Nayi Dhara Radio
Pratidin Ek Kavita
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
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Último episodio
14 de oct. de 2026
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Episodios
Chandroday Humne Kabse Nahi Dekha | Gyanendrapati 17.05.2026 2:30
चन्द्रोदय हमने कब से नहीं देखा । ज्ञानेन्द्रपति चन्द्रोदय! हमने कब से नहीं देखा प्रायः उस समय टी.वी. के किसी-न-किसी चैनल पर कोई-न-कोई नैनसुख कार्यक्रम चलता रहता है कोई-न-कोई चन्द्रमुखी उजागर कर रही होती है हमारे जीवन का अँधेरा और कभी जब देर से घर लौटते किसी क्षितिजवान सड़क के माथ पर औचक दिखा कभी नवोदित चाँद, देखता अनदेखी की हमने आँख मिलाने से डरे सड़क पकड़े चलते गए आदतन कि आँखें मिलने पर पूछना ह...
Abhinay | Manglesh Dabral 16.05.2026 3:04
अभिनय । मंगलेश डबराल एक गहन आत्मविश्वास से भरकर सुबह निकल पड़ता हूँ घर से ताकि सारा दिन आश्वस्त रह सकूँ एक आदमी से मिलते हुए मुस्कराता हूँ वह एकाएक देख लेता है मेरी उदासी एक से तपाक-से हाथ मिलाता हूँ वह जान जाता है मैं भीतर से हूँ अशांत एक दोस्त के सामने ख़ामोश बैठ जाता हूँ वह कहता है तुम दुबले बीमार क्यों दिखते हो जिन्होंने मुझे कभी घर में नहीं देखा वे कहते हैं अरे आप टी.वी. पर दिखे थे एक दिन बाज...
Baat Yah Nahi Hai | Teji Grover 15.05.2026 1:48
बात यह नहीं है । तेजी ग्रोवर बात यह नहीं है कि कहीं भी मन नहीं लगता, कहीं भी जड़ महसूस नहीं होती, कहीं भी अकेलापन साथ नहीं छोड़ता। बात ठीक इससे उलट है। हर जगह मन लगता है। हर जगह जड़ महसूस होती है। हर जगह सान्निध्य है, स्नेह है, साथ है। आत्मीयता से भरे हुए नक्षत्र पर किससे कहूँ कि ऐसा है... कौन मेरी बात का विश्वास करेगा?
Haan Dost | Agyeya 14.05.2026 2:45
हाँ, दोस्त। अज्ञेय हाँ, दोस्त, तुम ने पहाड़ की पगडंडी चुनी और मैं ने सागर की लहर। पहाड़ की पगडंडी : सँकरी, पथरीली, ढाँटी,पर स्पष्ट लक्ष्य की ओर जाती हुई : मातबर और भरोसेदार पगडंडी जो एक दिन निश्चय तुम्हें पड़ाव पर पहुँचा देगी। सागर की लहर विशाल, चिकनी, सपाट पर बिछलती फिसलती हमेशा अज्ञात अदृश्य को टेरती हुई, बेभरोस और आवारा... लहर जो न कभी कहीं पहुँचेगी न पहुँचाएगी न पहुँचने देगी, जो डुबोएगी नहीं त...
Seedhi | Padmaja Sharma 13.05.2026 1:40
सीढ़ी । पद्मजा शर्मा जो किसी को सीढ़ी बनाकर ऊपर चढ़ रहे हैं वह मुझसे कह रहे हैं तुम कमज़ोर हो कब से खड़ी हो बीच रास्ते हट जाओ वे नहीं जानते कि सीढ़ी के हटते ही वे गिरेंगे मैं फिर भी खड़ी रहूँगी
Lekar Seedha Naara | Shamsher Bahadur Singh 12.05.2026 1:35
लेकर सीधा नारा। शमशेर बहादुर सिंह लेकर सीधा नारा कौन पुकारा अंतिम आशाओं की संध्याओं से? पलकें डूबी ही-सी थीं - पर अभी नहीं; कोई सुनता-सा था मुझे कहीं; फिर किसने यह, सातों सागर के पार एकाकीपन से ही, मानो -हार, एकाकी उठ मुझे पुकारा कई बार? मैं समाज तो नहीं; न मैं कुल जीवन; कण-समूह में हूँ मैं केवल एक कण। - कौन सहारा! मेरा कौन सहारा!
Pasand Ki Jane Wali Stree | Savita Singh 11.05.2026 1:48
पसन्द की जाने वाली स्त्री । सविता सिंह प्रेम करती हुई स्त्री ही अब भी पसन्द की जाती है छल में भी एक अजीब जादू है जो झूठ में नहीं कितना मिलता-जुलता है झूठ भी सच से आख़िर मृत्यु ज्यों प्रेम से अन्त में सच ही बचाता है हर स्त्री को लेकिन तब तक वह तब्दील हो चुका होता है झूठ में कुछ इस तरह कि वह उस के किसी काम का नहीं रहता छल रहता है ज्यों का त्यों तब भी अपने काम करता प्रेम और मृत्यु का रथ हाँकता
Kis Jane Kis Ki Pyas Bujhane Kidhar Gayin | Kaifi Azmi 10.05.2026 2:00
क्या जाने किस की प्यास बुझाने किधर गईं । कैफ़ी आज़मी क्या जाने किस की प्यास बुझाने किधर गईं इस सर पे झूम के जो घटाएँ गुज़र गईं दीवाना पूछता है ये लहरों से बार बार कुछ बस्तियाँ यहाँ थीं बताओ किधर गईं अब जिस तरफ़ से चाहे गुज़र जाए कारवाँ वीरानियाँ तो सब मिरे दिल में उतर गईं पैमाना टूटने का कोई ग़म नहीं मुझे ग़म है तो ये कि चाँदनी रातें बिखर गईं पाया भी उन को खो भी दिया चुप भी हो रहे इक मुख़्तसर सी रात...
Choolha | Tanwir Sheikh 'Ilham' 09.05.2026 3:03
चूल्हा । तनवीर शेख़ 'इल्हाम’ चूल्हे ने संभाला पितृसत्ता को और बनाएं रखा अपना वर्चस्व ये चूल्हा स्त्रियों के ऊपर ऐसे स्थापित किया गया जो पुरुषों के रौब को आजीवन कायम रख सके पितृसत्ता ने चूल्हे के सहारे से स्त्रियों के सत्य को, उनके सपने को और उनके व्यक्तित्व को हमेशा जलाए रखा कितनी ही स्त्रियों को ब्याहा गया सिर्फ चूल्हे में झोंकने को मानो ये चूल्हा पकवान बनाने के लिए आविष्कार नहीं बल्कि पुरुषों...
Wo Ladke Kaun They | Gautam Kumar 08.05.2026 1:53
वो लड़के कौन थे | गौतम कुमार ख़ामोशी तोड़ो क्यों देखते हो अगली बारिश की राह क्यों कर रहे हो अपनी मिट्टी से उठने वाली सौंधी ख़ुशबू का इंतज़ार अब कौन-सी फ़सल है जिसकी फ़िक्र तुम्हें सता रही है खेतों तुम किसका पेट भरना चाहते हो किसे भूखा रखना चाहते हो खेतों तुम नहीं शरीक-ए-जुर्म पर सनद रहे तुम्हारी मिट्टी आबाद फ़सलों के पस-ए-मंज़र में बर्बाद नस्लों के ख़ून से सनी है तुम बोलो तुम तो जानते हो वो लड़की कौन थी वो ल...
Roop Naran Ke Tat Par | Rabindranath Tagore | Translation - Hans Kumar Tiwari 07.05.2026 1:28
रूप-नारान के तट पर । रवींद्रनाथ टैगोर अनुवाद : हंसकुमार तिवारी रूप-नारान के तट पर जाग उठा मैं। जाना, यह जगत् सपना नहीं है। लहू के अक्षरों में लिखा अपना रूप देखा; प्रत्येक आघात प्रत्येक वेदना में अपने को पहचाना। सत्य कठिन है कठिन को मैंने प्यार किया— वह कभी छलता नहीं। मरने तक के दुःख का तप है यह जीवन - सत्य के दारुण मूल्य को पाने के लिए मृत्यु में सारा ऋण चुका देना।
Dharti | Sharad Bilore 06.05.2026 1:36
धरती । शरद बिलौरे दो बरस की नीलू आसमान तकती है पापा से कहती है पापा मुझे आसमान चाहिए। पापा ने कभी आसमान जैसी चीज़ अपने बाप से नहीं माँगी एक बार तारे ज़रूर माँगे थे। पापा डरे हुए हैं सोचते हैं मैं धरती पर खेल कर बड़ा हुआ क्या नीलू आसमान ताक कर बड़ी होगी और यह कि मैंने अपने बाप से और नीलू ने मुझसे धरती क्यों नहीं माँगी। क्या सचमुच धरती बच्चों के खेलने की चीज़ नहीं!
Ahimsa | Kanhaiyalal Sethia 05.05.2026 1:15
अहिंसा । कन्हैयालाल सेठिया नहीं है हिंसा का नकारात्मक बोध अहिंसा एक मौलिक शोध चिंत्य है जिसमें दृष्टि से परे दर्शन जीवन से परे आत्मा जिसकी मीमांसा अनेकांत भूमिका सर्वोदय!
Unghta Santri | Vishwanath Prasad Tiwari 04.05.2026 2:01
ऊँघता संतरी। विश्वनाथ प्रसाद तिवारी उसे मत जगाओ वह सपने देख रहा है बच्चे लौट रहे हैं उसके सपने में पक्षी चहचहा रहे हैं उसके सपने में बदल रहे हैं इंद्रधनुष के रंग उसके सपने में झर रहे हैं गुलमुहर के फूल उसके सपने में उसे मत जगाओ उसकी नींद पर पाबंदी है अभी एक झपकी में वह लूट लेगा ब्रहमांड अभी एक हलका-सा पदचाप चकनाचूर कर देगा उसका शीशमहल देवदूत की तरह सो रहा है वह उसे मत जगाओ अभी वह उछलकर खड़ा हो जा...
Daant Ki Khidki | Nilesh Raghuvanshi 03.05.2026 2:07
दाँत की खिड़की। नीलेश रघुवंशी बारिश से पहले बादलों की गड़गड़ाहट बिजली के चमकने-सा मुस्कराता चेहरा सहेली का तिस पर "पहचाना-पहचाना' भरी बारिश में छपाक-छपाक की आवाज़ हा याद आया अपन एक बार..कहते सिर खुजलाना पीठ पर पड़ती धौल तुम क्यों पहचानोगी भैया झमाझम बारिश में बिना छतरी के भीग-भीग जाना गलबहियाँ डाल सहेली करो याद करो याद की रट लगाए घूमते हैं आँखों के आगे हजारों हज़ार चेहरे अँटता नहीं जिनमें चेहरा सह...
Kavita Kavi Ke Dimaag Mein | Aishwarya Tiwari 02.05.2026 1:41
कविता कवि के दिमाग में । ऐश्वर्या तिवारी कविता कवि के दिमाग में पलती है और जन्म लेती है कलम की कोख से बड़ी होती है भाषाओं के मेले में दोस्ती करती है, तेज़ तर्रार मन को पसीज और झंझोड़ देने वाले शब्दों से कभी आईना देखती है तो कभी आईना दिखलाती और एक दिन पूर्ण होकर ब्याह रचा लेती है अपने प्रियतम कागज से जो था बरसों से उसकी ताक में कविता कवि के दिमाग में
Bachhe Kaam Par Ja Rahe Hain | Rajesh Joshi 01.05.2026 2:21
बच्चे काम पर जा रहे हैं। राजेश जोशी कुहरे से ढँकी सड़क पर बच्चे काम पर जा रहे हैं सुबह-सुबह बच्चे काम पर जा रहे हैं हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह भयानक है इसे विवरण की तरह लिखा जाना लिखा जाना चाहिए इसे सवाल की तरह काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे? क्या अंतरिक्ष में गिर गई हैं सारी गेंदें क्या दीमकों ने खा लिया है सारी रंग-बिरंगी किताबों को क्या काले पहाड़ के नीचे दब गए हैं सारे खिलौने क्या कि...
Baatein | Navin Sagar 30.04.2026 1:16
बातें । नवीन सागर बातें करते हुए बातों के परे हम एक-एक के होते जाते हैं सोते जाते हैं जैसे सफ़र में बैठ-बैठ बातों में होते हैं हम जितना उतने से कई गुना कहीं और होते हैं आख़िर को दिखते हैं ना होकर होते हैं जहाँ वहाँ दिखते ही नहीं हैं।
Jung | Balraj Komal 29.04.2026 1:47
जंग । बलराज कोमल तीरगी में भयानक सदाएँ उठीं और धुआँ सा फ़ज़ाओं में लहरा गया मौत की सी सपेदी उफ़ुक़-ता-उफ़ुक़ तिलमिलाने लगी और फिर एक दम सिसकियाँ चार-सू थरथरा कर उठीं एक माँ सीना-कूबी से थक कर गिरी इक बहन अपनी आँखों में आँसू लिए राह तकती रही एक नन्हा खिलौने की उम्मीद में सर को दहलीज़ पर रख के सोता रहा एक मा'सूम सूरत दरीचे से सर को लगाए हुए ख़्वाब बुनती रही मुंतज़िर थीं निगाहें बड़ी देर से मुंतज़िर...
Safar Ke Saathi | Natasha 28.04.2026 1:32
सफ़र के साथी । नताशा वे मेरे कोई नहीं थे जिनका रह गया पानी उधार मुझ पर उन कंधों की स्मृति शेष है जिन पर मेरी नींद विदा हो गई है उन पर रह गया उधार मेरे चुंबन का स्पर्श बीच रस्ते में जिनसे बिछड़ जाना पड़ा था उन चेहरों को निहारना था जिन्होंने लंबे सफ़र में मेरी भूख को बाँटा जिनके संबोधन के सूत्र ध्वनि में घुल मेरे घर चले आए मैं कैसे चुकाऊँगी ये कर्ज़ उन अजनबियों के जो मेरे कोई नहीं थे!
Chutti Ka Din | Shariq Kaifi 27.04.2026 1:26
छुट्टी का दिन । शारिक़ कैफ़ी ये मेरी मौत पर छुट्टी का दिन है कैलेंडर पर छपी ये आज की तारीख़ मेरी मौत ही से लाल हो सकती थी शायद सवेरे तक जो काली रौशनाई (सियाही) से लिखी थी मज़ा ही कुछ अलग है ऐसी छुट्टी का अचानक जो मिले ये मेरा आख़िरी तोहफ़ा है अपने साथियों को वगरना पीर (वृहस्पतिवार) का दिन कितना सर-दर्दी भरा होता है दफ़्तर का ये दुनिया जानती है
Baarish | Girdhar Rathi 26.04.2026 1:24
बारिश । गिरधर राठी बारिश जहाँ जोड़ती है ठीक वहीं तोड़ती है गुनगुनाती है अपने-आप लहराती हहराती है अपने-आप चुप हो जाती है बरसती रहती है अपने-आप तुम्हें कुछ नहीं करने देती ... दीवार है बारिश हे बनती और टूटती टूट-टूट पड़ती एकांत पर एकांत बारिश में (भी) ढहता नहीं
Badan Ka Faisla | Mohammad Alvi 25.04.2026 1:22
बदन का फ़ैसला । मोहम्मद अल्वी ये बदन जिसे मैं बेहतरीन ग़िज़ाएँ (भोजन) खिलाता रहा पानी की जगह शराब पिलाता रहा यही बदन मुझ से कहता है जाओ दफ़ा हो जाओ जन्नत के मज़े उड़ाओ कि दोज़ख़ के अज़ाब उठाओ मेरी बला से मैं तो अब क़ब्र में सो रहूँगा मिट्टी हूँ मिट्टी का हो रहूँगा!!
Mere Naseeb ka Likha | Shayar Jamali 24.04.2026 2:17
मिरे नसीब का लिक्खा बदल भी सकता था । शायर जमाली मेरे नसीब का लिक्खा बदल भी सकता था वो चाहता तो मेरे साथ चल भी सकता था ये तू ने ठीक किया अपना हाथ खींच लिया मेरे लबों से तिरा हाथ जल भी सकता था उड़ाती रहती है दुनिया ग़लत-सलत बातें वो संग-दिल* था तो इक दिन पिघल भी सकता था संग-दिल: पत्थर दिल उतर गया तिरा ग़म रूह की फ़ज़ाओं में रगों में होता तो आँखों से ढल भी सकता था मैं ठीक वक़्त पे ख़ामोश हो गया वर्...
Hum Rote Thodi Hain Pagal | Pradip Awasthi 23.04.2026 1:47
हम रोते थोड़ी हैं पागल । प्रदीप अवस्थी हमारे हिस्से आईं जो उदासियाँ गले तक भर आए जो दुख के घड़े जला गया आँखों को जो गरम पानी और जो कहानियाँ बनाईं अपने दिमाग़ में जिनमें हम सबसे उत्पीड़ित किरदार तुम्हें बाँहों में भरते ही गलेगा सब हम रोते थोड़ी हैं पागल ये तो बस तस्वीरें अय्यारी करती हैं।
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