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Pratidin Ek Kavita

Arts HI ↓ 1195 episodes

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

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Jul 11, 2026

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Episodes

Sapne | Paash 11.02.2026

सपने । पाश अनुवाद : चमनलाल सपने हर किसी को नहीं आते बेजान बारूद के कणों में सोई आग को सपने नहीं आते बदी के लिए उठी हुई हथेली के पसीने को सपने नहीं आते शेल्फ़ों में पड़े इतिहास-ग्रंथों को सपने नहीं आते सपनों के लिए लाज़िमी है झेलने वाले दिलों का होना सपनों के लिए नींद की नज़र होना लाज़िमी है सपने इसलिए हर किसी को नहीं आते

Garibi | Dhoomil 10.02.2026

ग़रीबी । धूमिल ग़रीबी एक ख़ुली हुई क़िताब जो हर समझदार और मूर्ख के हाथ में दे दी गई है। कुछ उसे पढ़ते हैं कुछ उसके चित्र देख उलट-पुलट रख देते नीचे ’शो-केस’ के।

Sadak | Dheeraj 09.02.2026

सड़क । धीरज  तुम्हारा जाना, मेरा ऐसे छूट जाना जैसे हर साल छूट जाती है गाँव की एक ख़राब सड़क जिस पर लड़ा जा सके अगले साल का  चुनाव।

Pahadi Aurat | Nirmala Putul 08.02.2026

पहाड़ी औरत। निर्मला पुतुल  वह जो सर पे सूखी लकड़ियों का गट्ठर लादे  पहाड़ से उतर रही है  पहाड़ी स्त्री  अभी-अभी जाएगी बाज़ार  और बेचकर सारी लकड़ियाँ  बुझाएगी घर-भर के पेट की आग  चादर में बच्चे को पीठ पर लटकाये धान रोपती पहाड़ी स्त्री रोप रही है अपना पहाड़ सा दुख  सुख की एक लहलहाती फसल के लिए  पहाड़ तोड़ती, तोड़ रही है  पहाड़ी बन्दिश और वर्जनाएं  चटाईयाँ बुनते पहाड़ पर  काट रही है पहाड़ सा दिन  झाड़ू ब...

Raat Mein Boat Club | Hemant Deolekar 07.02.2026

रात में बोट क्लब । हेमंत देवलेकर रुकी हुई नावें : जैसे लहरों ने बेतरतीबी से उतार फैंकी अपनी जूतियाँ और समा गई तलघर में उनकी नींद पर मछलियों का पहरा है बंद है पानी का दरवाज़ा  चाँद उस पर लटका है ताले की तरह

Phool Khilkar Rahenge | Vishnu Nagar 06.02.2026

फूल खिल कर रहेंगे ।  विष्णु नागर  तुमने पत्थर बोए  तो पत्थर ही उगे  लेकिन पत्थरों ने अपने ऊपर  मिट्टी जमने नहीं दिया  हवा से नमी खींच ली  पौधे उगने बढ़ने लगे  पौधों ने फूल उगाए  फूलों ने ख़ुशबू बिखेरे  रंगों की बहार ला दी  पत्थर भी महकने लगे  पत्थरों ने पत्थर लगने से इन्कार कर दिया  तुमने पत्थरों पर बेवफ़ाई का आरोप लगाया  जवाब में पत्थरों ने और ख़ुशबू और रंग बिखेर दिए  तुम कुछ भी बोओ फूल खिल कर रहेंगे...

Kasbon Mein Chal Pustakalay | Anamika 05.02.2026

क़स्बों में चल पुस्तकालय ।  अनामिका  भाषाविद तो मैं नहीं हूँ, पर बचपन में अक्सर ही सोचती थी मैं- हमारी तरफ़ रूठ जाने को क्यों कहते हैं रूस जाना । औरतें हमारी तरफ़ की  रह- रह कर क्यों रूस जाती हैं । ऐसा क्या आकर्षण है सोवियत रूस में  क्या उसका आकर्षण है वे किताबें  जो सुन्दर हिंदी अनुवादों में  लाती है, चल पुस्तकालय की बड़ी बड़ी वैनें जब देखो तब  रूस जाने को तैयार कस्बे की ये उदास औरतें  जाओ वहाँ न ज...

Loktantrikta Mein Chhoona | Rupam Mishra 04.02.2026

लोकतांत्रिकता में छूना।  रूपम मिश्र  बुख़ार से देह इतनी निढाल है कि मौत से पहले ही माटी की लगने लगी हूँ घर से दूर हूँ तो घर की ज़्यादा लगने लगी हूँ कदमों में चलने की ताकत नहीं पर दोस्त से झूठ कहती हूँ कि आराम है घर जाने के लिए बस की एक सुरक्षित सीट पर पसर जाती हूँ खिड़की के पास की सीट अपनी लगती है क्यों कि उसके बाद कोई कहाँ धकेलेगा बस चली नहीं है और एक सज्जन बगल की सीट पर आ गये हैं कुछ नये रंगरुट से...

Dharti Ka Pehla Premi | Bhawani Prasad Mishra 03.02.2026

धरती का पहला प्रेमी ।  भवानीप्रसाद मिश्र एडिथ सिटवेल ने सूरज को धरती का पहला प्रेमी कहा है धरती को सूरज के बाद और शायद पहले भी तमाम चीज़ों ने चाहा जाने कितनी चीज़ों ने उसके प्रति अपनी चाहत को अलग-अलग तरह से निबाहा कुछ तो उस पर वातावरण बनकर छा गए कुछ उसके भीतर समा गए कुछ आ गए उसके अंक में मगर एडिथ ने उनका नाम नहीं लिया ठीक किया मेरी भी समझ में प्रेम दिया उसे तमाम चीज़ों ने मगर प्रेम किया सबसे पहले...

Main Kiski Aurat Hun | Savita Singh 02.02.2026

मैं किसकी औरत हूँ ।  सविता सिंह मैं किसकी औरत हूँ कौन है मेरा परमेश्वर किसके पाँव दबाती हूँ किसका दिया खाती हूँ किसकी मार सहती हूँ... ऐसे ही थे सवाल उसके बैठी थी जो मेरे सामनेवाली सीट पर रेलगाड़ी में मेरे साथ सफ़र करती उम्र होगी कोई सत्तर-पचहत्तर साल आँखें धँस गई थीं उसकी मांस शरीर से झूल रहा था चेहरे पर थे दुख के पठार थीं अनेक फटकारों की खाइयाँ सोचकर बहुत मैंने कहा उससे ‘मैं किसी की औरत नहीं हूँ...

Mera Ghar | Purnima Varman 01.02.2026

मेरा घर।  पूर्णिमा वर्मन मैंने सुई से खोदी ज़मीन  ‘फुलकारियां’ उगाई दुपट्टों पर मैंने दीवारों में रचे ‘ताख़’ दीवट वाले मैंने दरवाज़ों को दी राह बंदनवार वाली मैंने आग पर पकाया स्वाद अंजुरी में भरा तालाब मैंने कमरों को दी बुहार मैंने नवजीवन को दी पुकार मैंने सहेजा उमरदराज़ों को उनकी अंतिम सांस तक मैंने सुरों को भी छेड़ा बांस तक मेरे पसीने से बहा यश का गान पर मेरे घर पर लिखा तुम्हरा नाम...!

Zayid Zindagi | Shariq Kaifi 31.01.2026

ज़ाइद ज़िन्दगी । शारिक़ कैफ़ी कहानी और होती कुछ हमारी अगर हम वक़्त से सोने की आदत डाल लेते मगर हम तो न जाने क्या समझते थे सहर तक जागने को जो हम ने जाग कर काटी हैं नींद आते हुए भी वो ज़ाइद ज़िंदगी है वो ज़ाइद ज़िंदगी है जिस ने सारे मसअले पैदा किए हैं जिसे जीने में ख़्वाबों के ये उल्झट्टे हुए हैं ज़ाइद: अतिरिक्त

Do Boondein | Jaishankar Prasad 30.01.2026

दो बूँदें। जयशंकर प्रसाद शरद का सुंदर नीलाकाश निशा निखरी, था निर्मल हास बह रही छाया पथ में स्वच्छ सुधा सरिता लेती उच्छ्वास पुलक कर लगी देखने धरा प्रकृति भी सकी न आँखें मूँद सु शीतलकारी शशि आया सुधा की मनो बड़ी सी बूँद!

Neend | Alok Dhanwa 29.01.2026

नींद।  आलोक धन्वा रात के आवारा मेरी आत्मा के पास भी रुको मुझे दो ऐसी नींद जिस पर एक तिनके का भी दबाव ना हो ऐसी नींद जैसे चांद में पानी की घास

Koi Awaz Nahin | Tanwir Anjum 28.01.2026

कोई आवाज़ नहीं। तनवीर अंजुम अनुवाद: रिचर्ड जे कोहेन गर्द हमारे घरों तक फैल गई उस मौसम में कोई बारिश नहीं हम ने बादल के आख़िरी टुकड़े को गुज़र जाने दिया अब वो मेरे ना-फ़रमान बेटे की तरह वापस नहीं आएगा दुश्मनी हमारे दिलों तक फैल गई उस रात में कोई करामात नहीं हम ने पानी को कीचड़ में मिल जाने दिया अब वो बूढ़े की खोई हुई बीनाई की तरह वापस नहीं आएगा मौत हमारे जिस्मों तक फैल गई इन गलियों में कोई आवाज़ नह...

Ujda Mera Gaon | Rita Shukla 27.01.2026

उजड़ा मेरा गाँव। ऋता शुक्ल आम नीम महुआ की छाया नंदन कानन गाँव हमारा काशी मथुरा वृन्दावन  गंगासागर से अधिक दुलारा  चैता फगुआ ढोल झाल से  मह मह करती थीं चौपालें  कजरी सोहर बारहमासा अंगनाई की गमक संभाले  गंगा मईया की गोदी  लहरों संग वह डोला पाँती निर्गुण की लय साँझ उदासी आजी करती दीया बाती पहली पूजा काली मईया खीर बताशा भोग लगाती गाँव की उसकी रक्षा करना  भोले बाबा से यह विनती काम रसोई फिर जब जाती घर-घर...

Humein Bhool Jana Chahiye | Afzal Ahmed Sayyid 26.01.2026

हमें भूल जाना चाहिए । अफ़ज़ाल अहमद सय्यद उस ईंट को भूल जाना चाहिए जिस के नीचे हमारे घर की चाबी है जो एक ख़्वाब में टूट गया हमें भूल जाना चाहिए उस बोसे को (बोसा: चुम्बन) जो मछली के काँटे की तरह हमारे गले में फँस गया और नहीं निकलता उस ज़र्द रंग को भूल जाना चाहिए जो सूरज-मुखी से अलाहिदा दिया गया जब हम अपनी दोपहर का बयान कर रहे थे हमें भूल जाना चाहिए उस आदमी को जो अपने फ़ाक़े पर लोहे की चादरें बिछाता है...

Badi Bi | Aniruddh Umat 25.01.2026

बड़ी-बी। अनिरुद्ध उमट बड़ी-बी दरवाज़ा खोलो तुम्हारी पान घुँघरू, ख़त लाने में हुई मुझसे देरी बहुत 'हम नहीं जानते तुम कौन हो' बड़ी-बी हाथ में ख़त लिए मुँह में पान चबाए छमछम करती दरवाज़े की दहलीज़ पर आ हैरान थी 'हमने अपने मरने का दिन तय कर रखा था हमने समझा वह आ गया है' कहती बड़ी-बी मेरी आँखों में झाँक रही थी 'ठीक है गड्ढा ठीक ही खुदा है' कहती वह उतरी और एक मुट्ठी मिट्टी हमें दे गई

Aadmi Akela | Leeladhar Jagudi 24.01.2026

आदमी अकेला । लीलाधर जगूड़ी तारीख़ें भी तीस और आदमी अकेला हफ़्ते भी चार और आदमी अकेला महीने भी बारह और आदमी अकेला ऋतुएँ भी छह और आदमी अकेला वर्ष भी अनेक और आदमी अकेला काम भी बहुत से और आदमी अकेला।

Dus Se Upar | Sarwat Hussain 23.01.2026

दस से ऊपर। सरवत हुसैन इतने घर इतने सय्यारे कंकर पत्थर कौन गिने दस से ऊपर कौन गिने औज़ारों के नाम बहुत हैं हथियारों के दाम बहुत हैं ऐ सौदागर कौन गिने दस से ऊपर कौन गिने ऐ दिल ऐ बे-कल फ़व्वारे कितने घाव बने हैं प्यारे अपने अंदर कौन गिने दस से ऊपर कौन गिने कितनी लहरें टूट गई हैं बीच समुंदर कौन गिने

Ek Accha Gaon | Ajay 22.01.2026

एक अच्छा गाँव । अजेय एक अच्छे आदमी की तरह एक अच्छा गाँव भी एक बहुचर्चित गाँव नहीं होता अपनी गति से आगे सरकता अपनी पाठशाला में ककहरा सीखता अपनी ज़िंदगी के पहाड़े गुनगुनाता अपनी खड़िया से अपनी सलेट पट्टी पे अपने भविष्य की रेखाएँ उकेरता वह एक गुमनाम क़िस्म का गाँव होता है अपने कुएँ से पानी पीता अपनी कुदाली से अपनी मिट्टी गोड़ता अपनी फ़सल खाता अपने जंगल के बियाबानों में पसरा वह एक गुमसुम क़िस्म का गाँव होता...

Vimanspardhi | Gyanendrapati 21.01.2026

 विमानस्पर्धी।  ज्ञानेन्द्रपति  खगपथों पर पक्षियों से जा टकराते हैं विमान, अन्धाधुन्द और ध्वन्स का ज़िम्मेदार पक्षी को ठहराया जाता है बेसबब बेसब्र चील को दूर धरती के एक कसाईखाने की धुरी पर गगन मँडराते गिद्ध को जबकि वे खगपथों को मेघपथों से जोड़ने वाली आकासी सिवान पर  तारापथ जहाँ से दीख जाता दिन में ही उन्हें - अंक रही अंतिम उड़ानें हैं  पक्षीकुल की जिन्हें विमान-कम्पनियों और बीमा-कम्पनियों का अभिशाप-क...

Ma Aur Aag | Vishwanath Prasad Tiwari 20.01.2026

माँ और आग। विश्वनाथ प्रसाद तिवारी यह उस समय की बात है जब माचिस का आविष्कार नहीं हुआ था माँ थोड़ी-सी आग जलाकर रख देती सवेरे रोटी सेंकने के लिए रात को जब सभी सो जाते माँ आग को ऐसे ढककर छिपाती एक कोने में जैसे कोई रतन हो अमोल जैसे कोई शिशु हो मुलायम जैसे कोई दुल्हन हो लाल-लाल मेघ गरजते थे रातों को कड़कती थी बिजली खेतों में फेंकरते थे सियार और गलियों में रोते थे कुत्ते हम डर से चिपक जाते माँ की गोद मे...

Gori Soyi Sej Par | Madan Kashyap 19.01.2026

गोरी सोयी सेज पर । मदन कश्यप शब्द जो नंदिनी के खुर के नीचे दब कर भी नहीं मरे, राजा दिलीप के आतंक से मर गये कालिदास से पूछो कि धमनियों का रक्त पिला-पिला कर कैसे पुनरुज्जीवित किया उन शब्दों को मैं एक ऐसे टीले पर चक्कर काट रहा हूँ जिसके नीचे एक सभ्यता ही नहीं एक भाषा भी दफ्न है मुझे ढूँढने हैं हजारों शब्द जो कहीं उतनी छोटी-सी जगह में दुबके हैं जितनी-सी जगह तुम्हारे नाखून और उस पर चढ़ी पालिश के बीच बच...

Atmaparichay | Harivansh Rai Bachchan 18.01.2026

आत्मपरिचय। हरिवंशराय बच्चन मैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ, फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूँ; कर दिया किसी ने झंकृत जिनको छूकर मैं साँसों के दो तार लिए फिरता हूँ! मैं स्नेह-सूरा का पान किया करता हूँ, मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ, जग पूछ रहा उनको,जो जग की गाते, मैं अपने मन का गान किया करता हूँ! मैं निज उर के उद्गार लिए फिरता हूँ, मैं निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ; है यह अपूर्ण संसार न मु...

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