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Pratidin Ek Kavita

Arts HI ↓ 1195 episodes

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

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Jul 11, 2026

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Episodes

Koi Sagar Nahi | Bhawani Prasad Mishra 01.07.2025

कोई सागर नहीं | भवानीप्रसाद मिश्र कोई सागर नहीं है अकेलापन न वन है एक मन है अकेलापन जिसे समझा जा सकता है आर-पार जाया जा सकता है जिसके दिन में सौ बार कोई सागर नहीं है न वन है बल्कि एक मन है हमारा तुम्हारा सबका अकेलापन!

Waapsi | Ahmed Faraz 30.06.2025

वापसी | अहमद फ़राज़ उस ने कहा सुन अहद निभाने की ख़ातिर मत आना अहद निभाने वाले अक्सर मजबूरी या महजूरी की थकन से लौटा करते हैं तुम जाओ और दरिया दरिया प्यास बुझाओ जिन आँखों में डूबो जिस दिल में उतरो मेरी तलब आवाज़ न देगी लेकिन जब मेरी चाहत और मेरी ख़्वाहिश की लौ इतनी तेज़ और इतनी ऊँची हो जाए जब दिल रो दे तब लौट आना अहद: प्रतिज्ञा/ वादा महजूरी: विरह

Prem Ka Arthshastra | Vihaag Vaibhav 29.06.2025

 प्रेम का अर्थशास्त्र | विहाग वैभव  जितना हो तुम्हारे पास उससे कम ही बताना सबसे ख़र्च करते हुए हमेशा थोड़ा-सा बचा लेना माँ की गुप्त पूँजी की तरह जब छाती पर समय का साँप लोटने लगेगा हर साँस में चलने लगेगी जून की लू और तुम्हें लगेगा कि मन का आईना रेगिस्तान की गर्म हवाओं से चिटक रहा है तब कठिन वक़्तों में काम आएगा वही थोड़ा-सा बचा हुआ प्रेम।

Machli Boli Kavi Se | K Sachidanandan | Girdhar Rathi 28.06.2025

मछली बोली कवि से |  के. सच्चिदानंदन अनुवाद : गिरधर राठी   उपमा मुझे मत दो स्त्री की आँख की स्त्री हूँ मैं स्वयं, पूरी, संपूर्ण मुझे नहीं धरना है भेष जलपरियों का मैं नहीं ढोऊँगी नारी का भारी सिर मुझसे अँगूठी निगलवा कर करा नहीं पाओगे मछुए का इंतज़ार मैं नहीं कोई अवतार जो लाए वेद को उबार। वापस पहुँचा दो मुझे जल में तुम कच्चा ही, तड़पना पड़े न मुझे रेत में बनकर प्रतीक या फिर कोई रूपक।

Aana | Kailash Manhar 27.06.2025

आना |  कैलाश मनहर आऊँगा बारिश से भीगे खेतों पर क्वार की धूप बनकर चमकता-सा.... आऊँगा थके हुए बदन की रगों में धारोष्ण दूध की तरह उफनता-सा.... आऊँगा रूठी हुई प्रेमिका की आँखों में मानभरी लालिमा लिए दमकता-सा.... आऊँगा अकेले बच्चे के पास नाचती हुई चिड़िया के परों में लचकता-सा.... आऊँगा मकई के दानों में बनकर मिठास, शरद के आसपास सूर्योदय के साथ चूमने को तुम्हारे खुरदरे हाथ ज़रूर ज़रूर आऊँगा, करना तुम -- इन...

Raag Bhatiyali | Kunwar Narayan 26.06.2025

राग भटियाली | कुँवर नारायण   एक राग है भटियाली बाउल संगीत से जुड़ा हुआ अंतिम स्वर को खुला छोड़ दिया जाता है वायुमंडल में लहराता हुआ जैसे संपूर्ण जीवन राग से युक्त हुई एक ध्वनि अनंत में विलीन हो गई... वह शेष स्वरों को बाँधता नहीं इसलिए अंत में भी उनसे बँधता नहीं, अंतिम आह जैसा कुछ एक अजीब तरह की मुक्ति का एहसास देता है वह...

Ek Nanha Sa Keeda | Gyanendrapati 25.06.2025

एक नन्हा-सा कीड़ा | ज्ञानेन्द्रपति    यह एक नन्हा-सा कीड़ा अभी जिसको मसल जाता पैर जीवन की क्षणभंगुरता पर विचारने का एक लमहा एक ठिठका हुआ क्षण जिसको जल्दी से लाँघने में नहीं दिखता धरती की सिकुड़न में खोये हुए-से इस कीड़े में कितने भूकम्पों की स्मृति साँस लेती है। इतिहास के कितने युगों की स्मृति कि इसके लिए यह कल की ही बात जव वनमान्ष ने दोनों अगले पैर उठाए थे हाथों के आकार में मानव-सभ्यता ने लिये थे...

Bhookh | Naresh Saxena 24.06.2025

भूख | नरेश सक्सेना भूख सबसे पहले दिमाग़ खाती है उसके बाद आँखें फिर जिस्म में बाक़ी बची चीज़ों को छोड़ती कुछ भी नहीं है भूख वह रिश्तों को खाती है माँ का हो बहन या बच्चों का बच्चे तो उसे बेहद पसंद हैं जिन्हें वह सबसे पहले और बड़ी तेज़ी से खाती है बच्चों के बाद फिर बचता ही क्या है।

Tumhe Darr Hai | Gorakh Pandey 23.06.2025

तुम्हें डर है | गोरख पांडेय हज़ार साल पुराना है उनका ग़ुस्सा हज़ार साल पुरानी है उनकी नफ़रत मैं तो सिर्फ़ उनके बिखरे हुए शब्दों को लय और तुक के साथ लौटा रहा हूँ मगर तुम्हें डर है कि आग भड़का रहा हूँ।

Raahein | Narendra Sharma 22.06.2025

राहें | नरेंद्र शर्मा कुहरा छाया है गिरि-वन पर, गिरि-शिखरों पर; नहीं रहा आकाश आज आकाश, घिरे हैं बादल धौरे; मैं नीचे समतल पठार पर चला जा रहा— लेकिन ऊँचे तल की राहें धुँधग्रस्त हैं!

Din Baune Ho Gaye | Umakant Malviya 21.06.2025

दिन बौने हो गए | उमाकांत मालवीय रातें लम्बी हुईं दिन बौने हो गए । ठिगने कद वाले दिन लम्बी परछाइयाँ धूप की इकाई पर तिमिर की दहाइयाँ रातें पत्तल हुईं दिन दौने हो गए । कुहरों पर लिखी गई विष भरी कहानियाँ नीली पड़ने लगी सुबह की जवानियाँ रातें आँगन हुईं दिन कौने हो गए । बर्फ़ीले ओठों पर शब्द ठिठुरने लगे नाकाफ़ी ओढ़ने बिछौने जुड़ने लगे रातें अजगर हुईं दिन छौने हो गए ।

Kuch Ishq Kia Kuch Kaam Kia | Faiz Ahmed Faiz 20.06.2025

कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया/ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया

Purani Haveli | Khagendra Thakur 19.06.2025

पुरानी हवेली | खगेंद्र ठाकुर इस हवेली से गाँव में आदी-गुड़ बंटे सोहर की धुन सुने बहुत दिन हो गए   इस हवेली से सत्यनारायण का प्रसाद बंटे घड़ी-घंट की आवाज सुने बहुत दिन हो गए   इस हवेली से किसी को कन्धा लगाए राम नाम सत है- सुने बहुत दिन हो गए   इस हवेली की छत पर उग आई है बड़ी-बड़ी घास आम, पीपल आदि उग आये हैं पीढ़ियों की स्मृति झेलती जर्जर हवेली का सूनापन देख ये सब एकदम छत पर चढ़ गए हैं.   इस हरियाली...

Deewana Dil | Nasira Sharma 18.06.2025

दीवाना दिल - नासिरा शर्मा  अक्सर सोचती हूँ मैं जब भी मैंने चलना चाहा तुम्हें लेकर अपने संग नहीं समझ पाए तुम वह राहें तुम्हारे खेतों से उगी गेंहूँ की बालियों से फूटे दानों को बोना चाहती थी अपने आँगन में ताकि बना सकूँ रिश्ता ज़मीन से ज़मीन का उसकी उगी कोंपलों के रस को पी सकूँ और महसूस कर सकूँ तुमसे गहरे जुड़ाव को भेजने को कहा था तुमसे मैनें भेज दो कुछ ख़ुशबूदार पौधे  मुझे जिसे बोती मैं अपनी क्यारियो...

Sambandhon Ke Thande Ghar Mein | Amarnath Srivastava 17.06.2025

सम्बन्धों के ठंडे घर में | अमरनाथ श्रीवास्तव सम्बन्धों के ठंडे घर में वैसे तो सबकुछ है लेकिन इतने नीचे तापमान पर रक्तचाप बेहद खलता है| दिनचर्या कोरी दिनचर्या घटनायें कोरी घटनायें पढ़ा हुआ अखबार उठाकर हम कब तक बेबस दुहरायें नाम मात्र को सुबह हुई है कहने भर को दिन ढलता है| सहित ताप अनुकूलित घर में मौसम के प्रतिमान ढूंढते आधी उमर गुजर जाती है प्याले में तूफान ढूंढते गर्म खून वाला तेवर भी अब तो सिर्फ...

Mrityu Geet | Langston Hughes | Dharmvir Bharti 16.06.2025

मृत्यु-गीत | लैंग्स्टन ह्यूज़ अनुवाद : धर्मवीर भारती मातम के नक़्क़ारे बजाओ मेरे लिए, मातम और मौत के नक़्क़ारे बजाओ मेरे लिए और भीड़ से कह दो कि मिल कर के मरसिया गाए ताकि उसकी आवाज़ में मेरी हिचकियाँ डूब जाएँ। मौत के नक़्क़ारों के साथ सिसकते हुए बेले की महीन और दुखी आवाज़— लेकिन सूरज के संगीत से परिपूर्ण शंख की एक हुँकार भरी आवाज़ भी हो, जो मेरे साथ जाए, उस अँधियारे मृत्युलोक में जहाँ मैं जा रहा हूँ।

Mrit Ghoshit | Ankita Anand 15.06.2025

मृत घोषित | अंकिता आनंद उसके आख़िरी दिनों में कभी टूथपेस्ट के ट्यूब को दो टुकड़ों में काटा हो, तो तुमने देखा होगा कितना कुछ बचा रह जाता है तब भी जब लगता है सब ख़त्म हो गया। ज़िंदगी का कितना बड़ा टुकड़ा अक्सर फ़ेंक दिया जाता है उसे मरा समझ।

Unhone Ghar Banaye | Agyeya 14.06.2025

उन्होंने घर बनाये  - अज्ञेय  उन्होंने घर बनाये और आगे बढ़ गये जहाँ वे और घर बनाएँगे। हम ने वे घर बसाये और उन्हीं में जम गये : वहीं नस्ल बढ़ाएँगे और मर जाएँगे। इस से आगे कहानी किधर चलेगी? खँडहरों पर क्या वे झंडे फहराएँगे या कुदाल चलाएँगे, या मिट्टी पर हमीं प्रेत बन मँडराएँगे जब कि वे उस का गारा सान साँचों में नयी ईंटें जमाएँगे? एक बिन्दु तक कहानी हम बनाते हैं। जिस से आगे कहानी हमें बनाती है : उस बि...

Dharti Par Hazaar Cheezain Thin | Anupam Singh 13.06.2025

धरती पर हज़ार चीजें थीं काली और खूबसूरत | अनुपम सिंह  धरती पर हज़ार चीजें थीं काली और खूबसूरत उनके मुँह का स्वाद मेरा ही रंग देख बिगड़ता था वे मुझे अपने दरवाज़े से ऐसे पुकारते जैसे किसी अनहोनी को पुकार रहे हों उनके हज़ार मुहावरे मुँह चिढ़ाते थे काली करतूतें काली दाल काला दिल काले कारनामे बिल्लियों के बहाने दी गई गालियाँ सुन मैं ख़ुद को बिसूरती जाती थी और अकेले में छिपकर रोती थी पहली बार जब मेरे प्र...

Chuka Bhi Hun Main Nahin | Shamsher Bahadur Singh 12.06.2025

चुका भी हूँ मैं नहीं - शमशेर बहादुर सिंह चुका भी हूँ मैं नहीं कहाँ किया मैनें प्रेम अभी । जब करूँगा प्रेम पिघल उठेंगे युगों के भूधर उफन उठेंगे सात सागर । किंतु मैं हूँ मौन आज कहाँ सजे मैनें साज अभी । सरल से भी गूढ़, गूढ़तर तत्त्व निकलेंगे अमित विषमय जब मथेगा प्रेम सागर हृदय । निकटतम सबकी अपर शौर्यों की तुम तब बनोगी एक गहन मायामय प्राप्त सुख तुम बनोगी तब प्राप्य जय !

Ladki | Anjana Verma 11.06.2025

लड़की | अंजना वर्मा गर्मी की धूप में सुर्ख़ बौगेनवीलिया की एक उठी हुई टहनी की तरह वह पतली लड़की गर्म हवा झेलती साइकिल के पैडल मारती चली जा रही है वह जब भी निकलती है बाहर कालेज के लिए कई काम हो जाते हैं रास्ते में दवा की दुकान है और डाकघर भी काम निबटाते और वापस आते देर हो जाती है अक्सर सवेरे का गुलाबी सूरज हो जाता हे सफेद तब तक तपकर रोज़ ही करती है सामना लू का उसे अपना रास्ता मालूम है अब रास्ते में...

Nayi Bhookh | Hemant Deolekar 10.06.2025

नई भूख | हेमंत देवलेकर  भूख से तड़पते हुए भी  आदमी रोटी नहीं  मांगता वह चिल्लाता है 'गति...गति!! तेज़...और तेज़... इससे तेज़ क्यों नहीं' कभी न स्थगित होने वाली वासना है गति हमारे पास डाकिये की कोई स्मृति नहीं बची। दुनिया के किसी भी कोने में पलक झपकते पहुँच रहा है सब कुछ सारी आधुनिकता इस वक़्त लगी है समय बचाने में -  जो स्वयं ब्लैक होल है। हो सकता है किसी रोज़ हम बना लें समय भी मगर क्या तब भी होगा हमारे...

Tum Nahi Samjhogey | Bhavani Prasad Mishra 09.06.2025

तुम नहीं समझोगे | भवानीप्रसाद मिश्र तुम नहीं समझोगे केवल किया हुआ इसलिए अपने किए पर वाणी फेरता हूँ और लगता है मुझे उस पर लगभग पानी फेरता हूँ तब भी नहीं समझते तुम तो मैं उलझ जाता हूँ लगता है जैसे नाहक़ अरण्य में गाता हूँ और चुप हो जाता हूँ फिर लजाकर अपनी वाणी को इस तरह स्वर से सजा कर!

Daud | Kumar Ambuj 08.06.2025

दौड़ -कुमार अम्बुज  मुझे नहीं पता मैं कब से एक दौड़ में शामिल हूँ विशाल अंतहीन भीड़ है जिसके साथ दौड़ रहा हूँ मैं गलियों में, सड़कों पर, घरों की छतों पर, तहखानों में तनी हुई रस्सी पर सब जगह दौड़ रहा हूँ मैं मेरे साथ दौड़ रही है एक भीड़ जहाँ कोई भी कम नहीं करना चाहता अपनी रफ्तार मुझे ठीक-ठीक नहीं मालुम मैं भीड़ के साथ दौड़ रहा हूँ या भीड़ मेरे साथ अकेला पीछे छूट जाने के भय से दौड़ रहा हूँ या आगे नि...

Phoota Prabhat | Bharat Bhushan Aggarwal 07.06.2025

फूटा प्रभात | भारतभूषण अग्रवाल फूटा प्रभात, फूटा विहान वह चल रश्मि के प्राण, विहग के गान, मधुर निर्भर के स्वर झर-झर, झर-झर। प्राची का अरुणाभ क्षितिज, मानो अंबर की सरसी में फूला कोई रक्तिम गुलाब, रक्तिम सरसिज। धीरे-धीरे, लो, फैल चली आलोक रेख घुल गया तिमिर, बह गई निशा; चहुँ ओर देख, धुल रही विभा, विमलाभ कांति। अब दिशा-दिशा सस्मित, विस्मित, खुल गए द्वार, हँस रही उषा। खुल गए द्वार, दृग खुले कंठ, खुल गए...

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