Nayi Dhara Radio
Pratidin Ek Kavita
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
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Episodes
Roshni | Rajesh Joshi 01.08.2023 2:38
रौशनी | राजेश जोशी इतना अँधेरा तो पहले कभी नहीं था कभी-कभी अचानक जब घर की बत्ती गुल हो जाती थी तो किसी न किसी पड़ोसी के घर जलाई गई मोमबत्ती की कमज़ोर सी रोशनी हमारे घर तक चली आती थी कभी-कभी सड़क की रोशनियाँ खिड़की से झाँक कर घर को रोशन कर देतीं और कुछ नहीं तो कहीं भीतर बची हुई कोई बहुत धुँधली सी ज़िद्दी रोशनी कम से कम इतना तो कर ही देती थी कि दीया सलाई और मोमबत्तियाँ ढूँढ़ कर, जला ली जाएँ कोई कहता है...
Hanso Hanso Jaldi Hanso | Raghuvir Sahay 31.07.2023 2:52
हँसो हँसो जल्दी हँसो- रघुवीर सहाय हँसो तुम पर निगाह रखी जा रही है हँसो अपने पर न हँसना क्योंकि उसकी कड़वाहट पकड़ ली जाएगी और तुम मारे जाओगे ऐसे हँसो कि बहुत ख़ुश न मालूम हो वरना शक होगा कि यह शख़्स शर्म में शामिल नहीं और मारे जाओगे हँसते-हँसते किसी को जानने मत दो किस पर हँसते हो सबको मानने दो कि तुम सबकी तरह परास्त होकर एक अपनापे की हँसी हँसते हो जैसे सब हँसते हैं बोलने के बजाय जितनी देर...
Kya Tum Jaante Ho | Nirmala Putul 30.07.2023 2:51
क्या तुम जानते हो - निर्मला पुतुल क्या तुम जानते हो पुरुष से भिन्न एक स्त्री का एकांत? घर, प्रेम और जाति से अलग एक स्त्री को उसकी अपनी ज़मीन के बारे में बता सकते हो तुम? बता सकते हो सदियों से अपना घर तलाशती एक बेचैन स्त्री को उसके घर का पता? क्या तुम जानते हो अपनी कल्पना में किस तरह एक ही समय में स्वयं को स्थापित और निर्वासित करती है एक स्त्री? सपनों में भागती एक स्त्री का पीछा करत...
Mitne Ka Adhikaar | Mahadevi Verma 29.07.2023 1:51
मिटने का अधिकार / महादेवी वर्मा वे मुस्काते फूल, नहीं जिनको आता है मुरझाना, वे तारों के दीप, नहीं जिनको भाता है बुझ जाना! वे सूने से नयन,नहीं जिनमें बनते आँसू मोती, वह प्राणों की सेज,नही जिसमें बेसुध पीड़ा, सोती! वे नीलम के मेघ, नहीं जिनको है घुल जाने की चाह वह अनन्त रितुराज,नहीं जिसने देखी जाने की राह! ऎसा तेरा लोक, वेदना नहीं,नहीं जिसमें अवसाद, जलना जाना नहीं, नहीं जिसने जाना मिटने का स्...
Tumhare Saath Rehkar | Sarveshwar Dayal Saxena 28.07.2023 2:31
तुम्हारे साथ रहकर - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना तुम्हारे साथ रहकर अक्सर मुझे ऐसा महसूस हुआ है कि दिशाएँ पास आ गई हैं, हर रास्ता छोटा हो गया है, दुनिया सिमटकर एक आँगन-सी बन गई है जो खचाखच भरा है, कहीं भी एकांत नहीं न बाहर, न भीतर। हर चीज़ का आकार घट गया है, पेड़ इतने छोटे हो गए हैं कि मैं उनके शीश पर हाथ रख आशीष दे सकता हूँ, आकाश छाती से टकराता है, मैं जब चाहूँ बादलों में मुँह छिपा सकता हूँ...
Mit Gaye Maidanon Wala Gaon | Gyanendrapati 27.07.2023 5:02
मिट गये मैदानोंवाला गाँव - ज्ञानेन्द्रपति मिट गये मैदानों वाला गाँव क़स्बे की पान-रँगी मुस्कान मुस्काता जै राम जी की कहता है डूबती तरैयाँ और डूबती बिरियाँ निकलता था जो दिशा-मैदान के लिए और अब जिसकी किसी भी दिशा में मैदान नहीं गाँव ने मैदान मार लिया है। शहर बनने की राह में अपना मैदान मार दिया है चौराहे की गुमटियों में मटियाली बीड़ियों के मुट्ठे सफ़ेद सिगरेटों के रंगीन पैकिटों में बदल गये हैं सड़क...
Wah Lete Hain Pratishodh | Nandkishore Acharya 26.07.2023 1:53
वे लेते हुए प्रतिशोध– नंदकिशोर आचार्य शब्द मेरे मुखौटे हैं जिनमें अपने को छुपाता हूँ मैं अपनी लिप्सा, महत्वाकांक्षा, मक्कारी, फ़रेब और घृणा, भय अब कितनी मदद की है शब्दों ने मेरी उनका धन्यवाद करता जब अपनी ओर मुड़ता हूँ पाता हूँ बस खोखल, जिसको छुपाता ख़ुद मुखौटा बन गया हूँ मैं बेचारे नहीं होते शब्द, वे लेते हैं प्रतिशोध शब्दों को जैसा बरतते हो तुम, वे तुमको वैसा बरतते नहीं!
Matrubhasha | Kedarnath Singh 25.07.2023 1:26
मातृभाषा - केदारनाथ सिंह जैसे चींटियाँ लौटती हैं बिलों में कठफोड़वा लौटता है काठ के पास वायुयान लौटते हैं एक के बाद एक लाल आसमान में डैने पसारे हुए हवाई-अड्डे की ओर ओ मेरी भाषा मैं लौटता हूँ तुम में जब चुप रहते-रहते अकड़ जाती है मेरी जीभ दुखने लगती है मेरी आत्मा
Beghar Log | Jaiprakash Kardam 24.07.2023 2:14
बेघर लोग - जयप्रकाश कर्दम उनको भी प्यारी है अपनी और अपने परिवारों की ज़िंदगी करना चाहते हैं वे भी सरकार के सभी आदेशों, निर्देशों का पालन अपनी ज़िंदगी की सुरक्षा के लिए रहना चाहते हैं अपने घरों के अंदर इसलिए निकल रहे हैं वे अपने दड़बों से बाहर लौट रहे हैं अपने गाँव-घरों की ओर फटे हाल, नंगे पाँव भूख और थकान की मार झेलते सिर पर सामान की पोटली में अपना घर उठाए साइकिल पर रिक्शा-ठेले में लादकर या हाथों...
Roti | Sudama Pandey 'Dhoomil' 23.07.2023 1:22
रोटी - धूमिल एक आदमी रोटी बेलता है एक आदमी रोटी खाता है एक तीसरा आदमी भी है जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है मैं पूछता हूँ— ‘यह तीसरा आदमी कौन है?’ मेरे देश की संसद मौन है।
Tram Mein Ek Yaad | Gyanendrapati 22.07.2023 3:36
ट्राम में एक याद - ज्ञानेन्द्रपति चेतना पारीक कैसी हो? पहले जैसी हो? कुछ-कुछ ख़ुुश कुछ-कुछ उदास कभी देखती तारे कभी देखती घास चेतना पारीक, कैसी दिखती हो? अब भी कविता लिखती हो? तुम्हें मेरी याद तो न होगी लेकिन मुझे तुम नहीं भूली हो चलती ट्राम में फिर आँखों के आगे झूली हो तुम्हारी क़द-काठी की एक नन्ही-सी, नेक सामने आ खड़ी है तुम्हारी याद उमड़ी है चेतना पारीक, कैसी हो? पहले जैसी हो? आँखों में अब...
Tab Bhi Kya Taaliyan Bajti | Nandkishore Acharya 21.07.2023 2:33
तब भी क्या तालियाँ बजतीं - नंदकिशोर आचार्य तब भी क्या तालियाँ बजतीं अभिभूत थे सभी अभिनय पर मेरे तालियों की गड़गड़ाहट थी अनवरत नाटक खत्म होने पर और मैं शर्म से गढ़ा जा रहा था नहीं, किसी संकोच में नहीं! ये तो सोचता हुआ, क्या ये तालियाँ कुछ जान पाई हैं वो घृणा, वो लोलुपता, और करुणा के नीचे खौलती हुई वह महत्वाकांक्षा और फरेब अपने अभिनय में पहचानता खुद को उनके लिए जो अभिनय है मेरा, सच है मेरे लिए काश उ...
Kavi | Ramesh Chandra Shah 20.07.2023 1:43
कवि - रमेश चंद्र शाह वह रंकों का रंक मगर राजा होता है। सन्नाटे का शोर नहीं, बाजा होता है कवि का मन यह नहीं महज़ तुक कवि का मन साझा होता है। इसीलिए, इसीलिए हाँ, इसीलिए तो इतना सारा कीच पचा कर भी दुनिया का कवि का मन किस क़दर अरे ताला होता है।
Ehsaas Ka Ghar | Kanhaiya Lal Nandan 19.07.2023 2:01
अहसास का घर - कन्हैयालाल नंदन हर सुबह को कोई दोपहर चाहिए, मैं परिंदा हूं उड़ने को पर चाहिए। मैंने मांगी दुआएँ, दुआएँ मिलीं, उन दुआओं का मुझ पे असर चाहिए। जिसमें रहकर सुकूं से गुज़ारा करूँ, मुझको अहसास का ऐसा घर चाहिए। ज़िंदगी चाहिए मुझको मानी भरी, चाहे कितनी भी हो मुख़तसर चाहिए। लाख उसको अमल में न लाऊँ कभी, शानोशौकत का समाँ मगर चाहिए। जब मुसीबत पड़े और भारी पड़े, तो कहीं एक तो चश्मेतर...
Kyun Na | Gyanendrapati 18.07.2023 1:39
क्यों न - ज्ञानेन्द्रपति क्यों न कुछ निराला लिखें एक नई देवमाला लिखें अँधेरे का राज चौतरफ एक तीली उजाला लिखें सच का मुँह चूम कर झूठ का मुँह काला लिखें कला भूल, कविता कराला लिखें न आला लिखें, निराला लिखें अमृत की जगह विष-प्याला लिखें एक नई देवमाला लिखें खल पोतें दुनिया पर एक ही रंग हम बैनीआहपीनाला लिखें। सारे इंद्रधनुष के रंगों में सारे आयामों के बारे में लिखें।
Khushbu Rachte Hain Haath | Arun Kamal 17.07.2023 2:08
ख़ुशबू रचते हैं हाथ - अरुण कमल कई गलियों के बीच कई नालों के पार कूड़े-करकट के ढेरों के बाद बदबू से फटते जाते इस टोले के अंदर ख़ुशबू रचते हैं हाथ ख़ुशबू रचते हैं हाथ। उभरी नसोंवाले हाथ घिसे नाखूनोंवाले हाथ पीपल के पत्ते-से नए-नए हाथ जूही की डाल-से ख़ुशबूदार हाथ गंदे कटे-पिटे हाथ ज़ख्म से फटे हुए हाथ ख़ुशबू रचते हैं हाथ ख़ुशबू रचते हैं हाथ। यहीं इस गली में बनती हैं मुल्क की मशहूर अगरबत्तियाँ बनाते ह...
Cheetiyaan | Gagan Gill 16.07.2023 1:41
चीटियां - गगन गिल चींटियाँ अपने घर का रास्ता भूल गई थीं। हमारी नींद और हमारी देह की बीच वे क़तार बनाती चलतीं। उनकी स्मृति में बिखरा रहता उनका अदृश्य आटा, जो किसी दूसरे देश-काल ने बिखेरा था। उसे ढूँढ़ती वे चलती जातीं पृथ्वी के एक सिरे से दूसरे की ओर। वे अपने दाँत गड़ातीं हर जीवित व मृत वस्तु में। उनके चलने से पृथ्वी के दुख हल्के होने लगते कि दिशाएँ घूमने लगतीं, भ्रमित हो। ध्रुव बदलने लगते अपन...
Bas Ek Reteela Sapaat Aur Sookha Nahi hai Wah | Nandkishore Acharya 15.07.2023 3:26
बस एक रेतीला सपाट है - नंदकिशोर आचार्य न ऊँचाइयाँ है, न गहराइयाँ, बस एक रेतीला सपाट है दूर तक पसरा हुआ निश्छाय तपता जपता नाम कोई कहाँ तक उड़ता आबाद बंसल में प्यासा कलपता पाखी ढूँढ़ता छाया अपने ही परछाई में आ गिरता रेत पर बेबस, तड़पता झुलस जाता है सपना पल रहा था जो आँखों से निकलकर ढुलकने भी नहीं पाता सूख जाता है नि:संघ पसरा हुआ निश्छाय रेतीला सपाट तपता रहता है। सूखा नहीं है वह वे समझते हैं तुम्...
Sheher | Amrita Pritam 14.07.2023 1:54
शहर - अमृता प्रीतम मेरा शहर एक लम्बी बहस की तरह है सड़कें - बेतुकी दलीलों-सी… और गलियाँ इस तरह जैसे एक बात को कोई इधर घसीटता कोई उधर हर मकान एक मुट्ठी-सा भिंचा हुआ दीवारें-किचकिचाती सी और नालियाँ, ज्यों मुँह से झाग बहता है यह बहस जाने सूरज से शुरू हुई थी जो उसे देख कर यह और गरमाती और हर द्वार के मुँह से फिर साईकिलों और स्कूटरों के पहिये गालियों की तरह निकलते और घंटियाँ-हार्न एक दूसरे पर झपटत...
Goonga Nahi Tha Main | Jaiprakash Kardam 13.07.2023 2:22
गूंगा नहीं था मै - जयप्रकाश कर्दम गूँगा नहीं था मैं कि बोल नहीं सकता था जब मेरे स्कूल के मुझसे कई क्लास छोटे बेढँगे से एक जाट के लड़के ने मुझसे कहा था— ‘अरे ओ मोरिया! ज्यादै बिगड़े मत,कमीज कू पेंट में दबा कै मत चल।' और मैंने चुपचाप अपनी क़मीज़ पैंट से बाहर निकाल ली थी गूँगा नहीं था मैं न अक्षम, अपाहिज या जड़ था कि प्रतिवाद नहीं कर सकता था उस लड़के के इस अपमानजनक व्यवहार का लेकिन, अगर मैं ब...
Akelepan Ka Anand | Ramdhari Singh Dinkar 12.07.2023 1:50
अकेलेपन का आनंद - रामधारी सिंह ‘दिनकर’ अकेलेपन से बढ़कर आनन्द नहीं , आराम नहीं । स्वर्ग है वह एकान्त, जहाँ शोर नहीं, धूमधाम नहीं । देश और काल के प्रसार में, शून्यता, अशब्दता अपार में चाँद जब घूमता है, कौन सुख पाता है ? भेद यह मेरी समझ में तब आता है, होता हूँ जब मैं अपने भीतर के प्रांत में, भीड़ से दूर किसी निभृत, एकान्त में। और तभी समझ यह पाता हूँ पेड़ झूमता है किस मोद में खड़ा हुआ एकाकी पर...
Chandini Ki Paanch Partein | Sarveshwar Dayal Saxena 11.07.2023 2:43
चाँदनी की पाँच परतें / सर्वेश्वर दयाल सक्सेना चाँदनी की पाँच परतें, हर परत अज्ञात है। एक जल में एक थल में, एक नीलाकाश में। एक आँखों में तुम्हारे झिलमिलाती, एक मेरे बन रहे विश्वास में। क्या कहूँ, कैसे कहूँ….. कितनी ज़रा सी बात है। चाँदनी की पाँच परतें, हर परत अज्ञात है। एक जो मैं आज हूँ, एक जो मैं हो न पाया, एक जो मैं हो न पाऊँगा कभी भी, एक जो होने नहीं दोगी मुझे तुम, एक जिसकी ह...
Ek Paarivarik Prashn | Kedarnath Singh 10.07.2023 1:55
एक पारिवारिक प्रश्न - केदारनाथ सिंह छोटे-से आँगन में माँ ने लगाए हैं तुलसी के बिरवे दो पिता ने उगाया है बरगद छतनार मैं अपना नन्हा गुलाब कहाँ रोप दूँ! मुट्ठी में प्रश्न लिए दौड़ रहा हूँ वन-वन पर्वत-पर्वत रेती-रेती... बेकार!
Kuch Bhi To Nahi | Nandkishore Acharya 09.07.2023 2:02
कुछ भी तो नहीं / नंदकिशोर आचार्य कुछ भी तो नहीं ठीक से हुआ, न बचपना, न समझदारी, न दोस्ती, न दुश्मनी, न प्रेम, न परिवार, न तंदुरुस्ती, न बीमारी, न हँसना, न रोना, न नींद, न जागना, न रेंगना, न तन कर खड़े रह पाना, कविता भी नहीं! न कॉमेडी हुआ, न त्रासदी ठीक से जीवन इसलिए डरता हूँ ठीक से मरूँगा तो न!’
Barf, Samundar Aur Glacier | Suryabala 08.07.2023 2:26
बर्फ़ , समंदर और ग्लेशियर - सूर्यबाला सांसें पहाड़-सी टूटी पड़ रही हैं मुझ पर- और मैं नदी सी बिछलती धाराधार बहती जा रही हूँ अपने ओर-छोर की नियति से बेखबर आकांक्षाहीन... समंदर हो जाने की या बर्फ बन जम जाने की कुछ भी हो सकता है लेकिन बहुत सालों बाद जब टूटेंगे ग्लेशियर बहेंगे महानद तब क्या कोई समझेगा? कि, कभी यह महानद- मात्र बरूनियों पर उलझी एक बूंद हुआ करती था!..
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