Nayi Dhara Radio
Pratidin Ek Kavita
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
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Episodes
Paas Aao Mere | Narendra Kumar 02.05.2024 1:55
पास आओ मेरे | नरेंद्र कुमार पास आओ मेरे मुझे समझाओ ज़रा ये जो रोम-रोम में तुम्हारे नफ़रत रमी है तुममें ऐसी क्या कमी है खुद से पूछो ज़रा खुद को बताओ ज़रा व्हाट्सएप की जानकारी टीवी की डिबेट सारी साइड में रखो इसे इंसानियत की बात करें इसमें ऐसा क्या डर है मरहम होती है क्या ज़ख्म से पूछो ज़रा मेरा एक काम कर दो मुझे कहीं से ढूँढ कर वो प्रार्थना दो जिसमें हिंसा, द्वेष, और कलेश हो
Jeevan Nahi Mara Karta Hai | Gopaldas Neeraj 01.05.2024 2:52
जीवन नहीं मारा करता है | गोपालदस नीरज छिप छिप अंश्रु बहाने वालों, मोती व्यर्थ लुटाने वालों कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है। सपना क्या है, नयन सेज पर सोया हुया आँख का पानी और टूटना है उसको ज्यों जागे कच्ची नींद जवानी गीली उमर बनाने वालों, डूबे बिना नहाने वालों कुछ पानी के बह जाने से सावन नहीं मरा करता है। माला बिखर गई तो क्या है, खुद ही हल हो गयी समस्या आंसू गर नीलाम हुये तो समझो...
Pitaon Ke Baar Mein Kuch Chooti Hui Panktiyan | Kumar Ambuj 30.04.2024 2:38
पिताओं के बारे में कुछ छूटी हुई पंक्तियाँ | कुमार अम्बुज एक दिन लगभग सभी पुरुष पिता हो जाते हैं जो नहीं होते वे भी उम्रदराज़ होकर बच्चों से, युवकों से इस तरह पेश आने लगते हैं जैसे वे ही उनके पिता हों पिताओं की सख़्त आवाज़ घर से बाहर कई जगहों पर कई लोगों के सामने गिड़गिड़ाती पाई जाती है वे ज़माने भर से क्रोध में एक अधूरा वाक्य बुदबुदाते हैं— 'यदि बाल-बच्चे न होते तो मैं तुम्हारी...' कभी-कभी...
Salamat Rahein | Deepika Ghildiyal 29.04.2024 1:58
सलामत रहें | दीपिका घिल्डियाल सलामत रहें, सबके इंद्रधनुष, जिनके छोर चाहे कभी हाथ ना आएं, फिर भी सबके खाने के बाद, बची रहे एक रोटी, ताकि भूखी ना लौटे, दरवाज़े तक आई बिल्ली और चिड़िया सलामत रहे, माँ की आंखों की रौशनी, क्योंकि माँ ही देख पाती है, सूखे हुए आंसू और बारिश में गीले बाल सलामत रहें, बेटियों के हाथों कढ़े मेज़पोश और बहुओं के हल्दी भरे हाथों की थाप, क्योंकि उनके होने के निशान, छोटे ही सही,...
Khushamadeed | Gagan Gill 28.04.2024 1:21
ख़ुशआमदीद | गगन गिल दोस्त के इंतज़ार में उसने सारा शहर घूमा शहर का सबसे सुंदर फूल देखा शहर की सबसे शांत सड़क सोची एक क़िताब को छुआ धीरे-धीरे उसे देने के लिए कोई भी चीज़ उसे ख़ुशआमदीद कहने के लिए काफ़ी न थी !
Tumhari Filon Mein Gaon Ka Mausam Gulabi Hai | Adam Gondvi 27.04.2024 1:58
तुम्हारी फ़ाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है | अदम गोंडवी तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है उधर जम्हूरियत का ढोल पीटे जा रहे हैं वो इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है ,नवाबी है लगी है होड़ - सी देखो अमीरी औ गरीबी में ये गांधीवाद के ढाँचे की बुनियादी खराबी है तुम्हारी मेज़ चांदी की तुम्हारे जाम सोने के यहाँ जुम्मन के घर में आज भी फूटी रक़ाबी है
Ab Kabhi Milna Nahi Hoga Aisa Tha | Vinod Kumar Shukla 26.04.2024 1:46
अब कभी मिलना नहीं होगा ऎसा था | विनोद कुमार शुक्ल अब कभी मिलना नहीं होगा ऎसा था और हम मिल गए दो बार ऎसा हुआ पहले पन्द्रह बरस बाद मिले फिर उसके आठ बरस बाद जीवन इसी तरह का जैसे स्थगित मृत्यु है जो उसी तरह बिछुड़ा देती है, जैसे मृत्यु पाँच बरस बाद तीसरी बार यह हुआ अबकी पड़ोस में वह रहने आई उसे तब न मेरा पता था न मुझे उसका। थोड़ा-सा शेष जीवन दोनों का पड़ोस में साथ रहने को बचा था पहले हम एक ही घर में...
Ummeed Ki Chithi | Neelam Bhatt 25.04.2024 1:52
उम्मीद की चिट्ठी | नीलम भट्ट उदासी भरे हताश दिनों में कहीं दूर खुशियों भरे देस से मेरी दहलीज़ तक पहुंचे कोई चिट्ठी उम्मीद की कलम से लिखी स्नेह भरे दिलासे से सराबोर... मौत की ख़बरों के बीच बीमारी की दहशत से डरे समय में जिंदगी की जीत का यक़ीन दिलाती बताती कि शक भरे माहौल में अपनेपन का भरोसा ज़िंदा है अभी!
Cigarette Peeti Hui Aurat | Sarveshwar Dayal Saxena 24.04.2024 1:54
सिगरेट पीती हुई औरत | सर्वेश्वर दयाल सक्सेना पहली बार सिगरेट पीती हुई औरत मुझे अच्छी लगी। क्योंकि वह प्यार की बातें नहीं कर रही थी। —चारों तरफ़ फैलता धुआँ मेरे भीतर धधकती आग के बुझने का गवाह नहीं था। उसकी आँखों में एक अदालत थी : एक काली चमक जैसे कोई वकील उसके भीतर जिरह कर रहा हो और उसे सवालों का अनुमान ही नहीं उनके जवाब भी मालूम हों। वस्तुतः वह नहा कर आई थी किसी समुद्र में, और मेरे...
Jiske Sammohan Mein Pagal Dharti Hai Aakash Bhi Hai | Adam Gondvi 23.04.2024 2:13
जिसके सम्मोहन में पागल धरती है आकाश भी है | अदम गोंडवी | आरती जैन जिसके सम्मोहन में पागल धरती है, आकाश भी है एक पहेली-सी दुनिया ये गल्प भी है, इतिहास भी है चिंतन के सोपान पे चढ़कर चाँद-सितारे छू आये लेकिन मन की गहराई में माटी की बू-बास भी है मानवमन के द्वन्द्व को आख़िर किस साँचे में ढालोगे ‘महारास’ की पृष्ठभूमि में ओशो का संन्यास भी है इन्द्रधनुष के पुल से गुज़रकर इस बस्ती तक आए हैं जहाँ भूख की धू...
Restaurant Mein Intezar | Rajesh Joshi 22.04.2024 2:21
रेस्त्राँ में इंतज़ार | राजेश जोशी वो जिससे मिलने आई है अभी तक नहीं आया है वो बार बार अपना पर्स खोलती है और बंद करती है घड़ी देखती है और देखती है कि घड़ी चल रही है या नहीं एक अदृश्य दीवार उठ रही है उसके आसपास ऊब और बेचैनी के इस अदृश्य घेरे में वह अकेली है एकदम अकेली वेटर इस दीवार के बाहर खड़ा है वेटर उसके सामने पहले ही एक गिलास पानी रख चुका है धीरे धीरे दो घूँट पानी पीती है और ठंडे गिलास...
Patang | Arti Jain 21.04.2024 2:20
पतंग | आरती जैन हम कमरों की कैद से छूट छत पर पनाह लेते हैं जहाँ आज आसमां पर दो नन्हे धब्बे एक दूसरे संग नाच रहे हैं "पतंग? यह पतंग का मौसम तो नहीं" नीचे एम्बुलैंस चीरती हैं सड़कों को लाल आँखें लिए, विलाप करती अपनी कर्कश थकी आवाज़ में दामन फैलाये निरुत्तर सवाल पूछती ट्रेन में से झांकते हैं बुतों के चेहरे जिनके होठ नहीं पर आंखें बहुत सी हैं जो एकटक घूरती खोज रही हैं कि दिख जाए कुछ खौफ और हिम्मत के धुं...
Yatra | Naresh Saxena 20.04.2024 2:17
यात्रा | नरेश सक्सेना नदी के स्रोत पर मछलियाँ नहीं होतीं शंख–सीपी मूँगा-मोती कुछ नहीं होता नदी के स्रोत पर गंध तक नहीं होती सिर्फ़ होती है एक ताकत खींचती हुई नीचे जो शिलाओं पर छलाँगें लगाने पर विवश करती है सब कुछ देती है यात्रा लेकिन जो देते हैं धूप-दीप और जय-जयकार देते हैं वही मैल और कालिख से भर देते हैं धुआँ-धुआँ होती है नदी बादल-बादल होती है नदी लौटती है फिर से उन्हीं निर्मल ऊँचाइयों...
Prem Ke Liye Faansi | Anamika 19.04.2024 2:32
प्रेम के लिए फाँसी | अनामिका मीरा रानी तुम तो फिर भी ख़ुशक़िस्मत थीं, तुम्हें ज़हर का प्याला जिसने भी भेजा, वह भाई तुम्हारा नहीं था भाई भी भेज रहे हैं इन दिनों ज़हर के प्याले! कान्हा जी ज़हर से बचा भी लें, क़हर से बचाएँगे कैसे! दिल टूटने की दवा मियाँ लुक़मान अली के पास भी तो नहीं होती! भाई ने जो भेजा होता प्याला ज़हर का, तुम भी मीराबाई डंके की चोट पर हँसकर कैसे ज़ाहिर करतीं कि साथ तुम्हारे हुआ क्या! ‘राण...
Bhadka Rahe Hain Aag | Sahir Ludhianvi 18.04.2024 1:47
भड़का रहे हैं आग | साहिर लुधियानवी भड़का रहे हैं आग लब-ए-नग़्मागर से हम ख़ामोश क्या रहेंगे ज़माने के डर से हम। कुछ और बढ़ गए जो अँधेरे तो क्या हुआ मायूस तो नहीं हैं तुलू-ए-सहर से हम। ले दे के अपने पास फ़क़त इक नज़र तो है क्यूँ देखें ज़िंदगी को किसी की नज़र से हम। माना कि इस ज़मीं को न गुलज़ार कर सके कुछ ख़ार कम तो कर गए गुज़रे जिधर से हम।
Koi Bas Nahi Jaata | Nandkishore Acharya 17.04.2024 1:54
कोई बस नहीं जाता | नंदकिशोर आचार्य कोई बस नहीं जाता खंडहरों में लोग देखने आते हैं बस । जला कर अलाव आसपास उग आये घास-फूस और बिखरी सूखी टहनियों का एक रात गुज़ारी भी किसी ने यहाँ सुबह दम छोड़ जाते हुए केवल राख । खंडहर फिर भी उस का कृतज्ञ है बसेरा किया जिस ने उसे – रात भर की खातिर ही सही। उसे भला यह इल्म भी कब थाः गुज़रती है जो खंडहर पर फिर से खंडहर हो जाने में !
Agar Tum Meri Jagah Hotey | Nirmala Putul 16.04.2024 3:20
अगर तुम मेरी जगह होते | निर्मला पुतुल ज़रा सोचो, कि तुम मेरी जगह होते और मैं तुम्हारी तो, कैसा लगता तुम्हें? कैसा लगता अगर उस सुदूर पहाड़ की तलहटी में होता तुम्हारा गाँव और रह रहे होते तुम घास-फूस की झोपड़ियों में गाय, बैल, बकरियों और मुर्गियों के साथ और बुझने को आतुर ढिबरी की रोशनी में देखना पड़ता भूख से बिलबिलाते बच्चों का चेहरा तो, कैसा लगता तुम्हें? कैसा लगता? अगर तुम्हारी बेटियों को लाना पड़...
Mann Bahut Sochta Hai | Agyeya 15.04.2024 1:46
मन बहुत सोचता है | अज्ञेय मन बहुत सोचता है कि उदास न हो पर उदासी के बिना रहा कैसे जाए? शहर के दूर के तनाव-दबाव कोई सह भी ले, पर यह अपने ही रचे एकांत का दबाव सहा कैसे जाए! नील आकाश, तैरते-से मेघ के टुकड़े, खुली घास में दौड़ती मेघ-छायाएँ, पहाड़ी नदी : पारदर्श पानी, धूप-धुले तल के रंगारंग पत्थर, सब देख बहुत गहरे कहीं जो उठे, वह कहूँ भी तो सुनने को कोई पास न हो— इसी पर जो जी में उठे वह कहा क...
Bhutha Baag | Kedarnath Singh 14.04.2024 2:59
भुतहा बाग़ | केदारनाथ सिंह उधर जाते हुए बचपन में डर लगता था राही अक्सर बदल देते थे रास्ता और उत्तर के बजाय निकल जाते थे दक्खिन से अबकी गया तो देखा भुतहा बाग़ में खेल रहे थे बच्चे वहाँ बन गए थे कच्चे कुछ पक्के मकान दिखते थे दूर से कुछ बिजली के खंभे भी लोगों ने बताया जिस दिन गाड़ा गया पहला खम्भा एक आवाज़-सी सुनाई पड़ी थी मिट्टी के नीचे से पर उसके बाद कभी कुछ नहीं सुनाई पड़ा। उनका अनुमान था कुछ भू...
Aparibhashit | Ajay Jugran 13.04.2024 2:36
अपरिभाषित | अजेय जुगरान बारह - तेरह के होते - होते कुछ बच्चे खो जाते हैं अपनी परिभाषा खोजते - खोजते किसी का मन अपने तन से नहीं मिलता किसी का तन बचपन के अपने दोस्तों से। ये किशोर कट से जाते हैं आसपास सबसे और अपनी परिभाषा खोजने की ऊहापोह में अपने तन पर लिखने लगते हैं सुई काँटों टूटे शीशों से एक घनघोर तनाव - अपवाद की भाषा जो आस्तीनों - मफ़लरों के नीचे से यदाकदा झलक कभी - कहीं उनकी माँओं को आ ही जाती...
Haath Thaamna | Tanmay Pathak 12.04.2024 2:20
हाथ थामना | तन्मय पाठक तुम समंदर से बेशक़ सीखना गिरना उठना परवाह ना करना पर तालाब से भी सीखते रहना कुछ पहर ठहर कर रहना तुम नदियों से बेशक़ सीखना अपनी राह पकड़ कर चलना संगम से भी पर सीखते रहना बाँहें खोल कर मिलना घुलना तुम याद रखना कि डूबना भी उतना ही ज़रूरी है जितना कि तैरना तुम डूबने उतरना दरिया में बचपने पर भरोसा करना बच पाने की उम्मीद रखना ये बताने के लिए बचना कि अंतिम क्षणों में कुछ था तो सिर्फ़...
Hitler Ki Chitrakala | Rajesh Joshi 11.04.2024 2:13
हिटलर की चित्रकला | राजेश जोशी यह उम्मीस सौ आठ में उन दिनों की बात है जब हिटलर ने पेन्सिल से एक शांत गाँव का चित्र बनाया था यह सन् उन्नीस सौ आठ में उन दिनों की बात है जब दूसरी बार वियना की कला दीर्धा ने चित्रकला के लिए अयोग्य ठहरा दिया था हिटलर को उस छोटे से चित्र पर हिटलर के हस्ताक्षर थे इसलिए इंगलैण्ड के एक व्यवसायी ने जब नीलाम किया उस चित्र को जिसका आकार सिर्फ़ एक पोस्टकार्ड के बराबर था और जो...
Nadi Kabhi Nahi Sookhti | Damodar Khadse 10.04.2024 3:31
नदी कभी नहीं सूखती | दामोदर खड़से पौ फटने से पहले सारी बस्ती ही गागर भर-भरकर अपनी प्यास बुझाती रही फिर भी नदी कुँवारी ही रही क्योंकि, नदी कभी नहीं सूखती नदी, इस बस्ती की पूर्वज है! पीढ़ियों के पुरखे इसी नदी में डुबकियाँ लगाकर अपना यौवन जगाते रहे सूर्योदय से पहले सतह पर उभरे कोहरे में अंजुरी भर अनिष्ट अँधेरा नदी में बहाते रहे हर शाम बस्ती की स्त्रियाँ अपनी मन्नतों के दीये इसी नदी में सिराती रहीं न...
Din Dooba | Ramdarash Mishra 09.04.2024 1:50
दिन डूबा | रामदरश मिश्रा दिन डूबा अब घर जाएँगे कैसा आया समय कि साँझे होने लगे बन्द दरवाज़े देर हुई तो घर वाले भी हमें देखकर डर जाएँगे आँखें आँखों से छिपती हैं नज़रों में छुरियाँ दिपती हैं हँसी देख कर हँसी सहमती क्या सब गीत बिखर जाएँगे? गली-गली औ' कूचे-कूचे भटक रहा पर राह ने पूछे काँप गया वह, किसने पूछा- “सुनिए आप किधर जाएँगे?"
Thithurtey Lamp Post | Adnan Kafeel Darvesh 08.04.2024 2:30
ठिठुरते लैंप पोस्ट | अदनान कफ़ील दरवेश वे चाहते तो सीधे भी खड़े रह सकते थे लेकिन आदमियों की बस्ती में रहते हुए उन्होंने सीख ली थी अतिशय विनम्रता और झुक गए थे सड़कों पर आदमियों के पास, उन्हें देखने के अलग-अलग नज़रिए थे : मसलन, किसी को वे लगते थे बिल्कुल संत सरीखे दृढ़ और एक टाँग पर योग-मुद्रा में खड़े किसी को वे शहंशाह के इस्तक़बाल में क़तारबंद खड़े सिपाहियों-से लगते थे किसी को विशाल पक्षियों से ...
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