Nayi Dhara Radio
Pratidin Ek Kavita
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
Where to listen?
Podcasts in the app Replaio Radio Coming soonPodcasts are coming to the app soon. Install now and be the first to see a whole new take on podcasts
Episodes
Janna Zaroori Hai | Indu Jain 21.06.2024 1:22
जानना ज़रूरी है | इन्दु जैन जब वक्त कम रह जाए तो जानना ज़रूरी है कि क्या ज़रूरी है सिर्फ़ चाहिए के बदले चाहना पहचानना कि कहां हैं हाथ में हाथ दिए दोनों मुखामुख मुस्करा रहे हैं कहां फ़िर इन्हें यों सराहना जैसे बला की गर्मी में घूंट भरते मुंह में आई बर्फ़ की डली।
Hum Aur Log | Kedarnath Agarwal 20.06.2024 1:35
हम ओर लोग | केदारनाथ अग्रवाल हम बड़े नहीं फिर भी बड़े हैं इसलिए कि लोग जहाँ गिर पड़े हैं हम वहाँ तने खड़े हैं द्वन्द की लड़ाई भी साहस से लड़े हैं; न दुख से डरे, न सुख से मरे हैं; काल की मार में जहाँ दूसरे झरे हैं, हम वहाँ अब भी हरे-के-हरे हैं।
Baarish Ki Bhasha | Shahanshah Alam 19.06.2024 1:50
बारिश की भाषा | शहंशाह आलम उसकी देह कितनी बातूनी लग रही है जो बारिश से बचने की ख़ातिर खड़ी है जामुन पेड़ के नीचे जामुनी रंग के कपड़े में ‘जामुन ख़रीदकर घर लाए कितने दिन हुए’ हज़ारों मील तक बरस रही बारिश के बीच वह लड़की क्या ऐसा सोच रही होगी या यह कि इस शून्यता में जामुन का पेड़ बारिश से उसको कितनी देर बचा पाएगा बारिश किसी नाव की तरह बाँधी नहीं जा सकती, यह सच है जामुन का पककर गिरना भी बाँधा नहीं ज...
Ve Kaise Din They | Kirti Choudhary 18.06.2024 2:22
वे कैसे दिन थे | कीर्ति चौधरी वे कैसे दिन थे जब चीज़ें भागती थीं और हम स्थिर थे जैसे ट्रेन के एक डिब्बे में बंद झाँकते हुए ओझल होते थे दृश्य पल के पल में— ...कौन थी यह तार पर बैठी हुई बुलबुल, गौरय्या या नीलकंठ? आसमान को छूता हुआ सवन का जोड़ा था? दूरी पर झिलमिल-झिलमिल करती नदिया थी? या रेती का भ्रम? कभी कम कभी ज़्यादा प्रश्न ही प्रश्न उठते थे हम विमूढ़ ठगे-से सुलझाते ही रहते और चीज़ें...
Din Bhar | Ramdarash Mishra 17.06.2024 1:44
दिन भर | रामदरश मिश्रा आज दिन भर कुछ नहीं किया सुबह की झील में एक कंकड़ी मारकर बैठ गया तट पर और उसमें उठने वाली लहरों को देखता रहा शाम को लोग घर लौटे तो न जाने क्या-क्या सामान थे उनके पास मेरे पास कुछ नहीं था केवल एक अनुभव था कंकड़ी और लहरों के सम्बन्ध से बना हुआ।
Aurat Ki Ghulami | Sheoraj Singh 'Bechain' 16.06.2024 3:28
औरत की गुलामी | डॉ श्योराज सिंह ‘बेचैन’ किसी आँख में लहू है- किसी आँख में पानी है। औरत की गुलामी भी- एक लम्बी कहानी है। पैदा हुई थी जिस दिन- घर शोक में डूबा था। बेटे की तरह उसका- उत्सव नहीं मना था। बंदिश भरा है बचपन- बोझिल-सी जवानी है। औरत की गुलामी भी- एक लम्बी कहानी है। तालीम में कमतर है-- बाहरी हवा ज़हर है। लड़का कहीं भी जाए- उस पर कड़ी नज़र है। उसे जान गँवा कर भी- हर रस्म निभानी है। औरत की गुल...
Chal Insha Apne Gaon Mein | Ibn e Insha 15.06.2024 1:29
चल इंशा अपने गाँव में | इब्ने इंशा यहाँ उजले उजले रूप बहुत पर असली कम, बहरूप बहुत इस पेड़ के नीचे क्या रुकना जहाँ साये कम,धूप बहुत चल इंशा अपने गाँव में बेठेंगे सुख की छाओं में क्यूँ तेरी आँख सवाली है ? यहाँ हर एक बात निराली है इस देस बसेरा मत करना यहाँ मुफलिस होना गाली है जहाँ सच्चे रिश्ते यारों के जहाँ वादे पक्के प्यारों के जहाँ सजदा करे वफ़ा पांव में चल इंशा अपने गाँव में
Saat Panktiyan | Manglesh Dabral 14.06.2024 1:45
सात पंक्तियाँ - मंगलेश डबराल मुश्किल से हाथ लगी एक सरल पंक्ति एक दूसरी बेडौल-सी पंक्ति में समा गई उसने तीसरी जर्जर क़िस्म की पंक्ति को धक्का दिया इस तरह जटिल-सी लड़खड़ाती चौथी पंक्ति बनी जो ख़ाली झूलती हुई पाँचवीं पंक्ति से उलझी जिसने छटपटाकर छठी पंक्ति को खोजा जो आधा ही लिखी गई थी अन्ततः सातवीं पंक्ति में गिर पड़ा यह सारा मलबा।
Bahurupiya | Madan Kashyap 13.06.2024 3:31
बहुरूपिया | मदन कश्यप जब वह पास आया तो पाँव में प्लास्टिक की चप्पल देखकर एकदम से हँसी फूट पड़ी फिर लगा भला कैसे संभव है महानगर की क्रूर सड़कों पर नंगे पाँव चलना चाहे वह बहुरूपिया ही क्यों न हो वैसे उसने अपनी तरफ़ से कोशिश की थी दुम इतनी ऊँची लगायी थी कि वह सिर से काफ़ी ऊपर उठी दिख रही थी बाँस की खपच्चियों पर पीले काग़ज़ साटकर बनी गदा कमज़ोर भले हो चमकदार ख़ूब थी सिर पर गत्ते की चमकती टोपी थी चेहर...
Ik Roz Doodh Ne Ki Pani Se Paak Ulfat | Unknown 12.06.2024 2:33
इक रोज़ दूध ने की पानी से पाक उल्फ़त | अज्ञात इक रोज़ दूध ने की, पानी से पाक उल्फ़त इक ज़ात हो गए वो, मिल-जुल के भाई भाई इनमें बढ़ी वो उल्फ़त, एक रंग हो गए वो एक दूसरे ने पाया, सौ जान से फ़िदाई हलवाई ने उनकी, उल्फ़त का राज़ समझा दोनों से भर के रक्खी, भट्टी पे जब कढ़ाई बरछी की तरह उट्ठे, शोले डराने वाले भाई रहे सलामत, पानी के दिल में आई ख़ामोश भाप बनकर, भाई से ली विदाई क्या पाक-दामनी थी, के जान भी ग...
Arrey Ab Aisi Kavita Likho | Raghuvir Sahay 11.06.2024 1:35
अरे अब ऐसी कविता लिखो | रघुवीर सहाय अरे अब ऐसी कविता लिखो कि जिसमें छंद घूमकर आय घुमड़ता जाय देह में दर्द कहीं पर एक बार ठहराय कि जिसमें एक प्रतिज्ञा करूं वही दो बार शब्द बन जाय बताऊँ बार-बार वह अर्थ न भाषा अपने को दोहराय अरे अब ऐसी कविता लिखो कि कोई मूड़ नहीं मटकाय न कोई पुलक-पुलक रह जाय न कोई बेमतलब अकुलाय छंद से जोड़ो अपना आप कि कवि की व्यथा हृदय सह जाय थामकर हँसना-रोना आज उदासी होनी की कह जाय।
Prem Karna Ya Phasna | Rupam Mishra 10.06.2024 2:03
प्रेम करना या फंसना - रूपम मिश्रा हम दोनों नए-नए प्रेम में थे उसके हाथ में महँगा-सा फोन था और बाँह में औसत-सी मैं फोन में कई खूबसूरत लड़कियों की तसवीरें दिखाते हुए उसने मुस्कुराते हुए गर्व से कहा, देख रही हो ये सब मुझपे मरती थीं मैंने कहा और तुम! उसने कहा, ज़ाहिर है मैं भी प्रेम करता था मुझे भी थोड़ा रोमांच हुआ मैंने हसरत और थोड़ी रूमानियत से लजाते हुए कहा मेरे भी स्कूल में एक पगलेट-सा लड़का था मु...
Rin Phoolon Sa | Sunita Jain 09.06.2024 1:44
ऋण फूलों-सा | सुनीता जैन इस काया को जिस माया ने जन्म दिया, वह माँग रही-कि जैसे उत्सव के बाद दीवारों पर हाथों के थापे रह जाते जैसे पूजा के बाद चौरे के आसपास पैरों के छापे रह जाते जैसे वृक्षों पर प्रेम संदेशों के बँधे, बँधे धागे रह जाते, वैसा ही कुछ कर जाऊँ सोच रही, माया के धीरज का काया की कथरी का यह ऋण फूलों-सा हल्का- किन शब्दों में तोल, चुकाऊँ
Saath Chalte Chalte Tum | Rashmi Pathak 08.06.2024 1:51
साथ चलते चलते तुम | रश्मि पाठक तुम बहुत आगे निकल गए जाने कितना समय लगेगा तुम तक पहुँचने में सोचती थी कैसे कटेंगे ये पल छिन बीत गया एक बरस तुम्हारे बिन बंद हुए अब मन के सारे द्वार रुक गया है मेरा प्रति स्पंदन रह रह कर टीसती है वेदना और बूँद बूँद आँखों के कोनों से झड़ती है चुपचाप तुम नहीं हो मेरे पास
Filhaal | Uday Prakash 07.06.2024 1:49
फ़िलहाल | उदय प्रकाश एक गत्ते का आदमी बन गया था लौहपुरुष बलात्कारी हो चुका था सन्त व्यभिचारी विद्वान चापलूस क्रान्तिकारी मदारी को घोषित कर दिया गया था युग-प्रवर्तक अख़बार और चैनल चीख़-चीख़ कर कह रहे थे आ गयी है सच्ची जम्हूरियत जहाँ सबसे ज्यादा लाशें बिछी थीं वहीं हो रहा था विकास जो बैठा था किसी उजड़े पेड़ के नीचे पढ़ते हुए अकेले में कोई बहुत पुरानी किताब वही था सन्दिग्ध उसकी हो रही थी लगातार निगर...
Kavita Ke Liye | Snehmayi Chaudhary 06.06.2024 1:41
कविता के लिए | स्नेहमयी चौधरी कविता लिखने के लिए जो परेशान करते थे उन सबको मैंने धीरे-धीरे अपने से काट दिया। जैसे : ज़रा सी बात पर बड़ी देर तक घुमड़ते रहना, अपने किए को हर बार ग़लत समझना, निरंतर अविश्वास की झिझक ओढ़े घूमना। अब सिर ऊँचा कर स्वस्थ हो रही हूँ, मकान बनाने में जुटे मज़दूरों को देख रही हूँ।
Jo Maar Kha Royi Nahin | Vishnu Khare 05.06.2024 2:17
जो मार खा रोईं नहीं | विष्णु खरे तिलक मार्ग थाने के सामने जो बिजली का एक बड़ा बक्स है उसके पीछे नाली पर बनी झु्ग्गी का वाक़या है यह चालीस के क़रीब उम्र का बाप सूखी सांवली लंबी-सी काया परेशान बेतरतीब बढ़ी दाढ़ी अपने हाथ में एक पतली हरी डाली लिए खड़ा हुआ नाराज़ हो रहा था अपनी पांच साल और सवा साल की बेटियों पर जो चुपचाप उसकी तरफ़ ऊपर देख रही थीं ग़ु्स्सा बढ़ता गया बाप का पता नहीं क्या हो गया था बच्चि...
Kalpvriksha | Damodar Khadse 04.06.2024 2:15
कल्पवृक्ष | दामोदर खड़से कविता भीतर से होते हुए जब शब्दों में ढलती है भीतरी ठिठुरन ऊष्मा के स्पर्श से प्राणवान हो उठती है ज्यों थकी हुई प्रतीक्षा बेबस प्यास दुत्कारी आशा अनायास ही किसी पुकार को थाम लेती है शब्द सार्थक हो उठते हैं और एकांत भी सान्निध्य से भर जाते हैं कविता कल्पवृक्ष है।
Bhasha | Snehmayi Chaudhary 03.06.2024 1:54
भाषा | स्नेहमयी चौधरी यह नहीं कि उसे कोई शिकायत नहीं, लेकिन अब वह अपने पक्ष में कोई तर्क न देगी, न चाहेगी— लगाए गए आरोपों का कोई निराकरण। यह नहीं कि उसके पास कहने को कुछ नहीं, शायद यह कि बहुत कुछ है। अब कोई न पूछे उसके निजी दस्तावेज़, यही तो उसकी संपत्ति है। यद्यपि निष्क्रिय विद्रोह आज की भाषा नहीं : यह नहीं कि वह जानती नहीं। शायद यही उसके लिए सही भाषा की तलाश का एक तरीक़ा है।
Pura Parivaar Ek Kamre Mein | Laxmi Shankar Bajpai 02.06.2024 1:24
पूरा परिवार एक कमरे में | लक्ष्मीशंकर वाजपेयी पूरा परिवार, एक कमरे में कितने संसार, एक कमरे में। हो नहीं पाया बड़े सपनों का छोटा आकार, एक कमरे में। ज़िक्र दादा की उस हवेली का सैंकड़ों बार, एक कमरे में। शोरगुल, नींद, पढ़ाई, टी.वी. रोज़ तकरार, एक कमरे में। एक घर, हर किसी की आँखों में सबका विस्तार, एक कमरे में।
Main Buddh Nahi Banna Chahta | Shahanshah Alam 01.06.2024 1:52
मैं बुद्ध नहीं बनना चाहता | शहंशा आलम मैं बुद्ध नहीं बनना चाहता तुम्हारे लिए बुद्ध की मुस्कराहट ज़रूर बनना चाहता हूँ बुद्ध मर जाते हैं जिस तरह पिता मर जाते हैं किसी जुमेरात की रात को बुद्ध की मुस्कान लेकिन जीवित रहती है हमेशा मेरे होंठों पर ठहरकर जिस मुस्कान पर तुम मर मिटती हो तेज़ बारिश के दिनों में।
Geet | Sheoraj Singh 'Bechain' 31.05.2024 3:10
गीत | डॉ श्योराज सिंह 'बेचैन' मज़दूर-किसानों के अधर यूँ ही कहेंगे। हम एक थे, हम एक हैं, हम एक रहेंगे।। मज़हब, धर्म के नाम पर लड़ना नहीं हमें। फिर्को में जातियों में बिखरना नहीं हमें |। हम नेक थे, हम नेक हैं, हम नेक रहेंगे । समता की भूख हमसे कह रही है अब उठो। सामन्तों, दरिन्दों की बढ़ो, रीढ़ तोड़ दो ।। अपने हकूक दुश्मनों से लेके रहेंगे | कैसा अछूत-छूत क्या, हैं हिन्दू क्या मुसलमान । यकरसाँ हैं ज़मा...
Suraj | Akanksha Pandey 30.05.2024 4:12
सूरज | आकांक्षा पांडे तुम, हां तुम्हीं तुमसे कुछ बताना चाहती हूँ। माना अनजान हूं दिखती नादान हूं कुछ ज्यादा कहने को नहीं है कोई बड़ा फरमान नही है बस इतना दोहराना है जग में सबने जाना है पीड़ा घटे बताने से रात कटे बहाने से लेकिन की थोड़ी कंजूसी करके इतनी कानाफूसी बात का बतंगड़ बनाया ऐसा मायाजाल पिरोया कि अब डरते हो तुम कहने से अपने मन की देने दुहाई तन्हा दिल की करना साझा अपना बिसरा कोई दुख पु...
Andhera Bhi Ek Darpan Hai | Anupam Singh 29.05.2024 2:29
अँधेरा भी एक दर्पण है | अनुपम सिंह अँधेरा भी एक दर्पण है साफ़ दिखाई देती हैं सब छवियाँ यहाँ काँटा तो गड़ता ही है फूल भी भय देता है कभी नहीं भूली अँधेरे में गही बाँह पृथ्वी सबसे उच्चतम बिन्दु पर काँपी थी जल काँपा था काँपे थे सभी तत्त्व वह भी एक महाप्रलय था आँधेरे से सन्धि चाहते दिशागामी पाँव टकराते हैं आकाश तक खिंचे तम के पर्दे से जीवन-मृत्यु और भय का इतना रोमांच! भावों की पराकाष्ठा है यह अँधेरा...
Tahniyan | Jaiprakash Kardam 28.05.2024 2:12
टहनियाँ | जयप्रकाश कर्दम काटा जाता है जब भी कोई पेड़ बेजान हो जाती हैं टहनियां बिना कटे ही पेड़ है क्योंकि टहनियां हैं टहनियां हैं क्योंकि पेड़ है अर्थहीन हैं एक दूसरे के बिना पेड़ और टहनियां ठूंठ हो जाता है पेड़ टहनियों के अभाव में टहनियां हैं पेड़ का कुनबा पेड़ ने देखा है अपने कुनबे को बढते हुए टहनियों ने देखा है पेड़ को कटते हुए कटकर गिरने से पहले अंतिम शंवास तक संघर्ष करते हुए टहनियां उदास हैं...
Similar podcasts
Replaio is not a podcast publisher; show names, artwork and audio belong to their authors and are distributed through public RSS feeds.