होता है आटे-कुंकुम से अल्पना, जो भी जहाँ भी लोहे की कड़ाही में छौंकता होता है मेथी की भाजी, जो भी जहाँ भी चिंता भरी आँखें लिए निहारता होता है दूर तक का पथ - वही, हाँ, वही है माँ!!

Raat Yun Dil Mein | Faiz Ahmed Faiz 20.11.2025

रात यूँ दिल में तिरी खोई हुई याद आई | फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ रात यूँ दिल में तिरी खोई हुई याद आई जैसे वीराने में चुपके से बहार आ जाए जैसे सहराओं में हौले से चले बाद-ए-नसीम जैसे बीमार को बे-वज्ह क़रार आ जाए

Nritya Aur Parikathayein | Anwesha Rai 'Mandakini' 19.11.2025

नृत्य और परिकथाएँ | अन्वेषा राय 'मंदाकिनी' मेरे पाँव, बचपन से थिरकते रहे, किसी अनजान सवालिया धुन पर... मैं बढ़ती रही.. नाचती रही.. मेरे जीवन का उद्देश्य यह खोज भर रहा कि मेरे इस जीवन संगीत का उद्गम कहाँ है ?? मेरा यह कारवाँ जारी रहा... हर रोज़ मेरे पग उस संगीत की खोज में नृत्य करते चले गए !! मैं शायद नहीं जानती हूँ कि जीवन के किस रोज़ मेरा परी-कथाओं से विश्वास का नाता जुड़ गया! परी-राजकुमार को लाँ...

Main Aur Main | Saqi Farooqi 18.11.2025

मैं और मैं! | साक़ी फ़ारुक़ी मैं हूँ मैं वो जिस की आँखों में जीते जागते दर्द हैं दर्द कि जिन की हम-राही में दिल रौशन है दिल जिस से मैं ने इक दिन इक अहद (प्रतिज्ञा) किया था अहद कि दोनों एक ही आग में जलते रहेंगे आग कि जिस में जल कर जिस्म हुआ ख़ाकिस्तर (राख) जिस्म कि जिस के कच्चे ज़ख़्म बहुत दुखते थे ज़ख़्म कि जिन का मरहम वक़्त के पास नहीं है वक़्त कि जिस की ज़द में सारे सय्यारे हैं सय्यारे (ग्रह) जो क़...

Thakur Ka Kuan | Omprakash Valmiki 17.11.2025

ठाकुर का कुआँ। ओमप्रकाश वाल्मीकि चूल्हा मिट्टी का मिट्टी तालाब की तालाब ठाकुर का। भूख रोटी की रोटी बाजरे की बाजरा खेत का खेत ठाकुर का। बैल ठाकुर का हल ठाकुर का हल की मूठ पर हथेली अपनी फ़सल ठाकुर की। कुआँ ठाकुर का पानी ठाकुर का खेत-खलिहान ठाकुर के गली-मुहल्ले ठाकुर के फिर अपना क्या? गाँव? शहर? देश?

Surya Aur Sapne | Champa Vaid 16.11.2025

सूर्य और सपने।चंपा वैद सूर्य अस्त हो रहा है पहली बार इस मंज़िल पर खड़ी वह देखती है बादलों को जो टकटकी लगा देखते हैं सूर्य के गोले को यह गोला आग लगा जाता है उसके अंदर कह जाता है कल फिर आऊँगा पूछूँगा क्या सपने देखे?

Kya Hum Sab Kuch Jaante Hain? | Kunwar Narayan 15.11.2025

क्या हम सब कुछ जानते हैं । कुँवर नारायण क्या हम सब कुछ जानते हैं एक-दूसरे के बारे में क्या कुछ भी छिपा नहीं होता हमारे बीच कुछ घृणित या मूल्यवान जिन्हें शब्द व्यक्त नहीं कर पाते जो एक अकथ वेदना में जीता और मरता है जो शब्दित होता बहुत बाद जब हम नहीं होते एक-दूसरे के सामने और एक की अनुपस्थिति विकल उठती है दूसरे के लिए। जिसे जिया उसे सोचता हूँ जिसे सोचा उसे दोहराता हूँ इस तरह अस्तित्व में आता पुनः जो...

Nishabd Bhasha Mein | Navin Sagar 14.11.2025

निःशब्द भाषा में। नवीन सागर कुछ न कुछ चाहता है बच्चा बनाना एक शब्द बनाना चाहता है बच्चा नया शब्द वह बना रहा होता है कि उसके शब्द को हिला देती है भाषा बच्चा निःशब्द भाषा में चला जाता है क्या उसे याद आएगा शब्द स्मृति में हिला जब वह रंगमंच पर जाएगा बरसों बाद भाषा में ढूँढ़ता अपना सच कौंधेगा वह क्या एक बार! बनाएगा कुछ या चला जाएगा बना-बनाया दीर्घ नेपथ्य में बच्चा कि जो चाहता है बनाना अभी कुछ न कुछ।

Bechain Cheel | Muktibodh 13.11.2025

बेचैन चील।  गजानन माधव मुक्तिबोध बेचैन चील!! उस-जैसा मैं पर्यटनशील प्यासा-प्यासा, देखता रहूँगा एक दमकती हुई झील या पानी का कोरा झाँसा जिसकी सफ़ेद चिलचिलाहटों में है अजीब इनकार एक सूना!!

Matlab Hai | Parag Pawan 12.11.2025

मतलब है | पराग पावन मतलब है  सब कुछ पा लेने की लहुलुहान कोशिशों का  थकी हुई प्रतिभाओं और उपलब्धियों के लिए  तुम्हारी उदासीनता का गहरा मतलब है  जिस पृथ्वी पर एक दूब के उगने के हज़ार कारण हों  तुम्हें लगता है तुम्हारी इच्छाएँ यूँ ही मर गईं  एक रोज़मर्रा की दुर्घटना में  

Lai Taal | Kailash Vajpeyi 11.11.2025

लयताल।कैलाश वाजपेयी कुछ मत चाहो दर्द बढ़ेगा ऊबो और उदास रहो। आगे पीछे एक अनिश्चय एक अनीहा, एक वहम टूट बिखरने वाले मन के लिए व्यर्थ है कोई क्रम चक्राकार अंगार उगलते पथरीले आकाश तले कुछ मत चाहो दर्द बढ़ेगा ऊबो और उदास रहो यह अनुर्वरा पितृभूमि है धूप झलकती है पानी खोज रही खोखली सीपियों में चाँदी हर नादानी। ये जन्मांध दिशाएँ दें आवाज़ तुम्हें इससे पहले रहने दो विदेह ये सपने बुझी व्यथा को आग न दो तम के...

Kalkatta Ke Ek Tram Mein Madhubani Painting | Gyanendrapati 10.11.2025

कलकत्ता के एक ट्राम में मधुबनी पेंटिंग।ज्ञानेन्द्रपति अपनी कटोरियों के रंग उँड़ेलते शहर आए हैं ये गाँव के फूल धीर पदों से शहर आई है सुदूर मिथिला की सिया सुकुमारी हाथ वाटिका में सखियों संग गूँथा वरमाल जानकी ! पहचान गया तुम्हें में यहाँ इस दस बजे की भभक:भीड़ में अपनी बाँहें अपनी जेबें सँभालता पहचान गया तुम्हें मैं कि जैसे मेरे गाँव की बिटिया आँगन  से निकल पार कर नदी-नगर आई इस महानगर में रोज़ी -रोटी क...

Ghar Mein Waapsi | Dhoomil 09.11.2025

घर में वापसी । धूमिल मेरे घर में पाँच जोड़ी आँखें हैं माँ की आँखें पड़ाव से पहले ही तीर्थ-यात्रा की बस के दो पंचर पहिए हैं। पिता की आँखें— लोहसाँय की ठंडी सलाख़ें हैं बेटी की आँखें मंदिर में दीवट पर जलते घी के दो दिए हैं। पत्नी की आँखें आँखें नहीं हाथ हैं, जो मुझे थामे हुए हैं वैसे हम स्वजन हैं, क़रीब हैं बीच की दीवार के दोनों ओर क्योंकि हम पेशेवर ग़रीब हैं। रिश्ते हैं; लेकिन खुलते नहीं हैं और हम अपने...

Ramz | Jaun Elia 08.11.2025

रम्ज़ । जौन एलिया तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Baat Karni Mujhe Mushkil | Bahadur Shah Zafar 07.11.2025

बात करनी मुझे मुश्किल । बहादुर शाह ज़फ़र बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी जैसी अब है तिरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी ले गया छीन के कौन आज तिरा सब्र ओ क़रार बे-क़रारी तुझे ऐ दिल कभी ऐसी तो न थी उस की आँखों ने ख़ुदा जाने किया क्या जादू कि तबीअ'त मिरी माइल कभी ऐसी तो न थी अब की जो राह-ए-मोहब्बत में उठाई तकलीफ़ सख़्त होती हमें मंज़िल कभी ऐसी तो न थी चश्म-ए-क़ातिल मिरी दुश्मन थी हमेशा लेकिन जैसी अब हो...

Bahut Door Ka Ek Gaon | Dheeraj 06.11.2025

बहुत दूर का एक गाँव | धीरज  कोई भी बहुत दूर का एक गाँव  एक भूरा पहाड़ बच्चा भूरा और बूढ़ा पहाड़ साँझ को लौटती भेड़ और दूर से लौटती शाम रात से पहले का नीला पहाड़ था वही भूरा पहाड़। भूरा बच्चा, भूरा नहीं, नीला पहाड़, गोद में लिए, आँखों से। उतर आता है शहर एक बाज़ार में थैला बिछाए, बीच में रख देता है, नीला पहाड़। और बेचने के बाद का, बचा नीला पहाड़ अगली सुबह जाकर मिला देता है, उसी भूरे पहाड़ में।

Suwar Ke Chaune | Anupam Singh 05.11.2025

सूअर के छौने । अनुपम सिंह  बच्चे चुरा आए हैं अपना बस्ता मन ही मन छुट्टी कर लिये हैं आज नहीं जाएँगे स्कूल  झूठ-मूठ  का बस्ता खोजते बच्चे   मन ही मन नवजात बछड़े-सा कुलाँच रहे हैं उनकी आँखों ने देख लिया है आश्चर्य का नया लोक बच्चे टकटकी लगाए आँखों में भर रहे हैं अबूझ सौन्दर्य सूअरी ने जने हैं गेहुँअन रंग के सात छौने ये छौने उनकी कल्पना के नए पैमाने हैं सूर्य देवता का रथ खींचते सात घोड़े हैं आज दिन-भर...

Ma Nahin Thi Wah | Vishwanath Prasad Tiwari 04.11.2025

माँ नहीं थी वह । विश्वनाथ प्रसाद तिवारी माँ नहीं थी वह आँगन थी द्वार थी  किवाड़ थी,  चूल्हा थी आग थी नल की धार थी। 

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