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Pratidin Ek Kavita

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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

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Episódios

Bhatka Hua Akelapan | Kailash Vajpeyi 20.09.2023

भटका हुआ अकेलापन - कैलाश वाजपेयी यह अधनंगी शाम और  यह भटका हुआ  अकेलापन  मैंने फिर घबराकर अपना शीशा तोड़ दिया।  राजमार्ग—कोलाहल—पहिए  काँटेदार रंग गहरे  यंत्र-सभ्यता चूस-चूसकर  फेंके गए अस्त चेहरे  झाग उगलती खुली खिड़कियाँ  सड़े गीत सँकरे ज़ीने  किसी एक कमरे में मुझको  बंद कर लिया फिर मैंने  यह अधनंगी शाम और  यह चुभता हुआ  अकेलापन  मैंने फिर घबराकर अपना शीशा तोड़ दिया।  झरती भाँप, खाँसता बिस्तर, च...

Aao, Chale Hum | Gyanendrapati 19.09.2023

आओ, चलें हम - ज्ञानेन्द्रपति आओ, चलें हम साथ दो क़दम हमक़दम हों दो ही क़दम चाहे दुनिया की क़दमताल से छिटक हाथ कहाँ लगते हैं मित्रों के हाथ घड़ी-दो घड़ी को घड़ीदार हाथ -- जिनकी कलाई की नाड़ी से तेज़ धड़कती है घड़ी वक़्त के ज़ख़्म से लहू रिसता ही रहता है लगातार कहाँ चलते हैं हम क़दम-दो क़दम उँगलियों में फँसा उँगलियाँ उँगलियों में फँसी है डोर सूत्रधार की नहीं कठपुतलियों की हथेलियों में फँसी है एक बेल...

Palki | Kunwar Narayan 18.09.2023

पालकी - कुँवर नारायण  काँधे धरी यह पालकी है किस कन्हैयालाल की? इस गाँव से उस गाँव तक नंगे बदन, फेंटा कसे, बारात किसकी ढो रहे? किसकी कहारी में फँसे? यह क़र्ज पुश्तैनी अभी किश्तें हज़ारों साल की। काँधे धरी यह पालकी है किस कन्हैयालाल की? इस पाँव से उस पाँव पर, ये पाँव बेवाई फटे : काँधे धरा किसका महल? हम नींव पर किसकी डटे? यह माल ढोते थक गई तक़दीर खच्चर-हाल की। काँधे धरी यह पालकी है किस कन्हैयालाल की?...

Swapn Me Prem | Babusha Kohli 17.09.2023

स्वप्न में प्रेम - बाबुषा कोहली दूसरे दिनों से ज़रा ज़्यादा ही होती है हरारत उस सुबह की रॉकेट-सा आसमान चढ़ जाता तापमान यकायक भाप के जंगल में तब्दील होता बाथरूम का आईना कुल जमा तीन अक्षर भरते कुलाँचे चारों दिशाओं में दिशाओं के चार से दस होते देर नहीं लगती सारी दिशाएँ प्रेम का बहुवचन हैं जब तक शिकारी तानता धनुष ओझल हो जाता मायावी हिरण आँखों की चौंध में स्वप्न नशे में धुत्त अफ़ीमची नहीं किसी फ़रार मुजरिम...

Chori | Geet Chaturvedi 16.09.2023

चोरी | गीत चतुर्वेदी  प्रेम इस तरह किया जाए  कि प्रेम शब्द का कभी ज़िक्र तक न हो  चूमा इस तरह जाए  कि होंठ हमेशा ग़फ़लत में रहें  तुमने चूमा  या मेरे ही निचले होंठ ने औचक ऊपरी को छू लिया  छुआ इस तरह जाए  कि मीलों दूर तुम्हारी त्वचा पर  हरे-हरे सपने उग आएँ  तुम्हारी देह के छज्जे के नीचे  मुँहअँधेरे जलतरंग बजाएँ  रहा इस तरह जाए  कि नींद के भीतर एक मुस्कान  तुम्हारे चेहरे पर रहे  जब तुम आँख खोलो, वह भ...

Baat Ki Baat | Shivmangal Singh Suman 15.09.2023

बात की बात | शिवमंगल सिंह 'सुमन' इस जीवन में बैठे ठाले ऐसे भी क्षण आ जाते हैं जब हम अपने से ही अपनी बीती कहने लग जाते हैं। तन खोया-खोया-सा लगता मन उर्वर-सा हो जाता है कुछ खोया-सा मिल जाता है कुछ मिला हुआ खो जाता है। लगता; सुख-दुख की स्‍मृतियों के कुछ बिखरे तार बुना डालूँ यों ही सूने में अंतर के कुछ भाव-अभाव सुना डालूँ कवि की अपनी सीमाऍं है कहता जितना कह पाता है कितना भी कह डाले, लेकिन-अनकहा अधिक र...

Aag Hai, Paani Hai, Mitti Hai, Hawa Hai Mujhme | Krishn Bihari Noor 14.09.2023

आग है, पानी है, मिट्टी है, हवा है मुझमें | कृष्ण बिहारी नूर आग है, पानी है, मिट्टी है, हवा है मुझमें और फिर मानना पड़ता है ख़ुदा है मुझमें अब तो ले दे के वही शख़्स बचा है मुझमें मुझको मुझसे जो जुदा करके छुपा है मुझमें जितने मौसम हैं सभी जैसे कहीं मिल जाएँ इन दिनों कैसे बताऊँ जो फ़ज़ा है मुझमें आइना ये तो बताता है मैं क्या हूँ लेकिन आइना इस पे है ख़ामोश कि क्या है मुझमें अब तो बस जान ही देने की है...

Kal Humara Hai | Shailendra 13.09.2023

कल हमारा है | शैलेन्द्र ग़म की बदली में चमकता एक सितारा है आज अपना हो न हो पर कल हमारा है धमकी ग़ैरों की नहीं अपना सहारा है आज अपना हो न हो पर कल हमारा है ग़र्दिशों से से हारकर ओ बैठने वाले तुझको ख़बर क्या अपने पैरों में भी छाले हैं पर नहीं रुकते कि मंज़िल ने पुकारा है आज अपना हो न हो पर कल हमारा है ये क़दम ऐसे जो सागर पाट देते हैं ये वो धाराएँ हैं जो पर्वत काट देते हैं स्वर्ग उन हाथों ने धरती पर...

Dussehri Aam | Uday Prakash 12.09.2023
Laut Aao Tum | Dr Damodar Khadse 11.09.2023

‘लौट आओ तुम’ | डॉ दामोदर खड़से लौट आओ तुम  कि काले बादलों की ओट में सूरज अंधा हो गया था और दिन  चिकने फर्श पर औंधे गिर पड़ा लहूलुहान उसकी नाक  और कटा फटा उसका मुंह किससे करे शिकायत... कि क्यों और कैसे फिसल पड़ा वह  क्या सोच रहा था दिन सूरज के बिना तुम लौट आओ कि अब दिन रास्ता भटक गए हैं और शाम भी होने वाली तुम लौट आओ कि  काले बादल सिर्फ तुम्हीं से कतराते हैं फिर सूरज निकलेगा और दिन की चेतना लौटेगी लौट...

Chote Chote Ishwar | Madan Kashyap 10.09.2023

छोटे-छोटे ईश्वर | मदन कश्यप छोटे-छोटे ईश्वर छोटे-छोटे मंदिरों में रहते हैं छोटे-छोटे ईश्वर विशाल ऐतिहासिक मंदिरों की भीतरी चारदीवारियों कोनों-अंतरों में बने नक्काशीदार आलों ताकों कोटरों में  दुबके बैठे इन ईश्वरों का अपना कोई साम्राज्य नहीं होता  ये तो महान ईश्वरतंत्र के बस छोटे-छोटे पुर्जे होते हैं  किसी-किसी की बड़े ईश्वर से कुछ नाते-रिश्तेदारी भी होती है  और महात्म्य- कथाओं में इस बारे में लिखे...

Neem Ke Phool | Kunwar Narayan 09.09.2023

नीम के फूल |  कुँवर नारायण एक कड़वी-मीठी औषधीय गंध से भर उठता था घर जब आँगन के नीम में फूल आते। साबुन के बुलबुलों-से हवा में उड़ते हुए सफ़ेद छोटे-छोटे फूल दो–एक माँ के बालों में उलझे रह जाते जब वो तुलसी घर पर जल चढ़ाकर आँगन से लौटतीं। अजीब सी बात है मैंने उन फूलों को जब भी सोचा बहुवचन में सोचा। उन्हें कुम्हलाते कभी नहीं देखा–उस तरह रंगारंग खिलते भी नहीं देखा जैसे गुलमुहर या कचनार–पर कुछ था उनके झरने म...

Aparichit Se Prem | Mamta Kalia 08.09.2023

अपरिचित से प्रेम | ममता कालिया सबसे पहले तो बताओ अपना नाम फिर मोहल्ला, कहाँ रहते तो, क्या करते हो रोज़ सवेरे इकत्तीस नबंर की बस से कहाँ जाते हो और अक्सर चाय की उस रद्दी-सी दुकान पर क्यों खड़े रहते हो तुम्हारे बारे में बहुत कुछ जानने की इच्छा है तुम्हें शहर की कौन-सी सड़कें पसंद हैं क्या वो जो अक्सर वीरान रहती हैं या वो जहाँ भीड़-भाड़ रहती है तुम कौन-सा अख़बार पढ़ते हो कौन-सी पत्रिकाएँ खाली समय में...

Main Chahta Hoon | Mangesh Dabral 07.09.2023

मैं चाहता हूँ | मंगलेश डबराल मैं चाहता हूँ कि स्पर्श बचा रहे  वह नहीं जो कन्धे छीलता हुआ  आततायी की तरह गुज़रता है  बल्कि वह जो एक अनजानी यात्रा के बाद  धरती के किसी छोर पर पहुँचने जैसा होता है मैं चाहता हूँ स्वाद बचा रहे  मिठास और कड़ुवाहट से दूर  जो चीज़ों को खाता नहीं है  बल्कि उन्हें बचाये रखने की कोशिश का ही  एक नाम है एक सरल वाक्य बचाना मेरा उद्देश्य है  मसलन यह कि हम इनसान हैं  मैं चाहता हूँ...

Parchun | Anamika 06.09.2023

परचून | अनामिका पंसारी जहाँ भी लगा दे दस बोरियाँ– पटरी पर, गैराज में, खोली के अन्दर–  रख ले दो-चार बोइयाम–  आराम से वहीं सज जाती है  खुदरा परचून की दुकान–  बड़े-बड़े स्टोरों से सीधी आँखें लड़ाती!  बकझक, कुछ मोलतोल, हालचाल या आपसदारी,  ‘आज नकद, कल उधार’ की पट्टी के बावजूद  कई महीनों की बेरोक वह देनदारी– इनके बिना बड़ी बेस्वाद है खरीदारी–  नहीं जानती यह एफ.डी.आई.!

Bachhe Ke Shikshak Ko Patra | Rajendra Upadhyay 05.09.2023

बच्चे के शिक्षक को पत्र - राजेंद्र उपाध्याय  उसे नदियों और पेड़ों और पर्वतों के बारे में बताना उसे बरगद के बारे में बताना तो कली और तुलसी के बारे में भी नीम और पीपल, बादल और बिजली के बारे में बताना अजगर, हाथी, घोड़ों के बारे में बताते हुए बेचारे एक केंचुए को न भूल जाना उसे जीतना सिखाना पर हारने के सुख के बारे में भी बताना कमाई की एक पाई बड़ी है भीख में मांगे गए रुपए से उसे बताना। झूठ बोलकर जीतने से ब...

Sugiya | Nirmala Putul 04.09.2023

सुगिया | निर्मला पुतुल ‘सुगिया, तुम्हारे होंठ सुग्गा जैसे हैं’ एक ने कहा  ‘सुगिया, तुम्हारे होंठ सुग्गा जैसे हैं’ एक ने कहा  सुगिया हँस पड़ी खिलखिला कर  ‘तुम हँसती हो तो बहुत अच्छी लगती हो सुगिया’  बादलों में बिजली से चमकते उसके दाँतों को देख दूसरा बोला।   तीसरा ने फ़रमाया, ‘तुम बहुत अच्छा गाती हो बिल्कुल कोयल की तरह और नाच का तो क्या कहना, धरती नाच उठती है जब तुम नाचती हो’ चौथे ने उसकी आँखों की प...

Mere Sapne Bahut Nahi Hain | Girija Kumar Mathur 03.09.2023

मेरे सपने बहुत नहीं हैं | गिरिजा कुमार माथुर मेरे सपने बहुत नहीं हैं छोटी-सी अपनी दुनिया हो, दो उजले-उजले से कमरे जगने को, सोने को, मोती-सी हों चुनी किताबें शीतल जल से भरे सुनहले प्यालों जैसी ठण्डी खिड़की से बाहर धीरे हँसती हो तितली-सी रंगीन बग़ीची छोटा लॉन स्वीट-पी जैसा, मौलसिरी की बिखरी छितरी छाँहों डूबा हम हों, वे हों काव्य और संगीत-सिन्धु में डूबे-डूबे प्यार भरे पंछी से बैठे नयनों से रस-नयन मिल...

Hastakshep | Srikant Verma 02.09.2023

हस्तक्षेप | श्रीकांत वर्मा  कोई छींकता तक नहीं इस डर से कि मगध की शांति भंग न हो जाए, मगध को बनाए रखना है तो मगध में शांति रहनी ही चाहिए मगध है, तो शांति है कोई चीख़ता तक नहीं इस डर से कि मगध की व्यवस्था में दख़ल न पड़ जाए, मगध में व्यवस्था रहनी ही चाहिए मगध में न रही तो कहाँ रहेगी? क्या कहेंगे लोग? लोगों का क्या? लोग तो यह भी कहते हैं मगध अब कहने को मगध है, रहने को नहीं कोई टोकता तक नहीं इस डर से क...

Amma Dhaniya Kaat Rahi Hai | Yash Malviya 01.09.2023

अम्मा धनिया काट रही है | यश मालवीय इसकी उसकी नींद जम्हाई  मन से मन की गहरी खाई  कमरे-कमरे की मजबूरी  चौके से आँगन की दूरी  धीरे-धीरे पाट रही है  अम्मा धनिया काट रही है  काट रही है कठिन समय को  दिशा दे रही सूर्योदय को  ताग रही बस, ताग रही है  कपड़ों जैसे फटे हृदय को  सुख की स्वाति बूँद,  इस देहरी से उस देहरी बाँट रही है  अम्मा धनिया काट रही है  ख़ुशियों का बनकर हरकारा  सँजो रही है चाँद सितारा  अँधायु...

Aag Aur Aadmi | Deo Shankar Navin 31.08.2023

आग और आदमी | देवशंकर नवीन   आग और हवा को अपने-पराए की समझ नहीं होती वह अपने स्वभाव से काम करती है आग हर कुछ को जला देती है जीव-जंतु, फूल, कचरा, विष्ठा सब कुछ को हवा हर कुछ को सोख लेती है खुशबू, बदबू, मानवता, दानवता सब कुछ को आग और हवा वातावरण में सदा से थी लोगों को दिखती नहीं थी मनुष्य की किसी वानरी वृत्ति से आग प्रकट हो गई मनुष्य ने समझा कि आग उसने पैदा की आग और बदबू को हवा ने हवा दे दी मनुष्य ने...

Neev Ki Int Ho Tum Didi | Uday Prakash 30.08.2023

नींव की ईंट हो तुम दीदी | उदय प्रकाश पीपल होतीं तुम  पीपल, दीदी पिछवाड़े का, तो तुम्हारी ख़ूब घनी-हरी टहनियों में हारिल हम बसेरा लेते। हारिल होते हैं हमारी तरह ही घोंसले नहीं बनाते कहीं बसते नहीं कभी दूर पहाड़ों से आते हैं दूर जंगलों को उड़ जाते हैं। पीपल की छाँह तुम्हारी तरह ही ठंडी होती है दोपहर। ढिबरी थीं दीदी तुम हमारे बचपन की अचार का तलछट तेल अपनी कपास की बाती में सोखकर जलती रहीं। हमने सीखे थ...

Kaka Se | Ashok Vajpeyi 29.08.2023

काका से | अशोक वाजपेयी | अशोक वाजपेयी अब जब हमारे बीच कुछ और नहीं बचा है थोड़े से दु:ख और पछतावे के सिवाय और हम भूल चुके हैं तुम्हारे गुस्से और विफलताओं को मेरे बारे में तुम्हारी आशंकाओं को, हम देख सकते हैं कि जीवन में आभिजात्य तो आ जाता है, गरिमा आती है बड़ी मुश्किल से जीवन गरिमा देने में बहुत कंजूस है हम दोनों को ऐसी गरिमा पा सकने का उबालता रहा है। कोई भी अपमान फिर वह देवताओं ने किया हो या दुष्ट...

Reedh | Kusumagraj | Gulzar 28.08.2023

रीढ़ -  कुसुमाग्रज | अनुवाद - गुलज़ार “सर, मुझे पहचाना क्या?”  बारिश में कोई आ गया  कपड़े थे मुचड़े हुए और बाल सब भीगे हुए पल को बैठा, फिर हँसा, और बोला ऊपर देखकर “गंगा मैया आई थीं, मेहमान होकर  कुटिया में रह कर गईं!  माइके आई हुई लड़की की मानिन्द  चारों दीवारों पर नाची  खाली हाथ अब जाती कैसे?  खैर से, पत्नी बची है  दीवार चूरा हो गई, चूल्हा बुझा,  जो था, नहीं था, सब गया! प्रसाद में पलकों के नीचे चार क़...

Goonga Ho Jana Chahta Hai Shabd | Nandkishore Acharya 27.08.2023

गूँगा हो जाना चाहता है शब्द | नंदकिशोर आचार्य गूँगा हो जाना चाहता है शब्द नहीं तो भला कह पाएगा कैसे इन ज़ुल्मतों को वह क्या नाम हो उसका दुनिया छाली है ज़ुल्मतों में जो गूँगा हो कर ही अब हो पाएगा शब्द कहानी ज़ुल्मतों की मुझमें व्याप्त।

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