Siva Prasad
Gita Acharan
Bhagavad Gita is a conversation between Lord Krishna and Warrior Arjun. The Gita is Lord's guidance to humanity to be joyful and attain moksha (salvation) which is the ultimate freedom from all the polarities of the physical world. He shows many paths which can be adopted based on one's nature and conditioning. This podcast is an attempt to interpret the Gita using the context of present times. Siva Prasad is an Indian Administrative Service (IAS) officer. This podcast is the result of understanding the Gita by observing self and lives of people for more than 25 years, being in public life.
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Autor
Siva Prasad
Categoría
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Último episodio
27 de oct. de 2026
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Episodios
248. कर्म ही आधार है 27.10.2026 3:40
सामान्यतः यह माना जाता है कि आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करने के लिए भगवद्गीता तीन मार्गों की शिक्षा देती है -सांख्ययोग, जो बुद्धि-प्रधान व्यक्तियों के लिए ज्ञान और जागरूकता का मार्ग है; भक्तियोग, जो हृदय-प्रधान व्यक्तियों के लिए समर्पण का मार्ग है; और कर्मयोग, जो मन-प्रधान व्यक्तियों के लिए कर्म या क्रिया का मार्ग है।श्रीकृष्ण कहते हैं “केवल अज्ञानी ही सांख्य और कर्मयोग को भिन्न बताते हैं, न कि ज्ञा...
247. सभी कर्म दोषयुक्त हैं 19.10.2026 4:16
श्रीकृष्ण कहते हैं “प्रत्येक कर्म में कुछ न कुछ दोष अवश्य होता है, जैसे अग्नि धुएँ से आच्छादित होती है; अतः सहज कर्मों को त्यागना नहीं चाहिए” (18.48)। यहाँ ‘सहज कर्म’ का अर्थ हमारे स्वाभाविक कर्तव्यों से लिया गया है। एक अन्य दृष्टि से, इसका अर्थ ‘अस्तित्व से स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होने वाले कर्मों’ से भी लगाया जा सकता है। चाहे कोई भी अर्थ लिया जाए, श्रीकृष्ण का निष्कर्ष यह है कि प्रत्येक कर्म कि...
246. एक साधे सब सधै 14.10.2026 3:39
कहा जाता है कि सृष्टि मात्र एक लीला (दैवी खेल) है और इस खेल को रोचक बनाए रखने के लिए कुछ नियम बनाए गए हैं। जैसे फुटबॉल के खेल में यदि गोलपोस्ट बहुत छोटा या बहुत बड़ा हो जाए तो खेल का रोमांच समाप्त हो जाता है। उसी प्रकार, जन्म के बाद मृत्यु का आना, विभाजन या पृथक्करण का होना -ये सभी सृष्टि के ऐसे रोचक नियम हैं जिन्होंने जीवन के विकास में योगदान दिया और अंततः हमारे जैसे जटिल जीवन-रूपों का निर्माण हु...
245. कर्म ही पूजा है 05.10.2026 4:02
सामाजिक वर्गीकरण और उनसे संबंधित कर्मों को उनकी प्रकृति से उत्पन्न गुणों के आधार पर समझना भगवद्गीता के सबसे जटिल पहलुओं में से एक है। यह कठिनाई इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि हम किसी न किसी वर्ण के साथ गहराई से अपनी पहचान जोड़ लेते हैं। निम्नलिखित श्लोक यह स्पष्ट करते हैं कि वर्ण न तो श्रेणीबद्ध हैं और न ही किसी एक को श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि किसी भी व्यक्ति द्वारा किए गए कर्मों में सिद्धि (पूर्ण...
244. वर्गीकरण की विशेषताएँ 30.09.2026 4:11
जीवन का विकास, विभाजनों और भिन्नताओं का परिणाम है। किंतुइन विभाजनों के पीछे एक ‘एकत्व’ विद्यमान है जैसे विभिन्न मोतियों को एक सूत्र में पिरोने वाला अदृश्य धागा (7.7)। उद्देश्य यह है कि हम अपने चारों ओर दिखाई देने वाले अव्यवहारिक और तर्कहीन विभाजनों के मध्य उस ‘एकत्व’को अनुभव करने की क्षमता विकसित करें। यह क्षमता ‘एकत्व’ की जागरूकता और अपने कर्मों में संतुलन स्थापित करने के माध्यम से विकसित की जा स...
243. गुण ही विभाजन का कारण हैं 27.09.2026 4:07
श्रीकृष्ण कहते हैं “मैंने गुणों और कर्मों के भेद के अनुसार चार वर्णों (विभाजनों) की रचना की है; परंतु मुझे अकर्ता और अविनाशी जानो (4.13)। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र -ये सब अपने-अपने स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसारकर्म करते हैं” (18.41)।पहली बात, हमारा विभाजनकारी मन हमारे चारों ओर श्रेणियाँ बना लेता है। दूसरी बात, असत्य वास्तव में एक विकृत सत्य के सिवा कुछ नहीं है। इन दोनों के मिलन से यह...
242. सभी गुणों से प्रभावित हैं 08.09.2026 3:39
श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में प्रकृति के तीन गुणों -सत्त्व, रजस् और तमस्, का विभिन्न प्रसंगों में विस्तार से वर्णन किया है। वे कहते हैं कि पृथ्वी पर या इस भौतिक जगत् के उच्चतर लोकों में कोई भी जीव ऐसा नहीं है जो इन तीन गुणों के प्रभाव से मुक्त हो (18.40)। इसका अर्थ यह है कि किसी भी समय हम किसी न किसी गुण के प्रभाव में रहते हैं।श्रीकृष्ण कहते हैं सभी परिस्थितियों में कर्म गुणों द्वारा ही संपन्न होते ह...
241. सुख की रूपरेखा 07.09.2026 4:05
हमारे जीवन में सुख और दुःख की द्वैत स्थितियाँ निरन्तर अनुभव होती रहती हैं। श्रीकृष्ण ने कहा है कि जब इन्द्रियाँ अपने विषयों से मिलती हैंतब सुख-दुःख की द्वंद्व अवस्थाएँ उत्पन्न होती हैं (2.14)। प्रशंसा हमें सुख देती है जबकि निन्दा दुःख पहुँचाती है; यद्यपि दोनों ही केवल शब्दों के कानों सेटकराने की घटनाएँ मात्र हैं। इस प्रकार, जीवन इन्द्रियों और इन्द्रिय-विषयों के सतत संपर्क का परिणाम है जिससे स्पष्ट...
240. बुद्धि और धृति 21.08.2026 3:41
कर्म और कर्ता के त्रिविध स्वरूप का वर्णन करने के बाद श्रीकृष्ण बताते हैं कि बुद्धि और धृति (धैर्य या साहस) भी गुणों के अनुसार त्रिविध हैं (18.29)। वे कहते हैं “जो बुद्धि यह जानती है कि सकाम कर्म और त्याग क्या है, क्या कर्तव्य है और क्या नहीं, क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, क्या भय है और क्या अभय, क्या बन्धन है और क्या मोक्ष -वह सात्त्विक कही जाती है (18.30)। जो बुद्धि धर्म और अधर्म में,...
239. कर्ता और कर्म के तीन प्रकार 20.08.2026 3:54
कर्ता और कर्म को समझना जीवन के सबसे जटिल विषयों में से एक है। भगवद्गीता में इन जटिलताओं की व्याख्या कई स्थानों पर की गई है। श्रीकृष्ण चेतावनी देते हैं कि कर्म और अकर्म (निष्क्रियता) की सूक्ष्मताओं से ज्ञानीजन भी भ्रमित हो जाते हैं (4.16)। श्रीकृष्ण आगे समझाते हैं कि सृजन में सक्षम ब्रह्मांडीय ऊर्जा का पृथक्करण (बलिदान) (भूत-भाव-उद्भव-करो विसर्गः) कर्म कहलाता है (8.3) जो स्वयं में एक और गूढ़ विषय ह...
238. विचार से कर्म तक 16.08.2026 4:32
जब हम (ज्ञाता) किसी फूल (ज्ञान के विषय) को देखते हैं तो हम उसके रंग और सुगंध (ज्ञान) सहित अनेक गुणों को ग्रहण करते हैं। यह स्थिति एक कर्म को प्रेरित करती है। उदाहरण के लिए कोई कवि उस फूल की सुंदरता का वर्णन करते हुए कविता लिख सकता है। कवि कर्ता है, कलम उसका साधन(उपकरण) है, और कविता लिखना उसका कर्म है। इसी प्रकार कोई भक्त उसफूल को अपने इष्ट देवता को अर्पित करने के लिए तोड़ सकता है;कोई प्रेमी उसी फू...
237. कर्म के मूल कारण 16.08.2026 4:21
श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया कि कर्मों का पूर्णतः त्याग करना असम्भव है बल्कि त्यागी अपने कर्मों के फलों का त्याग करता है (18.11)। वे कर्म का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए कहते हैं “अधिष्ठान (कर्म का स्थान), कर्ता (कर्म करने वाला), विविध साधन (उपकरण), विभिन्न प्रकार की क्रियाएँ तथा दैवम् (ईश्वरीय तत्व), ये सभी कर्मों की सिद्धि के पाँच कारण हैं। मनुष्य शरीर, मन या वाणी से जो भी कर्म करता है, चाहे वह उचित...
236. त्यागी 24.07.2026 3:50
श्रीकृष्ण त्यागी को परिभाषित करते हुए कहते हैं “जो लोग न तो अकुशल(अप्रिय या दुःख रूप) कर्म से बचते हैं और न ही कुशल (सुखद या कल्याणकारी) कर्म में आसक्त होते हैं, वे त्यागी हैं। सात्विक गुणों से संपन्न और मेधावी होने के कारण वे संशय रहित होते है” (18.10)।हम सभी कुशल कर्मों को करने के लिए प्रेरित होते हैं और अकुशल कर्मों से बचते हैं। हम ऐसे कर्म करते हैं जो स्वयं की, परिवार, संगठन या समाज की भलाई के...
235. नियत कर्म 24.07.2026 3:46
भगवद्गीता में कुछ सूत्र ऐसे हैं जो समझने में तो सरल हैं, पर उन्हें जीवन में उतारना अत्यन्त कठिन है। दूसरी ओर, कुछ बातें ऐसी हैं जिन्हें समझ पाना ही चुनौतीपूर्ण है। ऐसा ही एक विषय है -‘नियत कर्म’ (निर्धारित या अनिवार्य कार्य)। यह प्रश्न सदा से मनुष्य को उलझन में डालता रहा है कि हमारे नियत या अनिवार्य कर्तव्य क्या हैं, किन बातों को सहना चाहिए और किन्हें नहीं। विभिन्न ज्ञानी महापुरुषों के ग्रंथों और...
234. आसक्ति का त्याग 24.07.2026 3:46
त्याग के विषय में चार प्रकार के मतों या विचारधाराओं का विस्तार से वर्णन करने के बाद श्रीकृष्ण कहते हैं “अब त्याग के विषय में मेरा निश्चय सुनो। त्याग तीन प्रकार के होते हैं” (18.4)। आगे के श्लोकों में वे स्पष्ट करते हैं कि त्याग भी तीन प्रकार का होता है -सात्त्विक, राजसिक और तामसिक। श्रीकृष्ण आगे कहते हैं “यज्ञ, दान, तथा तपस्या पर आधारित कर्मों का कभी परित्याग नहीं करना चाहिए। इन्हें निश्चित रूप से...
233. त्याग के चार मार्ग 24.07.2026 4:03
भगवद्गीता में अठारह अध्याय और सात सौ श्लोक हैं। अठारहवाँ अध्याय ‘मोक्ष संन्यास योग’ कहलाता है -अर्थात् संन्यास या त्याग के माध्यम से मुक्ति का योग। यह संन्यास या त्याग के मार्ग के द्वारा गंतव्य तक पहुँचना है जो कि मोक्ष या मुक्ति है। यह मुक्ति हमारी विभाजनकारी दृष्टिकोण से मुक्ति है; यह आस्थाओं या मान्यताओं से मुक्ति है; और अंततः, स्वयं त्याग से भी मुक्ति है। यह अध्याय अर्जुन के प्रश्न से शुरू होत...
232. शुभ कर्म 09.07.2026 4:31
श्रीकृष्ण कहते हैं ‘ॐ तत् सत्’ -यह तीन शब्द परम सत्य, ब्रह्म के त्रिविध प्रतीक हैं। वे आगे ‘सत्’ शब्द का अर्थ स्पष्ट करते हुए कहते हैं “ ‘सत्’ शब्द का अर्थ शाश्वत सत्य और शुभ है। हे अर्जुन! यह शब्द शुभ कर्मों को वर्णित करने के लिए भी प्रयुक्त होता है। जो व्यक्ति यज्ञ, तप और दान में निष्ठापूर्वक स्थित होता है, उसे भी ‘सत्’ कहा जाता है। और इस प्रकार जो भी कर्म इन उद्देश्यों के लिए किया जाता है, वह ‘...
231. ॐ तत् सत् 03.07.2026 4:15
भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय का शीर्षक ‘श्रद्धा त्रय विभाग योग’ है जिसमें श्रीकृष्ण जीवन और अस्तित्व के प्रत्येक पक्ष के तीन रूपों की व्याख्या करते हैं और कहते हैं कि ‘ॐ तत् सत्’ -ये तीन शब्द परम सत्य, ब्रह्म का त्रिविध प्रतिनिधित्व माने गए हैं। इसी ब्रह्म से ब्राह्मण ग्रन्थ, वेद और यज्ञ उत्पन्न हुए” (17.23)। ‘ॐ तत् सत्’ वेदान्त के संदर्भ में सर्वाधिक प्रचलित वाक्यांश है।ॐ एक मौलिक ध्वनि या कम्पन...
230. दान के प्रकार 01.07.2026 4:00
गुणों के संदर्भ में यज्ञ और तप का वर्णन करने के बाद श्रीकृष्ण दान के बारे में कहते हैं “जो दान केवल कर्तव्य समझकर, बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के, उचित समय और स्थान पर, किसी योग्य व्यक्ति को दिया जाता है, वह सात्विक माना जाता है” (17.20)। इस श्लोक में दान के लिए कई प्रकार के निर्देश या नियम निहित हैं।श्रीकृष्ण ने पहले कहा था कि योग न तो उस व्यक्ति के लिए है जो बहुत अधिक खाता है और न ही उस व्यक्ति...
229. तप के प्रकार 26.06.2026 4:18
तप के प्रकार
228. यज्ञ के प्रकार 26.06.2026 4:05
यज्ञ के प्रकार
227. मन और उदर का संबंध 26.06.2026 3:34
मन और उदर का संबंध
226. गुण और श्रद्धा 26.06.2026 3:49
गुण और श्रद्धा
225. शास्त्र एवं स्वधर्म 26.06.2026 3:27
शास्त्र एवं स्वधर्म
224. नरक के तीन द्वार 26.06.2026 3:48
नरक के तीन द्वार
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