Nayi Dhara Radio
Pratidin Ek Kavita
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
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Último episódio
11 de jul de 2026
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Episódios
Yudh Aur Titliyaan | Deepak Jaiswal 02.04.2026 1:57
युद्ध और तितलियाँ । दीपक जायसवाल तितलियों के दिल उनके पंखों में रहते हैं उनके पास दो दिल होते हैं लड़कियाँ उनके पंखों के प्यार में होती हैं वे उनमें भरती हैं अपना हृदय वे दुनिया को तितलियों के पंखों के मानिंद ख़ूबसूरत देखना चाहती हैं। फूलों की पंखुड़ियाँ लड़कियों की आँखें शांत नदी और सर्द मौसम मरने नहीं देते तितलियों को। लेकिन जब कहीं युद्ध छिड़ता है जब किसी के हृदय को छला जाता है जब फूल की पंखुड़ियाँ...
Pyar Karta Hun | Kailash Vajpeyi 01.04.2026 2:10
प्यार करता हूँ | कैलाश वाजपेयी माथे की आँच से डोरा सुलगता है मोम नहीं गलता देह बंद नदिया उफनाती है नीली फिर काली फिर श्वेत हो जाती है दार्शनिक उँगलियों से चितकबरे फूल नहीं झरती है राख असहाय होता हूँ जब-जब रिक्त होता हूँ प्यार करता हूँ वहीं एक सीढ़ी है नीचे उतरकर दुनिया कहलाने की। सागर के नीचे दरार है किरन कतराती है पत्थर सरकाकर राह निकल जाती है हवा की चोट से बाँस झुलस जाता है हरा-भरा अंधकार होता ह...
Poochte Ho To Suno | Meena Kumari 31.03.2026 2:32
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है | मीना कुमारी पूछते हो तो सुनो, कैसे बसर होती है रात ख़ैरात की, सदक़े की सहर होती है साँस भरने को तो जीना नहीं कहते या रब दिल ही दुखता है, न अब आस्तीं तर होती है जैसे जागी हुई आँखों में, चुभें काँच के ख़्वाब रात इस तरह, दीवानों की बसर होती है ग़म ही दुश्मन है मेरा, ग़म ही को दिल ढूँढता है एक लम्हे की जुदाई भी अगर होती है एक मर्कज़ की तलाश, एक भटकती ख़ुशबू...
Maut Bhi Jaise Khafa Ho Humse | Talat Siddiqui Natori 30.03.2026 2:49
मौत भी हम से ख़फ़ा हो जैसे। तलअत सिद्दीक़ी नह्टोरी मौत भी हम से ख़फ़ा हो जैसे ज़िंदगी एक सज़ा हो जैसे दिल के वीराने में वो यूँ आए फूल सहरा में खिला हो जैसे अपनी बर्बादी पे शर्मिंदा हूँ ये भी मेरी ही ख़ता हो जैसे अहमियत ये है तुम्हारे ख़त की मेरी क़िस्मत का लिखा हो जैसे दिल मिरा यूँ हुआ पारा-पारा आइना टूट गया हो जैसे तुम मुझे हाथ उठा कर कोसो कोई मसरूफ़-ए-दुआ* हो जैसे मसरूफ़-ए-दुआ: प्रार्थना में व्यस...
Baans | Kanhaiyalal Sethia 29.03.2026 1:30
बाँस | कन्हैयालाल सेठिया स्वयं उगते नहीं उगाए जाते बाँस, नहीं होते उनके सुमन कोई फल नहीं उनमें चंदन की सुवास, पर बिना बाँस नहीं बनती बाँसुरी, ध्वनित होती है जिसके छिद्रों से राग रागिनियाँ बिना उसके नहीं बनती कलम जिससे व्यक्त होती हैं जीवन की अनुभूतियाँ जो हैं अनमोल वह बिकते हैं कौड़ियाँ के मोल
Vishwas | Abha Bodhisattva 28.03.2026 1:28
विश्वास । आभा बोधिसत्व मैंने अपने सिर पर जो विश्वास की दीवार खड़ी की वहाँ यही लिखा बार-बार दुख बहुत छोटा है ख़ुशी बहुत बड़ी छोटे और बड़े के फ़र्क़ को जीना ही सागर बन जाना है एक दिन बूँद-बूँद जुड़ कर विश्व
Vishwas Badhta Hi Gaya | Shivmangal Singh Suman 27.03.2026 1:16
विश्वास बढ़ता ही गया । शिवमंगल सिंह सुमन पथ की सरलता देखकर दो-चार डग जब बढ़ गया तब दृष्टि-पथ के सामने आकर हिमालय अड़ गया। पथ के अथक अभ्यास पर विश्वास बढ़ता ही गया।
Pankh Diye Aakash Na Doge | Kanhaiyalal Sethia 26.03.2026 1:45
पंख दिए आकाश न दोगे | कन्हैयालाल सेठिया पंख दिए, आकाश न दोगे? तो जड़ता चेतनता क्या है? फिर क्षमता-दर्बलता क्या है? केवल खेल, अगर रचना को- प्राण दिए, विश्वास न दोगे! व्यर्थ मृत्यु-जीवन की रेखा, निष्फल है कटु-मधु का लेखा, केवल कपट, अगर कोयल को- कंठ दिए, मधुमास न दोगे! हृदय-हीन की भाषा कैसी? मिलन-हीन अभिलाषा कैसी? कैवल व्यंग्य, अगर लोचन को- स्वप्न दिए, आभास न दोगे? पंख दिए, आकाश न दोगे?
Bas Ek Kaam Yehi Baar Baar Karta Tha | Madhav Kaushik 25.03.2026 3:13
बस एक काम यही बार बार करता था । माधव कौशिक बस एक काम यही बार बार करता था भँवर के बीच से दरिया को पार करता था उसी की पीठ पर उभरे निशान ज़ख़्मों के जो हर लड़ाई में पीछे से वार करता था अजीब शख़्स था ख़ुद अलविदा कहा लेकिन हर एक शाम मेरा इंतिज़ार करता था सुना है वक़्त ने उस को बना दिया पत्थर जो रोज़ वक़्त को भी संगसार करता था हवा ने छीन लिया अब तो धूप का जादू नहीं तो पेड़ भी पत्तों से प्यार करता था
Harmonium Ki Dukaan Se | Kumar Ambuj 24.03.2026 3:03
हारमोनियम की दुकान से । कुमार अम्बुज उस पुरानी-सी दुकान पर ग्राहक कोई नहीं था बस एक बूढ़ा आदमी चुपचाप झुका हुआ एक हारमोनियम पर इतना तन्मय और बाकी चीज़ों से इतना बेखबर कि जैसे वह उस हारमोनियम का ही कोई हिस्सा वह बार-बार दबा रहा था एक रीड को शायद उसकी स्प्रंग ठीक नहीं थी धम्मन चलाते हुए उसने कई बार उस रीड को दबाया एक हलका-सा सुर गूँजता था उस भीड़ भरे बाज़ार में जो दस क़दम की दूरी तय करते-करते तोड़ द...
Saarangi | Krishna Mohan Jha 23.03.2026 2:58
सारंगी | कृष्णमोहन झा उस आदमी ने किया होगा इसका आविष्कार जो शायद जन्म से ही बधिर हो और जो अपनी आवाज़ खोजने बरसों जंगल-जंगल भटकता रहा हो या उस आदमी ने जिसने राजाज्ञा का उल्लंघन करने के बदले कटा दी हो अपनी जीभ और जिसकी देह मरोड़ती हुई पीड़ा की ऐंठन मुँह तक आकर निराकार ही निकल जाती हो अथवा उसने रचा होगा इसे जो समुद्र के ज्वार से तिरस्कृत घोंघे की तरह अकिंचनता के द्वीप पर फेंक दिया गया हो और जिसकी हर साँ...
Reedh | Vishwanath Prasad Tiwari 22.03.2026 2:06
रीढ़। विश्वनाथ प्रसाद तिवारी कौन-सा अंग है आदमी के शरीर में सबसे कीमती प्रेममार्गियों ने कहा दिल ज्ञानमार्गियों ने कहा दिमाग कर्ममार्गियों ने कहा हाथ पर रीढ़ न हो सीधी तो कैसे बनेगा आदमी कैसे खड़ा होगा वह गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध खड़े होते हैं बंदर और भालू भी अपनी रीढ़ पर कभी-कभी पर गीदड़ और गधे कभी नहीं रीढ़ झुकी है तो हाथ बँधे हैं हाथ बँधे हैं तो बँधी हैं आँखें आँखें बँधी हैं तो बँधा है मस्तिष्क...
Bhasha | Vivek Nirala 21.03.2026 1:43
भाषा । विवेक निराला मेरी पीठ पर टिकी एक नन्ही-सी लड़की मेरी गर्दन में अपने हाथ डाले हुए जितना सीख कर आती है उतना मुझे सिखाती है उतने में ही अपना सब कुछ दे जाती है।
Antariksh Ki Sair | Trilok Singh Thakurela 20.03.2026 1:49
अंतरिक्ष की सैर | त्रिलोक सिंह ठकुरेला नभ के तारे कई देखकर एक दिन बबलू बोला। अंतरिक्ष की सैर करें माँ ले आ उड़न खटोला॥ कितने प्यारे लगते हैं ये आसमान के तारे। कौतूहल पैदा करते हैं मन में रोज हमारे॥ झिलमिल झिलमिल करते रहते हर दिन हमें इशारे। रोज भेज देते हैं हम तक किरणों के हरकारे॥ कोई ग्रह तो होगा ऐसा जिस पर होगी बस्ती। माँ,बच्चों के साथ वहाँ मैं खूब करुँगा मस्ती॥ वहाँ नये बच्चों से मिलकर कितना सु...
Benaras | Kedarnath Singh 19.03.2026 4:18
बनारस | केदारनाथ सिंह इस शहर मे वसंत अचानक आता है और जब आता है तो मैंने देखा है लहरतारा या मडुवाडीह की तरफ़ से उठता है धूल का एक बवंडर और इस महान पुराने शहर की जीभ किरकिराने लगती है जो है वह सुगबुगाता है जो नहीं है वह फेंकने लगता है पचखियाँ आदमी दशाश्वमेध पर जाता है और पाता है घाट का आख़िरी पत्थर कुछ और मुलायम हो गया है सीढ़ियों पर बैठे बंदरों की आँखों में एक अजीब-सी नमी है और एक अजीब-सी चमक से भर...
Nav Varsh | Harivansh Rai Bachchan 18.03.2026 1:30
नव वर्ष | हरिवंशराय बच्चन वर्ष नव हर्ष नव जीवन उत्कर्ष नव। नव उमंग, नव तरंग, जीवन का नव प्रसंग। नवल चाह, नवल राह, जीवन का नव प्रवाह। गीत नवल, प्रीति नवल, जीवन की रीति नवल, जीवन की नीति नवल, जीवन की जीत नवल!
Akhbaar | Balswaroop Rahi 17.03.2026 1:17
अखबार | बालस्वरूप राही जिस दिन होता है इतवार, घर में आते ही अखबार, ऐसी छीन-झपट मचती हो जाते हैं हिस्से चार! पापा को खबरों का चाव, माँ पढ़ती दालों के भाव, भैया खेलों में रमते, भाता मुझे बनाना नाव
Ghar | Mohan Rana 16.03.2026 2:03
घर | मोहन राणा धन्य धरती है जिसकी करुणा अक्षत धन्य समुंदर जिसका नमक फीका नहीं होता धन्य आकाश जो रहता हमेशा मेरे साथ हर जगह दिन रात धन्य वे बीज जो पतझर को नहीं भूलते धन्य वे शब्द भूलते नहीं जो चौखट पर कभी बाट लगाते दुख उसकी स्मृति को धन्य उस विचार पहिए पर टँकी छवियाँ जो बन जाती टॉकीज़, आकाशगंगा के छोर चुपचाप परिक्रमा में धन्य यह साँस, मैं कैसे भूल सकता हूँ घर और कोने पर धारे का पानी
Hum Kya Jaane Qissa Kya Hai | Rahi Masoom Raza 15.03.2026 2:19
हम क्या जानें क़िस्सा क्या है | राही मासूम रज़ा हम क्या जानें क़िस्सा क्या है हम ठहरे दीवाने लोग उस बस्ती के बाज़ारों में रोज़ कहें अफ़्साने लोग यादों से बचना मुश्किल है उन को कैसे समझाएँ हिज्र के इस सहरा तक हम को आते हैं समझाने लोग कौन ये जाने दीवाने पर कैसी सख़्त गुज़रती है आपस में कुछ कह कर हँसते हैं जाने पहचाने लोग फिर सहरा से डर लगता है फिर शहरों की याद आई फिर शायद आने वाले हैं ज़ंजीरें पहना...
Dekho Ahista Chalo | Gulzar 14.03.2026 1:47
देखो आहिस्ता चलो | गुलज़ार देखो आहिस्ता चलो और भी आहिस्ता ज़रा देखना सोच सँभल कर ज़रा पाँव रखना ज़ोर से बज न उठे पैरों की आवाज़ कहीं काँच के ख़्वाब हैं बिखरे हुए तन्हाई में ख़्वाब टूटे न कोई जाग न जाए देखो जाग जाएगा कोई ख़्वाब तो मर जाएगा
Yaad Rakhna | Shailja Pathak 13.03.2026 1:25
याद रखना | शैलजा पाठक याद रखना वह कहेंगे : कम बोलो कम खाओ कम सजो कम घूमो कम हँसो कम खिलखिलाओ कम बनाओ दोस्त कम करो सपने कम हो रहो कम मेरी दोस्त! तुम कम सुनना...
Tere Sapne Mein Thode Hun | Teji Grover 12.03.2026 2:19
तेरे सपने में थोड़े हूँ | तेजी ग्रोवर तेरे सपने में थोड़े हूँ पगली मैं तो बैठा हूँ टाट पर सजूगर अचार भरी उँगलियाँ चाटता हुआ मैं टाट पर थोड़े हूँ पगली झूलती खाट में सो रहा हूँ तेरे पास इतना पास कि तेरा पेट गुड़गुड़ाया तो मैंने सोचा मेरा है भोर तक यहीं हूँ पगली तू साँस छोड़ेगी तो भींज उठेंगी मेरी कोंपलें मेरी खुरदरी उँगलियाँ नींद की रोई तेरी आँखों पर काँप-काँप जाएँगी और तू झपकी भर नहीं जगेगी रात में...
Main Badha Hi Ja Raha Hun | Shivmangal Singh Suman 11.03.2026 2:01
मैं बढ़ा ही जा रहा हूँ - शिवमंगल सिंह सुमन आज जो मैं इस तरह आवेश में हूँ, अनमना हूँ यह न समझो मैं किसी के रक्त का प्यासा बना हूँ सत्य कहता हूँ पराये पैर का काँटा कसकता भूल से चींटी कहीं दब जाए भी तो 'हाय!' करता पर जिन्होंने स्वार्थवश जीवन विषाक्त बना दिया है कोटि-कोटि बुभुक्षितों का कौर तक, छिना लिया है लाभ-शुभ लिखकर ज़माने का ह्रदय चूसा जिन्होंने और कल ही, बगल वाली लाश पर थूका जिन्होंने बिलखते शि...
Main Neer Bhari | Mahadevi Verma 10.03.2026 2:21
मैं नीर भरी | महादेवी वर्मा मैं नीर भरी दु:ख की बदली! स्पंदन में चिर निस्पंद बसा; क्रंदन में आहत विश्व हँसा, नयनों में दीपक-से जलते पलकों में निर्झरिणी मचली! मेरा पग-पग संगीत-भरा, श्वासों से स्वप्न-पराग झरा, नभ के नव रँग बुनते दुकूल, छाया में मलय-बयार पली! मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर धूमिल, चिंता का भार, बनी अविरल, रज-कण पर जल-कण हो बरसी नवजीवन-अंकुर बन निकली! पथ को न मलिन करता आना, पद-चिह्न न दे जा...
Adrak | Ekta Verma 09.03.2026 3:47
अदरक। एकता वर्मा इनकी देह दुखों की अंतर्मुखी गाँठों से बनी थी जिन्होंने अपनी कब्रों की मिट्टी ठेलकर अपनी देह के लिए जगह बनाई थी। ये आतताइयों का चरित्र पहचानते थे और उनके द्वारा कच्चा चबाए जाने के खिलाफ सुख की जिह्वा पर कसैलेपन की तरह उतरते थे। वे आघातों को अपनी छाती पर सहते थे इनका आखिरी कतरा प्रतिबद्धताओं की तीखी गंध से महकता था। वे रक्तबीज जैसे थे, उनके टुकड़े जहाँ गिरते हुजूम की शक्ल...
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