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Pratidin Ek Kavita

Arts HI ↓ 1195 episodes

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

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Jul 11, 2026

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Episodes

Swapn Mein Pita | Ghulam Mohammad Sheikh 12.05.2025

स्वप्न में पिता | ग़ुलाम मोहम्मद शेख़ बापू, कल तुम फिर से दिखे घर से हज़ारों योजन दूर यहाँ बाल्टिक के किनारे मैं लेटा हूँ यहीं, खाट के पास आकर खड़े आप इस अंजान भूमि पर भाइयों में जब सुलह करवाई तब पहना था वही थिगलीदार, मुसा हुआ कोट, दादा गए तब भी शायद आप इसी तरह खड़े होंगे अकेले दादा का झुर्रीदार हाथ पकड़। आप काठियावाड़ छोड़कर कब से यहाँ क्रीमिया के शरणार्थियों के बीच आ बसे? भोगावो छोड़, भादर लाँघ...

Us Din | Rupam Mishra 11.05.2025

उस दिन | रूपम मिश्र  उस दिन कितने लोगों से मिली  कितनी बातें , कितनी बहसें कीं कितना कहा  ,कितना सुना सब ज़रूरी भी लगा था  पर याद आते रहे थे बस वो पल जितनी देर के लिए तुमसे मिली  विदा की बेला में हथेली पे धरे गये ओठ देह में लहर की तरह उठते रहे  कदम बस तुम्हारी तरफ उठना चाहते थे और मैं उन्हें धकेलती उस दिन जाने कहाँ -कहाँ भटकती रही  वे सारी जगहें मेरी नहीं थीं  मेरी जगह मुझसे छूट गयी थी तो बचे हुए र...

Manushya | Vimal Chandra Pandey 10.05.2025

मनुष्य - विमल चंद्र पाण्डेय  मुझे किसी की मृत्यु की कामना से बचना है चाहे वो कोई भी हो चाहे मैं कितने भी क्रोध में होऊँ और समय कितना भी बुरा हो सामने वाला मेरा कॉलर पकड़ कर गालियाँ देता हुआ क्यों न कर रहा हो मेरी मृत्यु का एलान मुझे उसकी मृत्यु की कामना से बचना है यह समय मौतों के लिए मुफ़ीद है मनुष्यों की अकाल मौत का कोलाज़ रचता हुआ फिर भी मैं मरते हुए भी अपनी मनुष्यता बचाए रखना चाहूँगा ये मेरा जवाब...

Apne Prem Ke Udveg Mein | Agyeya 09.05.2025

अपने प्रेम के उद्वेग में | अज्ञेय  अपने प्रेम के उद्वेग में मैं जो कुछ भी तुमसे कहता हूँ, वह सब पहले कहा जा चुका है। तुम्हारे प्रति मैं जो कुछ भी प्रणय-व्यवहार करता हूँ, वह सब भी पहले हो चुका है। तुम्हारे और मेरे बीच में जो कुछ भी घटित होता है उससे एक तीक्ष्ण वेदना-भरी अनुभूति मात्र होती है—कि यह सब पुराना है, बीत चुका है, कि यह अभिनय तुम्हारे ही जीवन में मुझसे अन्य किसी पात्र के साथ हो चुका है! य...

Tum | Adnan Kafeel Darwesh 08.05.2025

तुम | अदनान कफ़ील दरवेश जब जुगनुओं से भर जाती थी दुआरे रखी खाट और अम्मा की सबसे लंबी कहानी भी ख़त्म हो जाती थी उस वक़्त मैं आकाश की तरफ़ देखता और मुझे वह ठीक जुगनुओं से भरी खाट लगता कितना सुंदर था बचपन जो झाड़ियों में चू कर खो गया मैं धीरे-धीरे बड़ा हुआ और जवान भी और तुम मुझे ऐसे मिले जैसे बचपन की खोई गेंद मैंने तुम्हें ध्यान से देखा मुझे अम्मा की याद आई और लंबी कहानियों की और जुगनुओं से भरी खाट की और...

Prem Ke Prasthan | Anupam Singh 07.05.2025

प्रेम के प्रस्थान | अनुपम सिंह  सुनो, एक दिन बन्द कमरे से निकलकर हम दोनों पहाड़ों की ओर चलेंगे या फिर नदियों की ओर नदी के किनारे, जहाँ सरपतों के सफ़ेद फूल खिले हैं। या पहाड़ पर जहाँ सफ़ेद बर्फ़ उज्ज्वल हँसी-सी जमी है दरारों में और शिखरों पर काढेंगे एक दुसरे की पीठ पर रात का गाढ़ा फूल इस बार मैं नहीं तुम मेरे बाजुओं पर रखना अपना सिर मैं तुम्हें दूँगी उत्तेजित करने वाला चुम्बन धीरे-धीरे पहाड़ की बर्...

Dhoop Bhi To Barish Hai | Shahanshah Alam 06.05.2025

धूप भी तो बारिश है | शहंशाह आलम  धूप भी तो बारिश है बारिश बहती है देह पर धूप उतरती है नेह पर मेरे संगीतज्ञ ने मुझे बताया धूप है तो बारिश है बारिश है तो धूप है मैंने जिससे प्रेम किया उसको बताया तुम हो तो ताप और जल दोनों है मेरे अंदर।

Jo Ulajhkar Reh Gayi Hai Filon Ke Jaal Mein | Adam Gondvi 05.05.2025

जो उलझकर रह गई है फ़ाइलों के जाल में | अदम गोंडवी जो उलझकर रह गई है फ़ाइलों के जाल में गाँव तक वह रौशनी आएगी कितने साल में बूढ़ा बरगद साक्षी है किस तरह से खो गई रमसुधी की झोंपड़ी सरपंच की चौपाल में खेत जो सीलिंग के थे सब चक में शामिल हो गए हमको पट्टे की सनद मिलती भी है तो ताल में जिसकी क़ीमत कुछ न हो इस भीड़ के माहौल में ऐसा सिक्का ढालिए मत जिस्म की टकसाल में

Ladai Ke Samachar | Naveen Sagar 04.05.2025

लड़ाई के समाचार | नवीन सागर लड़ाई के समाचार दूसरे सारे समाचारों को दबा देते हैं छा जाते हैं शांति के प्रयासों की प्रशंसा करते हुए हम अपनी उत्तेजना में मानो चाहते हैं युद्ध जारी रहे। फिर अटकलों और सरगर्मियों का दौर जिसमें फिर युद्ध छिड़ने की गुंजाइश दिखती है। युद्ध रोमांचित करता है! ध्वस्त आबादियों के चित्र देखने का ढंग बाद में शर्मिंदा करता है अकेले में। कैसे हम बचे रहते हैं और हमारा विश्वास बचा र...

Khana Banati Streeyan | Kumar Ambuj 03.05.2025

खाना बनाती स्त्रियाँ | कुमार अम्बुज जब वे बुलबुल थीं उन्होंने खाना बनाया फिर हिरणी होकर फिर फूलों की डाली होकर जब नन्ही दूब भी झूम रही थी हवाओं के साथ जब सब तरफ़ फैली हुई थी कुनकुनी धूप उन्होंने अपने सपनों को गूँधा हृदयाकाश के तारे तोड़कर डाले भीतर की कलियों का रस मिलाया लेकिन आख़िर में उन्हें सुनाई दी थाली फेंकने की आवाज़ आपने उन्हें सुंदर कहा तो उन्होंने खाना बनाया और डायन कहा तब भी उन्होंने बच्...

Ek Bahut Hi Tanmay Chuppi | Bhavani Prasad Mishra 02.05.2025

एक बहुत ही तन्मय चुप्पी | भवानीप्रसाद मिश्र एक बहुत ही तन्मय चुप्पी ऐसी जो माँ की छाती में लगाकर मुँह चूसती रहती है दूध मुझसे चिपककर पड़ी है और लगता है मुझे यह मेरे जीवन की लगभग सबसे निविड़ ऐसी घड़ी है जब मैं दे पा रहा हूँ स्वाभाविक और सुख के साथ अपने को किसी अनोखे ऐसे सपने को जो अभी-अभी पैदा हुआ है और जो पी रहा है मुझे अपने साथ-साथ जो जी रहा है मुझे!

Dena | Naveen Sagar 01.05.2025

देना | नवीन सागर जिसने मेरा घर जलाया उसे इतना बड़ा घर देना कि बाहर निकलने को चले पर निकल न पाए जिसने मुझे मारा उसे सब देना मृत्यु न देना जिसने मेरी रोटी छीनी उसे रोटियों के समुद्र में फेंकना और तूफ़ान उठाना जिनसे मैं नहीं मिला उनसे मिलवाना मुझे इतनी दूर छोड़ आना कि बराबर संसार में आता रहूँ अगली बार इतना प्रेम देना कि कह सकूँ प्रेम करता हूँ और वह मेरे सामने हो।

Ek Baar Kaho Tum Meri Ho | Ibn e Insha 30.04.2025

इक बार कहो तुम मेरी हो |  इब्न-ए-इंशा हम घूम चुके बस्ती बन में इक आस की फाँस लिए मन में कोई साजन हो कोई प्यारा हो कोई दीपक हो, कोई तारा हो जब जीवन रात अँधेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो जब सावन बादल छाए हों जब फागुन फूल खिलाए हों जब चंदा रूप लुटाता हो जब सूरज धूप नहाता हो या शाम ने बस्ती घेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो हाँ दिल का दामन फैला है क्यूँ गोरी का दिल मैला है हम कब तक पीत के धोके में तुम कब...

Mere Ekant Ka Pravesh Dwar | Nirmala Putul 29.04.2025

मेरे एकांत का प्रवेश-द्वार | निर्मला पुतुल यह कविता नहीं मेरे एकांत का प्रवेश-द्वार है यहीं आकर सुस्ताती हूँ मैं टिकाती हूँ यहीं अपना सिर ज़िंदगी की भाग-दौड़ से थक-हारकर जब लौटती हूँ यहाँ आहिस्ता से खुलता है इसके भीतर एक द्वार जिसमें धीरे से प्रवेश करती मैं तलाशती हूँ अपना निजी एकांत यहीं मैं वह होती हूँ जिसे होने के लिए मुझे कोई प्रयास नहीं करना पड़ता पूरी दुनिया से छिटककर अपनी नाभि से जुड़ती हूँ...

Lafzon Ka Pul | Nida Fazli 28.04.2025

लफ़्ज़ों का पुल | निदा फ़ाज़ली मस्जिद का गुम्बद सूना है मंदिर की घंटी ख़ामोश जुज़दानों में लिपटे आदर्शों को दीमक कब की चाट चुकी है रंग गुलाबी नीले पीले कहीं नहीं हैं तुम उस जानिब मैं इस जानिब बीच में मीलों गहरा ग़ार लफ़्ज़ों का पुल टूट चुका है तुम भी तन्हा मैं भी तन्हा

Ramayana Mein Mahabharat | Avtar Engill 27.04.2025

रामायण में महाभारत | अवतार एनगिल रविवार की सुबह उस औरत ने बड़ी मुश्किल से पति और बच्चों को जगाया किसी को ब्रश किसी को बनियान किसी को तौलिया थमाया चूल्हे के सामने खड़ी जैसे चौखटे में जड़ी बड़े के लिए लिए परांठे छोटों को ऑमलेट ’उनके’ लिए कम नमक वाला सासु के लिए नरम ससुर के लिए गरम अलग अलग अलग नाश्ते बना रही है और उसकी सासु माँ चौपाईयाँ गा रही है टी-वी. पर रामायण आ रही है उसके कॉमरेड पति अहिल्या के म...

Tumhare Bagair Ladna | Vihaag Vaibhav 26.04.2025

तुम्हारे बग़ैर लड़ना  | विभाग वैभव  तुम्हारे जाने के बाद मैं राह के पत्थर जितना अकेला रहा फिर एक दिन सिसकियों को एक खाली कैसेट में डालकर किताबों के बीच छिपा दिया बहुत से लोग थे जिन्हें फूलों की ज़रुरत थी मैंने माली का काम किया किसी कमज़ोर के खेत का पानी किसी ने लाठी के दम पर काट लिया दोस्तों को जुटाया  हड्डियों को चूम लेने वाली सर्दियों की रातों में घुटने तक पानी मे खड़ा रहा न्याय के लिए विवेक भर अड़ा...

Sitaron Se Ulajhta Ja Raha Hun | Firaq Gorakhpuri 25.04.2025

सितारों से उलझता जा रहा हूँ | फ़िराक़ गोरखपुरी सितारों से उलझता जा रहा हूँ शब-ए-फ़ुरक़त बहुत घबरा रहा हूँ यक़ीं ये है हक़ीक़त खुल रही है गुमाँ ये है कि धोखे खा रहा हूँ इन्ही में राज़ हैं गुल-बारियों के मै जो चिंगारियाँ बरसा रहा हूँ  तेरे पहलू में क्यों होता है महसूस कि तुझसे दूर होता जा रहा हूँ जो उलझी थी कभी आदम के हाथों वो गुत्थी आज तक सुलझा रहा हूँ मोहब्बत अब मोहब्बत हो चली है तुझे कुछ भूलता-सा...

Aapke Liye | Ajay Durgyey 24.04.2025

आपके लिए | अजय दुर्ज्ञेय आप यहां से जाइये! आप जब मेरी कविताएँ सुनेंगे तो ऐसा लगेगा कि जैसे कोई दशरथ-मांझी पहाड़ पर बजा रहा हो हथौडे मैं जब बोलूंगा तो आपको लगेगा कि मैं आपके कपड़े उतार रहा हूँ और न केवल उतार रहा हूँ बल्कि उन्हीं कपड़ों से अपनी विजय पताका बना रहा हूँ मैं जब अपने हक़ की कविता पढ़ंगा तो आपको लगेगा कि छीन रहा हूँ आपकी गद्दी, छीन रहा हूँ आपका सिंहासन और इसी भय से गलने लगेगीं आपकी हथेलिय...

Jab Teri Samundar Aankhon Mein | Faiz Ahmed Faiz 23.04.2025

जब तेरी समुंदर आँखों में | फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ये धूप किनारा शाम ढले मिलते हैं दोनों वक़्त जहाँ जो रात न दिन जो आज न कल पल-भर को अमर पल भर में धुआँ इस धूप किनारे पल-दो-पल होंटों की लपक बाँहों की छनक ये मेल हमारा झूठ न सच क्यूँ रार करो क्यूँ दोश धरो किस कारण झूठी बात करो जब तेरी समुंदर आँखों में इस शाम का सूरज डूबेगा सुख सोएँगे घर दर वाले और राही अपनी रह लेगा

Kabhi Kabhi Jeevan Mein | Laxmishankar Vajpeyi 22.04.2025

कभी कभी जीवन में ऐसे भी क्षण आये | लक्ष्मीशंकर वाजपेयी कभी कभी जीवन में ऐसे भी कुछ क्षण आये कहना चाहा पर होठों से बोल नहीं फूटे। महज़ औपचारिकता अक्सर होठों तक आयी रहा अनकहा जो उसको, बस नज़र समझ पायी कभी कभी तो मौन ढल गया जैसे शब्दों में और शब्द कोशों वाले सब शब्द लगे झूठे कहना चाहा पर होठों से शब्द नही फूटे। जिनसे न था खून का नाता, रिश्तों का बंधन कितना सारा प्यार दे गए कितना अपनापन कभी कभी उन रिश...

Jagah | Vishwanath Prasad Tiwari 21.04.2025

जगह | विश्वनाथ प्रसाद तिवारी  खड़े-खड़े मेरे पाँव दुखने लगे थे थोड़ी-सी जगह चाहता था बैठने के लिए कलि को मिल गया था राजा परीक्षेत का मुकुट मैं बिलबिलाता रहा कोने-अँतरे जगह, हाय जगह सभी बेदखल थे अपनी अपनी जगह से रेल में मुसाफिरों के लिए गुरुकुलों में वटुकों के लिए शहर में पशुओं आकाश में पक्षियों सागर में जलचरों पृथ्वी पर वनस्पतियों के लिए नहीं थी जगह सुई की नोक भर जगह के लिए हुआ था महासमर हासिल हुआ...

Gar Humne Dil Sanam Ko Diya | Nazeer Akbarabadi 20.04.2025

गर हम ने दिल सनम को दिया | नज़ीर अकबराबादी गर हम ने दिल सनम को दिया फिर किसी को क्या इस्लाम छोड़ कुफ़्र लिया फिर किसी को क्या क्या जाने किस के ग़म में हैं आँखें हमारी लाल ऐ हम ने गो नशा भी पिया फिर किसी को क्या आफी किया है अपने गिरेबाँ को हम ने चाक आफी सिया सिया न सिया फिर किसी को क्या उस बेवफ़ा ने हम को अगर अपने इश्क़ में रुस्वा किया ख़राब किया फिर किसी को क्या दुनिया में आ के हम से बुरा या भला 'न...

Jis Ka Koi Intezaar Na Kar Raha Ho | Afzal Ahmed Sayyid 19.04.2025

जिस का कोई इंतिज़ार न कर रहा हो/ अफ़ज़ाल अहमद सय्यद जिस का कोई इंतिज़ार न कर रहा हो उसे नहीं जाना चाहिए वापस आख़िरी दरवाज़ा बंद होने से पहले जिस का कोई इंतिज़ार न कर रहा हो उसे नहीं फिरना चाहिए बे-क़रार एक ख़ूबसूरत राहदारी में जब तक वो वीरान न हो जाए जिस का कोई इंतिज़ार न कर रहा हो उसे नहीं जुदा करना चाहिए ख़ून-आलूद पाँव से एक पूरा सफ़र जिस का कोई इंतिज़ार न कर रहा हो उसे नहीं मालूम करनी चाहिए फूलों...

Ek Lamhe Se Doosre Lamhe Tak | Shaharyar 18.04.2025

एक लम्हे से दूसरे लम्हे तक | शहरयार एक आहट अभी दरवाज़े पे लहराई थी एक सरगोशी अभी कानों से टकराई थी एक ख़ुश्बू ने अभी जिस्म को सहलाया था एक साया अभी कमरे में मिरे आया था और फिर नींद की दीवार के गिरने की सदा और फिर चारों तरफ़ तेज़ हवा!!

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