Vivek Agarwal

Hindi Poems by Vivek (विवेक की हिंदी कवितायेँ)

Arts HI ↓ 96 episódios

This podcast presents Hindi poetry, Ghazals, songs, and Bhajans written by me. इस पॉडकास्ट के माध्यम से मैं स्वरचित कवितायेँ, ग़ज़ल, गीत, भजन इत्यादि प्रस्तुत कर रहा हूँ Awards StoryMirror - Narrator of the year 2022, Author of the month (seven times during 2021-22)Kalam Ke Jadugar - Three Times Poet of the Month. Sometimes I also collaborate with other musicians & singers to bring fresh content to my listeners. Always looking for fresh voices. Write to me at HindiPoemsByVivek@gmail.com#Hindi #Poetry #Shayri #Kavita #HindiPoetry #Ghazal

Não deixe de visitar o site do podcast e apoiar quem o produz: linktr.ee

Autor

Vivek Agarwal

Categoria

Arts

Site do podcast

linktr.ee

Último episódio

26 de fev de 2025

Onde ouvir?

Podcasts no app Replaio Radio Em breve

Os podcasts estão chegando ao app. Instale agora e seja o primeiro a descobrir um jeito totalmente novo de curtir podcasts

Baixe no Google Play Instale grátis Android 5 mi+ downloads · nota 4,8 iOS em breve

Episódios

ग़ज़ल – जिंदगी 28.08.2021

जिंदगी की रेत से, ख़ुशी के कंकड़ छान लेते हैं। ये जीना जीना तो नहीं, पर चलो मान लेते हैं। तू गयी जब, तो सोचा था अब मिलेगा सुकूं। तू नहीं तो तेरी, यादों के ख़ंजर जान लेते हैं। नहीं चाहिये अब, हमें तेरी नज़र-ए-'इनायत। ग़ुरूर आज भी है, हम नहीं अहसान लेते हैं। मत करना मेरे, लौट कर आने का इंतज़ार। पलटते नहीं कभी, एक बार जो ठान लेते हैं। नादाँ हैं वो, जो रखते हैं वफ़ा की कोई उम्मीद। यहाँ चंद सिक्कों में, ल...

स्वतंत्रता दिवस विशेष - कलम के जादूगर 14.08.2021

भारत एक विशाल राष्ट्र है और यहाँ के हर प्रान्त, शहर व ग्राम में अतुलनीय प्रतिभा के लोग निवास करते हैं पर अक्सर उनकी प्रतिभा एक उचित अवसर के अभाव में एक संकीर्ण दायरे में सिमट कर रह जाती है। हर एक व्यक्ति के पास साधन या पहुँच नहीं होती की वो एक बड़े मंच से अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर सकें। लेकिन ये नया भारत है जो हार मान कर चुप बैठने वालों में से नहीं। ये नए नए अवसर निकाल ही लेता है। पिछले कुछ वर्षो...

इश्क़ दोबारा 12.08.2021

एक किताब सा मैं जिसमें तू कविता सी समाई है, कुछ ऐसे ज्यूँ जिस्म में रुह रहा करती है। मेरी जीस्त के पन्ने पन्ने में तेरी ही रानाई है, कुछ ऐसे ज्यूँ रगों में ख़ून की धारा बहा करती है। एक मर्तबा पहले भी तूने थी ये किताब सजाई, लिखकर अपनी उल्फत की खूबसूरत नज़्म। नीश-ए-फ़िराक़ से घायल हुआ मेरा जिस्मोजां, तेरे तग़ाफ़ुल से जब उजड़ी थी ज़िंदगी की बज़्म। सूखी नहीं है अभी सुर्ख़ स्याही से लिखी ये इबारतें, कहीं फ़िर स...

बातें बनाम कृत्य 01.08.2021

तुम्हें पता है, क्यूँ तुम्हारी किसी कड़वी बात का मैं बुरा नहीं मानता। क्यूंकि बातें अक्सर अस्थायी होती हैं। बदलती रहती हैं मनोदशा के साथ। सिर्फ बातों का कोई खास मूल्य भी नहीं होता, बातें करने वाले लाख मिल जायेंगे। क्यूंकि बातें करना आसान है, और उतना ही आसान है नकार जाना। बातें अक्सर हवा के झोंके सी आती हैं, और चली जाती हैं। बस छोड़ जाती हैं एक अहसास। जो मन को दे सकता है आह्लाद, या विषाद, या फिर क्रो...

माँ तू मुझे सिखा दे, आसमान में उड़ना 17.07.2021

माँ तू मुझे सिखा दे, आसमान में उड़ना ओ माँ तू मुझे सिखा दे, आसमान में उड़ना। पंखों में भर जोश मुझे भी, तेज हवा से लड़ना। हर सुबह तू छोड़ के मुझको, दाना लेने जाती है। सर्दी गर्मी में श्रम करके, तू सदैव मुस्काती है। बारिश के मौसम में जब, नीड़ हमारा रिसता है। वन में तू घूम अकेले, तिनका तिनका लाती है। तेरी प्रेरणा से मैं भी चाहूँ, नित ऊँचाई पे चढ़ना। ओ माँ तू मुझे सिखा दे, आसमान में उड़ना कभी सोचता था मैं मन...

हिमशिला 15.07.2021

।। हिमशिला   ।। एक निर्मल निर्झरणी थी तू, कैसे बन गयी हिमशिला । किधर गयी स्नेह की गर्मी, ये पाषाण हृदय था कहाँ मिला। वर्षों पहले जब देखा था, तू चंचल, कल कल बहती थी। जोश भरी, मतवाली होकर, लाखों बातें कहती थी। ऐसा वेग प्रचंड था तेरा, कोई बाधा रोक न पाती थी। तेरी जिजीविषा के सम्मुख, पर्वत चोटी झुक जाती थी। निकट तेरे आकर तो मैं भी, जड़ से चेतन हो जाता था। तेरी लहरों के गुंजन से, पूरा अरण्य गुनगुना...

कालिदास - बाबा नागार्जुन 06.07.2021

कालिदास! सच-सच बतलाना इन्दुमती के मृत्युशोक से अज रोया या तुम रोये थे? कालिदास! सच-सच बतलाना! शिवजी की तीसरी आँख से निकली हुई महाज्वाला में घृत-मिश्रित सूखी समिधा-सम कामदेव जब भस्म हो गया रति का क्रंदन सुन आँसू से तुमने ही तो दृग धोये थे कालिदास! सच-सच बतलाना रति रोयी या तुम रोये थे? वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमिका प्रथम दिवस आषाढ़ मास का देख गगन में श्याम घन-घटा विधुर यक्ष का मन जब उचटा खड़े-खड़े तब...

विवान और अवनि की प्रथम कविता 04.07.2021

आज मैं आपके सामने न तो कोई अपनी कविता लाया हूँ और न ही किसी प्रसिद्ध कवि की। पर ये कवितायेँ मुझे अति प्रिय हैं क्यूंकि ये कवितायें मेरी आँखों के दो तारों के पहली कवितायें हैं जो उन्होने कुछ दिन पहले लिखी और अपनी आवाज़ में रिकॉर्ड कीं।   आपका आशीर्वाद और प्रोत्साहन इन्हें और आगे बढ़ने की प्रेरणा देगा। 

कविता मेरी विवशता है 02.07.2021

।। कविता मेरी विवशता है ।। कविता मेरा शौक नहीं, कविता मेरी विवशता है। जीवन के दिये जो अवसर त्यागे उनका खेद खटकता है। कविता मेरी विवशता है। जीवन पथ तो चलता जाये, तरह तरह के मोड़ भी आये। कुछ राहें तो स्वयं चुनी थीं, कुछ रस्ते किस्मत से पाये। राहें जो यूँ ही छूट गयीं, उनका प्रतिबिम्ब झलकता है। कविता मेरी विवशता है। जीवन हमको सबक सिखाये, नित नूतन एक पाठ पढ़ाये। कुछ सीखों को मान गये हम, कुछ सीखों को जान...

वो काश कुछ कहकर जाती 26.06.2021

वो काश कुछ कहकर जाती वो काश कुछ कहकर जाती जो मन में था होठों पर लाती वो काश कुछ कहकर जाती अंतर्मन में आशंका थी या कोई मजबूरी आखिर क्या हुआ उन दिनों जो बढ़ गयी इतनी दूरी जो भी था, जैसा भी था मुझको तो बतलाती वो काश कुछ कह कर जाती कहने को तो कई दिनों की थी अपनी पहचान फिर भी एक दूजे से हम थे काफी कुछ अनजान थोड़ा और साथ चलते तो समझ और हो आती वो काश कुछ कह कर जाती विस्मृत नहीं हुआ आज तक वो दिन जब लम्बी रा...

मेरी जिंदगी (My Life) 22.06.2021

बहुत समय पहले की है बात वो थी पूनम की एक रात। मैं था बड़े चैन से सोया सतरंगी सपनों में खोया। अचानक किसी ने मानसपटल खटखटाया अलसाते हुए मन का द्वार खोला तो पाया। काले परिधान पहने, कोई थी खड़ी अदृश्य था चेहरा, फिर भी भयावह बड़ी। डर और क्रोध के बीच में डोलते हुए मैंने स्वयं को देखा ये बोलते हुए। कौन है तू, तेरा चेहरा क्यूँ नहीं दिखता उसने कहा, मैं हूँ तेरी  जिंदगी की रिक्तता। तू कैसे जी रहा है यही द...

मृत्यु (Death) - शची रानी 22.06.2021

यह कविता मेरे सहपाठी व मित्र श्री सिद्धार्थ रंजन की माताजी श्रीमती शची रानी की पुस्तक सूनृता से उनके आग्रह पर ली गयी है

प्रतीक्षा (The Wait) 18.06.2021

प्रतीक्षा हृदय में लिए असीम वेदना मस्तिष्क में विचित्र स्तब्धता गहन उदासी के प्रति मन की विचित्र बद्धता भावनाओं का एक भंवर मथता रहता है मन को ज्यूँ दारुण दावानल कोई निगल रहा हो वन को नीरवता कुछ कहती दिखती स्पंदन है चुप सा लगता एक प्रश्नचिन्ह सा लगा है सम्मुख समझो जितना और उलझता भरे विश्व में एकाकीपन मुझे आज क्यूँ लगता है दर्पण में प्रतिबिम्ब भी अपना अपरिचित अज्ञात सा दिखता है निर्मम निष्ठुर नेत्र...

चांदनी की पांच परतें - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 17.06.2021

चांदनी की पांच परतें सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की एक प्रसिद्ध कविता है, जिसमें एक साथ कई अनुभूतियों का अद्भुत समागम होता है यहाँ प्रेम के साथ पीड़ा है, आशा के साथ आशंका है और विश्वास के साथ है विवशता बहुत कम शब्दों में बहुत कुछ कह जाती है यह कविता

हम दोनों (Two of Us) - Extended Version 12.06.2021

हम दोनों हम दोनों नदिया के तीरे मध्य हमारे अविरल धारा अलग अलग अपनी दुनिया पर अनाद्यनंत रहे साथ हमारा अलग अलग अपनी राहें हैं अपनी अपनी जिम्मेदारी अपनी खुशियां, अपने दुःख हैं फिर भी अपनी साझेदारी मेरे तट पर जब मावस का घना अँधेरा छा जाता है तेरे तट का पूनम चन्दा मेरा मन भी बहलाता है तेरे तट पर जब आंधी में पुष्प लताएं सिहराती हैं मेरे तट के वट वृक्षों की शाख उधर ही बढ़ जाती हैं ग्रीष्म ऋतू में तप्त हवा...

सजल है कितना सवेरा - महादेवी वर्मा 04.06.2021

महादेवीजी का शब्दों का चुनाव तो विलक्षण था ही परन्तु कविता के माध्यम से एक रंग बिरंगा चित्र बना देने की उनकी शक्ति अतुलनीय थी उनकी कविताओं में एक अलग ही सम्मोहन शक्ति है जो पाठकों और श्रोताओं को अपनी ओर आकर्षित कर एक मायानगरी में ले जाती है जहां आप भावनाओं की निर्झरिणी में गोते लगाते रहने के लिए विवश हो जाते हैं सजल है कितना सवेरा गहन तम में जो कथा इसकी न भूला अश्रु उस नभ के, चढ़ा शिर फूल फूला झूम...

हम दोनों (Two of Us) 03.06.2021

हम दोनों नदिया के तीरे मध्य हमारे अविरल धारा अलग अलग अपनी दुनिया पर अनाद्यनंत रहे साथ हमारा अलग अलग अपनी राहें हैं अपनी अपनी जिम्मेदारी अपनी खुशियां, अपने दुःख हैं फिर भी अपनी साझेदारी कभी कोई पर्ण मेरे तट से तेरे तट तक बह जाता है अनकही बातों को मेरी कान में तेरे कह जाता है और कभी हवा का झोंका तेरे तट से आ जाता है तेरी श्वासों की खुशबू से मेरा तट महका जाता है - विवेक (सर्व अधिकार सुरक्षित, All Rig...

परशुराम की प्रतीक्षा (खण्ड-2) - रामधारी सिंह 'दिनकर' 02.06.2021

१९६२ में भारत चीन युद्ध में जब भारत को पराजय का सामना करना पड़ा तो पूरा देश स्तब्ध था और दिनकरजी भी इसका अपवाद नहीं थे स्वाभिमान पर लगी चोट और वीर सैनिकों के बलिदान के दुःख की अभिव्यक्ति है परशुराम की प्रतीक्षा दिनकरजी को कैसा प्रतीत हुआ होगा, इसका अनुभव मुझे २६ नवम्बर २००८ को हुआ जब मुंबई आतंकी हमलों के पश्चात देश में विवशता का वातावरण था ऐसा लग रहा था की कोई भी हमारे नगरों में आकर हम पर आक्रमण कर...

आव्हान (A Clarion Call) 31.05.2021

आव्हान पंच तत्व काया सागर की सजल नेत्रों की सीपी में विकल वेदना के अश्रु ये मृत्यु तक सहेज रख लूँ इहलोक से प्रस्थान कर जब जाऊँगा मिलने उस प्रभु से देकर भेंट अश्रु के मोती पूछूँगा कुछ प्रश्न अवश्य मैं। घना अँधेरा छाया जग में क्यों तज कर इसको सोया है अधर्म, अन्याय की पीड़ा से जब जन जन, नित नित रोया है कोटि कंसों के कृत्यों को क्या मूक समर्थन तेरा है अपराधियों के मस्तक पर क्या वरद हस्त भी फेरा है दूषि...

वीणा 31.05.2021

भोग स्वर्ग फिर मृत्युलोक की क्रीड़ा मुझसे पूछो, पाकर सब कुछ खो देने की पीड़ा मुझसे पूछो। कहाँ छिपी है विकल रागिनी गाने वाली सरगम, टूटे तारों से ही झंकृत वीणा मुझसे पूछो। - विवेक (सर्व अधिकार सुरक्षित, All Rights Reserved)

एक क्षण (One Moment) 31.05.2021

अवसादों के गहन तमस में, सूर्य किरण की काया बनकर शुष्क मरू से हृदय पटल पर, हरित तरु की छाया बनकर कब मांगी थी मैंने तुझसे, जीवनपर्यन्त प्रतिबद्धता बस एक क्षण वह मुझको दे दो, दिवास्वप्न की माया बनकर - विवेक (सर्व अधिकार सुरक्षित, All Rights Reserved)

Ouça o podcast Hindi Poems by Vivek (विवेक की हिंदी कवितायेँ) no Replaio

Rádio e podcasts em um só app - grátis e sem cadastro. Instale hoje e não perca o lançamento

Baixe no Google Play

O Replaio não é o publicador dos podcasts; os nomes dos programas, as capas e o áudio pertencem aos seus autores e são distribuídos por feeds RSS públicos