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Pratidin Ek Kavita

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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

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Jul 11, 2026

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Episodes

Prathna Bani Rahi | Gopal Singh Nepali 08.03.2026

प्रार्थना बनी रही | गोपाल सिंह नेपाली रोटियाँ ग़रीब की प्रार्थना बनी रही एक ही तो प्रश्न है रोटियों की पीर का पर उसे भी आसरा आँसुओं के नीर का राज है ग़रीब का ताज दानवीर का तख़्त भी पलट गया कामना गई नहीं रोटियाँ ग़रीब की प्रार्थना बनी रही चूम कर जिन्हें सदा क्राँतियाँ गुज़र गईं गोद में लिये जिन्हें आँधियाँ बिखर गईं पूछता ग़रीब वह रोटियाँ किधर गई देश भी तो बँट गया वेदना बँटी नहीं रोटियाँ ग़रीब की प्...

Khana Hai | Priyankshi Mohan 07.03.2026

खाना है । प्रियाँक्षी मोहन  खाना है "वो" खाना है क्या खाना है? घर भर पूछे बिटिया से बिटिया को बस रट लगी कि "वो" खाना है कल से वो क्या होता ज़रा बताओ? सब पूछे बिटिया से बिटिया को तो नाम न सूझे  कुछ मीठा मीठा सूझे टॉफी चॉकलेट मिश्री, कुल्फी क्या है वो इन सब में? बिटिया मुह फुलाए दौड़े इस कोने उस कोने पापा मम्मी दादा दादी सब सो गए जब थक के बिटिया कुतरे चीनी चाटे नन्ही चीटी के संग में

Basant | Kedarnath Singh 06.03.2026

बसन्त | केदारनाथ सिंह और बसन्त फिर आ रहा है शाकुन्तल का एक पन्ना मेरी अलमारी से निकलकर हवा में फरफरा रहा है फरफरा रहा है कि मैं उठूँ और आस-पास फैली हुई चीज़ों के कानों में कह दूँ 'ना' एक दृढ़ और छोटी-सी 'ना' जो सारी आवाज़ों के विरुद्ध मेरी छाती में सुरक्षित है मैं उठता हूँ दरवाज़े तक जाता हूँ शहर को देखता हूँ हिलाता हूँ हाथ और ज़ोर से चिल्लाता हूँ – ना...ना...ना मैं हैरान हूँ मैंने कितने बरस गँवा...

Jab Jab Tum Chahoge Mujhse | Adiba Khanum 05.03.2026

जब जब तुम चाहोगे मुझसे । अदीबा ख़ानम जब जब तुम चाहोगे मुझसे एक प्रेम पगी कविता मेरी जान मैं तम्हें टूट कर प्रेम दूँगी मेरे पसंदीदा मौसमों का आगाज़ हो तुम जानते हो मैं तुम्हें शिउली की तरह मिलूँगी हमेशा हर बरस बिखरती रहूँगी तुम्हारे ज़हन के कच्चे रास्तों पर उजली - उजली सुबह के शफ़्फ़ाफ़ उजालों सी कुछ क्षणों का ये मिलन यूँही न भूल पाओगे तुम, साल दर साल मेरी गन्ध से तुम्हारी स्मृतियाँ झंकृत हो उठेगी क...

Mujhe Tum Mile | Phanishwar Nath Renu 04.03.2026

मुझे तुम मिले! | फणीश्वरनाथ रेणु मुझे तुम मिले! मृतक-प्राण में शक्ति-संचार कर; निरंतर रहे पूज्य, चैतन्य भर! पराधीनता-पाप-पंकिल धुले! मुझे तुम मिले! रहा सूर्य स्वातंत्र्य का हो उदय! हुआ कर्मपथ पूर्ण आलोकमय! युगों के घुले आज बंधन खुले! मुझे तुम मिले!

Daudte Daudte Pyar | Nilesh Raghuvanshi 03.03.2026

दौड़ते-दौड़ते प्यार।  नीलेश रघुवंशी  वह दौड़ रहा है दिन ब दिन उसकी भागमभाग बढ़ती ही जा रही है वह जितना दौड़ता जाता है सड़कें उतनी लंबी होती जाती हैं दिन ब दिन पसरती सड़कें खत्म होने का नाम ही नहीं लेतीं मैं उसे प्यार करती हूँ और उसकी दौड़ से भयभीत होती हूँ भय खाती हूँ उसकी दिनचर्या से जिसमें कुछ पल भी नहीं उसके पास कोसती हूँ बिना पेड़ और बिना छाँव वाले चौराहों और सड़कों के किनारों को उकसाते हैं जो...

Rahe Na Koi Bhookha-Nanga | Koduram Dalit 02.03.2026

रहे न कोई भूखा–नंगा | कोदूराम दलित पराधीन रहकर सरकस का शेर नित्य खाता है कोड़े, पराधीन रहकर बेचारे बोझा ढोते हाथी-घोड़े । माता–पिता छुड़ा, पिंजरे में रखा गया नन्हा–सा तोता, वह स्वतंत्र उड़ते तोतों को देख सदा मन ही मन रोता । चाहे पशु हो, चाहे पंछी परवशता कब, किसको भायी, कहने का मतलब यह कि ‘परवशता’ होती दुखदायी। ऐसी दुखदायी परवशता मानव को कैसे भायेगी? औरों की दासता किसी को राहत कैसे पहुँचायेगी? जो ग...

Hanso | Shraddha Upadhyay 01.03.2026

 हँसो।  श्रद्धा उपाध्याय  कोई गिरे तो तुम उसे उठाते हुए गिरो फिर हँसो  तुम्हारी खिलखिलाहट से किसी खंडहर में उड़ जाएंगे चमगादड़  इतिहास में कई अवकाश हैं जिनमें सज जाएगी तुम्हारी हँसी  जिस सत्ता ने तुम्हें रोने नहीं दिया उनको जीभ चढ़ा कर हँसो  दो जहाँ दस दिशाओं में हँसो  हँसो इतना कि बैठकों में रखे बुद्ध की तोंद पिरा जाए  उस चुप्पी के सामने हँसो जिसके द्वार तोरण पर लिखा था कि हँसी कड़ जाली  हँसो हे र...

Mil Hi Jayega Kabhi | Ahmed Mushtaq 28.02.2026

मिल ही जाएगा कभी | अहमद मुश्ताक़ मिल ही जाएगा कभी दिल को यक़ीं रहता है वो इसी शहर की गलियों में कहीं रहता है जिस की साँसों से महकते थे दर-ओ-बाम तिरे         ऐ मकाँ बोल कहाँ अब वो मकीं रहता है         इक ज़माना था कि सब एक जगह रहते थे और अब कोई कहीं कोई कहीं रहता है रोज़ मिलने पे भी लगता था कि जुग बीत गए इश्क़ में वक़्त का एहसास नहीं रहता है दिल फ़सुर्दा तो हुआ देख के उस को लेकिन  उम्र भर कौन जवाँ क...

Awara Din | Poornima Varman 27.02.2026

आवारा दिन। पूर्णिमा वर्मन दिन कितने आवारा थे गली गली और बस्ती बस्ती अपने मन इकतारा थे माटी की खुशबू में पलते एक खुशी से हर दुख छलते बाड़ी, चौक, गली अमराई हर पत्थर गुरुद्वारा थे हम सूरज भिनसारा थे किसने बड़े ख़्वाब देखे थे किसने ताज महल रेखे थे माँ की गोद, पिता का साया घर घाटी चौबारा थे हम घर का उजियारा थे

Ek Khwaish | Sewak Nayyar 26.02.2026

एक ख़्वाहिश । सेवक नैयर और मैं सोचता हूँ यूँही उम्र भर एक कमरे में शतरंज की मेज़ पर तुम मुसलसल मुझे मात देती रहो मैं मुसलसल यूँही मात खाता रहूँ अपनी तक़दीर पर मुस्कुराता रहूँ

Iska Kya Matlab Hai | Krishna Mohan Jha 25.02.2026

इसका क्या मतलब है।  कृष्णमोहन झा ड्योढ़ी के टाट पर खीरे के पात की हरी छाँह के नीचे मेरी बाट जोह रही होगी मेरी लालसा... रात की शाखों से उतरकर रोज़ गिलहरी की तरह फुदकती हुई मुझे खोज रही होगी मेरी नींद… मेरे स्वप्न मेरी अनुपस्थिति पर सिर टिकाकर सो रहे होंगे और मेरे हिस्से का आसमान बिना छुए ही धूसर हो रहा होगा… इसका क्या मतलब है कि जहाँ लौट पाना अब लगभग असंभव है वहीं सबसे सुरक्षित है मेरा वजूद?

Kalam Tere Haath Mei Hai | Bhawani Prasad Mishra 24.02.2026

क़लम तेरे हाथ में है । भवानीप्रसाद मिश्र क़लम तेरे हाथ में है, जो चाहे सो लिख कुछ न सूझे तो अपना नाम लिख क्या ज़रूरी है कि जो कुछ लिखा, वह छपे भी न छपे सही अँगीठी के काम आएगा कभी दम होगा तो धधक जाएगा बोदा होगा तो बुझ जाएगा लिखने की बेला बड़ी पावन होती है सूखे मन के लिए सावन होती है रोशनाई और क़लम का संयोग होता है मन को सँजोने का प्राणान्तक योग होता है क़लम तेरे हाथ में है, ललकार कर लिख काग़ज़ हज़ा...

Neend Uchat Jati Hai | Narendra Sharma 23.02.2026

नींद उचट जाती है । नरेंद्र शर्मा जब-तब नींद उचट जाती है पर क्या नींद उचट जाने से रात किसी की कट जाती है? देख-देख दु:स्वप्न भयंकर, चौंक-चौंक उठता हूँ डरकर; पर भीतर के दु:स्वप्नों से अधिक भयावह है तम बाहर! आती नहीं उषा, बस केवल आने की आहट आती है! देख अँधेरा नयन दूखते, दुश्चिंता में प्राण सूखते! सन्नाटा गहरा हो जाता, जब-जब श्वान श्रृगाल भूँकते! भीत भावना,भोर सुनहली नयनों के न लाती है! मन होता है फिर...

Mujhe Tez Dhar Wali Kavitayein Chahiye | Pratibha Katiyar 22.02.2026

मुझे तेज़ धार वाली कविताएँ चाहिए । प्रतिभा कटियार मुझे तेज़ धार वाली कविताएँ चाहिए जिनके किनारे से गुज़रते हुए लहूलुहान हो जाए जिस्म जिन्हें हाथ लगाते ही रिसकर बहने लगे सब कुछ सह लेने वाला सब्र मुझे ढर्रे पर चलती ज़िंदगी के गाल पर थप्पड़ की तरह लगने वाली कविताएँ चाहिए कि देर तक सनसनाता रहे ढर्रे पर चलने वाला जीवन और आख़िर बदलनी ही पड़े उसे अपनी चाल मुझे बारूद सरीखी कविताएँ चाहिए जो संसद में किसी बम की...

Maun | Suryakant Tripathi 'Nirala' 21.02.2026

मौन । सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' बैठ लें कुछ देर, आओ, एक पथ के पथिक-से प्रिय, अंत और अनंत के, तम-गहन-जीवन घेर। मौन मधु हो जाए भाषा मूकता की आड़ में, मन सरलता की बाढ़ में, जल-बिंदु-सा बह जाए। सरल अति स्वच्छंद जीवन, प्रात के लघुपात से, उत्थान-पतनाघात से रह जाए चुप, निर्द्वंद।

Bas Ek Vachan | Mridula Shukla 20.02.2026

बस एक वचन।  मृदुला शुक्ला जब तुम मुझसे कर रहे थे प्रणय निवेदन तुम्हारी गर्म हथेलियों के बीच कंपकंपा रहा था मेरा दायाँ हाथ उसी वक़्त, तुम्हारे कमरे की दीवार पर मेरे सामने टंगी थी एक तस्वीर जिसमे एक जवान औरत पीस रही थी चक्की और बूढ़ी औरत दे रही थी चक्की के बीच दाने पास ही आधा पड़ा खाली मटका उन्हें उनकी अगली लड़ाई की याद दिला रहा था उसी तस्वीर में एक जवान आदमी दीवार से सर टिका गुडगुडा रहा था हुक्का ए...

Ghar Pe Thande Choolhe Par | Adam Gondvi 19.02.2026

घर पे ठंडे चूल्हे पर अगर ख़ाली पतीली है।अदम गोंडवी घर पे ठंडे चूल्हे पर अगर ख़ाली पतीली है बताओं कैसे लिख दूँ धूप फागुन की नशीली है भटकती है हमारे गाँव में गूँगी भिखारन-सी ये सुब्हे-फ़रवरी बीमार पत्नी से भी पीली है बग़ावत के कँवल खिलते हैं दिल के सूखे दरिया में मैं जब भी देखता हूँ आँख बच्चों की पनीली है सुलगते जिस्म की गर्मी का फिर एहसास हो कैसे मुहब्बत की कहानी अब जली माचिस की तीली है

Pani Aur Dhoop | Subhadra Kumari Chauhan 18.02.2026

पानी और धूप । सुभद्राकुमारी चौहान अभी अभी थी धूप, बरसने लगा कहाँ से यह पानी किसने फोड़ घड़े बादल के की है इतनी शैतानी। सूरज ने क्‍यों बंद कर लिया अपने घर का दरवाजा़ उसकी माँ ने भी क्‍या उसको बुला लिया कहकर आजा। ज़ोर-ज़ोर से गरज रहे हैं बादल हैं किसके काका किसको डाँट रहे हैं, किसने कहना नहीं सुना माँ का। बिजली के आँगन में अम्‍माँ चलती है कितनी तलवार कैसी चमक रही है फिर भी क्‍यों खाली जाते हैं वार।...

Is Janam Mein | Rajula Shah 17.02.2026

इस जनम में । राजुला शाह अचरज हो तुम एक दु:स्वप्न से जग कमरे में अलस्सुबह परदे उड़ाते आती हवा-सा अचरज। इसके आगे मगर मुझे कुछ याद नहीं जगता हूँ तो स्वप्न भुला जाता है सोता हूँ तो यह संसार जाने कहाँ बिला जाता है कभी यही भूल जाता हूँ कि जागा हूँ या सो रहा फिर भी इस जनम में तुमसे ही बाकी सब अपनी जगह पर है इसलिए मैं कहीं भी रहूँ तुम यहीं रहना मैं कुछ भी कहूँ तुम यही कहना मैं हूँ मैं रहूँगी।

Jisko Bachpan Me Dekha | Madhav Kaushik 16.02.2026

जिसको बचपन में देखा । माधव कौशिक जिसको बचपन में देखा वो पनघट पोखर ढूंढूंगा। अगली बार गाँव में जाकर फिर अपना घर ढूंढूंगा। ऐसा लगता है टाँगे ही टाँगे हैं अब लोगों की, मुझको मौका मिला तो सबके कटे हुए सर ढूंढूंगा। शहरों की शैतानी आँतें लीले गईं हर चीज़ मगर, दिल की बच्चों जैसी ज़िद के तितली के पर ढूंढूंगा। बुरे दिनों ने सिख लायी है जीने की तरकीब नई, जो कुछ चौराहे पर खोया घर के अन्दर ढूंढूंगा। तुम मेरे...

Na Tha Kuch To Khuda Tha | Mirza Ghalib 15.02.2026

न था कुछ तो ख़ुदा था। मिर्ज़ा ग़ालिब न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता हुआ जब ग़म से यूँ बे-हिस तो ग़म क्या सर के कटने का न होता गर जुदा तन से तो ज़ानू पर धरा होता हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता

Bees Baras Baad | Satyam Tiwari 14.02.2026

बीस बरस बाद ।  सत्यम तिवारी  जो जहाँ है वहाँ नहीं मिलेगा मरीचिकाएं अब एक पुरानी सदा हैं  और उठे हुए हाथ हवा में गिर जाते हैं तय करना मुश्किल है ऐसे में मनुष्य की गति शुरू ही होता है जिसका कालखंड बीस बरस पूर्व बर्फ़ के टुकड़े-सा चला है मेरा प्यार और दूर है तुम्हारा हाथ इतना दूर  वास्तुनिष्ठ सत्य जितना वास्तु से चश्मा आँख से पानी का कि हाथों हाथ लिया जाएगा फौरी सुझाव  और साक्ष्यों के अभाव में मिलेगी...

Kab Yaad Me Tera Saath Nahi | Faiz Ahmed Faiz 13.02.2026

कब याद में तेरा साथ नहीं । फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ कब याद में तेरा साथ नहीं कब हाथ में तेरा हाथ नहीं सद-शुक्र कि अपनी रातों में अब हिज्र की कोई रात नहीं मुश्किल हैं अगर हालात वहाँ दिल बेच आएँ जाँ दे आएँ दिल वालो कूचा-ए-जानाँ में क्या ऐसे भी हालात नहीं जिस धज से कोई मक़्तल में गया वो शान सलामत रहती है ये जान तो आनी जानी है इस जाँ की तो कोई बात नहीं मैदान-ए-वफ़ा दरबार नहीं याँ नाम-ओ-नसब की पूछ कहाँ आशिक़ त...

Political And Physical Maps Of India | Priyankshi Mohan 12.02.2026

पॉलिटिकल एंड फिज़ीकल मैप्स ऑफ इंडिया।  प्रियंक्षी मोहन  अखबार के पीछे से भेदती हैं पिता की आँखें एक समय के बाद माँ के हाथ की बनी गर्म, फूली हुई रोटियां भी फफोले सी नज़र आती है नकारेपन में इतना घूम लिया है शहर कि प्रेम करने के लिए तो मिल जाता है एक कोना मिल ही जाता है  पर, "क्या करते हो बेटा?" जैसे सवालों से छुपने के लिए दूर दूर तक कोई जगह नज़र नहीं आती है "दरवाज़े बाई तरफ खुलेंगे" हर रोज़  सुन सुनक...

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