प्रकर्ष प्रकाश

न्याय दर्शन AI

क्या है प्रमाण? सत्य को जानने का उपाय क्या है? संदेह, अनुमान, उपमान — ये सब कैसे काम करते हैं?“न्याय दर्शन – तर्क और प्रमाण का भारतीय विज्ञान” पॉडकास्ट में हम भारतीय तत्त्वज्ञान की एक महत्त्वपूर्ण शाखा, न्याय शास्त्र, का गहन अन्वेषण करते हैं। यह दर्शन शास्त्र केवल मुक्त‍ि की नहीं, बल्कि तर्कशक्ति, प्रमाण, आत्मा, मोक्ष, और पदार्थ के यथार्थ स्वरूप की भी वैज्ञानिक विवेचना करता है।🔹 प्राचीन न्याय सूत्रों की सरल व्याख्या🔹 गौतम ऋषि की विचारप्रणाली🔹 प्रमाणों के प्रकार — प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द🔹 तर्क और संशय की भूमिका🔹 आधुनिक जीवन में न्याय दर्शन की उपयोगिताहर सप्ताह एक नई कड़ी —

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Autor

प्रकर्ष प्रकाश

Categoría

Society

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Último episodio

2 de abr. de 2026

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Episodios

The_Celibate_Sexologist 02.04.2026

The_Celibate_Sexologist

सत्प्रतिपक्ष का दार्शनिक विश्लेषण 25.06.2025

प्रस्तुत पाठ  संशयजनक अनुमान  से संबंधित एक  दार्शनिक विश्लेषण  प्रस्तुत करता है, जहाँ एक विशेष मत, जिसे रत्नकोशकार का माना जाता है, यह तर्क देता है कि  सत्प्रतिपक्ष  (एक प्रकार का दोष)  संशय-उत्पादक  है, न कि ज्ञान का अवरोधक। इस मत के अनुसार, साध्य (जिसे सिद्ध करना है) और साध्याभाव (उसके अभाव) दोनों के परामर्श की उपस्थिति में  संशयात्मक अनुमान  उत्पन्न होता है। हालाँकि, ग्रंथकार इस विचार का खंडन...

अनुमान के प्रतिबंधक - संशयात्मक अनुमिति 25.06.2025

🔷 मूल विमर्श:यह चर्चा संशयात्मक अनुमिति (Doubt-generating inference) की उत्पत्ति और उसमें प्रतिबन्धकता (inhibitory factor) की भूमिका पर केन्द्रित है।🟠 पूर्वपक्ष (रत्नकोशकार का मत):अनुमिति (inference) की उत्पत्ति तभी रुकती है जब कोई प्रतिबन्धक (inhibitor) हो।लेकिन संशयात्मक अनुमिति की उत्पत्ति के लिए किसी प्रतिबन्धक की आवश्यकता नहीं, बल्कि यह साध्य और साध्याभाव, दोनों की स्मृति या परामर्श से उत्प...

अनुमान, व्याप्ति, परामर्श और करण 24.06.2025

यह अंश भारतीय दर्शन में  अनुमान  (अनुमानित ज्ञान) की प्रक्रिया को समझाता है, जिसमें मुख्य रूप से न्याय दर्शन के सिद्धांतों का उपयोग किया गया है। यह बताता है कि  परामर्श  (व्याप्ति के ज्ञान और हेतु के अवलोकन का संयोजन) वह मानसिक प्रक्रिया है जो अनुमान की ओर ले जाती है, जबकि  व्याप्ति-ज्ञान  (धूम और अग्नि जैसे दो तत्वों के बीच आवश्यक संबंध को जानना) वास्तविक  करण  (ज्ञान का साधन) है। स्रोत इस बात पर...

भागवत पुराणों में महापुराणत्व का विवाद 23.06.2025

यह अंश  'भागवत पुराणों में महापुराणत्व का विवाद'  नामक स्रोत से लिया गया है, जो  देवीभागवत  और  विष्णुभागवत  नामक दो 'भागवत' पुराणों की स्थिति पर केंद्रित है। पाठ इस बात पर चर्चा करता है कि इन दोनों में से कौन सा  महापुराण  है और कौन सा  उपपुराण । यह दर्शाता है कि विद्वानों के बीच इस विषय पर मतभेद हैं, कुछ  विष्णुभागवत  को महापुराण मानते हैं जबकि अन्य  देवीभागवत  को। स्रोत इस बात प...

भारतीय न्यायशास्त्र अनुमान और संशय विश्लेषण 23.06.2025

यह न्यायशास्त्र का एक गूढ़ विवेचन है जो  अनुमान  (inference) और  संशय  (doubt) की प्रकृति पर केंद्रित है। इसमें मुख्य रूप से  प्रतिबन्धकता  (inhibition) की भूमिका पर चर्चा की गई है, जहाँ यह समझाया गया है कि किसी ज्ञान का न होना या संशय की उत्पत्ति केवल सामग्री की अनुपस्थिति से नहीं, बल्कि किसी विरोधी ज्ञान या कारक द्वारा  अवरुद्ध  होने से होती है।  रत्नकोशकार  का मत है कि संशय के लिए प्रतिबन्धक आव...

सत्प्रतिपक्ष दार्शनिक विश्लेषण और संशय 23.06.2025

प्रस्तुत पाठ  संशयजनक अनुमान  से संबंधित एक  दार्शनिक विश्लेषण  प्रस्तुत करता है, जहाँ एक विशेष मत, जिसे रत्नकोशकार का माना जाता है, यह तर्क देता है कि  सत्प्रतिपक्ष  (एक प्रकार का दोष)  संशय-उत्पादक  है, न कि ज्ञान का अवरोधक। इस मत के अनुसार, साध्य (जिसे सिद्ध करना है) और साध्याभाव (उसके अभाव) दोनों के परामर्श की उपस्थिति में  संशयात्मक अनुमान  उत्पन्न होता है। हालाँकि, ग्रंथकार इस विचार का खंडन...

न्याय सिद्धांत मुक्तावलि में अनुमान 23.06.2025

यह "न्यायसिद्धान्तमुक्तवली - दिनकरी - अनुमानखण्डम्"  से प्राप्त उद्धरणों को प्रस्तुत करता है, जो भारतीय दर्शन के न्याय स्कूल से संबंधित  अनुमान (निष्कर्ष)  की अवधारणा की पड़ताल करते हैं। यह खंड  तर्क (परमर्श) ,  अव्याप्ति (गलत व्याप्ति) , और  हेत्वाभास (तार्किक भ्रांतियाँ)  जैसे महत्वपूर्ण विषयों को समझाता है, जो सही ज्ञान (अनुमिति) प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण हैं। पाठ में विभिन्न प्र...

वित्तीय (Finance) जगत में न्याय दर्शन के हेत्वाभास 23.06.2025

यह दस्तावेज़ न्याय दर्शन के पाँच  हेत्वाभासों  (तर्क दोषों) को वित्तीय जगत के उदाहरणों से समझाता है।  सव्यभिचार  तब होता है जब कारण और परिणाम का संबंध अनियमित हो, जैसे बजाज फाइनेंस के बढ़ने पर निफ्टी का हमेशा न बढ़ना।  सत्प्रतिपक्ष  में समान कारण से दो विरोधी निष्कर्ष निकाले जाते हैं, जैसे ब्याज दरें घटने पर बैंकिंग सेक्टर में वृद्धि और गिरावट दोनों का दावा।  असिद्ध  तब होता है जब कारण ही अविश्वसन...

हेत्वाभास – Advertise के माध्यमों से तर्कों की समझ 23.06.2025

विज्ञापन के हेत्वाभास: तर्कों की पहचान1 यह दस्तावेज़  न्याय दर्शन  के  हेत्वाभासों  (तर्क दोषों) की अवधारणा को विज्ञापनों में उनके अनुप्रयोग के माध्यम से समझाता है। यह बताता है कि कैसे विज्ञापन भावनात्मक अपीलों और अतिरंजना का उपयोग करके गलत तर्क पेश करते हैं। पाठ  सव्यभिचार ,  सत्प्रतिपक्ष ,  असिद्ध  (आश्रय-असिद्ध, स्वरूप-असिद्ध, उभय-असिद्ध सहित),  बाधित , और  व्यभिचार  जैसे विभिन्न हेत्वाभासों की...

हेत्वाभास के आधुनिक उदाहरण 23.06.2025

यह दस्तावेज़ न्याय दर्शन के पाँच प्रमुख  हेत्वाभासों  (तर्क दोषों) की व्याख्या करता है, जिसमें बताया गया है कि ये दोष कैसे आधुनिक जीवन, विशेषकर सोशल मीडिया और दैनिक संवाद में दिखाई देते हैं। इसमें  सव्यभिचार  (अपूर्ण तर्क),  सत्प्रतिपक्ष  (संतुलित प्रति-तर्क),  असिद्ध  (अप्रमाणित कारण),  बाधित  (खंडित कारण), और  व्यभिचार  (अनियमित संबंध) शामिल हैं। विशेष रूप से,  असिद्ध हेत्वाभास  के तीन उपभेद— आश...

चुटकुलों में हेत्वाभास के उदाहरण 23.06.2025

यह दस्तावेज़  न्याय दर्शन  के पाँच प्रकार के  हेत्वाभास  (तर्क दोष या गलत कारणों) को स्पष्ट करता है, जहाँ एक तर्क का आधार या  हेतु  त्रुटिपूर्ण होता है। यह लेख  सव्यभिचार  (अनियमितता),  सत्प्रतिपक्ष  (समान विरोधी कारण),  असिद्ध  (अप्रमाणित कारण),  बाधित  (प्रत्यक्ष खंडन) और  व्यभिचार  (गलत सामान्यीकरण) जैसे हेत्वाभासों की पहचान करता है। प्रत्येक प्रकार को एक  परिभाषा , एक  शास्त्रीय उदाहरण  और एक ...

हेत्वाभास के फिल्मी उदाहरण 23.06.2025

यह दस्तावेज़  न्याय दर्शन  के पाँच प्रकार के  हेत्वाभास  (तार्किक दोष) को बॉलीवुड फ़िल्मों के उदाहरणों से समझाता है।  सव्यभिचार  तब होता है जब कारण हमेशा परिणाम नहीं देता, जैसे "पुलिस आने से क्राइम होता है"।  सत्प्रतिपक्ष  में विरोधी पक्ष समान रूप से प्रबल तर्क प्रस्तुत करता है, जैसे 'लगान' में बारिश न होने के दो अलग-अलग कारण।  असिद्ध  तब होता है जब कारण स्वयं अप्रमाणित होता है,...

विज्ञापनों में हेत्वाभासों का उपयोग 23.06.2025

विज्ञापनों में हेत्वाभासों के उपयोग से उपभोक्ताओं पर क्या प्रभाव पड़ता है? विज्ञापनों में हेत्वाभासों का उपयोग उपभोक्ताओं पर विभिन्न प्रकार के प्रभाव डालता है, जो मुख्य रूप से उन्हें गुमराह करने और गलत धारणाएँ बनाने से संबंधित हैं:1.भ्रामक जानकारी और झूठी उम्मीदें: विज्ञापन अक्सर भावनात्मक अपील, अतिरंजना और गलत तर्कों का उपयोग करते हैं1. ये हेत्वाभास उपभोक्ताओं को गुमराह करते हैं और उन्हें उत्पाद...

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