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Odcinki

Abhida Ki Ek Sham | Vivek Nirala 11.07.2026

अभिधा की एक शाम।  विवेक निराला  एक छोटी शाम जोलम्बी खिंचती जाती थीबिल्कुल अभिधा में।रक्ताभा लिए रविलुकता जाता था।लक्षणा के लद चुकेदिनों के बादअभिधा की एक छोटी-सी शामधीरे-धीरेकरती रही अपना प्रसारबढ़ती जाती थी भीड़सिकुड़ता रहा सभागार।रचना ही बचना हैकोहराम मचना है-कहा कभी किसी नेबे दांत जबड़ों के बीचकुतरे जाते हुए।अहंकार से लथपथशतपथी ब्राहम्णों केपान से ललाये मुखसे होते हुए आख़िरपेट में जा पचना है।आयता...

Prakriya | Kedarnath Singh 10.07.2026

प्रक्रिया ।  केदारनाथ सिंहमैं जब हवा की तरहदृश्यों के बीच से गुज़रता हुआअकेला होता हूँतो क्षण भर के लिएमुझे कहीं भी देखा जा सकता हैकिसी भी दिशा सेकिसी भी मोड़ परकिसी भी भाषा के अज्ञातशब्दकोश मेंपर मैंजब कहीं नहीं होतासिर्फ़ कहीं होने की लगातार कोशिश मेंसामने की भीड़ कोदूर से पहचानता हुआहवा के आर-पारएक प्रश्न उछालता हूँऔर हँसता हूँतो न जाने क्योंमुझे लगता हैकि गूँज-हीन शब्दों के इस घने अंधकार मेंमै...

Vismriti | Sushma Kumari 09.07.2026

विस्मृति।  सुषमा कुमारी हम दूसरी दुनिया केचौथे, पाँचवे या सबसे निचले दर्जे केबचे हुए मुट्ठी भर अनाज हैं,आधे गेहूँ और आधे घून की तरहबची हुई हमारी नियतिजातें में पीसने को तैयार है!गेहूँ है, घून हैचक्की है, आटा है,भूख अब भी बैठी है आँत मेंहवा बदली है, मौसम बिगड़ा है।अख़बारों में युद्ध अब सबसे बड़ा मुद्दा नहीं,चूल्हे का सवालइन दिनों सबसे बड़ा सवाल है!और चूहेदानी में फंसेरोटी के टुकड़े सबसे बड़ा जाल है!...

Sau Sau Janam Pratiksha Kar Lun | Bharat Bhushan 08.07.2026

सौ-सौ जनम प्रतीक्षा कर लूँ।  भारत भूषणसौ-सौ जनम प्रतीक्षा कर लूँप्रिय मिलने का वचन भरो तो!पलकों-पलकों शूल बुहारूँअँसुअन सींचू सौरभ गलियाँभँवरों पर पहरा बिठला दूँकहीं न जूठी कर दें कलियाँफूट पडे पतझर से लालीतुम अरुणारे चरन धरो तो!रात न मेरी दूध नहाईप्रात न मेरा फूलों वालातार-तार हो गया निमोहीकाया का रंगीन दुशालाजीवन सिंदूरी हो जाएतुम चितवन की किरन करो तो!सूरज को अधरों पर धर लूँकाजल कर आँजूँ अँधियार...

O Achchi Ladkiyon | Pratibha Katiyar 07.07.2026

ओ अच्छी लड़कियों | प्रतिभा कटियार ओ अच्छी लड़कियो,तुम मुस्कुराहटों में सहेज देती हो दुःखओढ़ लेती हो चुप्पी की चुनरजब बोलना चाहती हो दिल सेतो बाँध लेती हो बतकही की पाजेबनाचती-फिरती होअपनी ही ख़्वाहिशों परऔर भर उठती हो संतोष सेकि ख़ुश हैं लोग तुमसेओ अच्छी लड़कियो,तुम अपने ही कंधे पर ढोना जानती होअपने अरमानों की लाशतुम्हें आते हैं हुनर अपनी देह को सजाने केनिभाने आते हैं रीति-रिवाज, नियमजानती हो तुम कि...

Auratein Kaam Karti Hain | Shubha 06.07.2026

औरतें काम करती हैं । शुभाचित्रकारों, राजनीतिज्ञों, दार्शनिकों कीदुनिया के बाहरमालिकों की दुनिया के बाहरपिताओं की दुनिया के बाहरऔरतें बहुत से काम करती हैंवे बच्चे को बैल जैसा बलिष्ठनौजवान बना देती हैंआटे को रोटी मेंकपड़े को पोशाक मेंऔर धागे को कपड़े में बदल देती हैंवे खंडहरों कोघरों में बदल देती हैंऔर घरों को कुएँ मेंवे काले चूल्हे मिट्टी से चमका देती हैंऔर तमाम चीज़ें सँवार देती हैंवे बोलती हैंऔर...

Laut Te Nahi Pita | Kumar Divyanshu Shekhar 05.07.2026

लौटते नहीं पिता । कुमार दिव्यनशु शेखर नीम-अँधेरे घर से निकले पिताअँधेरे से पहले लौट आने की बात दोहरा के।लौटी एक ख़बरलौटा एक एम्बुलेस।नीम-अँधेरे निकले पिताफिर नहीं लौटे।स्मृतियाँ लौट आती हैंबार-बारलौट आती हैं हिदायतेंलौटता है चेहराआँखों को बाँह ढाँपे लौट आता है सावनलौटती है गंगा की धारागाय के नाँद में चाराबारिश की नालियाँ-भुट्टों में बालियाँतुलसी का पत्ता-बया का जत्थाभोर की ओसबेठोसलौट आती है।तारीख ल...

Hulchal | Anurag Tiwari 04.07.2026

हलचल।  अनुराग तिवारी तेज़ कुछ भी हो सकता हैकिंतुसबसे तेज़ क्या हैचीते की चालबाज़ की नज़रनहीं।सबसे तेज़ हलचल होती हैजैसे आज एक हलचल हुई,मेरी आहट से दीवार पर चिपकी छिपकलीकोने में घुस गई।सबसे तेज़ हलचल शेयर बाज़ार में नहीं होती!एक्ज़िट पोल में भी हलचल तेज़ नहीं होती!भारत पाक मैच में दिन भर हलचल रहती हैलेकिन सबसे तेज़ नहीं।सबसे तेज़ हलचलउस चेतना में होती हैजिसे भ्रम था सदैव स्वतंत्र रहने का!सबसे तेज़...

Bacha Rahe Humare Beech Ka Ishwar | Arun Kumar Singh 03.07.2026

बचा रहे हमारे बीच का ईश्वर । अरुण कुमार सिंह तुम जागती करवटों से लिखते हो कोई नामसुबह चादर बूँद-बूँद  निचोड़ती है अपनी पीड़ाबहेलिए ने मारा फिर कैद कीएक चिड़ियाजिसके पेट में मिली थी प्रेम कविताउसे क्रांति की कविता भी कहा गया।जिस रात ठंड को याद कर चादर ओढ़ी थी,गर्मी बहुत थी और हम पसीने से तरबतर।ये कैसी त्रासदी जी रहे हैं हम,पास बने रहने के लिए दूर जाना ज़रूरीजिन रातों में कुछ नहीं लिखा तुमनेजीवन लिख...

Chaton Par Ladkiyan | Alok Dhanwa 02.07.2026

छतों पर लड़कियाँ ।  आलोक धन्वाअब भीछतों पर आती हैं लड़कियाँमेरी ज़िंदगी पर पड़ती हैं उनकी परछाइयाँ।गो कि लड़कियाँ आयी हैं उन लड़कों के लिएजो नीचे गलियों में ताश खेल रहे हैंनाले के ऊपर बनी सीढ़ियों पर औरफ़ुटपाथ के खुले चायख़ानों की बेंचों परचाय पी रहे हैंउस लड़के को घेर करजो बहुत मीठा बजा रहा है माउथ ऑर्गन परआवारा और श्री 420 की अमर धुनें।पत्रिकाओं की एक ज़मीन पर बिछी दुकानसामने खड़े-खड़े कुछ नौजवान...

Hoke Mayoos Na Yun Sham Se Dhalte Rahiye | Kunwar Bechain 01.07.2026

हो के मायूस न यूँ शाम से ढलते रहिए।  कुंवर बेचैनहो के मायूस न यूँ शाम से ढलते रहिएज़िंदगी भोर है सूरज से निकलते रहिएएक ही ठाँव पे ठहरेंगे तो थक जाएँगेधीरे धीरे ही सही राह पे चलते रहिएआप को ऊँचे जो उठना है तो आँसू की तरहदिल से आँखों की तरफ़ हँस के उछलते रहिएशाम को गिरता है तो सुब्ह सँभल जाता हैआप सूरज की तरह गिर के सँभलते रहिएप्यार से अच्छा नहीं कोई भी साँचा ऐ 'कुँवर'मोम बन के इसी साँचे में पिघलते...

Stree Ki Neend | Nilesh Raghuvanshi 30.06.2026

स्त्री की नींद।  नीलेश रघुवंशी एक छोटे से डाकखाने मेंवो स्त्री अपनी सीट पर इतनी उदास इतनी अकेलीसमय उसके आसपास नहीं होता ऊँघते और झपकियाँ लेतेएक ही गलती को दोहराती है बार-बार कंप्यूटर परकाउंटर पर ठक-ठक की आवाज़नींद और आलस से बाहर लाती है उसेवह लिफाफे की इबारत और भेजने वाले केहाथों के कंपन से होती है कोसों दूरनींद से भरी हुई इस स्त्री को देखदफ्तर के लोग पीटते हैं सिर कोसते हैं अपने बीच उसके होने कोघ...

Parantu | Kumar Ambuj 29.06.2026

परंतु । कुमार अम्बुजबुद्धिजीवी भी सड़क पर आ सकते हैंपरंतु क्या करें यह सरकार ठीक नहीं हैमाना कि यह लोकतंत्र हैऔर हम सुधारना चाहते हैं यह समाजपरंतु इधर ठाकुरों के वोट बहुत हैंबेचारा ज़िला दंडाधिकारी भीकरना तो चाहता है कुछ हस्तक्षेपपरंतु उसके अधिकारों में भीनिर्बल को ही दंडित कर सकना सीमित हैकहते हैं कि इस देश में कई लोग हैं दयालुपरंतु उनकी संपन्नता से ज़ाहिर  हो जाती है उनकी क्रूरतायों तो मैं ख़ुश हू...

Kitab Ke Phool | Tanwir Sheikh 'Ilham' 28.06.2026

किताब के फूल । तनवीर शेख़ 'इल्हाम’जब भीअपने प्रेमिका कोदेना गुलाबदेना संग किताबें भीताकी उन किताबों मेंउस गुलाब को संजो सकेतुम्हारे दिए खतों कोउस किताब के पन्नों में छुपा सकेऔर आजीवन के लिएइस पल को अपने स्मृति में सहेज सकेवो जब-जब उस किताब को पढ़ेतो उस गुलाब की ख़ुश्बूतुम्हारे होने का साक्षी बनेंगीऔर उसे यादों में ले जाएंगीजो उसे पुलकित करेंगेंये किताबें तुम्हारे प्रेम को जीवित रखने काकर्तव्य निभाती...

Swaron Ka Samarpan | Shrikant Verma 27.06.2026

स्वरों का समर्पण । श्रीकांत वर्माडबडब अँधेरे में, समय की नदी मेंअपने-अपने दिये सिरा दो;शायद कोई दिया क्षितिज तक जा,सूरज बन जाए!!हरसिंगार जैसे यदि चुए कहीं तारे,अगर कहीं शीश झुकाबैठे हों मेड़ों परपंथी पथहारे,अगर किसी घाटी भटकी हों छायाएँ,अगर किसी मस्तक परजर्जर हों जीवन कीत्रिपथगा ऋचाएँ;पीड़ा की यात्रा के ओ पूरब-यात्री!अपनी यह नन्हीं-सी आस्था तिरा दोशायद यह आस्था किसी प्रिय कोतट तक ले जाए!!

Deewar | Saqi Farooqui 26.06.2026

दीवार । साक़ी फ़ारुक़ीरगों में नाच रहा है इक आतिशीं ज़हराबआतिशीं: अग्निमय ज़हराब: ज़हरीला पानीतिरी तलाश फ़क़त जिस्म का तक़ाज़ा हैतिरी तलब के जहन्नम में जल रहा है बदनतलब: तलाशलहू पुकारता है क्या सुना नहीं तू नेकि मैं ने रूह की दीवार ही गिरा दी है

Ichhayein | Asteek Vajpeyi 25.06.2026

इच्छाएँ । आस्तीक वाजपेयीलकड़ी की अलमारी पर धूल,उनसे चिपकी दीवार पर टँगी इच्छाएँ।जैसे मैं अलमारी को,वैसे पूरी न हुई इच्छाएँ मुझे,झाड़ने आती हैं।

Zindagi Jab Bhi Teri Bazm Mein | Shahryar 24.06.2026

ज़िंदगी जब भी तिरी बज़्म में लाती है हमें । शहरयारज़िंदगी जब भी तिरी बज़्म में लाती है हमेंये ज़मीं चाँद से बेहतर नज़र आती है हमेंसुर्ख़ फूलों से महक उठती हैं दिल की राहेंदिन ढले यूँ तिरी आवाज़ बुलाती है हमेंयाद तेरी कभी दस्तक कभी सरगोशी सेरात के पिछले-पहर रोज़ जगाती है हमेंहर मुलाक़ात का अंजाम जुदाई क्यूँ हैअब तो हर वक़्त यही बात सताती है हमें

Milan | Bharat Bhushan Aggarwal 23.06.2026

मिलन । भारतभूषण अग्रवालछलक कर आई न पलकों पर विगत पहचान,मुस्कुरा पाया न ओठों पर प्रणय का गान;ज्यों जुड़ीं आँखें, मुड़ीं तुम, चल पड़ा मैं मूक -इस मिलन से और भी पीड़ित हुए ये प्राण।

Diya | Om Prakash Valmiki 22.06.2026

दिया । ओमप्रकाश वाल्मीकि कच्चे घर मेंजलते दीए की रोशनी परक़ब्ज़ा करके बैठ गए हो तुम।लौ के ठीक ऊपर काला धुआँ है।जो पर्त दर-पर्तकालिख पोत रहा हैदीवार पर,नीचे गहरा अँधेरा हैजिसमें दीपदान को पकड़े रहा हूँ मैंहज़ार-हज़ार वर्षों से अनवरत।मेरी पिंडलियोंऔर भुजाओं के माँस से बनी हैं बातीहड्डियों को निचोड़करनिकाला गया है तेल।अँधेरे में,कालिख पुता मेरा जिस्मजिसे तुमने अपवित्रघोषित कर दियातिल-तिल जल रहा हैतुम...

Mobile | Manglesh Dabral 21.06.2026

मोबाइल । मंगलेश डबरालवे गले में सोने की मोटी जंज़ीर पहनते हैंकमर में चौड़ी बेल्ट लगाते हैंऔर मोबाइलों पर बात करते हैंवे एक आधे अँधेरे और आधे उजले रेस्तराँ में घुसते हैंऔर खाने और पीने का ऑर्डर देते हैंवे आपस में जाम टकराते हैंऔर मोबाइलों पर बात करते हैंउनके मोबाइलों का रंग काला है या आबनूसीचाँदी जैसा या रहस्यमय नीलाउनके आकार पतले छरहरे या सुडौल आकर्षकवे अपने नए मोबाइलों को अपनी नई प्रेमिकाओं की तर...

Ve Kaise Din The | Kirti Chowdhary 20.06.2026

वे कैसे दिन थे। कीर्ति चौधरीवे कैसे दिन थेजब चीज़ें भागती थींऔर हम स्थिर थेजैसे ट्रेन के एक डिब्बे में बंद झाँकते हुएओझल होते थे दृश्यपल के पल में—...कौन थी यह तार पर बैठी हुईबुलबुल, गौरय्या या नीलकंठ?आसमान को छूता हुआसवन का जोड़ा था?दूरी पर झिलमिल-झिलमिल करतीनदिया थी?या रेती का भ्रम?कभी कम कभी ज़्यादाप्रश्न ही प्रश्न उठते थेहम विमूढ़ ठगे-सेसुलझाते ही रहतेऔर चीज़ें हो जाती थीं ओझलवे कैसे दिन थेजो रहे...

Hey Meri Uttara | Ashutosh Sharma 19.06.2026

 हे मेरी उत्तरा! । आशुतोष शर्मामेरे शस्त्र की धारमयी रति कोतुम्हारी भाषा के वैराग्य ने छीन लिया थाहे मेरी उत्तरा!मेरे रण में जाने से पूर्वतुम्हारे ऑँचल का सतीत्वमुझे आगाह कर रहा थाएक भयंकर सामूहिक पाप के प्रतिमेरे मातुल की वंशी सेएक मौन भाप की ध्वनि आ रही थीगांडीव अपने चरण मुझसे दूर हटा रहा थाआधा सा लग रहा था पिता भीम का आश्वासनहै मेरी उत्तरा!तुम्हारे बाल वैधव्यता सेकुरुक्षेत्र के मंडप में होगा मे...

Ladna | Pawan Karan 18.06.2026

लड़ना।  पवन करणमुझे उन सबकी ख़ूब याद आती हैजिन्होंने मुझसे कई बार कहाकि मुझे लड़ना चाहिएमैं उन सबको कभी भूल नहीं पाताजो मुझसे हमेशा कहते रहे कि मुझेलड़ने से डरना नहीं चाहिएमैं उनसे माफ़ी माँगना चाहता हूँजिन्होंने मुझसे कहा कि मैं हीनहीं लड़ूँगा तो फिर कौन लड़ेगामैंने उनकी मानी होतीतो मैं भी लड़कर हारा होता

Pahadi Baccha | Nirmala Putul 17.06.2026

पहाड़ी बच्चा ।  निर्मला पुतुल पहाड़ की गोद में  पहाड़ के छोटे-छोटे टुकड़ों साखेलता है पहाड़ी बच्चा  लड़खड़ाते  कदमों से पहाड़ चढ़ते रोपता है पहाड़ी धरती पर पाँव पहाड़ी माहौल में पहाड़ की तरह पूरी ताकत से होने के लिए पहाड़ी बच्चों के भीतर होता है पूरा का पूरा पहाड़,और पहाड़ों की गोद में होता है  दौड़ता, भागता पहाड़ी बच्चा,पहाड़ी बच्चा देखता है पहाड़ के ऊपर से गुज़रता जहाज़ और पूछता है पिता सेउस नए पक्षी के बारे...

O podcaście

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

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Arts

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HI

Odcinki

1195

Ostatni odcinek

11 lip 2026

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