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Pratidin Ek Kavita

Arts HI ↓ 1195 episodes

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

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Jul 11, 2026

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Episodes

Shishu | Naresh Saxena 26.08.2023

शिशु | नरेश सक्सेना  शिशु लोरी के शब्द नहीं संगीत समझता है बाद में सीखेगा भाषा अभी वह अर्थ समझता है समझता है सबकी मुस्कान सभी के अल्ले ले ले ले तुम्हारे वेद पुराण कुरान अभी वह व्यर्थ समझता है अभी वह अर्थ समझता है समझने में उसको, तुम हो कितने असमर्थ, समझता है बाद में सीखेगा भाषा उसी से है, जो है आशा।

Nazm - 'Raatein Hain Udaas, Din kade Hain' | Ahmad Faraz 25.08.2023

नज़्म ‘रातें हैं उदास, दिन कड़े हैं’ | अहमद फ़राज़  रातें हैं उदास दिन कड़े हैं, ऐ दिल तेरे हौसले बड़े हैं, ऐ यादे-हबीब साथ देना, कुछ मरहले सख़्त आ पड़े हैं, रूकना हो अगर तो सौ बहाने, जाना हो तो रास्ते बड़े हैं, अब किसे बतायें वजहे-गिरीया, जब आप भी साथ रो पड़े हैं, अब जाने कहाँ नसीब ले जाए, घर से तो ‘फ़राज़’ चल पड़े हैं,

Prem Patra | Badri Narayan 24.08.2023

प्रेमपत्र - बद्री नारायण   प्रेत आएगा  किताब से निकाल ले जाएगा प्रेमपत्र  गिद्ध उसे पहाड़ पर नोच-नोच खाएगा  चोर आएगा तो प्रेमपत्र चुराएगा  जुआरी प्रेमपत्र पर ही दाँव लगाएगा  ऋषि आएँगे तो दान में माँगेंगे प्रेमपत्र  बारिश आएगी तो  प्रेमपत्र ही गलाएगी  आग आएगी तो जलाएगी प्रेमपत्र  बंदिशें प्रेमपत्र पर ही लगाई जाएँगी  साँप आएगा तो डँसेगा प्रेमपत्र  झींगुर आएँगे तो चाटेंगे प्रेमपत्र  कीड़े प्रेमपत्र ह...

Unka Darr | Gorakh Pandey 23.08.2023

 उनका डर - गोरख पांडेय वे डरते हैं  किस चीज़ से डरते हैं वे  तमाम धन-दौलत  गोला-बारूद पुलिस-फ़ौज के बावजूद?  वे डरते हैं  कि एक दिन  निहत्थे और ग़रीब लोग  उनसे डरना बंद कर देंगे।

Patwaar | Shivmangal Singh Suman 22.08.2023

पतवार - शिवमंगल सिंह ‘सुमन’   तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार।  आज सिन्धु ने विष उगला है  लहरों का यौवन मचला है  आज ह्रदय में और सिन्धु में  साथ उठा है ज्वार  तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार।  लहरों के स्वर में कुछ बोलो  इस अंधड में साहस तोलो  कभी-कभी मिलता जीवन में  तूफानों का प्यार  तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार।  यह असीम, निज सीमा जाने  सागर भी तो यह पहचाने  मिट्टी के पुतले...

Zindagi Jaisi Tamanna Thi | Shahryar 21.08.2023

  ज़िन्दगी जैसी तमन्ना थी - शहरयार   ज़िन्दगी जैसी तमन्ना थी नहीं कुछ कम है  हर घड़ी होता है एहसास कहीं कुछ कम है घर की तामीर तसव्वुर ही में हो सकती है  अपने नक़्शे के मुताबिक़ ये ज़मीं कुछ कम है बिछड़े लोगों से मुलाक़ात कभी फिर होगी  दिल में उम्मीद तो काफ़ी है यक़ीं कुछ कम है   अब जिधर देखिये लगता है कि इस दुनिया में  कहीं कुछ चीज़ ज़ियादा है कहीं कुछ कम है   आज भी है तेरी दूरी ही उदासी का सबब  य...

Saare Kaam Niptakar Tumhe Yaad Karne Baitha | Doodhnath Singh 20.08.2023

सारे काम निपटाकर तुम्हें याद करने बैठा - दूधनाथ सिंह   सारे काम निपटाकर तुम्हें याद करने बैठा।  फ़ुर्सत ही नहीं देते लोग  तुम्हारे चेहरे पर नज़र टिकाई नहीं कि कोई आ गया  ‘क्या कर रहे हैं ?’  ‘कुछ भी तो नहीं ।’ मैंने कहा  चोरी-छिपे झाँककर देख लिया, सोचता हुआ —  कहीं इसने देख तो नहीं लिया, मैं जिसे देख रहा था  मेरी दृष्टि का अनुगमन तो नहीं किया इसने  कहाँ से टपक पड़ा मेरे एकान्त में!  चिड़चिड़ तो हु...

Nadi, Pahad Aur Bazaar | Jacinta Kerketta 19.08.2023

नदी, पहाड़ और बाज़ार | जसिंता केरकेट्टा | कार्तिकेय खेतरपाल   गाँव में वो दिन था, एतवार। मैं नन्ही पीढ़ी का हाथ थाम निकल गई बाज़ार। सूखे दरख़्तों के बीच देख एक पतली पगडंडी मैंने नन्ही पीढ़ी से कहा, देखो, यही थी कभी गाँव की नदी। आगे देख ज़मीन पर बड़ी-सी दरार मैंने कहा, इसी में समा गए सारे पहाड़। अचानक वह सहम के लिपट गई मुझसे सामने दूर तक फैला था भयावह क़ब्रिस्तान। मैंने कहा, देख रही हो इसे? यहीं थे कभी...

Main Jise Odhta - Bichaata Hoon | Dushyant Kumar 18.08.2023

मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ | दुष्यंत कुमार    मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ, वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ।   एक जंगल है तेरी आँखों में, मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ।   तू किसी रेल-सी गुज़रती है, मैं किसी पुल-सा थरथराता हूँ।   हर तरफ़ एतराज़ होता है, मैं अगर रोशनी में आता हूँ।   एक बाज़ू उखड़ गया जब से, और ज़्यादा वज़न उठाता हूँ।   मैं तुझे भूलने की कोशिश में, आज कितने क़रीब पाता हूँ।   कौन ये फ़ासला निभाएगा, मै...

Postcard | Ramdarash Mishra 17.08.2023

पोस्टकार्ड | रामदरश मिश्र    चिट्ठी तो मैं भी हूँ  परंतु वह सभ्य क़ीमती लिफ़ाफ़ा नहीं  जो अपने भीतर  न जाने क्या-क्या छिपाये रहता है  और उसे दुनिया की नज़रों से बचाकर  छोड़ आता है किसी हाथ के एकांत में  मैं तो खुला हुआ सस्ता-सा पोस्टकार्ड हूँ  और ढोता रहता हूँ  मोटी खुरदरी अँगुलियों के सुख-दुख  जिन्हें यहाँ-वहाँ कोई भी बाँच सकता है और स्पंदित होकर महसूस कर सकता है कि अरे यह चिट्ठी तो उसी की है लेट...

Dangaiyon Ko Ghar Ki Samajjh Nahi Hoti | Deo Shankar Navin 16.08.2023

दंगाइयों को घर की समझ नहीं होती | देवशंकर नवीन  ‘दंगाइयों को घर की समझ नहीं होती’ दंगाई नहीं जानते घर का मतलब जानते तो न जलाते न उजाड़ते बस्तियाँ कोई सच्चा मनुष्य तो देख तक नहीं सकता किसी घर का जलना, उजड़ना क्योंकि घर अकेले नहीं उजड़ता उसके साथ-साथ उजड़ते हैं मनुष्य, मनुष्य के सपने, सपनों का परिवेश घर में रहकर सपना देख लेने वाला मनुष्य असल में कभी घर से बाहर ही नहीं होता उस घर से उसका शरीर भर जाता...

Pandrah Agast | Girija Kumar Mathur 15.08.2023

पंद्रह अगस्त | गिरिजा कुमार माथुर  आज जीत की रात पहरुए सावधान रहना खुले देश के द्वार अचल दीपक समान रहना प्रथम चरण है नए स्वर्ग का है मंज़िल का छोर इस जन-मन्थन से उठ आई पहली रत्न हिलोर अभी शेष है पूरी होना जीवन मुक्ता डोर क्योंकि नहीं मिट पाई दुख की विगत साँवली कोर ले युग की पतवार बने अम्बुधि महान रहना पहरुए, सावधान रहना! विषम शृंखलाएँ टूटी हैं खुली समस्त दिशाएँ आज प्रभंजन बन कर चलतीं युग बन्दिनी हव...

Kalam, Aaj Unki Jai Bol | Ramdhari Singh 'Dinkar' 14.08.2023

  कलम, आज उनकी जय बोल | रामधारी सिंह ‘दिनकर’    कलम, आज उनकी जय बोल   जला अस्थियाँ बारी-बारी छिटकाई जिनने चिंगारी, जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर लिए बिना गर्दन का मोल। कलम, आज उनकी जय बोल।   जो अगणित लघु दीप हमारे तूफानों में एक किनारे, जल-जलकर बुझ गए, किसी दिन माँगा नहीं स्नेह मुँह खोल। कलम, आज उनकी जय बोल।   पीकर जिनकी लाल शिखाएँ उगल रहीं लू लपट दिशाएं, जिनके सिंहनाद से सहमी धरती रही अभी तक डोल। कलम,...

Ja Raha Tha Mendhakon Ka Kafila | Ashok Chakradhar 13.08.2023

जा रहा था मेंढकों का काफ़िला | अशोक चक्रधर जा रहा था मेंढकों का काफ़िला एक कुआँ मार्ग में उनको मिला वे लगे कुएँ के अंदर झाँकने और जल में बिंब अपना ताकने कुछ कुदकते थे कुएँ की मेंड़ पर कुछ लगे आपस की छेड़मछेड़ पर नाचने और कूदने में मस्त थे गिर गए उनमें से दो जो स्वस्थ थे खिलखिलाकर सभी टर्राने लगे जो गिरे थे डर से थर्राने लगे थीं निकल आने की उनकी ख़्वाहिशें कुआँ गहरा था न थीं गुजाइशें सतह चिकनी सीढ़...

Sheher Ki Subah | Adnan Kafeel Darwesh 12.08.2023

शहर की सुबह / अदनान कफ़ील दरवेश शहर खुलता है रोज़ाना किसी पुराने सन्दूक़-सा नहीं किसी बच्चे की नरम मुट्ठियों-सा नहीं बल्कि वो खुलता है सूरज की असँख्य रौशन धारों से जो शहर के बीचों-बीच गोलम्बरों पर गिरती हैं और फैल जाती हैं उन तारीक गलियों तक जहाँ तक जाने में एक शरीफ़ आदमी कतराता है लेकिन जहाँ कुत्ते और सुअर बेधड़क घुसे चले जाते हैं शहर खुलता है मज़दूरों की क़तारों से जो लेबर-चौकों को आरास्ता करते...

Ghar Pahunchna | Kunwar Narayan 11.08.2023

घर पहुँचना - कुंवर नारायण हम सब एक सीधी ट्रेन पकड़कर अपने-अपने घर पहुँचना चाहते हम सब ट्रेनें बदलने की  झंझटों से बचना चाहते हम सब चाहते एक चरम यात्रा और एक परम धाम हम सोच लेते कि यात्राएँ दुखद हैं  और घर उनसे मुक्ति सचाई यूँ भी हो सकती है  कि यात्रा एक अवसर हो  और घर एक सम्भावना ट्रेनें बदलना विचार बदलने की तरह हो  और हम जब जहाँ जिनके बीच हों वही हो घर पहुँचना।

Hamd | Nida Fazli 10.08.2023

हम्द नील गगन पर बैठे कब तक चाँद सितारों से झाँकोगे पर्वत की ऊँची चोटी से  कब तक  दुनिया को देखोगे आदर्शों के बन्द ग्रन्थों में कब तक आराम करोगे मेरा छप्पर टपक रहा है बनकर सूरज  इसे सुखाओ ख़ाली है आटे का कनस्तर  बनकर गेहूँ इसमें आओ माँ का चश्मा टूट गया है बनकर शीशा इसे बनाओ चुप-चुप हैं आँगन में बच्चे बनकर गेंद इन्हें बहलाओ शाम हुई है चाँद उगाओ पेड़ हिलाओ हवा चलाओ काम बहुत हैं हाथ बटाओ अल्लाह मियाँ म...

Ek Aag To Baaki Hai Abhi | Pratibha Katiyar 09.08.2023

एक आग तो बाक़ी है अभी / प्रतिभा कटियार उसकी आँखों में जलन थी हाथों में कोई पत्थर नहीं था। सीने में हलचल थी लेकिन कोई बैनर उसने नहीं बनाया सिद्धांतों के बीच पलने-बढ़ने के बावजूद नहीं तैयार किया कोई मैनिफेस्टो। दिल में था गुबार कि धज्जियाँ उड़ा दे समाज की बुराइयों की , तोड़ दे अव्यवस्थाओं के चक्रव्यूह तोड़ दे सारे बाँध मजबूरियों के गढ़ ही दे नई इबारत कि जिंदगी हँसने लगे कि अन्याय सहने वालों को नहीं ...

Bachhon Ki Chitrakala Pratiyogita | Rajesh Joshi 08.08.2023

बच्चों की चित्रकला प्रतियोगिता उन्होंने बनाए बहुत नीले आसमान फिर सूरज चाँद और सितारों को अलग अलग जगह रखा! पेड़ इतने हरे बनाए उन्होंने  जितना हरा उन्हें होना चाहिए या जितने हरे रहे होंगे वे  कभी हमारी धरती पर ! फिर पहाड़ों, नदियों और झरनों को उन्होंने अलग-अलग जगह रखा! उन्होंने मकान, सड़कें और पुल भी बनाए  जिन्हें ईश्वर ने भी नहीं बनाया था कभी फिर उन्होंने बनाई बसें, स्कूटर और कारें  साइकिल चलाते और...

Kapas Ke Phool | Kedarnath Singh 07.08.2023

कपास के फूल - केदारनाथ सिंह  कपास के फूल  वे देवता को पसंद नहीं  लेकिन आश्चर्य इस पर नहीं  आश्चर्य तो ये है कि कविगण भी  लिखते नहीं कविता कपास के फूल पर प्रेमीजन भेंट में देते नहीं उसे कभी एक-दूसरे को  जबकि वह है कि नंगा होने से बचाता है सबको और सुतर गया मौसम तो भूख और प्यास से भी  बचाता है वह ईश्वर को तो ठण्ड लगती नहीं  वैसे नंगा होना भी वहाँ उतना ही सहज है उतना ही दिव्य  इसलिए इतना तय है कि ठंड...

Jeevdhara | Arun Kamal 06.08.2023

जीवधारा - अरुण कमल खूब बरस रहा है पानी जीवन रस में डूब गयी है धरती अभी भी बादल छोप रहे हैं अमावस्या का हाथ बँटाते बज रही है धरती हज़ारों तारों वाले वाद्य-सी बज रही है धरती चारों ओर पता नहीं कितने जीव-जन्तु बोल रहे हैं हज़ारों आवाज़ों में कभी मद्धिम कभी मन्द्र कभी शान्त कभी-कभी बथान में गौएँ करवट बदलती हैं  बैल ज़ोर से छोड़ते हैं साँस अचानक दीवार पर मलकी टॉर्च की रोशनी कोई निकला है शायद खेत घूमने धरती ब...

Namak | Anamika 05.08.2023

नमक - अनामिका नमक दुख है धरती का और उसका स्वाद भी! पृथ्वी का तीन भाग नमकीन पानी है और आदमी का दिल नमक का पहाड़ कमज़ोर है दिल नमक का, कितनी जल्दी पसीज जाता है! गड़ जाता है शर्म से  जब फेंकी जाती हैं थालियाँ दाल में नमक कम या ज़रा तेज़ होने पर! वो जो खड़े हैं न- सरकारी दफ्तर- शाही नमकदान हैं। बड़ी नफ़ासत से छिड़क देते हैं हरदम हमारे जले पर नमक! जिनके चेहरे पर नमक है- पूछिए उन औरतों से- कितना भारी पड़ता है उनक...

Meri Duniya Ke Tamaam Bacche | Adnan Kafeel Darwesh 04.08.2023

मेरी दुनिया के तमाम बच्चे / अदनान कफ़ील दरवेश वो जमा होंगे एक दिन और खेलेंगे एक साथ मिलकर वो साफ़-सुथरी दीवारों पर पेंसिल की नोक रगड़ेंगे वो कुत्तों से बतियाएँगे और बकरियों से और हरे टिड्डों से और चीटियों से भी.. वो दौड़ेंगे बेतहाशा हवा और धूप की मुसलसल निगरानी में और धरती धीरे-धीरे और फैलती चली जाएगी उनके पैरों के पास.. देखना! वो तुम्हारी टैंकों में बालू भर देंगे और तुम्हारी बन्दूकों को मिट्टी मे...

Char Prem Kavita | Madhusudan Anand 03.08.2023

चार प्रेम कविता | मधुसुदन आनंद यह जो तुम्हारे हमारे बीच हुआ और जो हो रहा है और जो होता रहेगा उसे कभी भूलकर भी मत कहना प्रेम...   यह महाविस्फोट के कोई तेरह अरब सत्तर करोड़ साल बाद मलबे के दो छोटे-छोटे टुकड़ों का आपसी आकर्षण है जिसके लिए सारा यूनिवर्स तमाम आकाशगंगाएँ और सौरमंडल और तारे कम पड़ गए   सिर्फ पृथ्वी ही बनी वह जगह जो खुद तमाम खिंचावों और बलों के बावजूद हमारे लिए एक रस्सी की तरह तन गई   पृथ...

Bewaqt Guzar Gaya Maali | Dr Sheoraj Singh Bechain 02.08.2023

बेवक़्त गुज़र गया माली | डॉ श्यौराज सिंह 'बेचैन'  टूटी डार झड़ी सब पत्तियाँ  डाल भय लाचार  विधाता कैसी विपदा डारी रे  माँगत फूल, हवा और पानी  ऋतु निर्मोही ने का ठानी  काते कहें कौन दुख बाटें कौन करे रखवाली  बे वक्त गुज़र गया माली किल्ला नए वक्त के मारे आँधु लु ने निवल कर डाले का खाएँ, का पिएँ बेचारे कैसे कर के जीएँ बेचारे नंगे सिर पर बरसी ज्वाला घर आए कंगाली रे बेवक़्त गुज़र गया माली उठ गई पैंठ लद...

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