Nayi Dhara Radio
Pratidin Ek Kavita
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
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Episodes
Dushwari | Javed Akhtar 17.01.2026 2:01
दुश्वारी। जावेद अख़्तर मैं भूल जाऊँ तुम्हें अब यही मुनासिब है मगर भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूँ कि तुम तो फिर भी हक़ीक़त हो कोई ख़्वाब नहीं यहाँ तो दिल का ये आलम है क्या कहूँ कम-बख़्त भुला न पाया वो सिलसिला जो था ही नहीं वो इक ख़याल जो आवाज़ तक गया ही नहीं वो एक बात जो मैं कह नहीं सका तुम से वो एक रब्त जो हम में कभी रहा ही नहीं मुझे है याद वो सब जो कभी हुआ ही नहीं
Tumhari Jeb Mein Ek Suraj Hota Tha | Ajay 16.01.2026 2:42
तुम्हारी जेब में एक सूरज होता था । अजेय तुम्हारी जेबों में टटोलने हैं मुझे दुनिया के तमाम ख़ज़ाने सूखी हुई ख़ुबानियाँ भुने हुए जौ के दाने काठ की एक चपटी कंघी और सीप की फुलियाँ सूँघ सकता हूँ गंध एक सस्ते साबुन की आज भी मैं तुम्हारी छाती से चिपका तुम्हारी देह को तापता एक छोटा बच्चा हूँ माँ मुझे जल्दी से बड़ा हो जाने दे मुझे कहना है धन्यवाद एक दुबली लड़की की कातर आँखों को मूँगफलियाँ छीलती गिलहरी की नन्ही...
Ek Rajnitik Pralap | Kumar Ambuj 15.01.2026 4:40
एक राजनीतिक प्रलाप। कुमार अम्बुज यहाँ अब कुछ इच्छाओं का गुम हो जाना सबसे मामूली बात है। मसलन धुएँ के घेरे के बाहर एक जगह या एक ठहाका या एक किताब कबाड़ में ऐसी कई चीज़ें हैं जिन पर जंग और मायूसी है कबाड़ के बाहर भी ऐसी कई चीज़ें हैं जिन पर जम गई हैं उदासी की परतें मूर्त यातना जैसा कुछ नहीं बर्बरता एक वैधानिक कार्यवाही जिसके ज़रिये निबटा जा रहा है फालतू जनता से अखबार और हास्य धारावाहिकों के असंख्य चै...
Tum Itna Jo Muskura Rahe Ho | Kaifi Azmi 14.01.2026 1:54
तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो । कैफ़ी आज़मी तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो क्या ग़म है जिस को छुपा रहे हो आँखों में नमी हँसी लबों पर क्या हाल है क्या दिखा रहे हो बन जाएँगे ज़हर पीते पीते ये अश्क जो पीते जा रहे हो जिन ज़ख़्मों को वक़्त भर चला है तुम क्यूँ उन्हें छेड़े जा रहे हो रेखाओं का खेल है मुक़द्दर रेखाओं से मात खा रहे हो
Sochna Aur Hona | Nilesh Raghuvanshi 13.01.2026 2:00
सोचना और होना। नीलेश रघुवंशी बनाना चाहती थी घर पहाड़ों के ऊपर डर गई लेकिन जंगली जानवरों और हवाओं से.. बहुत प्यार है पानी से सोचा क्यों न घर बनाऊं समुद्र तट पर लेकिन डर गई तूफान और लहरों से.. फिर सोचा कहीं एकांत में शहर के कोलाहल से दूर लेकिन बिछड़ने से पहले दोस्तों की याद ने ऐसा करने से रोका फिर जाने कैसे बिना कोई ना नुकुर किए बन गया घर सोचती हूँ अब खिड़की से झाँकते संसार को त्यागने से अच्छा है मा...
Shashwat | Doodhnath Singh 12.01.2026 2:18
शाश्वत । दूधनाथ सिंह यह उदासी जन्म से ही है। यह सहज, संभाव्य अकुलाहट मौन में यह दबी घबराहट यह तुम्हारा अंतरिक्ष-अभाव-तट कौन जानेगा कि यह जो बादलों में टँका मेरा हठ— तुम्हारे लिए—यह सच जन्म से ही है। और कोई एक भाषा-विपद और कोई एक कवि-पद और कोई एक हाहाकार और कोई तुम—सतत... कुछ भी हो— सभी कुछ है बराबर... सभी कुछ है व्यर्थ सभी कुछ है साधु... लेकिन यह तुम्हारा अंतरिक्ष-अभाव तट यह उदासी-भरा हठ—यह जन्म स...
Koi Ek Ko | Dheeraj 11.01.2026 1:39
कोई एक को। धीरज कोई एक को कहूँगा कि साथ चलेंगे, मैं अकेला नही जाना चाहता पहाड़। अकेले देखे जाने का डर हमेशा लगता है, पहाड़ को, मुझको । हम जब भी मिले, कोई एक को लेकर मिले कि दोनों के अकेलेपन के मिल जाने का डर हमेशा रहता है पहाड़ को और मुझको
Reshmi Patola | Alka Sinha 10.01.2026 2:19
रेशमी पटोला । अलका सिन्हा ख़ूबसूरत, चिरजीवी होता है रेशमी पटोला तार-तार बुना जाता है बार-बार बिंधा जाता है बाँधा जाता है कई-कई रंगों में रंगा जाता है रेशमी पटोला। मगर अब इक्का-दुक्का परिवार ही बचे हैं जो सहेजते हैं इतने प्यार और इतमीनान से रेशमी पटोला। लंबा समय लगता है इन्हें तैयार करने में जैसेकि आत्मीय स्पर्श से रेशा-रेशा खिलती हैं इंद्रधनुषी वितान रचाती रंगोली सजाती तितली-सी लड़कियाँ। आसान नही...
Dheere Bahut Dheere Chhoot Jaata hai Sab | Adiba Khanum 09.01.2026 2:41
धीरे बहुत धीरे छूट जाता है सब । अदीबा ख़ानम धीरे, बहुत धीरे छूट जाता है सब अपना घर अपने लोग अपना मन अपना जीवन जिए हुए के प्रति प्रेम आने वाले के प्रति ईमानदारी अपनी इच्छाएँ और उम्मीदें धरती की हरी घास का मोह मिटटी की कच्ची सुगंध का पाश हिलते हुए पीले परदों से झँकती रौशनी चाँद की कीमती ठंडक सितारों की चमक और रात के आसमान की नीली रोशनाई नहरों का गंदला पानी नदियों की बेख़ौफ़ दौड़ समुद्र का अथाह विता...
Baat Un Dinon Ki Hai | Rajendra Sharma 08.01.2026 3:24
बात उन दिनों की है । राजेंद्र शर्मा बात उन दिनों की है जब नहीं था रंगीन टेलीविज़न इक्का-दुक्का समृद्ध घरों में ही होता था शटर वाला ब्लैक एंड व्हाइट टेलीविज़न । रविवार को आने वाली पिक्चर देखने पूरा मोहल्ला पहुँचता टेलीविज़न वाले घर अहाते मे लगाया जाता टेलीविज़न पूरा मोहल्ला देखता पिक्चर मध्यातंर मे जब सलमा सुल्तान अपने जूड़े मे लगाए गुलाब का फूल अपनी बेशक़ीमती मुस्कुराहट से पढ़ती समाचार पूरे मोहल्ले...
Ghar Ki Baatein | Shraddha Upadhyay 07.01.2026 1:41
घर की बातें । श्रद्धा उपाध्याय घर की बातें घर में नहीं रहनी चाहिए घर की बातें सड़कों पर होनी चाहिए रास्तों पर बेघर लोगों के साथ सोना चाहिए घर की बातों को घर की बातों को मोर्चा लेकर निकलना चाहिए शहर में पोस्टरों पर लिखी जानी चाहिए घर की बातें घर की बातें पढ़ी जानी चाहिए अख़बारों पर और फिर उन बातों पर भेल पूरी रख कर खाना चाहिए बना कर पतंग घर की बातों को आकाश में उड़ा देना चाहिए
Rotiyan | Ekta Verma 06.01.2026 2:56
रोटियाँ । एकता वर्मा रोटियों की स्मृतियों में आँच की कहानियाँ गमकती हैं। अम्मा बताती हैं, सेसौरी के ईंधन पर चिपचिपाई सी फूलती हैं रोटियाँ सौंफ़ला पर सिंकी रोटियाँ धुँवाई; पकती हैं चटक-चटक नीम के ईंधन पर कसैली सी, करुवाती हैं रोटियाँ पर, अरहर की जलावन पर पकती हैं भीतर-बाहर बराबर। अम्मा का मानना है, शहर रोटियों के स्वाद नहीं जानते स्टोव की रोटियों में महकती है किरोसिन की भाप और ग़ैस पर तो पकती...
Happily Ever After | Satyam Tiwari 05.01.2026 2:41
हैप्पिली एवर आफ्टर । सत्यम तिवारी हम चाहते थे अंत में नायक ही विजयी हो लेकिन जो विजयी हुआ उन्होंने उसे ही नायक घोषित कर दिया अबकी बार भी सिनेमा में समय से अधिक, पैसों की बर्बादी खली वही हुआ फिर उन्होंने अपना नायक पहले से चुन रखा था कहानी जो चाहे रुख़ ले ऊँट किसी भी करवट बैठे राजगद्दी पर उनका ही नायक बैठेगा नायिका भी उसी के हिस्से आएगी दिलों में प्यार उमड़ेगा बस उसके ही लिए और हमारा हीरो, ठीक हमारी त...
Aaj Ki Raat Tujhe | Gopaldas Neeraj 04.01.2026 3:38
आज की रात तुझे आख़िरी ख़त और लिख दूँ । गोपालदास नीरज आज की रात तुझे आख़िरी ख़त और लिख दूँ कौन जाने यह दिया सुबह तक जले न जले? बम बारूद के इस दौर में मालूम नहीं ऐसी रंगीन हवा फिर कभी चले न चले। ज़िंदगी सिर्फ़ है ख़ुराक टैंक तोपों की और इंसान है एक कारतूस गोली का सभ्यता घूमती लाशों की इक नुमाइश है और है रंग नया ख़ून नई होली का। कौन जाने कि तेरी नर्गिसी आँखों में कल स्वप्न सोए कि किसी स्वप्न का मरण स...
Roshni, Pani, Ped | Atulveer Arora 03.01.2026 1:14
रोशनी, पानी, पेड़ | अतुलवीर अरोड़ा पानी में झाँकता है एक पूरा पेड़ एक पूरा पेड़ पानी हो जाता है झाँकते हुए पानी में दो पेड़ दीखते हैं एक पेड़ पानी का एक रोशनी का।
Sardi Aayi | Safdar Hashmi 02.01.2026 1:51
सर्दी आई | सफ़दर हाश्मी सर्दी आई, सर्दी आई ठंड की पहने वर्दी आई। सबने लादे ढेर से कपड़े चाहे दुबले, चाहते तगड़े। नाक सभी की लाल हो गई सुकड़ी सबकी चाल हो गई। ठिठुर रहे हैं, काँप रहे हैं दौड़ रहे हैं, हाँप रहे हैं। धूप में दौड़ें तो भी सर्दी छाओं में बैठें तो भी सर्दी। बिस्तर के अंदर भी सर्दी बिस्तर के बाहर भी सर्दी। बाहर सर्दी, घर में सर्दी। पैर में सर्दी, सर में सर्दी। इतनी सर्दी किसने करदी अंडे की जम ज...
Apne Hisse Mein Log Aakash Dekte Hain | Vinod Kumar Shukla 01.01.2026 2:05
अपने हिस्से में लोग आकाश देखते हैं। विनोद कुमार शुक्ल अपने हिस्से में लोग आकाश देखते हैं और पूरा आकाश देख लेते हैं सबके हिस्से का आकाश पूरा आकाश है। अपने हिस्से का चंद्रमा देखते हैं और पूरा चंद्रमा देख लेते हैं सबके हिस्से का चंद्रमा वही पूरा चंद्रमा है। अपने हिस्से की जैसी-तैसी साँस सब पाते हैं वह जो घर के बग़ीचे में बैठा हुआ अख़बार पढ़ रहा है और वह भी जो बदबू और गंदगी के घेरे में ज़िंदा है। सबक...
Aao Prem Deep Ek Agyaat Jalao | Nirmala Putul 31.12.2025 2:28
आओ प्रेम दीप एक अज्ञात जलाओ - निर्मला पुतुल आओ मन के सूने आँगन आओ प्रेम पूरित भाव अनोखा एक मन हर दीप जलाओ घर पूरा रौशन हो जावे जो दूर भगावे अंधियारे आओ भी ओलती आँगन ताखा भनसा गोहाल गलियारा वो तुलसी चौराहा सर्वत्र आस के सपने सजाओ बरसों से बेजान हुई बस्ती की वो बुधनी काकी उसकी देहरी कुटिया आओ और अन्तरंग उसकी उम्मीद बनो कोई एक दीप दिखाओ काल कोठरी कब तक है जीना प्रिय के न आने तक ठीक कहाँ है ...
Tumko Niharta Hun Subah Se | Dushyant Kumar 30.12.2025 1:41
तुमको निहारता हूँ सुबह से ऋतम्बरा। दुष्यंत कुमार तुमको निहारता हूँ सुबह से ऋतम्बरा, अब शाम हो रही है मगर मन नहीं भरा। ख़रगोश बन के दौड़ रहे हैं तमाम ख़्वाब, फिरता है चाँदनी में कोई सच डरा-डरा। पौधे झुलस गए हैं मगर एक बात है, मेरी नज़र में अब भी चमन है हरा-भरा। लंबी सुरंग-सी है तेरी ज़िंदगी तो बोल, मैं जिस जगह खड़ा हूँ वहाँ है कोई सिरा। माथे पे रखके हाथ बहुत सोचते हो तुम, गंगा क़सम बताओ हमें क्या...
Mujh Se Pehle | Ahmad Faraz 29.12.2025 2:31
मुझ से पहले। अहमद फ़राज़ मुझ से पहले तुझे जिस शख़्स ने चाहा उस ने शायद अब भी तिरा ग़म दिल से लगा रक्खा हो एक बे-नाम सी उम्मीद पे अब भी शायद अपने ख़्वाबों के जज़ीरों को सजा रक्खा हो जज़ीरा: द्वीप मैं ने माना कि वो बेगाना-ए-पैमान-ए-वफ़ा बेगाना-ए-पैमान-ए-वफ़ा: जो प्रेम का वादा करके भूल गया हो खो चुका है जो किसी और की रानाई में शायद अब लौट के आए न तिरी महफ़िल में और कोई दुख न रुलाये तुझे तन्हाई में मै...
Chai Ke Pyale Mein | Rajkamal Chowdhary 28.12.2025 2:10
चाय के प्याले में । राजकमल चौधरी दुख करने का असली कारण है : पैसा - पहले से कम चीज़ें ख़रीदता है। कश्मीरी सेब दिल के मरीज़ को चाहिए तो क्या हुआ? परिश्रम अब पहले से कम पैसे ख़रीदता है। हम सबके लिए काम इतना ही बचा है कि सुबह वक़्त पर शेव कर सकें। शाम को घर में चाय, और पड़ोसिनों के बारे में घरेलू कहानियाँ, हज़ार छोटे दंगे-फ़साद होते हैं, इतिहास और आर्थिक सभ्यता को उजागर करने के लिए—एक बड़ी लड़ाई नहीं हो...
Nukta-Chi Hai | Mirza Ghalib 27.12.2025 2:31
नुक्ता-चीं है। मिर्ज़ा ग़ालिब नुक्ता-चीं है ग़म-ए-दिल उस को सुनाए न बने क्या बने बात जहाँ बात बनाए न बने मैं बुलाता तो हूँ उस को मगर ऐ जज़्बा-ए-दिल उस पे बन जाए कुछ ऐसी कि बिन आए न बने खेल समझा है कहीं छोड़ न दे भूल न जाए काश यूँ भी हो कि बिन मेरे सताए न बने ग़ैर फिरता है लिए यूँ तिरे ख़त को कि अगर कोई पूछे कि ये क्या है तो छुपाए न बने इस नज़ाकत का बुरा हो वो भले हैं तो क्या हाथ आवें तो उन्हें हाथ...
Agantuk | Agyeya 26.12.2025 1:34
आगंतुक। अज्ञेय आँखों ने देखा पर वाणी ने बखाना नहीं। भावना ने छुआ पर मन ने पहचाना नहीं। राह मैंने बहुत दिन देखी, तुम उस पर से आए भी, गए भी, - कदाचित्, कई बार - पर हुआ घर आना नहीं।
Haar Na Apni Manunga Main | Gopaldas Neeraj 25.12.2025 1:46
हार न अपनी मानूँगा मैं !। गोपालदास "नीरज" चाहे पथ में शूल बिछाओ चाहे ज्वालामुखी बसाओ, किन्तु मुझे जब जाना ही है - तलवारों की धारों पर भी, हँस कर पैर बढ़ा लूँगा मैं ! मन में मरू-सी प्यास जगाओ, रस की बूँद नहीं बरसाओ, किन्तु मुझे जब जीना ही है - मसल-मसल कर उर के छाले, अपनी प्यास बुझा लूँगा मैं ! हार न अपनी मानूंगा मैं ! चाहे चिर गायन सो जाए, और ह्रदय मुर्दा हो जाए, किन्तु मुझे अब जीना ही है - बैठ...
Tumhari Aankhein | Parag Pawan 24.12.2025 1:27
तुम्हारी आँखें।पराग पावन कितनी सुंदर हैं तुम्हारी आँखें मुझे कुछ और चाहिए जो कहा न गया हो आँखों के बारे में इतनी सुंदर आँखों से कितनी सुंदर दुनिया दिखती होगी और तुम्हारा काजल ओह जैसे पानी पर पानी बरसता है अपनी ही उछाल को उत्सव में बदलते हुए
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