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Pratidin Ek Kavita

Arts HI ↓ 1195 episodes

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

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Jul 11, 2026

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Episodes

Ek Avishwasniya Sapna | Vishwanath Prasad Tiwari 27.05.2024

एक अविश्वसनीय सपना - विश्वनाथ प्रसाद तिवारी एक दिन उसने सपना देखा बिना वीसा बिना पासपोर्ट सारी दुनिया में घूम रहा है वह न कोई सरहद, न कोई चेकपोस्ट समुद्रों और पहाड़ों और नदियों और जंगलों से गुज़रते हुए उसने अद्भुत दृश्य देखे... आकाश के, बादलों और रंगों के... अक्षत यौवना प्रकृति उसके सामने थी... निर्भय घूम रहे थे पशु पक्षी। पुरुष स्त्री बच्चे  क्या शहर थे वे और कैसे गाँव कोई राजा कोई सिपाही कोई जेल...

Rok Sako To Roko | Poonam Shukla 26.05.2024

रोक सको तो रोको | पूनम शुक्ला  उछलेंगी ये लहरें अपनी राह बना लेंगी ये बल खाती सरिताएँ अपनी इच्छाएँ पा लेंगी रोको चाहे जितना भी ये झरने शोर मचाएँगे रोड़े कितने भी डालो कूद के ये आ जाएँगे चाहे ऊँची चट्टानें हों विहंगों का वृंद बसेगा सूखती धरा भले हो पुष्पों का झुंड हँसेगा हो रात घनेरी जितनी रोशनी का पुंज उगेगा रोक सको तो रोको यम भी विस्मित चल देगा डालो चाहे जितने विघ्न चाहे जितने करो प्रयत्न रोक नही...

Ghar-Baar Chhorkar Sanyaas Nahin Lunga | Vinod Kumar Shukla 25.05.2024

घर-बार छोड़कर संन्यास नहीं लूंगा |  विनोद कुमार शुक्ल घर-बार छोड़कर संन्यास नहीं लूंगा अपने संन्यास में मैं और भी घरेलू रहूंगा घर में घरेलू और पड़ोस में भी। एक अनजान बस्ती में एक बच्चे ने मुझे देखकर बाबा कहा वह अपनी माँ की गोद में था उसकी माँ की आँखों में ख़ुशी की चमक थी कि उसने मुझे बाबा कहा एक नामालूम सगा।

Agnipath | Harivansh Rai Bachchan 24.05.2024

अग्निपथ | हरिवंश राय बच्चन वृक्ष हों भले खड़े, हों घने हों बड़े, एक पत्र छाँह भी, माँग मत, माँग मत, माँग मत, अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ। तू न थकेगा कभी, तू न रुकेगा कभी, तू न मुड़ेगा कभी, कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ, अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ। यह महान दृश्य है, चल रहा मनुष्य है, अश्रु स्वेद रक्त से, लथपथ लथपथ लथपथ, अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।

Phagun Ka Geet | Kedarnath Singh 23.05.2024

फ़ागुन का गीत |  केदारनाथ सिंह गीतों से भरे दिन फागुन के ये गाए जाने को जी करता! ये बाँधे नहीं बँधते,  बाँहें रह जातीं खुली की खुली, ये तोले नहीं तुलते, इस पर ये आँखें तुली की तुली, ये कोयल के बोल उड़ा करते, इन्हें थामे हिया रहता! अनगाए भी ये इतने मीठे इन्हें गाएँ तो क्या गाएँ, ये आते, ठहरते, चले जाते इन्हें पाएँ तो क्या पाएँ ये टेसू में आग लगा जाते, इन्हें छूने में डर लगता! ये तन से परे ही परे रहत...

Sach Hai Vipatti Jab Aati Hai | Ramdhari Singh 'Dinkar' 22.05.2024

सच है, विपत्ति जब आती है | रामधारी सिंह दिनकर  सच है, विपत्ति जब आती है, कायर को ही दहलाती है, सूरमा नहीं विचलित होते, क्षण एक नहीं धीरज खोते, विघ्नों को गले लगाते हैं, काँटों में राह बनाते हैं। मुख से न कभी उफ कहते हैं, संकट का चरण न गहते हैं, जो आ पड़ता सब सहते हैं, उद्योग-निरत नित रहते हैं, शूलों का मूल नसाने को, बढ़ खुद विपत्ति पर छाने को। है कौन विघ्न ऐसा जग में, टिक सके वीर नर के मग में खम ठ...

Chithi Hai Kissi Dukhi Mann Ki | Kunwar Bechain 21.05.2024

 चिट्ठी है किसी दुखी मन की |  कुँवर बेचैन  बर्तन की यह उठका-पटकी यह बात-बात पर झल्लाना चिट्ठी है किसी दुखी मन की। यह थकी देह पर कर्मभार इसको खाँसी, उसको बुखार जितना वेतन, उतना उधार नन्हें-मुन्नों को गुस्से में हर बार, मारकर पछताना चिट्ठी है किसी दुखी मन की। इतने धंधे! यह क्षीणकाय- ढोती ही रहती विवश हाय खुद ही उलझन, खुद ही उपाय आने पर किसी अतिथि जन के दुख में भी सहसा हँस जाना चिट्ठी है किसी दुखी मन...

Need Ka Nirman | Harivansh Rai Bachchan 20.05.2024

नीड़ का निर्माण | हरिवंश राइ बच्चन नीड़ का निर्माण फिर-फिर, नेह का आह्वान फिर-फिर! वह उठी आँधी कि नभ में छा गया सहसा अँधेरा, धूलि धूसर बादलों ने भूमि को इस भाँति घेरा, रात-सा दिन हो गया, फिर रात आ‌ई और काली, लग रहा था अब न होगा इस निशा का फिर सवेरा, रात के उत्पात-भय से भीत जन-जन, भीत कण-कण किंतु प्राची से उषा की मोहिनी मुस्कान फिर-फिर! नीड़ का निर्माण फिर-फिर, नेह का आह्वान फिर-फिर! वह चले झोंके क...

Gun Gaunga | Arun Kamal 19.05.2024

 गुन गाऊँगा | अरुण कमल गुन गाऊँगा फाग के फगुआ के चैत के पहले दिन के गुन गाऊँगा गुड़ के लाल पुओं और चाशनी में इतराते मालपुओं के गुन गाऊँगा दही में तृप्त उड़द बड़ों और भुने जीरों रोमहास से पुलकित कटहल और गुदाज़ बैंगन के गुन गाऊँगा होली में घर लौटते जन मजूर परिवारों के गुन भाँग की सांद्र पत्तियों और मगही पान के नर्म पत्तों सरौतों सुपारियों के गुन गाऊँगा जन्मजन्मांतर मैं वसंत के धरती के गुन गाऊँगा— आओ...

Sahil Aur Samandar | Sarwar 18.05.2024

साहिल और समंदर | सरवर  ऐ समंदर क्यों इतना शोर करते हो  क्या कोई दर्द अंदर रखते हो  यूं हर बार साहिल से तुम्हारा टकराना  किसी के रोके जाने के खिलाफ तो नहीं  पर मुझको तुम्हारी लहरें याद दिलाती हैं  कोशिश से बदल जाते हैं हालात  तुमने ढाला है साहिलों को  बदला है उनके जबीनों को  मुझको ऐसा मालूम पड़ता है  कि तुम आकर लेते हो  बौसा साहिलों के हज़ार  ये मोहब्बत है तुम्हारी उस साहिल के लिए  जो छोड़ता नहीं है त...

Furniture | Anamika 17.05.2024

फ़र्नीचर | अनामिका मैं उनको रोज़ झाड़ती हूँ पर वे ही हैं इस पूरे घर में जो मुझको कभी नहीं झाड़ते! रात को जब सब सो जाते हैं— अपने इन बरफाते पाँवों पर आयोडिन मलती हुई सोचती हूँ मैं— किसी जनम में मेरे प्रेमी रहे होंगे फ़र्नीचर, कठुआ गए होंगे किसी शाप से ये! मैं झाड़ने के बहाने जो छूती हूँ इनको, आँसुओं से या पसीने से लथपथ- इनकी गोदी में छुपाती हूँ सर- एक दिन फिर से जी उठेंगे ये! थोड़े-थोड़े-से तो जी भी उठे...

Dua | Manmeet Narang 16.05.2024

दुआ | मनमीत नारंग कतरनें प्यार की  जो फेंक दीं थी बेकार समझकर  चल चुनें तुम और मैं हर टुकड़ा उस नेमत का  और बुनें एक रज़ाई  छुप जाएं सभी उसमें आज  तुम मेरे सीने पे मैं उसके कंधे पर  सिर रखकर रो लें ज़रा  कुछ हँस दें ज़रा  यूँ ही ज़िंदगी  गुज़र बसर हो जाएगी  शायद यह दुनिया बच जाएगी 

Dahi Jamane Ko Thoda Sa Jaman Dena | Yash Malviya 15.05.2024

दही जमाने को, थोड़ा-सा जामन देना | यश मालवीय मन अनमन है, पल भर को  अपना मन देना  दही जमाने को, थोड़ा-सा  जामन देना  सिर्फ़ तुम्हारे छू लेने से  चाय, चाय हो जाती  धूप छलकती दूध सरीखी  सुबह गाय हो जाती  उमस बढ़ी है, अगर हो सके  सावन देना  दही जमाने को, थोड़ा-सा  जामन देना  नहीं बाँटते इस देहरी  उस देहरी बैना  तोता भी उदास, मन मारे  बैठी मैना  घर से ग़ायब होता जाता,  आँगन देना  दही जमाने को, थोड़ा-सा  जामन...

Tamasha | Madan Kashyap 14.05.2024

तमाशा | मदन कश्यप  सर्कस में शेर से लड़ने की तुलना में बहुत अधिक ताकत और हिम्मत  की ज़रूरत होती है जंगल में शेर से लड़ने के लिए जो जिंदगी की पगडंडियों पर इतना भी नहीं चल सका कि सुकून से चार रोटियाँ खा सके वह बड़ी आसानी से आधी रोटी के लिए  रस्सी पर चल लेता है। तमाशा हमेशा ही सहज होता है क्योंकि इसमें बनी-बनायी सरल प्रक्रिया में चीजें लगभग पूर्व निर्धारित गति से चल कर पहले से सोचे-समझे अंत तक पहुँचत...

Jadein | Rajendra Dhodapkar 13.05.2024

जड़ें | राजेंद्र धोड़पकर हवा में बिल्कुल हवा में उगा पेड़  बिल्कुल हवा में, ज़मीन में नहीं  बादलों पर झरते हैं उसके पत्ते  लेकिन जड़ों को चाहिए एक आधार और वे  किसी दोपहर सड़क पर चलते एक आदमी के  शरीर में उतर जाती हैं  उसके साथ उसके घर जाती हैं जड़ें  और फैलती हैं दीवारों में भी  आदमी झरता जाता है दीवारों के पलस्तर-सा  जब भी बारिश होती है  उसके स्वप्नों में पत्ते झरते हैं बादलों से  जब दोपहर में आद...

Sanyog | Shahanshah Alam 12.05.2024

संयोग | शहंशाह आलम यह संयोगवश नहीं हुआ कि मैंने पुरानी साइकिल से पुराने शहरों की यात्राएं कीं ख़ानाबदोश उम्मीदों से भरी इस यात्रा में संयोग यह था कि तुम्हारा प्रेम साथ था मेरे तुम्हारे प्रेम ने मुझे अकेलेपन से मुठभेड़ नहीं होने दिया एक संयोग यह भी था कि मेरा शहर जूझ रहा था अकेलेपन की उदासी से तुम्हारे ही इंतज़ार में और मेरे शहर का नाम तुमने खजुराहो रखा था प्रेम की पवित्रता में बहकर।

Wahan Nahin Milungi Main | Renu Kashyap 11.05.2024

वहाँ नहीं मिलूँगी मैं | रेणु कश्यप मैंने लिखा एक-एक करके  हर अहसास को काग़ज़ पर  और सँभालकर रखा उसे फिर  दरअस्ल, छुपाकर  मैंने खटखटाया एक दरवाज़ा  और भाग गई फिर  डर जितने डर  उतने निडर नहीं हम  छुपते-छुपाते जब आख़िर निकलो जंगल से बाहर  जंगल रह जाता है साथ ही  आसमान से झूठ बोलो या सच  समझ जाना ही है उसे  कि दोस्त होते ही हैं ऐसे।  मेरे डरों से पार  एक दुनिया है  तुम वहीं ढूँढ़ रहे हो मुझे  वहाँ नहीं...

Yadi Chune Hon Shabd | Nandkishore Acharya 10.05.2024

यदि चुने हों शब्द | नंदकिशोर आचार्य  जोड़-जोड़ कर एक-एक ईंट ज़रूरत के मुताबिक लोहा, पत्थर, लकड़ी भी रच-पच कर बनाया है इसे। गोखे-झरोखे सब हैं दरवाज़े भी कि आ-जा सकें वे जिन्हें यहाँ रहना था यानी तुम। आते भी हो पर देख-छू कर चले जाते हो और यह तुम्हारी खिलखिलाहट से जिसे गुँजार होना था मक़्बरे-सा चुप है। सोचो, यदि यह मक़्बरा हो भी तो किस का? और ईंटों की जगह चुने हों यदि शब्द!

Dhoop | Roopa Singh 09.05.2024

धूप | रूपा सिंह धूप!! धधकती, कौंधती, खिलखिलाती अंधेरों को चीरती, रौशन करती। मेरी उम्र भी एक धूप थी अपनी ठण्डी हड्डियों को सेंका करते थे जिसमें तुम! मेरी आत्मा अब भी एक धूप अपनी बूढ़ी हड्डियों को गरमाती हूँ जिसमें। यह धूप उतार दूँगी, अपने बच्चों के सीने में ताकि ठण्डी हड्डियों वाली नस्लें इस जहाँ से ही ख़त्म हो जाएँ।

Chidiya | Ramdarash Mishra 08.05.2024

चिड़िया | रामदरश मिश्रा  चिड़िया उड़ती हुई कहीं से आयी बहुत देर तक इधर उधर भटकती हुई अपना घोंसला खोजती रही फिर थक कर एक जली हुई डाल पर बैठ गयी और सोचने लगी- आज जंगल में कोई आदमी आया था क्‍या?

Uska Chehra | Rajesh Joshi 07.05.2024

उसका चेहरा | राजेश जोशी  अचानक गुल हो गयी बत्ती घुप्प अँधेरा हो गया चारों तरफ उसने टटोल कर ढूँढी दियासलाई और एक मोमबत्ती जलाई आधे अँधेरे और आधे उजाले के बीच उभरा उसका चेहरा न जाने कितने दिनों बाद देखा मैंने इस तरह उसका चेहरा जैसे किसी और ग्रह से देखा मैंने पृथ्वी को !

Gol Pathar | Naresh Saxena 06.05.2024

  गोल पत्थर | नरेश सक्सेना  नोकें टूटी होंगी एक-एक कर तीखापन ख़त्म हुआ होगा किस-किस से टकराया होगा कितनी-कितनी बार पूरी तरह गोल हो जाने से पहले जब किसी भक्त ने पूजा या बच्चे ने खेल के लिए चुन लिया होगा तो खुश हुआ होगा कि सदमे में डूब गया होगा एक छोटी-सी नोक ही बचाकर रख ली होती किसी आततायी के माथे पर वार के लिए।

Saankal | Rajni Tilak 05.05.2024

सांकल | रजनी तिलक  चारदीवारी की घुटन घूँघट की ओट सहना ही नारीत्व तो बदलनी चाहिए परिभाषा। परम्पराओं का पर्याय बन चौखट की साँकल है जीवन-सार तो बदलना होगा जीवन-सार।

Jharber | Kedarnath Singh 04.05.2024

झरबेर | केदारनाथ सिंह  प्रचंड धूप में इतने दिनों बाद  (कितने दिनों बाद) मैंने ट्रेन की खिड़की से देखे  कँटीली झाड़ियों पर पीले-पीले फल ’झरबेर हैं’- मैंने अपनी स्मृति को कुरेदा और कहीं गहरे एक बहुत पुराने काँटे ने फिर मुझे छेदा

Bachana | Rajesh Joshi 03.05.2024

बचाना | राजेश जोशी  एक औरत हथेलियों की ओट में दीये की काँपती लौ को बुझने से बचा रही है एक बहुत बूढ़ी औरत कमज़ोर आवाज़ में गुनगुनाते हुए अपनी छोटी बहू को अपनी माँ से सुना गीत सुना रही है एक बच्चा पानी में गिर पड़े चींटे को एक हरी पत्ती पर उठाने की कोशिश कर रहा है एक आदमी एलबम में अपने परिजनों के फोटो लगाते हुए अपने बेटे को उसके दादा दादी और नाना नानी के किस्से सुना रहा है बची है यह दुनिया कि कोई न...

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