Vivek Agarwal

Hindi Poems by Vivek (विवेक की हिंदी कवितायेँ)

Arts HI ↓ 96 episódios

This podcast presents Hindi poetry, Ghazals, songs, and Bhajans written by me. इस पॉडकास्ट के माध्यम से मैं स्वरचित कवितायेँ, ग़ज़ल, गीत, भजन इत्यादि प्रस्तुत कर रहा हूँ Awards StoryMirror - Narrator of the year 2022, Author of the month (seven times during 2021-22)Kalam Ke Jadugar - Three Times Poet of the Month. Sometimes I also collaborate with other musicians & singers to bring fresh content to my listeners. Always looking for fresh voices. Write to me at HindiPoemsByVivek@gmail.com#Hindi #Poetry #Shayri #Kavita #HindiPoetry #Ghazal

Não deixe de visitar o site do podcast e apoiar quem o produz: linktr.ee

Autor

Vivek Agarwal

Categoria

Arts

Site do podcast

linktr.ee

Último episódio

26 de fev de 2025

Onde ouvir?

Podcasts no app Replaio Radio Em breve

Os podcasts estão chegando ao app. Instale agora e seja o primeiro a descobrir um jeito totalmente novo de curtir podcasts

Baixe no Google Play Instale grátis Android 5 mi+ downloads · nota 4,8 iOS em breve

Episódios

सरस्वती वंदना - आशी (Saraswati Vandana - Music by Aashi) 01.04.2022

सरस्वती वंदना हरिगीतिका छंद (२८ मात्रिक १६,१२ पर यति) है हंस पर आरूढ़ माता, श्वेत वस्त्रों में सजी। वीणा रखी है कर तिहारे, दिव्य सी सरगम बजी॥ मस्तक मुकुट चमके सुशोभित, हार पुष्पों से बना। फल फ़ूल अर्पण है चरण में, हम करें आराधना॥ संगीत का आधार हो माँ, हर कला का श्रोत हो। जग में प्रकाशित हो रही जो, वेद की वह ज्योत हो॥ वरदायिनी पद्मासिनि माँ, अब यही अभियान हो। हम सब चलें सत्मार्ग पर अब, ना हमें अभिमान...

प्रकृति का पाठ (Lessons from Nature) 26.03.2022

आओ बच्चों आज तुमको एक पाठ नया पढ़ाता हूँ। प्रकृति हमको क्या सिखलाती, ये तुमको बतलाता हूँ। देखो कैसे पत्थर खा के भी, पेड़ हमें फल देते हैं। क्षमा-दान से बड़ा कुछ नहीं, ये हम सबसे कहते हैं। पर्वत से सागर तक नदिया, लम्बा सफर है करती। निज लक्ष्य तक बढ़ो निरंतर, सीख यही है मिलती। सबका भार उठाये मस्तक पर, देखो धरती माता। सहनशीलता का अर्थ क्या, इससे समझ में आता। ज्वार-भाटा नित्य आता पर, सागर सीमा ना तोड़े। सु...

होली (Holi) 18.03.2022

आओ मिल कर खेलें होली सबसे न्यारी अपनी टोली सभी पुराने क्लेश भुलाकर सबसे बोलें मीठी बोली लाल हरे और पीले नीले देखो मेरे रंग चटकीले भर ली मैंने नयी पिचकारी रंग दूंगा मैं दुनिया सारी सुबह सवेरे सोनू जागा उसके पीछे मोनू भागा वो छिप गया लकी सयाना नहीं चलेगा कोई बहाना बंद करो ये आंखमिचौली आओ मिल कर खेलें होली रंग लगायें गुंझिया खाएं झूमे नाचें खुशी मनाएं खेल कूद कर घर को आये रगड़ रगड़ कर हम नहाये बड़े जोर...

ग़ज़ल - तू ही बता (Ghazal - Tu Hi Bata) 11.03.2022

ग़ज़ल - तू ही बता क्यों हर समय यादें तेरी आती हमें तू ही बता। सोता हूँ तो सपने तेरे मुझको दिखें तू ही बता। सीने में हैं तूफाँ बहुत दिल है मगर खाली मेरा। हाल-ए-जिगर जाने न तू कैसे कहें तू ही बता। है मतलबी सारा जहाँ सोचा कि तुम होगी जुदा। तू भी मगर खुदगर्ज है क्या हम करें तू ही बता। छोटी सी थी मेरी खता ये बात है तुझको पता। इतनी बड़ी दी है सजा कैसे सहें तू ही बता। चाहूँ नहीं अपने ग़मों को इस जहाँ से बाँ...

ग़ज़ल - सपने तेरे (Ghazal - Sapne Tere) 04.03.2022

ग़ज़ल - सपने तेरे जो सब कहें सपने तेरे, मुश्किल बड़े तो क्या हुआ। तेरी रज़ा तेरा सफर, अड़चन पड़े तो क्या हुआ। पथ पर अगर पत्थर पड़े, ठोकर लगे काँटे चुभें। आगे बढ़ो हिम्मत करो, गिर भी गये तो क्या हुआ। जो धुन्ध में रस्ता कहीं, खोता लगे थमना नहीं। चलते चलो मंज़िल अगर, ना भी दिखे तो क्या हुआ। होते हैं सच सपने सभी, कोशिश करो जी जान से। थोड़े समय तुमने अगर, दुख भी सहे तो क्या हुआ। हर्फ़-ए-अना तुझको कभी, छू भी न पा...

शिव स्तुति (Shiv Stuti) 03.03.2022

शिव स्तुति स्वभाव से हैं जो सरल, त्रिनेत्र में रखें अनल। जटाओं में भागीरथी, कण्ठ में धरें गरल॥ सोम सज्ज भाल है, वज्र वक्ष विशाल है। जिनका नाम मात्र ही, काल का भी काल है॥ दिव्य जिनका रूप है, सौभाग्य का स्वरूप है। कपूर कान्ति वर्ण पर, भस्म और भभूत है॥ आसन व्याघ्र चर्म है, धर्म का जो मर्म है। जिनकी इच्छा मात्र से, घटित प्रत्येक कर्म है॥ औघड़ आदिनाथ हैँ, भूत प्रेत साथ हैँ। क्या मनुज क्या पशु, वो तो विश...

मैं प्रलय हूँ (Main Pralay Hoon) 22.02.2022

मैं प्रलय हूँ मैं प्रलय हूँ। अरि-मस्तकों को काट काट; शोणित-सुशोभित उन्नत ललाट, सर्व व्याप्त विश्व रूप विराट। रणचण्डी का उन्मुक्त अट्टहास; रिपुह्रदय में कर भय का निवास, अग्नि उगले मेरी हर एक श्वास। करता सुनिश्चित निज जय हूँ, मैं प्रलय हूँ। अविरल मेरी गति निरंतर, पग थमे नहीं तूफानों से। मैं थका नहीं मैं डिगा नहीं, पथ में पड़ती चट्टानों से। मैं भगीरथ मैं ध्रुव; मैं अचल अटल निश्चय हूँ, मैं प्रलय हूँ।...

एहसास-ए-मोहब्बत (Ehsas-A-Mohabbat) 13.02.2022

एहसास-ए- मोहब्बत हर रोंया गुदगुदाता है। तन्हाई में भी मुस्कान के मोती सजाता है। चंद तारीखों में न सीमित कर मोहब्बत को। ये जज़्बा हर लम्हे में पैबस्त हुआ जाता है। इश्क़ फैले तो पूरी कायनात में न समाये। और चाहे तो छोटे से दिल में सिमट आता है। जिसने की; करामात-ए-मोहब्बत वही जाने। की कैसे ये एक साथ हँसाता और रुलाता है। न रहे बाकी कोई और ख्वाहिश इस दिल में। दौलत-ए-इश्क़ हो तो न कुछ और लुभाता है। महक उठता...

ग़ज़ल - इतनी मेरी कहानी (Ghazal - Itni Meri Kahani) 30.01.2022

नखरे तिरे उठाये, तिरि बात हम ने मानी। तिरा इंतज़ार करते, मिरि खो गयी जवानी। तुम दूर हम से हो तो, कमतर है जिंदगानी। दिन भी नहीं है अच्छा, न ही रात है सुहानी। तुम आज हो ये कहते, कहीं और दिल लगा लूँ। अब यूँ किसे मैं चाहूँ, न तिरा बना है सानी। अहसान कर दे इतना, कि न याद हम को करना। यदि कोइ रह गयी है, मिरि फेंक दे निशानी। शुरुआत भी तुझी से, अनजाम तुम हो मेरा। कुछ और ना है शामिल, इतनी मेरी कहानी। ~ विवेक...

अपना बीता साल (Apna Beeta Saal) 24.01.2022

अपना बीता साल क्या बतायें कैसा गुजरा, अपना बीता साल। हर्ष के लमहे भी देखे, और देखा दुःख का काल। क्या बतायें कैसा गुजरा, अपना बीता साल। आरम्भ था वो साल का, कहूँ क्या अपने हाल का। निष्क्रिय निर्जीव था, न होश समय की चाल का। एक गीत बन के आयी थी, उमंग साथ लायी थी। मुझे सोते से जगा दिया, दिल पे वो ही छायी थी। सच कहें तो यूँ लगा, आया कोई भूचाल। क्या बतायें कैसा गुजरा, अपना बीता साल। दीप में ज्यूँ घृत पड़ा...

हिन्द की सेना (Indian Army) 15.01.2022

हिमालय की बर्फीली ऊँचाइयों से, हिन्द महासागर की अथाह गहराइयों तक। पूर्वोत्तर के प्रचंड झंझावतों व सघन वर्षा वनों से, थार की गर्म शुष्क हवाओं तक। हिंदुस्तान के कोने कोने में आलोकित है, इनके स्वेद और शोणित की चमक। और अनंत काल तक गूँजेगी, सेना-ए-हिन्द की जोशीली ललकारो की खनक। माँ भारती की सीमा-औ-सम्मान-सुरक्षा पर, ये सदैव शीश अर्पण को तत्पर। कभी मुड़े ना कभी रुके ना कभी डरे ना, जब जब आया बलिदान का अवस...

बातें दिल की (Baaten Dil Ki) 07.01.2022

एक ग़ज़ल लिखी है चन्दा पे, छत पर आके पढ़ लेना। है तेरी याद में गाया नगमा, जब हवा बहे तो सुन लेना। अपने सागर में उगते सूरज को, नयन घटों से अर्घ्‍य दिया है। तेरे सागर में जब सूरज डूबे, अश्कों के मोती चुन लेना। जितनी भी हैं मेरी यादें, दो हिस्सों में कर लेना। बुरी लगें जो उन्हें भुलाकर, ठीक लगें वो रख लेना। जो दुनिया वाले पूछें तुझसे, किसने की थी बेवफ़ायी। तुमको है ये कसम हमारी, नाम मेरा तुम कह लेना। अपन...

जन जन को जगाते हैं 31.12.2021

चलो इस जनवरी जन जन को जगाते हैं। बैर और नफरत की दीवार को, मिलकर मिटटी में मिलाते हैं। चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं। व्यर्थ का यह वाद विवाद, इसका प्रत्युत्तर उसका प्रतिवाद, पूर्वाग्रहों को मन से हटा, सब लोग करें सार्थक संवाद। तुम अपनी कहो, हम अपनी सुनाते हैं। चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं। व्यक्ति को है जब गुस्सा आता। विवेक कहीं है तब खो जाता। अपशब्द अनर्गल प्रलाप करे वो, मगर बाद में वो है प...

मेरी तन्हाई (Meri Tanhai) 23.12.2021

मेरी तन्हाई वाकिफ है मेरे हर एक राज से। आखिर मेरी सबसे वफादार हमराह है ये। खुशियों की बज़्म में भले ही न हो शामिल। गम में बहे हर एक अश्क की गवाह है ये। छोड़ देती है मेरा साथ जब तू पास होती है। पर जुदाई में गुलशुदा दिल की पनाह है ये। हमसफ़र बदल लेते हैं अपनी राहें अक्सर। जब और रास्ते बंद हों तो अकेली राह है ये। अफ़सुर्दा दिल जब महव-ए-यास रहता है। तस्सवुर में तेरे तबस्सुम से भरी चाह है ये। लोग साथ छोड़...

परोपकार (Paropkar) 20.12.2021

क्या वृक्षों को तुमने देखा है, निज फलों का स्वयं संचय करते। वाटिका में पल्लवित पुष्प भला, क्या मात्र अपने लिये महकते। जनकल्याण को आतुर अम्बुद, क्यों अपना अस्तित्व मिटाता। सूर्य देव के सप्त अश्वों को, दिन भर क्यों कर अरुण चलाता। नभ में टिमटिमा के ध्रुव तारा, पथिकों को है दिशा दिखाता। अपने कद को काँटछाँट कर, चन्दा है सबको तिथि बताता। आखिर अपना क्या प्रयोजन, जो अवनि भोजन सबको देती। जग में श्वासों का...

अपने सपने 04.12.2021

अपने सपने ऐ मुन्ने तू मुझे बता, तेरे क्या क्या सपने हैं कौन से हैं औरों ने चुने, और कौन से तेरे अपने हैं। कदम कदम पर लोग कहेंगे, क्या करना है क्या नहीं। इधर उधर की राह पकड़कर, भटक न जाना तू कहीं। बाकी सबकी बातें छोड़, बात तू अपने दिल की सुन। तेरी मंज़िल जो रस्ता जाये, राह वही तू खुद से चुन। मछली को तुमने देखा है, क्या कभी पेड़ पर चढ़ते। या किसी बाज को तुमने पाया, कभी ऊँचाई से डरते। सबके अपने गुण दोष है...

निर्झरिणी 02.12.2021

निर्झरिणी निर्मल निश्छल निर्झरिणी तू, पर्वत पर प्रपात बन बहती। मनमोहक मधुर मंद ध्वनि में, मेरे कानों में क्या कहती। स्वच्छंद सजीव तू चले निरंतर, थमना है तेरा काम नहीं। पथ पर पड़ते पाषाण परन्तु, प्रीती सदैव हृदय में रहती। (१) अंजन आँखों से तेरी चुराकर, श्यामघटा है नभ में छाती। तेरी तरंगों से क्रीड़ा करने, नित्य सूर्य की किरणें आती। उमड़ घुमड़ तेरा नृत्य देखके, पशु-पक्षी हैं साथ थिरकते। प्रमुदित प्रफुल्...

ग़ज़ल-लहजा (Ghazal - Lehja) 08.11.2021

ग़ज़ल-लहजा मतलब निकल गया तो, लहजा बदल गया। चलो इस बहाने हमें दिख, चेहरा असल गया। कल की बात है वो, दर आये  मुस्कुराते। देख कर भोली सूरत दिल, अपना मचल गया।  ऐसा नहीं हमें ना था, तग़ाफ़ुल का अंदेशा।  कुछ ऐसे वो बोले कि, जादू सा चल गया।  कतराते हैं वो ऐसे की मेरा, साया तक ना दिखे।  जिनकी फ़रमाइश पे कुर्बां, मेरा कल गया।  उसके लबों पे है हँसीं, पा के मेरी नियामत।  अपने...

तुम्हें उदास-सा पाता हूँ मैं कई दिन से - साहिर लुधियानवी 07.11.2021

तुम्हें उदास-सा पाता हूँ मैं कई दिन से न जाने कौन से सदमे उठा रही हो तुम वो शोख़ियाँ, वो तबस्सुम, वो क़हक़हे न रहे हर एक चीज़ को हसरत से देखती हो तुम छुपा-छुपा के ख़मोशी में अपनी बेचैनी ख़ुद अपने राज़ की तशहीर बन गयी हो तुम मेरी उम्मीद अगर मिट गयी तो मिटने दो उम्मीद क्या है बस एक पेशो-ओ-पश है कुछ भी नहीं मेरी हयात की ग़मग़ीनियों का ग़म न करो ग़म हयात-ए-ग़म यक नक़्स है कुछ भी नहीं तुम अपने हुस्न की...

शक्ति-स्वरुप 15.10.2021

प्रथम सर्ग काँप रही थी पृथ्वी, स्वर्ग भी था भयभीत। महिषासुर ने लिया, तीनों लोकों को जीत। त्राहि माम के गुंजन से, सृष्टि भर गयी सारी। जग में आतंक मचा रहा, वो क्रूर अत्याचारी। उसकी शक्ति के सम्मुख, देव भी थे लाचार। ब्रह्मदेव के वर स्वरुप, निष्फल हुये प्रहार। वज्र व्यर्थ बाण बेकार, सुदर्शन सफल नहीं। देवता घूम रहे चहुँ ओर, मिले न चैन कहीं। थक हार कर सब पहुँचे, महादेव के पास। निराश हृदय में लेकर, एक छो...

क्राँति का नया अर्थ 10.10.2021

शीर्षक: क्राँति का नया अर्थ २६ जनवरी की सर्द सुबह को, गर्म चाय की चुस्कियां लेते हुये। गर्वित अनुभव कर रहा था, टीवी पर सेना की परेड देखते हुये। की अचानक एक आवाज आयी, और लुप्त हो गयी पिक्चर सारी। तथा स्क्रीन पर आ गए भगत, सुभाष और अन्य वीर क्रांतिकारी। चेहरे पर स्वतंत्रता मिलने का हर्ष नहीं, अपितु था एक विचित्र विषाद। रक्तिम नेत्रों में निराशा-नीर, व आक्रोश-अग्नि का मिश्रित उन्माद। विस्मय और भय के ब...

कोपल की कहानी 27.09.2021

कोपल की कहानी कोमल कोपल के कोने से, ढुलक पड़ी बूँदें ओस की। सकुचाई सिमटी सी वो पत्ती, कर अर्पित निधि कोष की। अंशुमाली क्या स्वीकार करेंगे, सप्रेम समर्पित स्नेह अर्घ्य यह। धरा ने जिसे धरा सहेज कर, कहीं किधर न जाये बह। अवनि आखिर जननी है, पादप, पत्ती पुष्पों की। कैसे जाने दे व्यर्थ भला, प्रेम-भेंट निज पुत्री की। बहुत हुआ ये तिरस्कार, मन ही मन वसुधा ने ठाना। क्या अपराध किया कोपल ने, होगा सूर्य को आज बत...

अपना ये रिश्ता 10.09.2021

अपना ये रिश्ता न अपनों वाली आत्मीयता है और, न अजनबियों वाली औपचारिकता। असहज हो जाती हो मेरी मौजूदगी में, आखिर कैसा है अपना ये रिश्ता। आखिर … न कभी अनुराग से मनुहार किया और, न ही कभी नम्रता से परिपूर्ण निवेदन। चंद लफ़्ज़ों में कर लेती हो जरुरत की बात, आखिर कहाँ सीखी ये व्यवहार कुशलता। आखिर … न दिखी कभी स्नेहमयी सहज संवेदना और, न ही कभी शिष्टाचार की कृत्रिम कृतज्ञता। फिर भी रोज होती हैं अपनी बातें दो...

साढ़े नौ किलोमीटर (Nine and a half Kilometers) 02.09.2021

साढ़े नौ किलोमीटर "साढ़े नौ किलोमीटर" कलाई पर बँधी स्मार्टवॉच ने दिखाया। जैसे ही घर का द्वार निकट आया। रोज ही की तरह मॉर्निंग वॉक से वापस आ रहा था। स्वयं से किया नये साल का वादा निभा रहा था। अपनी जानी पहचानी गलियों को मापते हुये। पास वाले गार्डन और बीचफ़्रंट की लम्बाई नापते हुये। तक़रीबन डेढ़ घंटा हो गया था चलते हुये। और अपनी प्रिय प्लेलिस्ट को सुनते हुये। ऑफिस  के पेंडिंग काम याद आने लगे थे। और सिर्फ...

सन्देश (Message) 29.08.2021

सन्देश साँवरे सुन सन्देश हृदय का, मोहे मोह माया से उबार दे। अपने चरणों की पावन रज पै, थोड़ा सा तो अधिकार दे। मन मोरा मैला मलिन जान के, न छोड़ना मेरा साथ मुरारी। मेरी भक्ति को अपनी शक्ति का, अवलंब और आधार दे। बांके बिहारी बसि बसि जावे, छवि तिहारी मोरे नैनन में। देखूँ हर पल तोरी मोहिनी मूरत, पूरा कर मोरा मनुहार दे। जागत सोवत बस नाम तिहारा, निकले मेरी हर श्वास से। और कछु-कौऊ ध्यान ना आबै, हिय में अइसन...

Ouça o podcast Hindi Poems by Vivek (विवेक की हिंदी कवितायेँ) no Replaio

Rádio e podcasts em um só app - grátis e sem cadastro. Instale hoje e não perca o lançamento

Baixe no Google Play

O Replaio não é o publicador dos podcasts; os nomes dos programas, as capas e o áudio pertencem aos seus autores e são distribuídos por feeds RSS públicos