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Pratidin Ek Kavita

Arts HI ↓ 1195 episodes

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

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Jul 11, 2026

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Episodes

Akaal Aur Uske Baad | Nagarjun 16.07.2024

अकाल और उसके बाद | नागार्जुन कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास  कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास  कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त  कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त  दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद  धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद  चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद  कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद 

Santaan Saate | Nilesh Raghuvanshi 15.07.2024

संतान साते - नीलेश रघुवंशी  माँ परिक्रमा कर रही होगी पेड़ की हम परिक्रमा कर रहे हैं पराये शहर की जहाँ हमारी इच्छाएँ दबती ही जा रही हैं । सात पुए और सात पूड़ियाँ थाल में सजाकर रखी होंगी नौ चूड़ियाँ आठ बहन और एक भाई की ख़ुशहाली और लंबी आयु पेड़ की परिक्रमा करते कभी नहीं थके माँ के पाँव। माँ नहीं समझ सकी कभी जब माँग रही होती है वह दुआ हम सब थक चुके होते हैं जीवन से। माँ के थाल में सजी होंगी सात पूड़िय...

Jo Hua Vo Hua Kis Liye | Nida Fazli 14.07.2024

जो हुआ वो हुआ किसलिए | निदा फ़ाज़ली जो हुआ वो हुआ किसलिए हो गया तो गिला किसलिए काम तो हैं ज़मीं पर बहुत आसमाँ पर ख़ुदा किसलिए एक ही थी सुकूँ की जगह घर में ये आइना किसलिए

Bachao | Uday Prakash 13.07.2024

बचाओ - उदय प्रकाश  चिंता करो मूर्द्धन्य 'ष' की किसी तरह बचा सको तो बचा लो ‘ङ’ देखो, कौन चुरा कर लिये चला जा रहा है खड़ी पाई और नागरी के सारे अंक जाने कहाँ चला गया ऋषियों का “ऋ' चली आ रही हैं इस्पात, फाइबर और अज्ञात यौगिक धातुओं की तमाम अपरिचित-अभूतपूर्व चीज़ें किसी विस्फोट के बादल की तरह हमारे संसार में बैटरी का हनुमान उठा रहा है प्लास्टिक का पहाड़ और बच्चों के हाथों में बोल रही है कोई डरावनी चीज़...

Jab Main Tera Geet Likhne Lagi 12.07.2024

जब मैं तेरा गीत लिखने लगी/अमृता प्रीतम मेरे शहर ने जब तेरे कदम छुए सितारों की मुट्ठियाँ भरकर आसमान ने निछावर कर दीं दिल के घाट पर मेला जुड़ा , ज्यूँ रातें रेशम की परियां पाँत बाँध कर आई...... जब मैं तेरा गीत लिखने लगी काग़ज़ के ऊपर उभर आईं केसर की लकीरें सूरज ने आज मेहंदी घोली हथेलियों पर रंग गई, हमारी दोनों की तकदीरें

Telephone Par Pita Ki Awaz | Nilesh Raghuvanshi 11.07.2024

टेलीफ़ोन पर पिता की आवाज़ - नीलेश रघुवंशी  टेलीफ़ोन पर थरथराती है पिता की आवाज़ दिये की लौ की तरह काँपती-सी। दूर से आती हुई छिपाये बेचैनी और दुख। टेलीफ़ोन के तार से गुज़रती हुई कोसती खीझती  इस आधुनिक उपकरण पर। तारों की तरह टिमटिमाती टूटती-जुड़ती-सी आवाज़। कितना सुखद पिता को सुनना टेलीफ़ोन पर पहले-पहल कैसे पकड़ा होगा पिता ने टेलीफ़ोन। कड़कती बिजली-सी पिता की आवाज़ कैसी सहमी-सहमी-सी टेलीफ़ोन पर। बनत...

Saamya | Naresh Saxena 10.07.2024

साम्य | नरेश सक्सेना  समुद्र के निर्जन विस्तार को देखकर वैसा ही डर लगता है जैसा रेगिस्तान को देखकर समुद्र और रेगिस्तान में अजीब साम्य है दोनों ही होते हें विशाल लहरों से भरे हुए और दोनों ही भटके हुए आदमी को मारते हैं प्यासा।

Nani Ki Kahani Mein Devraj Indra | Arunabh Saurabh 09.07.2024

नानी की कहानी में देवराज इन्द्र - अरुणाभ सौरभ  कठोरतम तप से किसी साधक को मिलने लगेगी सिद्धि तो आपका स्वर्ग सिंहासन डोल जाएगा देवराज बचपन में आपसे नानी की कहानियों में मिलता रहा हूँ जवान हुआ तो समझा कि सबसे सुंदरतम दुनिया की अप्सराएँ सबसे मादक पेय और अमरत्व आपके अधीन जहाँ प्रवेश अत्यंत कठिन है मरणोपरांत पर हरेक हंदय में स्वर्ग की चाहना- कामना - इच्छा अपार तिसपर एकक्षत्र राज प्रभो! नानी को गए बरसों...

Aakhri Kavita | Imroz 08.07.2024

आख़िरी कविता | इमरोज़ अनुवाद : अमिया कुँवर जन्म के साथ  मेरी क़िस्मत नहीं लिखी गई  जवानी में लिखी गई  और वह भी कविता में...  जो मैंने अब पढ़ी है  पर तू क्यों  मेरी क़िस्मत कविता को  अपनी आख़िरी कविता कर रही हो...  मेरे होते तेरी तो कभी भी  कोई कविता आख़िरी कविता  नहीं हो सकती... 

Kivaad | Kumar Ambuj 07.07.2024

किवाड़ | कुमार अम्बुज ये सिर्फ़ किवाड़ नहीं हैं  जब ये हिलते हैं  माँ हिल जाती है  और चौकस आँखों से  देखती है—‘क्या हुआ?’  मोटी साँकल की  चार कड़ियों में  एक पूरी उमर और स्मृतियाँ  बँधी हुई हैं  जब साँकल बजती है  बहुत कुछ बज जाता है घर में  इन किवाड़ों पर  चंदा सूरज  और नाग देवता बने हैं  एक विश्वास और सुरक्षा  खुदी हुई है इन पर  इन्हें देख कर हमें  पिता की याद आती है।  भैया जब इन्हें बदलवाने का क...

Likhne Se Hi Likhi Jaati Hai Kavita | Udayan Vajpeyi 06.07.2024

लिखने से ही लिखी जाती है कविता | उदयन वाजपेयी लिखने से ही लिखी जाती है कविता  प्रेम भी करने की ही चीज़ है  जैसे जंगल सुनने की  किताब डूबने की  मृत्यु इंतज़ार की  जीवन, अपने को चारों ओर से  समेट कर किसी ऐसे बिंदु पर  ला देने की जहाँ नर्तकी की तरह  अपने पाँव के अँगूठे पर कुछ देर  खड़ा रह सके वियोग 

Sirf Mohabbat Hi Mazhab Hai Har Sacche Insaan Ka | Lakshmi Shankar Vajpeyi 05.07.2024

सिर्फ मोहब्बत ही मज़हब है हर सच्चे इंसान का | लक्ष्मीशंकर वाजपेयी माँ की ममता, फूल की खुशबू,  बच्चे की मुस्कान का सिर्फ़ मोहब्बत ही मज़हब है  हर सच्चे इंसान का किसी पेड़ के नीचे आकर राही जब सुस्ताता है पेड़ नहीं पूछे है किस मज़हब से तेरा नाता है धूप गुनगुनाहट देती है चाहे  जिसका आँगन हो जो भी प्यासा आ जाता है,  पानी प्यास बुझाता है मिट्टी फसल उगाये पूछे धर्म न किसी किसान का। ये श्रम युग है जिसमे स...

Umr | Hemant Deolekar 04.07.2024

उम्र -  हेमंत देवलेकर  तुम कितने साल की हो डिंबू ? "तीन साल की” "और तुम्हारी मम्मी ?" "तीन साल की" "और पापा?" "तीन साल" अचानक मुझे यह दुनिया कच्चे टमाटर सी लगी महज़ तीन साल पुरानी

Kavi Log | Rituraj 03.07.2024

कवि लोग | ऋतुराज कवि लोग बहुत लंबी उमर जीते हैं  मारे जा रहे होते हैं  फिर भी जीते हैं  कृतघ्न समय में मूर्खों और लंपटों के साथ  निभाते अपनी दोस्ती   उनके हाथों में ठूँसते अपनी किताब  कवि लोग बहुत दिनों तक हँसते हैं  चीख़ते हैं और चुप रहते हैं  लेकिन मरते नहीं हैं कमबख़्त!  कवि लोग बच्चों में चिड़ियाँ  और चिड़ियों में लड़कियाँ  और लड़कियों में फूल देखते हैं  सब देखे हुए के बीज समेटते हैं  फिर ख़ुद...

Parinde Par Kavi Ko Pehchante Hain | Rajesh Joshi 02.07.2024

परिन्दे पर कवि को पहचानते हैं - राजेश जोशी  सालिम अली की क़िताबें पढ़ते हुए मैंने परिन्दों को पहचानना सीखा। और उनका पीछा करने लगा पाँव में जंज़ीर न होती तो अब तक तो . न जाने कहाँ का कहाँ निकल गया होता हो सकता था पीछा करते-करते मेरे पंख उग आते और मैं उड़ना भी सीख जाता जब परिन्दे गाना शुरू करतें और पहाड़ अँधेरे में डूब जाते। ट्रक ड्राइवर रात की लम्बाई नापने निकलते तो अक्सर मुझे साथ ले लेते मैं परिन्...

Ek Tinka | Ayodhya Singh Upadhyay 'Hari Oudh' 01.07.2024

एक तिनका | अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’  मैं घमण्डों में भरा ऐंठा हुआ। एक दिन जब था मुण्डेरे पर खड़ा। आ अचानक दूर से उड़ता हुआ। एक तिनका आँख में मेरी पड़ा। मैं झिझक उठा, हुआ बेचैन-सा। लाल होकर आँख भी दुखने लगी। मूँठ देने लोग कपड़े की लगे। ऐंठ बेचारी दबे पाँवों भगी। जब किसी ढब से निकल तिनका गया। तब 'समझ' ने यों मुझे ताने दिए। ऐंठता तू किसलिए इतना रहा। एक तिनका है बहुत तेरे लिए।

Bahut dinon ke baad | Nagarjun 30.06.2024

बहुत दिनों के बाद | नागार्जुन बहुत दिनों के बाद  अबकी मैंने जी भर देखी  पकी-सुनहली फ़सलों की मुस्कान  - बहुत दिनों के बाद  बहुत दिनों के बाद  अबकी मैं जी भर सुन पाया  धान कूटती किशोरियों की कोकिलकंठी तान  - बहुत दिनों के बाद  बहुत दिनों के बाद  अबकी मैंने जी भर सूँघे  मौलसिरी के ढेर-ढेर-से ताज़े-टटके फूल  - बहुत दिनों के बाद  बहुत दिनों के बाद  अबकी मैं जी भर छू पाया  अपनी गँवई पगडंडी की चंदनवर्णी...

Uth Jaag Musafir | Vanshidhar Shukla 29.06.2024

उठ जाग मुसाफ़िर | वंशीधर शुक्ल उठ जाग मुसाफ़िर! भोर भई,  अब रैन कहाँ जो सोवत है।  जो सोवत है सो खोवत है,  जो जागत है सो पावत है।  उठ जाग मुसाफ़िर! भोर भई,  अब रैन कहाँ जो सोवत है।  टुक नींद से अँखियाँ खोल ज़रा  पल अपने प्रभु से ध्यान लगा,  यह प्रीति करन की रीति नहीं  जग जागत है, तू सोवत है।  तू जाग जगत की देख उड़न,  जग जागा तेरे बंद नयन,  यह जन जाग्रति की बेला है,  तू नींद की गठरी ढोवत है।  लड़ना व...

Maut Ik Geet Raat Gaati Thi | Firaq Gorakhpuri 28.06.2024

मौत इक गीत रात गाती थी ज़िन्दगी झूम झूम जाती थी ज़िक्र था रंग-ओ-बू का और दिल में तेरी तस्वीर उतरती जाती थी वो तिरा ग़म हो या ग़म-ए-आफ़ाक़ शम्मअ  सी दिल में झिलमिलाती थी ज़िन्दगी  को रह-ए-मोहब्बत में मौत ख़ुद रौशनी दिखाती थी जल्वा-गर हो रहा था कोई उधर धूप इधर फीकी पड़ती जाती थी ज़िन्दगी ख़ुद को राह-ए-हस्ती में कारवाँ कारवाँ छुपाती थी हमा-तन-गोशा ज़िन्दगी थी फ़िराक़  मौत धीमे सुरों में गाती थी ज़िक्र: च...

Sir Chupane Ki Jagah | Rajesh Joshi 27.06.2024

सिर छिपाने की जगह  | राजेश जोशी  न उन्होंने कुंडी खड़खड़ाई न दरवाज़े पर लगी घंटी बजाई अचानक घर के अन्दर तक चले आए वे लोग उनके सिर और कपड़े कुछ भीगे हुए थे मैं उनसे कुछ पूछ पाता, इससे पहले ही उन्होंने कहना शुरू कर दिया कि शायद तुमने हमें पहचाना नहीं । हाँ...पहचानोगे भी कैसे बहुत बरस हो गए मिले हुए तुम्हारे चेहरे को, तुम्हारी उम्र ने काफ़ी बदल दिया है लेकिन हमें देखो हम तो आज भी बिलकुल वैसे ही हैं ह...

Mere Bete | Kavita Kadambari 26.06.2024

मेरे बेटे | कविता कादम्बरी मेरे बेटे                                                       कभी इतने ऊँचे मत होना  कि कंधे पर सिर रखकर कोई रोना चाहे तो  उसे लगानी पड़े सीढ़ियाँ  न कभी इतने बुद्धिजीवी  कि मेहनतकशों के रंग से अलग हो जाए तुम्हारा रंग  इतने इज़्ज़तदार भी न होना  कि मुँह के बल गिरो तो आँखें चुराकर उठो  न इतने तमीज़दार ही  कि बड़े लोगों की नाफ़रमानी न कर सको कभी  इतने सभ्य भी मत होना  कि छत पर...

Baad Ke Dinon Mein Premikayein | Rupam Mishra 25.06.2024

बाद के दिनों में   प्रेमिकाएँ | रूपम मिश्रा  बाद के दिनों में प्रेमिकाएँ पत्नियाँ बन गईं वे सहेजने लगीं प्रेमी को जैसे मुफलिसी के दिनों में अम्मा घी की गगरी सहेजती थीं वे दिन भर के इन्तजार के बाद भी ड्राइव करते प्रेमी से फोन पर बात नहीं करतीं वे लड़ने लगीं कम सोने और ज़्यादा शराब पीने पर प्रेमी जो पहले ही घर में बिनशी पत्नी से परेशान था अब प्रेमिका से खीजने लगा वो सिर झटक कर सोचता कि कहीं गलती से उ...

Ishwar Aur Pyaz | Kedarnath Singh 24.06.2024

ईश्वर और प्याज़ | केदारनाथ सिंह  क्या ईश्वर प्याज़ खाता है? एक दिन माँ ने मुझसे पूछा जब मैं लंच से पहले प्याज़ के छिलके उतार रहा था क्यों नहीं माँ मैंने कहा जब दुनिया उसने बनाई तो गाजर मूली प्याज़ चुकन्दर- सब उसी ने बनाया होगा फिर वह खा क्‍यों नहीं सकता प्याज़? वो बात नहीं- हिन्दू प्याज़ नहीं खाता धीरे-से कहती है वह तो क्‍या ईश्वर हिन्दू हैं माँ? हँसते हुए पूछता हूँ मैं  माँ अवाक देखती है मुझे  उधर...

Anant Janmon Ki Katha | Vishwanath Prasad Tiwari 23.06.2024

अनंत जन्मों की कथा | विश्वनाथ प्रसाद तिवारी  मुझे याद है अपने अनंत जन्मों की  कथा पिता ने उपेक्षा की सती हुई मैं चक्र से कटे मेरे अंग-प्रत्यंग जन्मदात्री माँ ने अरण्य में छोड़ दिया असहाय पक्षियों ने पाला शकुंतला कहलाई जिसने प्रेम किया उसी ने इनकार किया पहचानने से सीता नाम पड़ा धरती से निकली समा गई अग्नि-परीक्षा की धरती में जन्मते ही फेंक दी गई आम्र कुंज में आम्रपाली कहलाई; सुंदरी थी इसलिए पूरे नगर...

Khul Kar | Nandkishore Acharya 22.06.2024

खुल कर | नंदकिशोर आचार्य  खुल कर हो रही बारिश खुल कर नहाना चाहती लड़की अपनी खुली छत पर। किन्तु लोगों की खुली आँखें उसको बन्द रखती हैं खुल कर हो रही बरसात में।

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