Nayi Dhara Radio
Pratidin Ek Kavita
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
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Episodes
Jab Rangon Ki Baat Chalti Hai | Shahanshah Alam 07.07.2023 3:24
जब रंगों की बात चलती है - शहंशाह आलम जब रंगों की बात चलती है बहुत बुरे रंग में भी तुम ख़ास कुछ ढूंढ़ लेती हो तुमने बतलाया कि ऎसा हमारे प्रेम की वज़ह से होता है मैं तुम्हारी पसन्द के रंगों वाले कपड़े और जूते पहन कर कुमार गंधर्व के आडियो कैसेट खरीदने इतवार की शाम को निकलता हूँ घर से मैं जहाँ पर काम करता हूँ वहाँ ऎसे रास्ते होकर पहुँचता हूँ जिस रास्ते में तुम्हारी पसन्द के रंग दिखते हैं और जिस रास...
Peeth Ki Khujli | Rajesh Joshi 06.07.2023 2:37
पीठ की खुजली - राजेश जोशी अभी-अभी लौटा हूँ सारे काम-धाम निपटाकर रात का खाना खाकर अभी-अभी कपडे बदलकर घुसा हूँ होटल के बिस्तर में और रह-रहकर पीठ में खुजली हो रही है रह-रहकर आ रही है इस समय तुम्हारी याद काम आ सकती थी जनेऊ इस समय पर उसे तो बहुत पहले ही छोड़ आया पैतृक घर की खूँटी पर कोई बैलगाड़ी भी नहीं यहाँ कि जिसके पहिए से टिक कर खुजला हूँ अपनी पीठ जहाँ तक जा सकता है ले जाता हूँ खींचकर...
Dastakhat | Suryabala 05.07.2023 1:57
दस्तख़त – सूर्यबाला छमाही के नतीजे पर दस्तख़त करती- हंसी थी मां- ‘तू फिर फर्स्ट आई है?...’ दुबली उंगलियों में कांपी है कलम- यज्ञ की समिधा की अग्नि सी और पूजा की चौकी पर, झुके माथे के नीचे- उसकी आंखों की कोर डबडबाई है!... हो गए दस्तख़त
Ek Stree Par Kijiye Vishwas | Kumar Ambuj 04.07.2023 2:46
एक स्त्री पर कीजिए विश्वास - कुमार अंबुज जब ढह रही हों आस्थाएँ जब भटक रहे हों रास्ता तो इस संसार में एक स्त्री पर कीजिए विश्वास वह बताएगी सबसे छिपाकर रखा गया अनुभव अपने अँधेरों में से निकालकर देगी वही एक कंदील कितने निर्वासित, कितने शरणार्थी, कितने टूटे हुए दुखों से, कितने गर्वीले कितने पक्षी, कितने शिकारी सब करते रहे हैं एक स्त्री की गोद पर भरोसा जो पराजित हुए उन्हें एक स्त्री के स्पर्श ने ही ब...
Upkaran | Nandkishore Acharya 03.07.2023 2:26
उपकरण - नंदकिशोर आचार्य पत्थर क्या नींद से भी ज्यादा पारदर्शी होता है कि और भी साफ दिख जाता है उसमें तुम्हें अपना सपना तुम जिसे उकेरने लगते हो, शिल्पी जो ठहरे पर क्या होता है उन टुकड़ों का जिन्हें तुम अपने उकेरने में पत्थर से उतार देते हो और उस मूरत का जो जैसी भी हो तुम्हारी ही पहचान होती है, पत्थर की नहीं उनमें क्या सशक्तता नहीं रहता होगा पत्थर का भी कोई क्षत-विक्षत सपना अपना हाँ पत्थर तो उपकर...
Tab Tum Kya Karoge? | Om Prakash Valmiki 02.07.2023 4:25
तब तुम क्या करोगे? - ओमप्रकाश वाल्मीकि यदि तुम्हें, धकेलकर गाँव से बाहर कर दिया जाए पानी तक न लेने दिया जाए कुएँ से दुतकारा-फटकारा जाए चिलचिलाती दुपहर में कहा जाए तोड़ने को पत्थर काम के बदले दिया जाए खाने को जूठन तब तुम क्या करोगे? यदि तुम्हें, मरे जानवर को खींचकर ले जाने के लिए कहा जाए और, कहा जाए ढोने को पूरे परिवार का मैला पहनने को दी जाए उतरन तब तुम क्या करोगे? यदि तुम्हें, ...
Udaas Tum | Dharmvir Bharti 01.07.2023 3:06
उदास तुम - धर्मवीर भारती तुम कितनी सुंदर लगती हो, जब तुम हो जाती हो उदास! ज्यों किसी गुलाबी दुनिया में, सूने खंडहर के आस-पास मदभरी चाँदनी जगती हो! मुँह पर ढक लेती हो आँचल, ज्यों डूब रहे रवि पर बादल। या दिन भर उड़ कर थकी किरन, सो जाती हो पाँखें समेट, आँचल में अलस उदासी बन; दो भूले-भटके सांध्य विहग पुतली में कर लेते निवास। तुम कितनी सुंदर लगती हो, जब तुम हो जाती हो उदास! खारे आँसू से धुल...
Ek Ajeeb Din | Kunwar Narayan 30.06.2023 2:08
एक अजीब दिन - कुंवर नारायण और कोई दुर्घटना नहीं हुई। आज सारे दिन लोगों से मिलता रहा और कहीं अपमानित नहीं हुआ। आज सारे दिन सच बोलता रहा और किसी ने बुरा न माना। आज सबका यकीन किया और कहीं धोखा नहीं खाया। और सबसे बड़ा चमत्कार तो यह कि घर लौटकर मैंने किसी और को नहीं अपने ही को लौटा हुआ पाया।
Rohit Vemula Par Paanch Kavitayein | Priyadarshan 29.06.2023 5:25
रोहित वेमुला पर पाँच कविताएँ / प्रियदर्शन सत्ताईस साल से मौत की तिल-तिल अदा की जा रही किस्तें उसने एक बार चुकाने का फैसला किया और एक लंबी छलाँग लगाकर चला गया उस बेहद लंबी अंधी सुरंग के पार जो उसकी जिंदगी थी उसकी लहू-लुहान पीठ पर सदियों से पड़ते कोड़ों के निशान थे उसकी जुबान सिल दी गई थी अपने जख्मी होठों से जिन शब्दों को वह अपने मुक्ति के मंत्र की तरह बुदबुदाना चाहता था उन्हें व्यर्थ बना दिया गया...
Jal Prapat Hai Sameep | Vinod Kumar Shukla 28.06.2023 2:51
जल प्रपात है समीप - विनोद कुमार शुक्ल जल प्रपात है समीप जल बिंदु के साथ हवा का झोंका आ रहा है । जलप्रपात अपनी जलप्रपात ध्वनि से सब ध्वनियों को निस्तब्ध कर रहा है । वहाँ जाने के पहले जो कुछ कहना सुन्ना है कह सुन लिया गया कि जलप्रपात के पास केवल जलप्रपात ध्वनि को सुना जाता है इस भाषा को पुरखे सुन चुके होते हैं और पीढ़िया सुनने वाली होती हैं अलावा कुछ भी सुनाई नहीं देता। तब भी प्रपात के पास पे...
Barf Bahar Gir Rahi Hai | Nandkishore Acharya 27.06.2023 1:55
बर्फ़ बाहर गिर रही है - नंदकिशोर आचार्य बर्फ़ बाहर गिर रही है, यह अलाव भी बुझ चला सा है एक अधजली लकड़ी से मैं झाड़ता हूँ राख बुझ रही लकड़ियों को नए क्रम में पुन: चुनता हूँ फूँक से जगाता हूँ आग सोई हुई एक धीमा ताप सब पर व्याप जाता है मीठा और उदास, बर्फ़ बाहर गिर रही होगी।
Ullanghan | Rajesh Joshi 26.06.2023 4:09
उल्लंघन - राजेश जोशी उल्लंघन कभी जानबूझकर किये और कभी अनजाने में बंद दरवाज़े बचपन से ही मुझे पसंद नहीं रहे एक पाँव हमेशा घर की देहरी से बाहर ही रहा मेरा व्याकरण के नियम जानना कभी मैंने ज़रूरी नहीं समझा और इसी कारण मुझे दीमक के कीड़ों को खाने की लत नहीं लगी और किसी व्यापारी के हाथ मैंने अपना पंख देकर उन्हें खरीदा नहीं बहुत मुश्किल से हासिल हुई थी आज़ादी और उससे भी मुश्किल था हर वक़्त उसकी हिफाज़त...
Kavita Si Rachi Ma | Suryabala 25.06.2023 2:25
कविता सी रची माँ - सूर्यबाला सुनो, मुझे समय का सिर्फ एक पृष्ठ सहज लेने दो जिस पर कविता सी रची है मेरी माँ वह पृष्ठ फड़फड़ाता है जो किसी ऊँची डाल से हरसिंगार चढ़ती लोरी के बूंदों की तरह और खो सी जाती हूँ सोन चिड़िया सी मै वह पृष्ठ, ऊँची डाल और वे लोरी के बोल नहीं सहेजे गए न , तो लोरियां कहाँ आकर गाएंगी? और ऋतुएं कहाँ से सुनाएंगी ? वन पाखी सी ! तो सुनो, मुझे समय का सिर्फ एक पृष्ठ सहज लेने दो
Yeh Bhi Prem Kavitayein | Priyadarshan 24.06.2023 5:04
यह भी प्रेम कविताएँ / प्रियदर्शन ‘ये भी प्रेम कविताएँ’ एक– ‘प्रेम को लेकर इतनी सारी धारणाएँ चल पड़ी हैं कि ये समझना मुश्किल हो गया है कि प्रेम क्या है एक धारणा कहती है, सबसे करो प्रेम दूसरी धारणा बोलती है, बस किसी एक से करो प्रेम तीसरी धारणा मानती है, प्रेम किया नहीं जाता हो जाता है एक चौथी धारणा भी है, पहला प्रेम हमेशा बना रहता है बशर्ते याद रह जाए कि कौन-सा पहला था या प्रेम था पाँचवीं धारणा ह...
Farz Karo | Ibn-e-Insha 23.06.2023 2:57
फ़र्ज़ करो - इब्न इ इंशा फ़र्ज़ करो हम अहले वफ़ा हों, फ़र्ज़ करो दीवाने हों फ़र्ज़ करो ये दोनों बातें झूठी हों अफ़साने हों फ़र्ज़ करो ये जी की बिपता, जी से जोड़ सुनाई हो फ़र्ज़ करो अभी और हो इतनी, आधी हमने छुपाई हो फ़र्ज़ करो तुम्हें ख़ुश करने के ढूंढे हमने बहाने हों फ़र्ज़ करो ये नैन तुम्हारे सचमुच के मयख़ाने हों फ़र्ज़ करो ये रोग हो झूठा, झूठी पीत हमारी हो फ़र्ज़ करो इस पीत के रोग में सांस भी...
Khandahar Par Hariyali | Nandkishore Acharya 22.06.2023 1:45
खंडहर पर हरियाली - नंदकिशोर आचार्य यूँ ही आ गई थी तुम खंडहर पर हरियाली आ जाए बरसात में जैसे इसलिए लौट ही जाना था तुमको और खंडहर करती हुई मुझे।
Sapney | Dr Vishwanath Prasad Tiwari 21.06.2023 2:13
सपने - विश्वनाथ प्रसाद तिवारी कैसे कटती हैं उनकी रातें जो सपने नहीं देखते? सपने आकाश की तरह अनंत सपने क्षितिज की तरह अजनबी सपने बच्चों की तरह मुलायम सपने परियों की तरह पंख फैलाए सपने कोहरे में सोए जंगलों की तरह उगते दिन की तरह सपने कहते हैं वे अपने सपने बेच दो क्या खरीदूँगा मैं अपने सपने बेचकर?
Genhui Kalaiyon Mein Kaamdani Chudiyan | Suryabala 20.06.2023 2:55
गेहुंई कलाइयों में कामदानी चूड़ियाँ - सूर्यबाला यादें भी अजीब हैं.... कभी लोरी बनती हैं कभी घोडे की जीन।.... जरा ऐड़ लगाते ही झालरदार इक्के के साथ सरपट भागती हैं... हिट-हिट, हुर्र-हुर्र, बड़ी, छोटी बहनें बैठीं- खिल-खिल बतियाती हैं गेहुईं कलाइयों में कामदानी चूड़ियां फूलदार फ्रॉक और लाल पीले रिबनों में गूंजती मिठ बोलियां अध फूटी सड़कों पर खदराते पहिये जंगल जलेबियां और चिलबिल के भीटे..... पोखर शिवाले...
Chinta | Priyadarshan 19.06.2023 3:01
चिंताएँ कभी खत्म नहीं होतीं नींद में भी घुसपैठ कर जाती हैं धूसर सपनों वाले कपड़े पहनकर जागते समय साथ-साथ चला करती हैं कभी-कभी उनके दबाव कुछ कम हो जाते हैं तब फैला-फैला लगता है आकाश, प्यारी प्यारी लगती है धूप नरम मुलायम लगती है धरती लेकिन जब कभी बढ़ जाती हैं चिंताएँ बाकी कुछ जैसे सिकुड़ जाता है हवा भी भारी हो जाती है साँस लेने में लगती है मेहनत एक एक कदम बढ़ाना पहाड़ चढ़ने के बराबर मालूम होता है क...
Aaj Nadi Bilkul Udaas Thi | Kedarnath Agarwal 18.06.2023 1:57
आज नदी बिलकुल उदास थी - केदारनाथ अग्रवाल आज नदी बिलकुल उदास थी। सोई थी अपने पानी में, उसके दर्पण पर- बादल का वस्त्र पडा था। मैंने उसको नहीं जगाया, दबे पांव घर वापस आया।
Atma Ke Garbh Mein | Nandkishore Acharya 17.06.2023 2:03
आत्मा के गर्भ में - नंदकिशोर आचार्य चारों खूँट फैला तप रहा मरूथल आवें की तरह भीतर ही भीतर क्या पकाता है ? बोलो, तुम्हीं कुछ बोलो, प्रजापति ! मेरी आत्मा के गर्भ में क्या धर दिया पकने मेरे ही पसार के चाक पर घड़ कर ? ये आवाँ कभी तो खोलो, प्रजापति ! मुझ में कभी तो हो लो !
Shabd Batao, Katha, Akela Mela | Ramesh Chandra Shah 16.06.2023 3:41
रमेशचंद्र शाह - शब्द बताओ कहना क्या है शब्द बताओ कहना क्या शब्द बताओ गहना क्या है। मेरा तुम्हें तुम्हारा मुझे उलेहना क्या है शब्द बताओ कहना क्यों है शब्द बताओ सहना क्यों है तुमने हमको हमने तुमको पहना क्यों है? कथा खुला घर है एक साँकल भर लगी है लौट आएगी अभी माँ वह गई है कथा सुनने यहीं ठाकुरद्वार! चल रही है कथा अब भी ढल रही है कथा अब भी फूल आते फूल जाते बेल सा मुझ पर चढ़ा संसार हाथ साँकल तक पहुँच क...
Sadi Samvaad | Suryabala 15.06.2023 2:50
सदी संवाद | सूर्यबाला आधी सदी पहले- वह मेरा छुटंका देवर रसोई के दरवाजे पर डंका सा पीटता था- कि उसे स्कूल की देरी हो रही है और बाइस की मैं- सहमी, सकपकाई- चूल्हे से फूली गरम रोटियां निकाल उसकी थाली में सरकाती थी और फिर नल की धार में भाप से जली अपनी उँगलियाँ ठंडाती थी- छज्जे से देखता मेरा पति, मन ही मन आश्वस्त हो लेता था कि यह स्त्री, उसका कुटुंब संभाल ली जा रही है आधी सदी बाद - खिचड़ाए बालों वाला...
Jo Pul Banayenge | Agyega | Dr Anunaya Chaubey 14.06.2023 1:50
जो पुल बनाएंगे - अज्ञेय जो पुल बनाएँगे वे अनिवार्यत: पीछे रह जाएँगे। सेनाएँ हो जाएँगी पार मारे जाएँगे रावण जयी होंगे राम, जो निर्माता रहे इतिहास में बन्दर कहलाएँगे।
Prem Aur Ghruna | Priyadarshan 13.06.2023 2:38
प्रियदर्शन - प्रेम और घृणा प्रेम पर सब लिखते हैं, घृणा पर कोई नहीं लिखता, जबकि कई बार प्रेम से ज्यादा तीव्र होती है घृणा प्रेम के लिए दी जाती है शाश्वत बने रहने की शुभकामना, लेकिन प्रेम टिके न टिके, घृणा बची रहती है। कई बार ऐसा भी होता है कि पहली नज़र में जिनसे प्रेम होता है दूसरी नज़र में उनसे ईर्ष्या होती है और अंत में कभी-कभी वह घृणा तक में बदल जाती है। यह तजबीज कभी काम नहीं आती कि सबसे प्रेम क...
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