Nayi Dhara Radio
Pratidin Ek Kavita
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
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Episodes
Raat Kati Din Tara Tara | Shiv Kumar Batalvi 10.08.2024 1:39
रात कटी गिन तारा तारा - शिव कुमार बटालवी अनुवाद: आकाश 'अर्श' रात कटी गिन तारा तारा हुआ है दिल का दर्द सहारा रात फुंका मिरा सीना ऐसा पार अर्श के गया शरारा आँखें हो गईं आँसू आँसू दिल का शीशा पारा-पारा अब तो मेरे दो ही साथी इक आह और इक आँसू खारा मैं बुझते दीपक का धुआँ हूँ कैसे करूँ तिरा रौशन द्वारा मरना चाहा मौत न आई मौत भी मुझ को दे गई लारा छोड़ न मेरी नब्ज़ मसीहा बाद में ग़म का कौन सह...
Apne Purkhon Ke Liye | Vishwanath Prasad Tiwari 09.08.2024 2:52
अपने पुरखों के लिए | विश्वनाथ प्रसाद तिवारी इसी मिट्टी में मिली हैं उनकी अस्थियाँ अँधेरी रातों में जो करते रहते थे भोर का आवाहन बेड़ियों में जकड़े हुए जो गुनगुनाते रहते थे आज़ादी के तराने माचिस की तीली थे वे चले गए एक लौ जलाकर थोड़ी सी आग जो चुराकर लाये थे वे जन्नत से हिमालय की सारी बर्फ और समुद्र का सारा पानी नहीं बुझा पा रहे हैं उसे लड़ते रहे, लड़ते रहे, लड़ते रहे वे मछुआरे जर्जर नौका की तरह समय क...
Amaltaash | Anjana Verma 08.08.2024 1:45
अमलताश | अंजना वर्मा उठा लिया है भार इस भोले अमलताश ने दुनिया को रौशन करने का बिचारा दिन में भी जलाये बैठा है करोड़ों दीये! न जाने किस स्त्री ने टाँग दिये अपने सोने के गहने अमलताश की टहनियों पर और उन्हें भूलकर चली गई पीली तितलियों का घर है अमलताश या सोने का शहर है अमलताश दीवाली की रात है अमलताश या जादुई करामात है अमलताश!
Atyachari ke Pramaan | Manglesh Dabral 07.08.2024 2:08
अत्याचारी के प्रमाण | मंगलेश डबराल अत्याचारी के निर्दोष होने के कई प्रमाण हैं उसके नाखुन या दाँत लम्बे नहीं हैं आँखें लाल नहीं रहती... बल्कि वह मुस्कराता रहता है अक्सर अपने घर आमंत्रित करता है और हमारी ओर अपना कोमल हाथ बढ़ाता है उसे घोर आश्चर्य है कि लोग उससे डरते हैं अत्याचारी के घर पुरानी तलवारें और बन्दूकें., सिर्फ़ सजावट के लिए रखी हुई हैं उसका तहख़ाना एक प्यारी-सी जगह है जहाँ श्रेष्ठ कलाकृत...
Main Shamil Hun Ya Na Hun | Nasira Sharma 06.08.2024 2:35
मैं शामिल हूँ या न हूँ | नासिरा शर्मा मैं शामिल हूँ या न हूँ मगर हूँ तो इस काल- खंड की चश्मदीद गवाह! बरसों पहले वह गर्भवती जवान औरत गिरी थी, मेरे उपन्यासों के पन्नों पर ख़ून से लथपथ। ईरान की थी या फिर टर्की की या थी अफ़्रीका की या फ़िलिस्तीन की या फिर हिंदुस्तान की क्या फ़र्क़ पड़ता है वह कहाँ की थी। वह लेखिका जो पूरे दिनों से थी जो अपने देश के इतिहास को शब्दों का जामा पहनाने के जुर्म में लगाती...
Ambapali | Vishwanath Prasad Tiwari 05.08.2024 2:02
अम्बपाली | विश्वनाथ प्रसाद तिवारी मंजरियों से भूषित यह सघन सुरोपित आम्र कानन सत्य नहीं है, अम्बपाली ! -यही कहा तथागत ने झड़ जाएँगी तोते के पंख जैसी पत्तियाँ ठूँठ हो जाएँगी भुजाएँ कोई सम्मोहन नहीं रह जाएगा पक्षियों के लिए इस आम्रकुंज में -यही कहा तथागत ने दर्पण से पूछती है अम्बपाली अपने भास्वर, सुरुचिर मणि जैसे नेत्रों से पूछती है पूछती है भ्रमरवर्णी, स्निग्ध, कुंचित केशों से तूलिका अंकित भौंहों स...
Kaun Ho Tum | Anjana Bakshi 04.08.2024 1:46
कौन हो तुम | अंजना बख्शी तंग गलियों से होकर गुज़रता है कोई आहिस्ता-आहिस्ता फटा लिबास ओढ़े कहता है कोई आहिस्ता-आहिस्ता पैरों में नहीं चप्पल उसके काँटों भरी सेज पर चलता है कोई आहिस्ता-आहिस्ता आँखें हो गई हैं अब उसकी बूढ़ी धँसी हुई आँखों से देखता है कोई आहिस्ता-आहिस्ता एक रोज़ पूछा मैंने उससे, कौन हो तुम ‘तेरे देश का कानून’ बोला आहिस्ता-आहिस्ता !!
Tha Kiska Adhoorapan | Nandkishore Acharya 03.08.2024 1:32
था किसका अधूरापन | नंदकिशोर आचार्य शुरू में शब्द था केवल' -शब्द जो मौन को आकार देता है इसलिए मौन को पूर्ण करता हुआ उसी से बनी है यह सृष्टि पर सृष्टि में पूरा हुआ जो था किसका अधूरापन?
Kabaadkhana | Pratibha Saxena 02.08.2024 1:23
कबाड़खाना | प्रतिभा सक्सेना हर घर में कुछ कुठरियाँ या कोने होते हैं, जहाँ फ़ालतू कबाड़ इकट्ठा रहता है. मेरे मस्तिष्क के कुछ कोनों में भी ऐसा ही अँगड़-खंगड़ भरा है! जब भी कुछ खोजने चलती हूँ तमाम फ़ालतू चीज़ें सामने आ जाती हैं, उन्हीं को बार-बार, देखने परखने में लीन भूल जाती हूँ, कि क्या ढूँढने आई थी!
Baarish Chamatkaar Ki Tarah Hoti Hai | Shahanshah Alam 01.08.2024 1:41
बारिश चमत्कार की तरह होती है | शहंशाह आलम बारिश चमत्कार की तरह होती है उसने मुझे यह बात इस तरह बताई जिस तरह कोई अपने भीतर के किसी चमत्कार के बारे में बताता है उसने बारिश को लेकर जो कुछ कहा सच कहा मैंने भी देखा बारिश को प्रार्थना की मुद्रा में पेड़ के पत्तों पर बरसते पूरी तरह चमत्कारी।
Ye Bhari Aankhen Tumhari | Kunwar Bechain 31.07.2024 1:45
ये भरी आँखें तुम्हारी | कुँअर बेचैन जागती हैं रात भर क्यों ये भरी आँखें तुम्हारी! क्या कहीं दिन में तड़पता स्वप्न देखा सुई जैसी चुभ गई क्या हस्त-रेखा बात क्या थी क्यों डरी आँखें तुम्हारी। जागती हैं रात भर क्यों, ये भरी आँखें तुम्हारी! लालसा थी क्या उजेरा देखने की चाँद के चहुँ ओर घेरा देखने की बन गईं क्यों गागरी आँखें तुम्हारी। जागती है रात भर क्यों, ये भरी आँखें तुम्हारी!
Zindagi Tere Ghere Mein Rehkar | Sheoraj Singh 'Bechain' 30.07.2024 2:01
ज़िन्दगी तेरे घेरे में रहकर - श्योराज सिंह 'बेचैन' ज़िन्दगी तेरे घेरे में रहकर क्या करें इस बसेरे में रहकर इस उजाले में दिखता नहीं कुछ आँख चुंधियाएँ, पलके भीगी सी रहकर अब कहीं कोई राहत नहीं है दर्द कहता है आँखों से बहकर हाँ, हमी ने बढ़ावा दिया है ज़ुल्म सहते हैं ख़ामोश रहकर मुक्ति देखी ग़ुलामी से बदतर क्यों चिढ़ाते हैं आज़ाद कहकर घूँट भर पीने लायक न छोड़ी माँ जो आयी हिमालय से बहकर इस नए ट्रैक की ख़ा...
Khali Jagah | Amrita Pritam 29.07.2024 1:39
ख़ाली जगह | अमृता प्रीतम सिर्फ़ दो रजवाड़े थे – एक ने मुझे और उसे बेदखल किया था और दूसरे को हम दोनों ने त्याग दिया था। नग्न आकाश के नीचे – मैं कितनी ही देर – तन के मेंह में भीगती रही, वह कितनी ही देर तन के मेंह में गलता रहा। फिर बरसों के मोह को एक ज़हर की तरह पीकर उसने काँपते हाथों से मेरा हाथ पकड़ा! चल! क्षणों के सिर पर एक छत डालें वह देख! परे – सामने उधर सच और झूठ के बीच – कुछ ख़ाली जगह है...
Tum Hansi Ho | Agyeya 28.07.2024 2:26
तुम हँसी हो | अज्ञेय तुम हँसी हो - जो न मेरे होंठ पर दीखे, मुझे हर मोड़ पर मिलती रही है। धूप - मुझ पर जो न छाई हो, किंतु जिसकी ओर मेरे रुद्ध जीवन की कुटी की खिड़कियाँ खुलती रही हैं। तुम दया हो जो मुझे विधि ने न दी हो, किंतु मुझको दूसरों से बाँधती है जो कि मेरी ही तरह इंसान हैं। आँख जिनसे न भी मेरी मिले, जिनको किंतु मेरी चेतना पहचानती है। धैर्य हो तुम : जो नहीं प्रतिबिंब मेरे कर्म के धुँध...
Choolhe Ke Paas | Madan Kashyap 27.07.2024 1:21
चूल्हे के पास - मदन कश्यप गीली लकड़ियों को फूँक मारती आँसू और पसीने से लथपथ चूल्हे के पास बैठी है औरत हज़ारों-हज़ार बरसों से धुएँ में डूबी हुई चूल्हे के पास बैठी है औरत जब पहली बार जली थी आग धरती पर तभी से राख की परतों में दबाकर आग ज़िंदा रखे हुई है औरत!
Koi Aadmi Mamuli Nahi Hota | Kunwar Narayan 26.07.2024 1:28
कोर्ई आदमी मामूली नहीं होता | कुंवर नारायण अकसर मेरा सामना हो जाता इस आम सचाई से कि कोई आदमी मामूली नहीं होता कि कोई आदमी ग़ैरमामूली नहीं होता आम तौर पर, आम आदमी ग़ैर होता है इसीलिए हमारे लिए जो ग़ैर नहीं, वह हमारे लिए मामूली भी नहीं होता मामूली न होने की कोशिश दरअसल किसी के प्रति भी ग़ैर न होने की कोशिश है।
Bazaar | Anamika 25.07.2024 1:52
बाज़ार | अनामिका सुख ढूँढ़ा, गैया के पीछे बछड़े जैसा दुःख चला आया! जीवन के साथ बँधी मृत्यु चली आई! दिन के पीछे डोलती आई रात बाल खोले हुई। प्रेम के पीछे चली आई दाँत पीसती कछमछाहट! ‘बाई वन गेट वन फ़्री!' लेकिन अतिरेकों के बीच कहीं कुछ तो था जो जस का तस रह गया लिए लुकाठी हाथ- डफ़ली बजाता हुआ और मगन गाता हुआ- ‘मन लागो मेरो यार फ़क़ीरी में!
Ma | Damodar Khadse 24.07.2024 2:30
माँ - दामोदर खड़से नदी सदियों से बह रही है इसका संगीत पीढ़ियों को लुभा रहा है आकांक्षाओं और आस्थाओं के संगम पर वह धीमी हो जाती है... उफनती है आकांक्षाओं की पुकार से पीढ़ियाँ, बहाती रही हैं इच्छा-दीप और निर्माल्य बिना जाने कि थोड़ी-सी आँच भी नदी को तड़पा सकती है पर नदी ने कभी प्रतिकार नहीं किया... हर फूल, हवन, राख को पहुँचाया है अखंड आराध्य तक कभी नहीं करती वह शिकायत भीड़ भरे किनारों से...
Har Taraf Har Jagah Beshumar Aadmi | Nida Fazli 23.07.2024 1:56
हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी | निदा फ़ाज़ली हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी फिर भी तनहाईयों का शिकार आदमी सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ अपनी ही लाश का ख़ुद मज़ार आदमी हर तरफ़ भागते दौड़ते रास्ते हर तरफ़ आदमी का शिकार आदमी रोज़ जीता हुआ रोज़ मरता हुआ हर नए दिन नया इंतज़ार आदमी ज़िन्दगी का मुक़द्दर सफ़र दर सफ़र आख़िरी साँस तक बेक़रार आदमी
Baadal Raag | Awadhesh Kumar 22.07.2024 2:58
बादल राग | अवधेश कुमार बादल इतने ठोस हों कि सिर पटकने को जी चाहे पर्वत कपास की तरह कोमल हों ताकि उन पर सिर टिका कर सो सकें झरने आँसुओं की तरह धाराप्रवाह हों कि उनके माध्यम से रो सकें धड़कनें इतनी लयबद्ध कि संगीत उनके पीछे-पीछे दौड़ा चला आए रास्ते इतने लंबे कि चलते ही चला जाए पृथ्वी इतनी छोटी कि गेंद बनाकर खेल सकें आकाश इतना विस्तीर्ण कि उड़ते ही चले जाएँ दुख इतने साहसी हों कि सुख में ब...
Samay Aur Bachpan | Hemant Deolekar 21.07.2024 2:26
समय और बचपन - हेमंत देवलेकर उसने मेरी कलाई पर टिक टिक करती घड़ी देखी तो मचल उठी वैसी ही घड़ी पाने के लिए उसका जी बहलाते स्थिर समय की एक खिलौना घड़ी बाँध दी उसकी नन्हीं कलाई पर पर घड़ी का खिलौना मंज़ूर नहीं था उसे टिक टिक बोलती, समय बताती घड़ी असली मचल रही थी उसके हठ में यह सच है कि बच्चे समय का स्वप्न देखते हैं लेकिन मैं उसे समय के हाथों में कैसे सौंप दूँ क्योंकि वह एक कुख्यात बच्चा चोर है तभी उसकी ज़ि...
Barson Ke Baad | Girija Kumar Mathur 20.07.2024 1:33
बरसों के बाद | गिरिजा कुमार माथुर बरसों के बाद कभी हम-तुम यदि मिलें कहीं देखें कुछ परिचित-से लेकिन पहिचाने ना। याद भी न आये नाम रूप, रंग, काम, धाम सोचें यह संभव है पर, मन में माने ना। हो न याद, एक बार आया तूफान ज्वार बंद, मिटे पृष्ठों को पढ़ने की ठाने ना। बातें जो साथ हुई बातों के साथ गई आँखें जो मिली रहीं उनको भी जानें ना।
Prem Mein Main Aur Tum | Anshu Kumar 19.07.2024 1:52
प्रेम में मैं और तुम | अंशू कुमार एक दिन तुम और मैं जब अपनी अपनी धुरी पर लौट रहे होंगे ख़ाली हाथ, बेआवाज़ और बदहवास अपने-अपने हिस्से के सुख और दुःख लिए अब कब मिलेंगे, मिलेंगे भी या नहीं जैसे ख़ौफ़नाक सवाल लिए अनंत ख़ालीपन के साथ तब सबसे अंत में हमारे हिस्से का प्रेम ही बचेगा जो अगर बचा सकता तो बचा लेगा हमें एक बार फिर से मिलने की उम्मीद में...!
Baarish Ya Punyavarsha | Arunabh Saurabh 18.07.2024 1:38
बारिश या पुण्यवर्षा | अरुणाभ सौरभ धरती पर गिरती बूँदें बारिश की छोटी - छोटी ये बूँद-बूँद गोलाइयाँ धरती को चुंबन है आकाश का या धरती से आकाश के मिलने का सबूत या प्यार है मर मिटनेवाला या प्यार की सिफ़ारिश ये बारिश है या हृदय के भीतर की बची हुई करुणा हमारे भीतर की बची हुई मनुष्यता पितरों के पुण्य की पुष्पवर्षा इसी के सहारे जीते हैं हम इसे देखकर जवान होते हैं
Jagat Ke Kuchle Hue Path | Harishankar Parsai 17.07.2024 2:08
जगत के कुचले हुए पथ पर भला कैसे चलूं मैं? | हरिशंकर परसाई किसी के निर्देश पर चलना नहीं स्वीकार मुझको नहीं है पद चिह्न का आधार भी दरकार मुझको ले निराला मार्ग उस पर सींच जल कांटे उगाता और उनको रौंदता हर कदम मैं आगे बढ़ाता शूल से है प्यार मुझको, फूल पर कैसे चलूं मैं? बांध बाती में हृदय की आग चुप जलता रहे जो और तम से हारकर चुपचाप सिर धुनता रहे जो जगत को उस दीप का सीमित निबल जीवन सुहाता यह धधकता रूप मे...
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