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Pratidin Ek Kavita

Arts HI ↓ 1195 episodes

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

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Jul 11, 2026

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Episodes

Jaane Kis Kiska Khayal Aaya Hai | Dushyant Kumar 26.07.2025

जाने किस-किसका ख़्याल आया है  |  दुष्यंत कुमार जाने किस—किसका ख़्याल आया है इस समंदर में उबाल आया है एक बच्चा था हवा का झोंका साफ़ पानी को खंगाल आया है एक ढेला तो वहीं अटका था एक तू और उछाल आया है कल तो निकला था बहुत सज-धज के आज लौटा तो निढाल आया है ये नज़र है कि कोई मौसम है ये सबा है कि बवाल आया है इस अँधेरे में दिया रखना था तू उजाले में बाल आया है हमने सोचा था जवाब आएगा एक बेहूदा सवाल आया है

Shahadat | Sunil Jha 25.07.2025

शहादत | सुनील झा फूल, रास्ते भीड़ नज़ारे सारे तुम्हारे लिए और, तुम हो कि चुप हो... न सलाम न दुआ ऐसे भी कोई घर आता है भला!

Amarta | Devi Prasad Mishra 24.07.2025

अमरता | देवी प्रसाद मिश्र बहुत हुआ तो मैं बीस साल बाद मर जाऊँगा मेरी कविताएँ कितने साल बाद मरेंगी कहा नहीं जा सकता  हो सकता है वे मेरे मरने के पहले ही मर जाएँ  और तानाशाहों के नाम इसलिए अमर रहें कि उन्होंने नियन्त्रण के कितने ही तरीके ईज़ाद किए मैंने भी कुछ उपाय खोजे मसलन यह कि आदमी तक पहुँचने का टिकट किस खड़की से लिया जाए एक भुला दिया गया कवि बहुत याद किए जाते शासक से बेहतर होता है और अमरता की अन...

Vasantsena | Shrikant Verma 23.07.2025

वसंतसेना |  श्रीकांत वर्मा सीढ़ियाँ चढ़ रही है वसंतसेना अभी तुम न समझोगी वसंतसेना अभी तुम युवा हो सीढ़ियाँ समाप्त नहीं होती उन्नति की हों अथवा अवनति की आगमन की हों या प्रस्थान की अथवा अवसान की अथवा अभिमान की अभी तुम न समझोगी वसंतसेना न सीढ़ियाँ चढ़ना आसान है न सीढ़ियाँ उतरना जिन सीढ़ियों पर चढ़ते हैं, हम, उन्हीं सीढ़ियों से उतरते हैं, हम निर्लिप्त हैं सीढ़ियाँ, कौन चढ़ रहा है कौन उतर रहा है चढ़ता...

Din Ghatenge | Dinesh Singh 22.07.2025

दिन घटेंगे | दिनेश सिंह जनम के सिरजे हुए दुख उम्र बन-बनकर कटेंगे ज़िन्दगी के दिन घटेंगे कुआँ अन्धा बिना पानी घूमती यादें पुरानी प्यास का होना वसन्ती तितलियों से छेड़खानी झरे फूलों से पहाड़े -- गन्ध के कब तक रटेंगे ? ज़िन्दगी के दिन घटेंगे चढ़ गए सारे नसेड़ी वक़्त की मीनार टेढ़ी 'गिर रही है -- गिर रही है' -- हवाओं ने तान छेड़ी मचेगी भगदड़ कि कितने स्वप्न लाशों से पटेंगे ? ज़िन्दगी के दिन घटेंगे परि...

Akalmandi Aur Moorkhta | Shubha 21.07.2025

अकलमंदी और मूर्खता | शुभा स्त्रियों की मूर्खता को पहचानते हुए पुरुषों की अक्लमंदी को भी पहचाना जा सकता है इस बात को उलटी तरह भी कहा जा सकता है पुरुषों की मूर्खताओं को पहचानते हुए स्त्रियों की अक्लमंदी को भी पहचाना जा सकता है वैसे इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि स्त्रियों में भी मूर्खताएँ होती हैं और पुरुषों में भी सच तो ये है कि मूर्खों में अक्लमंद और अक्लमन्दों में मूर्ख छिपे रहते हैं मनुष्यता ऐसी...

Bhool Bhulaiyya | Shraddha Upadhyay 20.07.2025

 भूल-भूलैया | श्रद्धा उपाध्याय हम सबसे पहले मिलेंगे दिल्ली में घुमते बेमक़सद क़दमों में  सड़कें तुम्हें घर ले जाएँगी  और मुझे भूल-भूलैया में  मैं किताबें खरीदूँगी कोई उन्हें पढ़ेगा  मैं अपना कॉफ़ी मग अपने घर के नजदीकी पार्क में रोप दूँगी  फिर कुछ दिन मैं उस बाग़ में रहूंगी  जब वापस आऊँगी तो सोफ़े पर समेट लूँगी  तीन कविताएँ पाँच कहानियाँ  और साथ में मैं दो बार प्रेम में पडूँगी  और छः बार निकस जाऊँगी  ख़ून...

Main Gaane Lagta | Dinesh Singh 19.07.2025

मैं गाने लगता | दिनेश सिंह अक्सर क्या होता मुझको जो मन ही मन शर्माने लगता तुम रोती, मैं गाने लगता तुम घर मैं कितना खटती हो कितने हिस्सों में बटती हो कड़ी धूप-सी सबकी बातें आर्द्र भूमि-सी तुम फटती हो मेरा मन छल-छल कर आँखों-आँखों से बतियाने लगता तुम रोती मैं गाने लगता चूल्हा-चौका रोटी-पानी सुबह-शाम की राम-कहानी दिन भर बच्चों की चिकचिक से पोछा करती हो पेशानी दस्तरखान सजाने वाले हाथों को सहलाने लगता त...

Uski Grahasthi | Rajesh Joshi 18.07.2025

उसकी गृहस्थी | राजेश जोशी  थकी हारी लौटी है वो आफिस से अभी टिफिन बाक्स को रसोई में रखती है। मुँह पर पानी के छीटे मारती है बाहर निकल आई लट को वापस खोंसती है। बालों में आँखों को हौले से दबाती है हथेलियों से उठती है और रसोईघर की ओर जाने को होती है। मैं कहता हूँ, 'बैठो, तुम, आज मैं चाय बनाता हूँ ! मेरी आवाज़ की नोक मुझ़ी को चुभती है। गैस जला कर चाय का पानी चढ़ाता हूँ और दूसरे ही पल आवाज़ लगाता हूँ सुन...

Tumhari Kavita | Abha Bodhisattva 17.07.2025

तुम्हारी कविता | आभा बोधिसत्त्व तुम्हारी कविता से जानती हूँ तुम्हारे बारे में तुम सोचते क्या हो , कैसा बदलाव चाहते हो किस बात से होते हो आहत; किस बात से खुश तुम्हारा कोई बायोडटा नहीं मेरे पास फिर भी जानती हूँ मैं तुम्हें तुम्हारी कविताओं से क्या यह बडी़ बात नही कि नहीं जानती तुम्हारा देश , तुम्हारी भाषा तुम्हारे लोग मैं कुछ भी नहीं जानती, फिर भी कितना कुछ जानती हूँ तुम्हारे बारे में तुम्हारे घर के...

Kaling | Shrikant Verma 16.07.2025

कलिंग - श्रीकांत वर्मा केवल अशोक लौट रहा है और सब कलिंग का पता पूछ रहे हैं केवल अशोक सिर झुकाए हुए है और सब विजेता की तरह चल रहे हैं केवल अशोक के कानों में चीख़ गूँज रही है और सब हँसते-हँसते दोहरे हो रहे हैं केवल अशोक ने शस्त्र रख दिये हैं केवल अशोक लड़ रहा था ।

Algani | Shahanshah Alam 15.07.2025

अलगनी | शहंशाह आलम   अलगनी पर मैंने क्या चीज़ सुखाई कविता की वो गीली किताबें जिसे बारिश ने पढ़ा था पूरे मन से जो बारिश मेघालय में होती होगी वही बारिश हुई इस दफ़ा मेरे पटना में अलगनी पर मैंने और क्या चीज़ सुखाई कविता की किताबों के अलावा अपने कपड़े… नहीं न अपने जूते… नहीं न अपने मोजे… नहीं न अपना पूरा घर सुखाया धूप के निकलने पर और अपनी देह को भी टाँगकर रखा अलगनी पर अब जब बारिश के बाद ठंड आएगी दस्तक...

Kahan Rahegi Wah Santap Ke Saath? | Gagan Gill 14.07.2025

कहाँ रहेगी वह संताप के साथ?/ गगन गिल  अगर वह उसके सीने पर रख दे अपना सिर या उसके कंधे पर अगर वह छुए उसका हाथ अक्तूबर की झुरझुरी में  थाम ले उसकी बाँह घबराकर  स्टेशन की हड़बड़ी में  लौटते हुए रख दे चुपचाप  उसकी गर्म गर्दन पर  अलविदा का एक अधूरा, रुआँसा चुम्बन  तो  उस लम्बी-चौड़ी देह में क्या इतनी जगह होगी जहाँ वह रह सके  अपने सारे संताप के साथ? 

Jab Hum Mare Jayenge | Arvind Srivastava 13.07.2025

जब हम मारे जाएंगे | अरविन्द श्रीवास्तव जब हम बुन रहे होंगे कोई हसीन ख्वाब तुम्हारे बिल्कुल करीब आकर बाँट रहे होंगे आत्मीयता प्रेम व नग्न भाषा रच रहे होंगे कविताएँ तभी एक साथ उठ खड़े होंगे दुनिया के तमाम तानाशाह जिनके फरमान पर हत्यारे असलहों में भर लेंगे बारुद और खोजी कुत्ते सूंघ-सूंघ कर इस धरा को खोज निकालेंगे हमें हम किसी कोमल और मुलायम स्वप्न देखने के जुर्म में मारे जाएंगे जब हम मारे जाएंगे तब श...

Marghat | Raghivir Sahay 12.07.2025

मरघट | रघुवीर सहाय शानदार मौत थी इसलिए कि कोई न भीड़ थी न था रोना-धोना हम लोग एक बड़े ख़ाली खेत में गए गाँव के सिमटने से बचा रह गया था जो और एक हल्की-सी देह को फेंक आए “कहाँ है मरघट?” जो पता दिया गया था पूछता उसे चला रामजस स्कूल के पीछे एक जगह दो लड़के बोले, “हाँ, रामजस? वहीं हम पढ़ते हैं—मरघट वहीं पर है?” —मुँह बाकर रह गया वह युवक— यह तो पता ही न था! फिर हम भटक गए अंत में एक किसी से मिले दोनों ने...

Ya Devi | Viren Dangwal 11.07.2025

या देवि! | वीरेन डंगवाल माथे पर एक आँख लम्बवत उसके भी ऊपर मुकुट बहुत सारे हाथ मगर दीखते दो ही : एक में टपकता मुंड। दुसरे में टपटपाता खड्ग। शेर नीचे खड़ा है। दांत दिखाता, मगर सीधा - सादा। बगल में नदी बह रही लहरदार। पहाड़ क्या हैं, रामलीला का पर्दा हैं। माता, मैं उस चित्रकार को प्रणाम करता हूँ जिस ने तेरी यह धजा बनाई।

Behnein | Abha Bodhisattva 10.07.2025

बहनें | आभा बोधिसत्त्व बहनें होती हैं, अनबुझ पहेली-सी जिन्हें समझना या सुलझाना इतना आसान नही होता जितना लटों की तरह उलझी हुई दुनिया को , इन्हें समझते और सुलझाते ...में विदा करने का दिन आ जाता है न जाने कब इन्हें समझ लिया जाता अगर वो होती ... कोई बन्द तिजोरी... जिन्हे छुपा कर रखते भाई या कोई... देखते सिर्फ़... या ...कि होती ... सांझ का दिया ... जिनके बिना ... न होती कहीं रोशनी... पर नही़ बहनें तो प...

Antim Aalap | Prachi 09.07.2025

अंतिम आलाप | प्राची कितना और समेटूँ ख़ुद को! ख़ुद की सूनी-वंचित बाँहों में धूप का छुआ मेरा रंग कपड़ों के इस पार तक ही है तुम्हारे छूने की लालसा अंतस को कचोटती अँधेरे में सकुचाती और सर्वस्व त्याग देने को खड़ी— ध्यान-मुद्रा में पेड़ो-पहाड़ो-जानवरो-बच्चो, कोई तो मेरी देह अपने तक खींच लो, ख़ुद के भार से मैं धँसती जा रही हूँ अंतिम आलाप का आख़िरी सुर जहाँ न पहुँचे वहीं कहीं छुपी बैठी हूँ।

Puri ka Samudra | Gyanendrapati 08.07.2025

पुरी का समुद्र | ज्ञानेन्द्रपति आँखों में पुरी का समुद्र लिये जब लौटोगी विस्मय -विस्फारित अपनी बड़री आँखों में तरंग-विकल वह संयम-असमर्थ समुद्र पछाड़ खाता, पुकारता, लीलने को आता उद्द्वेलित, उद्दाम, हहाता दष्टि-छोर तक फेला, फूला, फेनिल टूट-टूट बिखर, तुम्हारे पैरों तले बिछ जाता तुम्हें छोड़ जाता हुआ कुछ-कुछ गीला, कुछ-कुछ भीत तुम्हारे कन्धों पर रख हाथ, तुम्हारी आँखों में झाँकता मैं जानूँगा, अरे! यह तो...

Aunga | Leeladhar Jagudi 07.07.2025

आऊँगा | लीलाधर जगूड़ी नए अनाज की ख़ुशबू का पुल पार करके मैं तुम्हारे पास आऊँगा ज्यों ही तुम मेरे शब्दों के पास आओगे मैं तुम्हारे पास आऊँगा जैसे बादल पहाड़ की चोटी के पास आता है।  और लिपट जाता है जिसे वे ही देख पाते हैं जिनकी गर्दनें उठी हुई हों। मैं वहाँ तुम्हारे दिमाग़ में जहाँ एक मरुस्थल है। आना चाहता हूँ मैं आऊँगा। मगर उस तरह नहीं बर्बर लोग जैसे कि पास आते हैं उस तरह भी नहीं गोली जैसे कि निशाने...

Mann Ke Panne | Nasira Sharma 06.07.2025

मन के पन्ने | नासिरा शर्मा  जब तुम थककर सोते हो तो तुम्हारे उजले तलवों को देख कर  जाने क्यों ख़याल आता है उसपर लिख दूँ  मन के इंद्रधनुष से एक प्रेम-पत्र जिसमें लिखा हो अवाम का वह प्यार जो हम उनसे करते हैं जिस में हो उनके आहत मन की  भूखी-प्यासी इच्छाओं के दस्तावेज़  और हमारी नाकाम कोशिशों के न थकने वाले हौसले तुम जहाँ-जहाँ जाओ छप जाए धरती के सीने पर यह शब्द सपने, सपने और सपने हमारी उम्मीदों के जिसप...

Bhavsagar | Vishwanath Prasad Tiwari 05.07.2025

भवसागर | विश्वनाथ प्रसाद तिवारी इसी में बोना है अमर बीज इसी में पाना है खोना है प्यार भवसागर है यह संतों का इसी में ढूंढ़ना है निकलने का द्वार

Nasht Kuch Bhi Nahi Hota | Priyadarshan 04.07.2025

नष्ट कुछ भी नहीं होता | प्रियदर्शन नष्ट कुछ भी नहीं होता, धूल का एक कण भी नहीं, जल की एक बूंद भी नहीं बस सब बदल लेते हैं रूप उम्र की भारी चट्टान के नीचे प्रेम बचा रहता है थोड़ा सा पानी बनकर और अनुभव के खारे समंदर में घृणा बची रहती है राख की तरह गुस्सा तरह-तरह के चेहरे ओढ़ता है, बात-बात पर चला आता है, दुख अतल में छुपा रहता है, बहुत छेड़ने से नहीं, हल्के से छू लेने से बाहर आता है, याद बादल बनकर आती...

Prarthna | Rachit 03.07.2025

प्रार्थना | रचित ईश्वर, ध्यान देना… जब खड़ा होना पड़े मुझे तो अपने अस्तित्व से ज़्यादा जगह न घेरूँ। मैं ऋग्वेद के चरवाहों की करुणा के साथ कहता हूँ— मुझे इस अनंत ब्रह्मांड में मेरे पेट से बड़ा खेत मत देना, हल के भार से अधिक शक्ति, बैल के आनंद से अधिक श्रम मत देना। मैं तोलस्तोय के किसान से सीख लेकर कहता हूँ : मुझे मत देना उतनी ज़मीन जो मेरे रोज़ाना के इस्तेमाल से ज़्यादा हो, हद से हद एक चारपाई जितनी जग...

Angoothe | Arvind Srivastava 02.07.2025

अंगूठे | अरविन्द श्रीवास्तव बताओ, कहाँ मारना है ठप्पा कहाँ लगाने हैं निशान तुम्हारे सफ़ेद—धवल काग़ज़ पर हम उगेंगे बिल्कुल अंडाकार या कोई अद्भुत कलाकृति बनकर बगैर किसी कालिख़, स्याही और पैड के अंगूठे गंदे हैं मिट्ती में सने हैं आग में पके हैं पसीने की स्याही में ।

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