Nayi Dhara Radio
Pratidin Ek Kavita
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
Where to listen?
Podcasts in the app Replaio Radio Coming soonPodcasts are coming to the app soon. Install now and be the first to see a whole new take on podcasts
Episodes
Chidimaar Ne Chidiya Maari | Kedarnath Aggarwal 17.04.2025 1:48
चिड़ीमार ने चिड़िया मारी | केदारनाथ अग्रवाल हे मेरी तुम! चिड़ीमार ने चिड़िया मारी; नन्नी-मुन्नी तड़प गई प्यारी बेचारी। हे मेरी तुम! सहम गई पौधों की सेना, पाहन-पाथर हुए उदास; हवा हाय कर ठिठकी ठहरी; पीली पड़ी धूप की देही। हे मेरी तुम! अब भी वह चिड़िया ज़िंदा है मेरे भीतर, नीड़ बनाये मेरे दिल में, सुबुक-सुबुक कर चूँ-चूँ करती चिड़ीमार से डरी-डरी-सी।
Gharaunde | Avtar Engel 16.04.2025 1:23
घरौंदे | अवतार एनगिल सागर किनारे खेलते दो बच्चों ने मिलकर घरौंदे बनाए देखते-देखते लहरों के थपेड़े आए उनके घर गिराए और भागकर सागर में जा छिपे माना, कि सदैव ऎसा हुआ तो भी किसी भी सागर के किसी भी तट पर कहीं भी कभी भी बच्चों ने घरौंदे बनाने बन्द नहीं किए
Gaveshna | Aakash 15.04.2025 2:31
गवेषणा | आकाश इस नुमाइश मे ईश्वर खोज रहा हूँ, बच्चों की मानिंद बौराया हुआ, इस दुकान से उस दुकान, उथली रौशनी की परिधि के भीतर, चमकीली भीड़ में घिरे, जहाँ केवल नीरसता और बीरानगी विद्यमान है। इस नुमाइश में, मैं अस्पष्ट अज्ञात लय में चलता हूँ, और घूमकर पाता हूँ स्वयं को निहत्था, निराश और पराजित। छान आया हूँ आस्था की चार दीवारी, लाँघ लिए हैं प्रकाश के पर्वत, घूम लिया है ज्ञान की गुफ़ाओं में, कर ली है प...
Char Aur Panktiyan | Prabhakar Machve 14.04.2025 1:07
चार और पंक्तियाँ | प्रभाकर माचवे जब दिल ने दिल को जान लिया जब अपना-सा सब मान लिया तब ग़ैर-बिराना कौन बचा यदि बचा सिर्फ़ तो मौन बचा
Naavein | Naresh Saxena 13.04.2025 2:02
नावें | नरेश सक्सेना नावों ने खिलाए हैं फूल मटमैले क्या उन्हें याद है कि वे कभी पेड़ बनकर उगी थीं नावें पार उतारती हैं ख़ुद नहीं उतरतीं पार नावें धार के बीचों-बीच रहना चाहती हैं तैरने न दे उस उथलेपन को समझती हैं ठीक-ठीक लेकिन तैरने लायक गहराई से ज़्यादा के बारे में कुछ भी नहीं जानतीं नावें बाढ़ उतरने के बाद वे अकसर मिलती हैं छतों या पेड़ों पर चढ़ी हुईं नावें डूबने से डरती हैं भर-भर कर खाली होती रह...
Sundariyon | Nilesh Raghuvanshi 12.04.2025 1:46
सुंदरियों | नीलेश रघुवंशी मत आया करो तुम सम्मान समारोहों में तश्तरी, शाल और श्रीफल लेकर दीप प्रज्वलन के समय मत खड़ी रहा करो माचिस और दीया -बाती के संग मंच पर खड़े होकर मत बाँचा करो अभिनंदन पत्र उपस्थिति को अपनी सिर्फ मोहक और दर्शनीय मत बनने दिया करो सुंदरियो, तुम ऐसा करके तो देखो बदल जाएगी ये दुनिया सारी।
Nahi Dunga Naam | Nandkishore Acharya 11.04.2025 1:40
नहीं दूँगा नाम | नंदकिशोर आचार्य नहीं दूँगा तुम्हें कोई नाम। जूही की कली, कलगी बाजरे की छरहरी, या और कुछ। नाम देना पहचान को जड़ करना है मैं तो तुम्हें हर बार आविष्कृत करता हूँ। नाम देकर तुम्हे तीसरा नहीं करूँगा क्यों कि तुम सम्पूर्ण मेरी हो तुम्हें तुम ही कहूँगा कोई नाम नहीं दूँगा।
Rishtedari | Laxmishankar Vajpeyi 10.04.2025 2:11
रिश्तेदारी | लक्ष्मीशंकर वाजपेयी नहीं, यह भी संभव नहीं होता कि उनके शहर जाकर भी जाया ही न जाय रिश्तेदारों के घर अकसर कुछ एहसान लदे होते हैं उनके बुज़ुर्गों के अपने बुज़ुर्गों पर ऐसा कुछ न भी हो, तो ज़रूरी होता है लोकाचार निभाना किंतु अकसर खड़ी हो जाती है समस्या कि पत्नी की कुशलक्षेम, बच्चों की सुचारू पढ़ाई का विवरण दे देने तथा ’और क्या हाल-चाल हैं‘ का कई-कई बार उत्तर दे देने के बाद, कैसे जारी रखा ज...
Abbas Miyan | Neerav 09.04.2025 3:16
अब्बास मियाँ | नीरव पंद्रह बीघे की खेती अकेले संभालने वाले अब्बास मियाँ हमारे हरवाहे थे हम काका कहते थे उन्हें हम सुनते बड़े हुए थे काका खानदानी शहनाई वादक थे अपने ज़माने में बहुत मशहूर दूर-दूर तक उनके सुरों की गूंज थी हमारे बाबा भी एक क़िस्सा बताते थे काशी में काका को एक दफे उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के सामने शहनाई बजाने का मौका मिला था और उस्ताद ने पीठ थपथपाकर कहा था - उसकी बड़ी नेमत है हुनर संभालन...
Kya Kaam | Manglesh Dabral 08.04.2025 1:51
क्या काम | मंगलेश डबराल आप दिखते हैं बहुत उदास आपको इस शहर में क्या काम आपके भीतर भरा है ग़ुस्सा आपको इस शहर में क्या काम आप सफलता नहीं चाहते नहीं चाहते ताक़त जो मिल जाए उसे छोड़ कुछ नहीं माँगते आपको इस शहर में क्या काम आप तुरंत लपकते नहीं और न खिलखिल करते हाथ जेब में डाले चलते रोज़ रात में पाते ख़ुद को लहूलुहान आपको इस शहर में क्या काम।
Mera Aangan Mera Ped | Javed Akhtar 07.04.2025 1:30
मेरा आँगन, मेरा पेड़ | जावेद अख़्तर मेरा आँगन कितना कुशादा फैला हुआ कितना बड़ा था जिसमें मेरे सारे खेल समा जाते थे और आँगन के आगे था वह पेड़ कि जो मुझसे काफ़ी ऊँचा था लेकिन मुझको इसका यकीं था जब मैं बड़ा हो जाऊँगा इस पेड़ की फुनगी भी छू लूँगा बरसों बाद मैं घर लौटा हूँ देख रहा हूँ ये आँगन कितना छोटा है पेड़ मगर पहले से भी थोड़ा ऊँचा है
Balshram | Pawan Sain Masoom 06.04.2025 3:22
बालश्रम| पवन सैन मासूम छणकु साफ़ कर रहा है चाय के झूठे गिलास इसलिए नहीं कि उसके नन्हें हाथ सरलता से पहुँच पा रहे हैं गिलास की तह तक बल्कि इसलिए कि उसके घर में भी हों झूठे बर्तन जो चमचमा रहे हैं एक अरसे से अन्न के अभाव में। दुकिया पहुँचा रहा है चाय ठेले से दुकानों, चौकों तक इसलिए नहीं कि वह नन्हें पाँवों से तेज़ दौड़ता है बल्कि इसलिए कि उसके शराबी पिता के दौड़ते पाँवों की गति हो सके कुछ धीमी जो दौड़...
Makaan Ke Upari Manzil Par | Gulzar 05.04.2025 3:49
मकान की ऊपरी मंज़िल पर | गुलज़ार वो कमरे बंद हैं कब से जो चौबीस सीढ़ियां जो उन तक पहुँचती थी, अब ऊपर नहीं जाती मकान की ऊपरी मंज़िल पर अब कोई नहीं रहता वहाँ कमरों में, इतना याद है मुझको खिलौने एक पुरानी टोकरी में भर के रखे थे बहुत से तो उठाने, फेंकने, रखने में चूरा हो गए वहाँ एक बालकनी भी थी, जहां एक बेंत का झूला लटकता था मेरा एक दोस्त था, तोता, वो रोज़ आता था उसको एक हरी मिर्ची खिलाता था उसी के सा...
Rachta Vriksh | Raghuvir Sahay 04.04.2025 1:46
रचता वृक्ष | रघुवीर सहाय देखो वक्ष को देखो वह कुछ कर रहा है। किताबी होगा कवि जो कहेगा कि हाय पत्ता झर रहा है रूखे मुँह से रचता है वृक्ष जब वह सूखे पत्ते गिराता है ऐसे कि ठीक जगह जाकर गिरें धूप में छाँह में ठीक-ठीक जानता है वह उस अल्पना का रूप चलती सड़क के किनारे जिसे आँकेगा और जो परिवर्तन उसमें हवा करे उससे उदासीन है।
Varsh Ke Sabse Kathin Dinon Mein | Kedarnath Singh 03.04.2025 2:04
वर्ष के सबसे कठिन दिनों में | केदारनाथ सिंह अगर धीरे चलो वह तुम्हें छू लेगी दौड़ो तो छूट जाएगी नदी अगर ले लो साथ वह चलती चली जाएगी कहीं भी यहाँ तक - कि कबाड़ी की दुकान तक भी छोड़ दो तो वही अंधेरे में करोड़ों तारों की आँख बचाकर वह चुपके से रच लेगी एक समूची दुनिया एक छोटे से घोंघे में सच्चाई यह है कि तुम कहीं भी रहो तुम्हें वर्ष के सबसे कठिन दिनों में भी प्यार करती है एक नदी नदी जो इस समय नहीं है इस...
Manikarnika Ka Bashinda | Gyanendrapati 02.04.2025 3:52
मणिकर्णिका का बाशिंदा | ज्ञानेन्द्रपति साढ़े तीन टाँगों वाला एक कुत्ता मणिकर्णिका का स्थायी बाशिंदा है लकड़ी की टालों और चायथानों वालों से हिलगा यह नहीं कि दुत्कारा नहीं जाता वह लेकिन हमेशा दूर-दूर रखने वाली दुर-दुर नहीं भुगतता वह यहाँ विकलांगता के बावजूद विकल नहीं रहता यहाँ साढ़े तीन टाँगों वाला वह भूरा कुत्ता तनिक उदास ऑँखों से मानुष मन को थाहता-सा इधर से उधर आता-जाता है बीच-बीच में यहाँ-वहाँ मि...
Ek Aur Akaal | Kedarnath Singh 01.04.2025 2:27
एक और अकाल | केदारनाथ सिंह सभाकक्ष में जगह नहीं थी तो मैंने कहा कोई बात नहीं सड़क तो है चल तो सकता हूँ सो, मैंने चलना शुरू किया चलते-चलते एक दिन अचानक मैंने पाया मेरे पैरों के नीचे अब नहीं है सड़क तो मैंने कहा चलो ठीक है न सही सड़क मेरे शहर में एक गाती-गुनगुनाती हुई नदी तो है फिर एक दिन बहुत दिनों बाद मैंने सुबह-सुबह जब खिड़की खोली तो देखा- तट उसी तरह पड़े हैं और नदी ग़ायब! यह मेरे लिए अनभ्र बज्...
Lakkadhare Ki Peeth | Anuj Lugun 31.03.2025 1:19
लकड़हारे की पीठ | अनुज लुगुन जलती हुई लकड़ियों का गट्ठर है मेरी पीठ पर और तुम मुझे बाँहों में भरना चाहती हो मैं कहता हूँ— तुम भी झुलस जाओगी मेरी देह के साथ।
Mitr | Ashwini 30.03.2025 2:07
मित्र | अश्विनी लक्ष्य को सदा चेताए, तेरी त्रुटि कभी न छुपाए, तेरा क्रोध भी सह जाए, जो भटकने न दे मार्ग से, वह मित्र है । मित्र का हृदय निर्मल, विशाल, मित्र ही बने मित्र की ढाल, आँच न दे आने मित्र पर, जो दे काल को टाल, वह मित्र है । क्षुब्ध मन को बहलाता मित्र है, असफलता को करता सहज, ढांढस बंधाता मित्र है । मन की तपती हुई रेत पर, ठंडा जल छिड़काता मित्र है। कंधे पर ख़ुशी से उठाता मित्र है...
Suno Sitaron! | Nasira Sharma 29.03.2025 2:52
सुनो सितारों! | नासिरा शर्मा कहाँ गुम हो जाते हो तुम रात आते ही जाते हो शराबख़ाने या फिर थके हारे मज़दूर की तरह पड़ जाते हो बेसुध चादर ओढ़ तुम! मच्छर लाख काटें और गुनगुनाएँ उठते नहीं हो तुम नींद से कुछ तो बताओ आख़िर कहाँ चले जाते हो तुम हमारी आँखों की पहुँच से दूर अंधेरी रातों में आ जाते थे रौशनी भरने आँखों में आँखें डाल टिमटिमाते थे सारे दिन की थकी आँखों को सेकते थे और बिना बोले ही बहुत कुछ बतिय...
Beej Pakhi | Hemant Deolekar 28.03.2025 2:08
बीज पाखी | हेमंत देवलेकर यह कितना रोमांचक दृश्य है: किसी एकवचन को बहुवचन में देखना पेड़ पैराशुट पहनकर उत्तर रहा है। वह सिर्फ़ उतर नहीं रहा बिखर भी रहा है। कितनी गहरी व्यंजना : पेड़ को हवा बनते देखने में सफ़ेद रोओं के ये गुच्छे मिट्टी के बुलबुले है पत्थर हों या पेड़ मन सबके उड़ते हैं हर पेड़ कहीं दूर फिर अपना पेड़ बसाना चाहता है और यह सिर्फ़ पेड़ की आकांक्षा नहीं आब-ओ-दाने की तलाश में भटकता हर कोई उ...
Sapne Nahin Hain To | Nandkishore Acharya 27.03.2025 2:14
सपने नहीं हैं तो | नंदकिशोर आचार्य नहीं देखे किसी और के सपने मेरे सिवा फिर भी वह नहीं था मैं जिस के सपने देखती थीं तुम क्यों कि मेरे भी तो थे सपने कुछ नहीं थे जो सपनों में तुम्हारे जैसे तुम थीं सपनों में मेरे पर नहीं थे सपने तुम्हारे एक-एक कर निकालती गयीं वे सपने मेरी नींद में से तुम और बनाती गयीं जागते में मुझ को अपने सपने-सा..... और अब हुआ यह है : मैं हर वक्त जगा-सा हूँ । फिर भी झल्लाती हो तुम...
Hum Adharon Adharon Bikhrenge | Seema Aggarwal 26.03.2025 1:52
हम अधरों-अधरों बिखरेंगे | सीमा अग्रवाल तुम पन्नों पर सजे रहो हम अधरों-अधरों बिखरेंगे तुम बन ठन कर घर में बैठो हम सड़कों से बात करें तुम मुट्ठी में कसे रहो हम पोर पोर खैरात करें इतराओ गुलदानों में तुम हम मिट्टी में निखरेंगे कलफ लगे कपडे सी अकड़ी गर्दन के तुम हो स्वामी दायें बाए आगे पीछे हर दिक् के हम सहगामी हठयोगी से सधे रहो तुम हम हर दिल से गुज़रेंगे तुम अनुशासित झीलों जैसे हल्का हल्का मुस्काते ह...
Ramdas | Raghuvir Sahay 25.03.2025 2:36
रामदास | रघुवीर सहाय चौड़ी सड़क गली पतली थी दिन का समय घनी बदली थी रामदास उस दिन उदास था अंत समय आ गया पास था उसे बता यह दिया गया था उसकी हत्या होगी धीरे-धीरे चला अकेले सोचा साथ किसी को ले ले फिर रह गया, सड़क पर सब थे सभी मौन थे सभी निहत्थे सभी जानते थे यह उस दिन उसकी हत्या होगी खड़ा हुआ वह बीच सड़क पर दोनों हाथ पेट पर रखकर सधे कदम रख करके आये लोग सिमटकर आँख गड़ाये लगे देखने उसको जिसकी तय था हत्या...
Dopahar Ki Kahaniyon Ke Mama | Rajesh Joshi 24.03.2025 2:50
दोपहर की कहानियों के मामा | राजेश जोशी हम उन नटखट बच्चियों के मामा थे जो अकसर दोपहर में अपनी नानियों से कहानी सुनने की ज़िद करती थी हम हमेशा ही घर लौटने के रास्ते भूल जाते थे घर के एकदम पास पहुँचकर मुड़ जाते थे किसी अपरिचित गली में अकेले होने से हमें डर लगता था और लोगों के बीच अचानक ही हम अकेले हो जाते थे अर्जियों के साथ हमारा जो जीवन चरित नत्थी था उसमें हमारे अनुभवों के लिए कोई जगह नहीं थी उसमें...
Similar podcasts
Replaio is not a podcast publisher; show names, artwork and audio belong to their authors and are distributed through public RSS feeds.