Nayi Dhara Radio
Pratidin Ek Kavita
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
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Episodes
Cheekho Dost | Pratibha Katiyar 23.12.2025 2:33
चीख़ो दोस्त - प्रतिभा कटियार चीख़ो दोस्त कि इन हालात में अब चुप रहना गुनाह है और चुप भी रहो दोस्त कि लड़ने के वक़्त में महज़ बात करना गुनाह है फट जाने दो गले की नसें अपनी चीख़ से कि जीने की आख़िरी उम्मीद भी जब उधड़ रही हो तब गले की इन नसों का साबुत बच जाना गुनाह है चलो दोस्त कि सफ़र लंबा है बहुत ठहरना गुनाह है लेकिन कहीं न जाते हों जो रास्ते उन रास्तों पर बेसबब चलते जाना भी तो गुनाह है हँसो दोस्...
Agnipath | Harivansh Rai Bachchan 22.12.2025 1:43
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!। हरिवंशराय बच्चन अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ! वृक्ष हों भलें खड़े, हों घने, हों बड़ें, एक पत्र-छाँह भी माँग मत, माँग मत, माँग मत! अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ! तू न थकेगा कभी! तू न थमेगा कभी! तू न मुड़ेगा कभी!—कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ! यह महान दृश्य है— चल रहा मनुष्य है अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ, लथपथ, लथपथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!
Jo Shilayein Todte Hain | Kedarnath Aggarwal 21.12.2025 2:22
जो शिलाएँ तोड़ते हैं । केदारनाथ अग्रवाल ज़िंदगी को वह गढ़ेंगे जो शिलाएँ तोड़ते हैं, जो भगीरथ नीर की निर्भय शिराएँ मोड़ते हैं। यज्ञ को इस शक्ति-श्रम के श्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!! ज़िंदगी को वे गढ़ेंगे जो खदानें खोदते हैं, लौह के सोए असुर को कर्म-रथ में जोतते हैं। यज्ञ को इस शक्ति श्रम के श्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!! ज़िंदगी को वे गढ़ेंगे जो प्रभंजन हाँकते हैं, शूरवीरों के चरण से रक्त-रेखा आँकते हैं।...
Ek Bijooke Ki Prem Kahani | Anamika 20.12.2025 4:00
एक बिजूके की प्रेम कहानी | अनामिका मैं हूँ बिजूका एक ऐसे खेत का जिसमें सालों से कुछ नहीं उगा बेकार पड़ा पड़ा धसक गया है मेरा हाड़ी सा गोल गोल माथा, उखड़ गई हैं मूँछें लचक गए हैं कंधे एक तरफ़ झूल गया है कुर्ता कुर्ते की जेबी में चुटुर- पुटुर करती है लेकिन नीले पीले पंखों वाली इक छोटी-सी चिड़िया एक वक़्त था जब यह चिड़िया मुझ से बहुत डरती थी धीरे-धीरे उसका डर निकल गया कल मेरी जेबी में अंडे दिए उस...
Champa Kale Kale Acchar Nahi Cheenti | Trilochan 19.12.2025 3:10
चंपा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती । त्रिलोचन चंपा काले-काले अच्छर नहीं चीन्हती मैं जब पढ़ने लगता हूँ वह आ जाती है खड़ी-खड़ी चुपचाप सुना करती है उसे बड़ा अचरज होता है : इन काले चिन्हों से कैसे ये सब स्वर निकला करते हैं चंपा सुंदर की लड़की है सुंदर ग्वाला है : गायें-भैंसे रखता है चंपा चौपायों को लेकर चरवाही करने जाती है चंपा अच्छी है चंचल है न ट ख ट भी है कभी-कभी ऊधम करती है कभी-कभी वह क़लम चुरा देत...
Dil Mein Hardam Chubhne Wala | Madhav Kaushik 18.12.2025 4:07
दिल में हर दम चुभने वाला । माधव कौशिक दिल में हर दम चुभने वाला काँटा सही सलामत दे आँखें दे या मत दे लेकिन सपना सही सलामत दे हमें तो युद्ध आतंक भूख से मारी धरती बख़्शी है आने वाली पीढ़ी को तो दुनिया सही सलामत दे दावा है मैं इक दिन उस को दरिया कर के छोड़ूँगा खुली हथेली पर आँसू का क़तरा सही सलामत दे बच्चे भी अब खेल रहे हैं ख़तरनाक हथियारों से बचपन की बग़िया को कोई गुड़िया सही सलामत दे आधी और अधू...
Itni Si Azadi | Rupam Mishra 17.12.2025 3:09
इतनी सी आज़ादी । रूपम मिश्र चाहती हूँ जब घर-दुवार के सब कामों से छूटूँ तो हर साँझ तुम्हें फोन करूँ तुमसे बातें करूँ देश - दुनिया की सेवार- जवार बदलने और न बदलने की पेड़ पौधों के नाम से जानी जाती जगहों की तुमसे ही शोक कर लेती उस दुःख का कि पाट दिए गये गाँव के सभी कुवें ,गड़हे साथी और ढेरवातर पर अब कोई ढेरा का पेड़ नहीं है अब तो चीन्ह में भी नहीं बची बसऊ के बाग और मालदहवा की अमराई की राह में च...
Apna Abhinay Itna Accha Karta Hun | Naveen Sagar 16.12.2025 2:17
अपना अभिनय इतना अच्छा करता हूँ । नवीन सागर घर से बाहर निकला फिर अपने बाहर निकल कर अपने पीछे-पीछे चलने लगा पीछे मैं इतने फ़ासले पर छूटता रहा कि ओझल होने से पहले दिख जाता था एक दिन घर लौटने के रास्ते में ओझल हो गया ओझल के पीछे कहाँ जाता घर लौट आया दीवारें धुँधली पड़ कर झुक-सी गईं सीढ़ियाँ नीचे से ऊपर ऊपर से नीचे होने लगीं पर वह घर नहीं लौटा घर से बाहर निकला फिर मुझसे बाहर निकल कर चला गया मैं आईने मे...
Kona | Priya Johri 'Muktipriya' 15.12.2025 1:52
कोना । प्रिया जोहरी 'मुक्तिप्रिया’ वो कोना था मेरे जीवन का, एक गहरा, सकरा, फिर भी विस्तृत- इतना कि उसमें पूरा जीवन समा जाए। समा जाएँ मेरी हर तकलीफ, हर रंज, हर तंज। उस कोने में बैठकर लिख सकती हूँ अनगिनत प्रेम-पत्र, पढ़ सकती हूँ मन की दो किताबें, तोड़ सकती हूँ कई गुलाब, और गूँथ सकती हूँ एक फूलों की माला। महसूस कर सकती हूँ नदी का तेज, ताज़ी हवा का हर झोंका। देख सकती हूँ. हथेली पर रखा एक सफेद मोती, जो...
Theek Hai Khud Ko Hum Badalte Hain | Jaun Elia 14.12.2025 2:12
ठीक है ख़ुद को हम बदलते हैं। जौन एलिया ठीक है ख़ुद को हम बदलते हैं शुक्रिया मश्वरत का चलते हैं हो रहा हूँ मैं किस तरह बरबाद देखने वाले हाथ मलते हैं है वो जान अब हर एक महफ़िल की हम भी अब घर से कम निकलते हैं क्या तकल्लुफ़ करें ये कहने में जो भी ख़ुश है हम उस से जलते हैं है उसे दूर का सफ़र दर-पेश हम सँभाले नहीं सँभलते हैं तुम बनो रंग तुम बनो ख़ुश्बू हम तो अपने सुख़न में ढलते हैं मैं उसी तरह तो बहलता...
Log Pagdandiyan Banayenge | Lakshmishankar Vajpeyi 13.12.2025 2:05
लोग पगडंडियाँ बनाएँगें। लक्ष्मीशंकर वाजपेयी रास्ते जब नज़र न आएँगे लोग पगडंडियाँ बनाएँगे। खुश न हो कर्ज़ के उजालों से ये अँधेरे भी साथ लाएँगे। ख़ौफ़ सारे ग्रहों पे है कि वहाँ आदमी बस्तियाँ बसाएँगे। सुनते-सुनते गुज़र गई सदियाँ मुल्क़ से अब अँधेरे जाएँगे। जीत डालेंगे सारी दुनिया को वे जो अपने को जीत पाएँगे। दूध बेशक पिलाएँ साँपों को उनसे लेकिन ज़हर ही पाएँगे।
Jeevan Ki Jai | Maithlisharan Gupt 12.12.2025 2:04
जीवन की जय। मैथिलीशरण गुप्त मृषा मृत्यु का भय है, जीवन की ही जय है। जीवन ही जड़ जमा रहा है, निज नव वैभव कमा रहा है, पिता-पुत्र में समा रहा है, यह आत्मा अक्षय है, जीवन की ही जय है! नया जन्म ही जग पाता है, मरण मूढ़-सा रह जाता है, एक बीज सौ उपजाता है, स्रष्टा बड़ा सदय है, जीवन की ही जय है। जीवन पर सौ बार मरूँ मैं, क्या इस धन को गाड़ धरूँ मैं, यदि न उचित उपयोग करूँ मैं, तो फिर महा प्रलय है, जीवन की ही...
Prayashchit | Hemant Deolekar 11.12.2025 1:28
प्रायश्चित । हेमंत देवलेकर इस दुनिया में आने-जाने के लिए अगर एक ही रास्ता होता और नज़र चुराकर बच निकलने के हज़ार रास्ते हम निकाल नहीं पाते तो वही एकमात्र रास्ता हमारा प्रायश्चित होता और ज़िन्दगी में लौटने का नैतिक साहस भी
Vardaan Mangunga Nahi | Shivmangal Singh Suman 10.12.2025 2:00
वरदान माँगूँगा नहीं। शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ यह हार एक विराम है जीवन महासंग्राम है तिल-तिल मिटूँगा पर दया की भीख मैं लूँगा नहीं । वरदान माँगूँगा नहीं ।। स्मृति सुखद प्रहरों के लिए अपने खण्डहरों के लिए यह जान लो मैं विश्व की सम्पत्ति चाहूँगा नहीं । वरदान माँगूँगा नहीं ।। क्या हार में क्या जीत में किंचित नहीं भयभीत मैं संघर्ष पथ पर जो मिले यह भी सही वह भी सही । वरदान माँगूँगा नहीं ।। लघुता न अब मेरी...
Aao Jal Bhare Bartan Mein | Raghuvir Sahay 09.12.2025 1:54
आओ, जल-भरे बरतन में । रघुवीर सहाय आओ, जल-भरे बरतन में झाँकें साँस से पानी में डोल उठेंगी दोनों छायाएँ चौंककर हम अलग-अलग हो जाएँगे जैसे अब, तब भी न मिलाएँगे आँखें, आओ पैठी हुई शीतल जल में छाया साथ-साथ भीगे झुके हुए ऊपर दिल की धड़कन-सी काँपे करती हुई इंगित कभी हाँ के, कभी ना के आओ जल-भरे बरतन में झाँके
Aurat Ko Chahiye Thi | Adiba Khanum 08.12.2025 3:00
औरत को चाहिए थी महज़ एक जेब। अदीबा ख़ानम औरत को चाहिए थी महज़ एक जेब उसमें चन्द खनकते सिक्के जिनके के बल पर आज़ाद करने थे कुछ ऐसे पंछी जो पीढ़ी दर पीढ़ी किसी महान षडयंत्र के तहत होते आए थे क़ैद चाभियाँ पल्लू में बाँध नहीं भाता उन्हें रानियों का स्वाँग उन चाभियों ने बन्द कर रखे हैं कई क़ीमती संदूक जिनमें बन्द हैं ख़ुद रानियाँ ही धूल फाँक रहीं गहनों की किसी हीरे किसी मोती की चमक नहीं कर रही उनके जीवन मे...
Andhere Ke Din | Laxmishankar Vajpeyi 07.12.2025 1:26
अँधेरे के दिन । लक्ष्मीशंकर वाजपेयी बदल गए हैं अँधेरों के दिन अब वे नहीं निकलते सहमे, ठिठके, चुपके-चुपके रात के वक्त वे दिन-दहाड़े घूमते हैं बस्ती में सीना ताने, कहकहे लगाते नहीं डरते उजालों से बल्कि उजाले ही सहम जाते हैं इनसे अकसर वे धमकाते भी हैं उजालों को बदल गए हैं अँधेरों के दिन।
Koi Ummeed Bar Nahi Aati | Mirza Ghalib 06.12.2025 2:22
कोई उम्मीद बर नहीं आती। मिर्ज़ा ग़ालिब कोई उम्मीद बर नहीं आती कोई सूरत नज़र नहीं आती मौत का एक दिन मुअ'य्यन है नींद क्यूँ रात भर नहीं आती आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी अब किसी बात पर नहीं आती जानता हूँ सवाब-ए-ताअत-ओ-ज़ोहद पर तबीअत इधर नहीं आती है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूँ वर्ना क्या बात कर नहीं आती क्यूँ न चीख़ूँ कि याद करते हैं मेरी आवाज़ गर नहीं आती दाग़-ए-दिल गर नज़र नहीं आता बू भी ऐ चारा-गर नहीं...
Ityaadi | Rajesh Joshi 05.12.2025 2:55
इत्यादि - राजेश जोशी कुछ लोगों के नामो का उल्लेख किया गया था जिनके ओहदे थे बाकी सब इत्यादि थे इत्यादि तादात में हमेशा ही ज़्यादा होते थे इत्यादि भाव ताव कर के सब्जी खरीदते थे और खाना वाना खा कर ख़ास लोगों के भाषण सुनने जाते थे इत्यादि हर गोष्ठी में उपस्थिति बढ़ाते थे इत्यादि जुलूस में जाते थे तख्तियां उठाते थे नारे लगाते थे इत्यादि लम्बी लाइनों में लग कर मतदान करते थे उन्हें लगातार ऐसा भ्रम दिया गया...
Baat Ki Baat | Shivmangal Singh Suman 04.12.2025 4:19
बात की बात । शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ इस जीवन में बैठे ठाले ऐसे भी क्षण आ जाते हैं जब हम अपने से ही अपनी बीती कहने लग जाते हैं। तन खोया-खोया-सा लगता मन उर्वर-सा हो जाता है कुछ खोया-सा मिल जाता है कुछ मिला हुआ खो जाता है। लगता; सुख-दुख की स्मृतियों के कुछ बिखरे तार बुना डालूँ यों ही सूने में अंतर के कुछ भाव-अभाव सुना डालूँ कवि की अपनी सीमाऍं है कहता जितना कह पाता है कितना भी कह डाले, लेकिन-अनकहा अधिक र...
Bhookhmari Ki Zad Mein Hai... | Adam Gondvi 03.12.2025 1:55
भुखमरी की ज़द में है या दार के साये में है। अदम गोंडवी भुखमरी की ज़द में है या दार के साये में है अहले हिंदुस्तान अब तलवार के साये में है छा गई है ज़ेहन की पर्तों पे मायूसी की धूप आदमी गिरती हुई दीवार के साये में है बेबसी का इक समंदर दूर तक फैला हुआ और कश्ती काग़ज़ी पतवार के साये में है हम फ़क़ीरों की न पूछो मुतमइन वो भी नहीं जो तुम्हारी गेसुए-ख़मदार के साये में है
Sabse Acchi Kavita | Vishnu Nagar 02.12.2025 1:55
विष्णु नागर । सबसे अच्छी कविता सबसे अच्छी कविता इतनी विनम्र होगी कि अविश्वसनीय लगेगी इतनी प्राकृतिक होगी कि हिन्दी लगेगी इतने दुखों में काम आएगी कि लिखी हुई नहीं लगेगी सबसे अच्छी कविता सबसे बुरे दिनों में याद आएगी उसे जो कंठ गाएगा मीठा लगेगा सबसे अच्छी कविता विकल कर देगी मुक्ति के लिए सबसे अच्छी कविता सबसे अच्छी बंदूक़ का सबसे बुरा झगड़ा साबित होगी सबसे अच्छी कविता सबसे बुरे दिनों में पहचा...
Main Phool | Gopaldas Neeraj 01.12.2025 1:21
मैं फूल । गोपालदास "नीरज" निर्जन की नीरव डाली का मैं फूल ! कल अधरों में मुस्कान लिए आया था, मन में अगणित अरमान लिए आया था, पर आज झर गया खिलने से पहले ही, साथी हैं बस तन से लिपटे दो शूल ! निर्जन की नीरव डाली का मैं फूल !
Tanhai | Shahryar 30.11.2025 1:24
तन्हाई । शहरयार अँधेरी रात की इस रहगुज़र पर हमारे साथ कोई और भी था उफ़ुक़* (क्षितिज) की सम्त* (दिशा) वो भी तक रहा था उसे भी कुछ दिखाई दे रहा था उसे भी कुछ सुनाई दे रहा था मगर ये रात ढलने पर हुआ क्या हमारे साथ अब कोई नहीं है
Shabd Aur Arth Ek Beech | Gayatribala Panda 29.11.2025 1:25
शब्द और अर्थ के बीच। गायत्रीबाला पंडा शब्द और अर्थ के बीच एक नारी ही बदल जाती है लंबे इंतज़ार में। ख़ुद को कोड़ती है बीज बोती है अनाज उपजाती है धरती को सदाबहार बनाती है और जीवनभर किसी न किसी की छाया में बैठकर एक इंसान बनने की अथक प्रतीक्षा करती है।
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