Nayi Dhara Radio
Pratidin Ek Kavita
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
Não deixe de visitar o site do podcast e apoiar quem o produz: nayidhara.in
Autor
Nayi Dhara Radio
Categoria
Site do podcast
Último episódio
11 de jul de 2026
Onde ouvir?
Podcasts no app Replaio Radio Em breveOs podcasts estão chegando ao app. Instale agora e seja o primeiro a descobrir um jeito totalmente novo de curtir podcasts
Episódios
Andhere Ka Safar | Ramanath Awasthi 24.10.2024 2:08
अँधेरे का सफ़र मेरे लिए है | रमानाथ अवस्थी तुम्हारी चाँंदनी का क्या करूँ मैं अँधेरे का सफ़र मेरे लिए है। किसी गुमनाम के दुख-सा अनजाना है सफ़र मेरा पहाड़ी शाम-सा तुमने मुझे वीरान में घेरा तुम्हारी सेज को ही क्यों सजाऊँ समूचा ही शहर मेरे लिए है थका बादल किसी सौदामिनी के साथ सोता है। मगर इनसान थकने पर बड़ा लाचार होता है। गगन की दामिनी का क्या करूँ मैं धरा की हर डगर मेरे लिए है। किसी चौरास्ते की रात-...
Naya Sach Rachne | Nandkishore Acharya 23.10.2024 1:31
नया सच रचने | नंदकिशोर आचार्य पत्तों का झर जाना शिशिर नहीं जड़ों में यह सपनों की कसमसाहट है- अपने लिए नया सच रचने की ख़ातिर- झूठ हो जाता है जो खुद झर जाता है।
Aatma | Anju Sharma 22.10.2024 2:49
आत्मा | अंजू शर्मा मैं सिर्फ एक देह नहीं हूँ, देह के पिंजरे में कैद एक मुक्ति की कामना में लीन आत्मा हूँ, नृत्यरत हूँ निरंतर, बांधे हुए सलीके के घुँघरू, लौटा सकती हूँ मैं अब देवदूत को भी मेरे स्वर्ग की रचना मैं खुद करुँगी, मैं बेअसर हूँ किसी भी परिवर्तन से, उम्र के साथ कल पिंजरा तब्दील हो जायेगा झुर्रियों से भरे एक जर्जर खंडहर में, पर मैं उतार कर, समय की केंचुली, बन जाऊँगी चिर-यौवना, मैं बेअसर हूँ...
Ladki | Anju Sharma 21.10.2024 3:05
लड़की | अंजू शर्मा एक दिन समटते हुए अपने खालीपन को मैंने ढूँढा था उस लड़की को, जो भागती थी तितलियों के पीछे सँभालते हुए अपने दुपट्टे को फिर खो जाया करती थी किताबों के पीछे, गुनगुनाते हुए ग़ालिब की कोई ग़ज़ल अक्सर मिल जाती थी वो लाईब्रेरी में, कभी पाई जाती थी घर के बरामदे में बतियाते हुए प्रेमचंद और शेक्सपियर से, कभी बारिश में तलते पकौड़ों को छोड़कर खुले हाथों से छूती थी आसमान, और ज़ोर से सांस खींचत...
Tumne Is Talaab Mein | Dushyant Kumar 20.10.2024 1:54
तुमने इस तालाब में | दुष्यंत कुमार तुमने इस तालाब में रोहू पकड़ने के लिए छोटी-छोटी मछलियाँ चारा बनाकर फेंक दीं। तुम ही खा लेते सुबह को भूख लगती है बहुत, तुमने बासी रोटियाँ नाहक उठाकर फेंक दीं। जाने कैसी उँगलियाँ हैं जाने क्या अंदाज़ हैं, तुमने पत्तों को छुआ था जड़ हिलाकर फेंक दीं। इस अहाते के अँधेरे में धुआँ-सा भर गया, तुमने जलती लकड़ियाँ शायद बुझाकर फेंक दीं।
Jantar Mantar | Arunabh Saurabh 19.10.2024 2:30
जंतर-मंतर | अरुणाभ सौरभ लाल - दीवारों और झरोखे पर सरसराते दिन में सीढ़ी-सीढ़ी नाप रहे हो जंतर-मतर पर बोल कबूतर मैंना बोली फुदक-फुदककर बड़ी जालिम है। जंतर-मंतर मॉँगन से कछू मिले ना हियाँ बताओ किधर चले मियाँ पूछ उठाकर भगी गिलहरी कौवा बोला काँव - काँव लोट चलो अब अपने गाँव टिट्ही बोलीं टीं.टीं. राजा मंत्री छी...छी घर - घर माँग रहे वोट और नए- पुराने नोट झरोखे से झाँके इतिहास का कोना जीना चढ़ि ऊँचे हु...
Padhiye Gita | Raghuvir Sahay 18.10.2024 1:16
पढ़िए गीता | रघुवीर सहाय पढ़िए गीता बनिए सीता फिर इन सब में लगा पलीता किसी मूर्ख की हो परिणीता निज घर-बार बसाइए होंय कैँटीली आँखें गीली लकड़ी सीली, तबियत ढीली घर की सबसे बड़ी पतीली भर कर भात पसाइए
Saathi | Kedarnath Agarwal 17.10.2024 1:48
साथी | केदारनाथ अग्रवाल झूठ नहीं सच होगा साथी। गढ़ने को जो चाहे गढ़ ले मढ़ने को जो चाहे मढ़ ले शासन के सी रूप बदल ले राम बना रावण सा चल ले झूठ नहीं सच होगा साथी! करने को जो चाहे कर ले चलनी पर चढ़ सागर तर ले चिउँटी पर चढ़ चाँद पकड़ ले लड़ ले ऐटम बम से लड़ ले झूठ नहीं सच होगा साथी!
Milna Tha Itefaaq Bichadna Naseeb Tha | Anjum Rehbar 16.10.2024 2:09
मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था | अंजुम रहबर मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था वो उतनी दूर हो गया जितना क़रीब था मैं उस को देखने को तरसती ही रह गई जिस शख़्स की हथेली पे मेरा नसीब था बस्ती के सारे लोग ही आतिश-परस्त थे घर जल रहा था और समुंदर क़रीब था मरियम कहाँ तलाश करे अपने ख़ून को हर शख़्स के गले में निशान-ए-सलीब था दफ़ना दिया गया मुझे चाँदी की क़ब्र में मैं जिस को चाहती थी वो लड़का ग़रीब था
Pooch Rahe Ho Kya Abhaav Hai | Shailendra 15.10.2024 1:37
पूछ रहे हो क्या अभाव है | शैलेन्द्र पूछ रहे हो क्या अभाव है तन है केवल, प्राण कहाँ है ? डूबा-डूबा सा अन्तर है यह बिखरी-सी भाव लहर है, अस्फुट मेरे स्वर हैं लेकिन मेरे जीवन के गान कहाँ हैं? मेरी अभिलाषाएँ अनगिन पूरी होंगी ? यही है कठिन, जो ख़ुद ही पूरी हो जाएँ - ऐसे ये अरमान कहाँ हैं ? लाख परायों से परिचित है, मेल-मोहब्बत का अभिनय है, जिनके बिन जग सूना-सूना मन के वे मेहमान कहाँ हैं ?
Raakh | Arun Kamal 14.10.2024 2:53
राख | अरुण कमल शायद यह रुक जाता सही साइत पर बोला गया शब्द सही वक्त पर कन्धे पर रखा हाथ सही समय किसी मोड़ पर इंतज़ार शायद रुक जाती मौत ओफ! बार बार लगता है मैंने जैसे उसे ठीक से पकड़ा नहीं गिरा वह छूट कर मेरी गोद से किधर था मेरा ध्यान मैं कहाँ था अचानक आता है अँधेरा अचानक घास में फतिंगों की हलचल अचानक कोई फूल झड़ता है और पकने लगता है फल मैंने वे सारे क्षण खो दिये वे अन्तिम साँस के क्षण अपनी साँस उसके...
Tumko Bhula Rahi Thi Ki Tum Yaad Aa Gaye | Anjum Rehbar 13.10.2024 2:17
तुम को भुला रही थी कि तुम याद आ गए | अंजुम रहबर तुम को भुला रही थी कि तुम याद आ गए मैं ज़हर खा रही थी कि तुम याद आ गए कल मेरी एक प्यारी सहेली किताब में इक ख़त छुपा रही थी कि तुम याद आ गए उस वक़्त रात-रानी मिरे सूने सहन में ख़ुशबू लुटा रही थी कि तुम याद आ गए ईमान जानिए कि इसे कुफ़्र जानिए मैं सर झुका रही थी कि तुम याद आ गए कल शाम छत पे मीर-तक़ी-'मीर' की ग़ज़ल मैं गुनगुना रही थी कि तुम याद आ गए 'अंज...
Tumhari Jaati Kya Hai? | Kumar Ambuj 12.10.2024 2:06
तुम्हारी जाति क्या है? | कुमार अंबुज तुम्हारी जाति क्या है कुमार अंबुज? तुम किस-किस के हाथ का खाना खा सकते हो और पी सकते हो किसके हाथ का पानी चुनाव में देते हो किस समुदाय को वोट ऑफ़िस में किस जाति से पुकारते हैं लोग तुम्हें जन्मपत्री में लिखा है कौन सा गोत्र और कहां ब्याही जाती हैं तुम्हारे घर की बहन-बेटियां बताओ अपना धर्म और वंशावली के बारे में किस मस्जिद किस मंदिर किस गुरुद्वारे में किस चर्च में...
Ankur | Ibbar Rabbi 11.10.2024 1:28
अँकुर | इब्बार रब्बी अँकुर जब सिर उठाता है ज़मीन की छत फोड़ गिराता है वह जब अन्धेरे में अंगड़ाता है मिट्टी का कलेजा फट जाता है हरी छतरियों की तन जाती है कतार छापामारों के दस्ते सज जाते हैं पाँत के पाँत नई हो या पुरानी वह हर ज़मीन काटता है हरा सिर हिलाता है नन्हा धड़ तानता है अँकुर आशा का रँग जमाता है।
Bachcha | Ramdarash Mishra 10.10.2024 1:49
बच्चा | रामदरश मिश्रा हम बच्चे से खेलते हैं। हम बच्चे की आँखों में झाँकते हैं। वह हमारी आँखों में झाँकता है हमारी आँखों में उसकी आँखों की मासूम परछाइयाँ गिरती हैं और उसकी आँखों में हमारी आँखों के काँटेदार जंगल। उसकी आँखें धीरे-धीरे काँटों का जंगल बनती चली जाती हैं और हम गर्व से कहते हैं- बच्चा बड़ा हो रहा है।
Pita | Vinay Kumar Singh 09.10.2024 1:35
पिता | विनय कुमार सिंह ख़ामोशी से सो रहे पिता की फैली खुरदुरी हथेली को छूकर देखा उन हथेलियों की रेखाएं लगभग अदृश्य हो चली थीं फिर उन हथेलियों को देखते समय नज़र अपनी हथेली पर पड़ी और एहसास हुआ न जाने कब उन्होंने अपनी क़िस्मत की लकीरों को चुपचाप मेरी हथेली में रोप दिया था अपनी ओर से कुछ और जोड़कर
Mann Ke Jheel Mein | Shashiprabha Tiwari 08.10.2024 2:36
मन के झील में | शशिप्रभा तिवारी आज फिर तुम्हारे मन के झील की परिक्रमा कर रही हूं धीरे-धीरे यादों की पगडंडी पर गुज़रते हुए वह पीपल का पुराना पेड़ याद आया उसके छांव में बैठ कर मुझसे बहुत सी बातें तुम करते थे मेरे कानों में बहुत कुछ कह जाते जो नज़रें मिला कर नहीं कह पाते थे क्या करूं गोविन्द! बहुत रोकती हूं मन कहा नहीं मानता तुम द्वारका वासी मैं बरसाने में बैठी तुम्हें घड़ी-घड़ी सुमर...
Laut ti Sabhyatayein | Anjana Tandon 07.10.2024 2:13
लौटती सभ्यताएँ | अंजना टंडन विश्वास की गर्दन प्रायः लटकती है संदेह की कीलों पर, “कहीं कुछ तो है” का भाव दरअसल दिमाग की दबी आवाज़ है जो अक्सर छोड़ देती है प्रशंसा में भी कितनी खाली ध्वनियाँ, संदेह के कान आत्ममुग्धता की रूई से बंद है आँखें ऊगी हैं पूरी देह पर और खून में है दुनियावी अट्टाहास , कंठ भर तंज दिल के मर्म को कभी जान नहीं पाएगा, मृत्यु बाद ही धुले थे बुल्लेशाह ,मीरा और अमृता के दाग, वैसे तो...
Tum Aurat Ho | Parul Chandra 06.10.2024 2:02
तुम औरत हो | पारुल चंद्रा क्योंकि किसी ने कहा है, कि बहुत बोलती हो, तो चुप हो जाना तुम उन सबके लिए... ख़ामोशियों से खेलना और अंधेरों में खो जाना, समेट लेना अपनी ख़्वाहिशें, और कैद हो जाना अपने ही जिस्म में… क्योंकि तुम तो तुम हो ही नहीं… क्योंकि तुम्हारा तो कोई वजूद नहीं... क्योंकि किसी के आने की उम्मीद पर आयी एक नाउम्मीदी हो तुम.. बोझ समझी जाती हो, माथे के बल बढ़ाती हो.. जो मानती हो ये सब सच, तो ख़ा...
Ishwar Tumhari Madad Chahta Hai | Vishwanath Prasad Tiwari 05.10.2024 1:29
ईश्वर तुम्हारी मदद चाहता है | विश्वनाथ प्रसाद तिवारी बदल सकता है धरती का रंग बदल सकता है चट्टानों का रूप बदल सकती है नदियों की दिशा बदल सकती है मौसम की गति ईश्वर तुम्हारी मदद चाहता है। अकेले नहीं उठा सकता वह इतना सारा बोझ।
Meri Beti | Ibbar Rabbi 04.10.2024 1:45
मेरी बेटी | इब्बार रब्बी मेरी बेटी बनती है मैडम बच्चों को डाँटती जो दीवार है फूटे बरसाती मेज़ कुर्सी पलंग पर नाक पर रख चश्मा सरकाती (जो वहाँ नहीं है) मोहन कुमार शैलेश सुप्रिया कनक को डाँटती ख़ामोश रहो चीख़ती डपटती कमरे में चक्कर लगाती है हाथ पीछे बांधे अकड़ कर फ़्रॉक के कोने को साड़ी की तरह सम्हालती कॉपियाँ जाँचती वेरी पुअर गुड कभी वर्क हार्ड के फूल बरसाती टेढ़े-मेढ़े साइन बनाती वह तरसती है माँ पि...
Mukti | Kedarnath Singh 03.10.2024 2:10
मुक्ति | केदारनाथ सिंह मुक्ति का जब कोई रास्ता नहीं मिला मैं लिखने बैठ गया हूँ मैं लिखना चाहता हूँ 'पेड़' यह जानते हुए कि लिखना पेड़ हो जाना है मैं लिखना चाहती हूँ ‘पानी’ 'आदमी' 'आदमी' मैं लिखना चाहता हूँ एक बच्चे का हाथ एक स्त्री का चेहरा मैं पूरी ताक़त के साथ शब्दों को फेंकना चाहता हूँ आदमी की तरफ़ यह जानते हुए कि आदमी का कुछ नहीं होगा में भरी सड़क पर सुनना चाहता हूँ वह धमाका जो शब्द और आदमी की टक्...
Hum Laut Jayenge | Shashiprabha Tiwari 02.10.2024 2:33
हम लौट जाएंगे | शशिप्रभा तिवारी कितने रात जागकर हमने तुमने मिलकर सपना बुना था कभी इस नीम की डाल पर बैठ कभी उस मंदिर कंगूरे पर बैठ कभी तालाब के किनारे बैठ कभी कुएं के जगत पर बैठ बहुत सी कहानियां मैं सुनाती थी तुम्हें ताकि उन कहानियों में से कुछ अलग कहानी तुम लिख सको और अपनी तकदीर बदल डालो कितने रात जागकर हमने तुमने मिलकर सपना बुना था साथ तुम्हारे हम भी दुनिया के रंग देख पाते! लेकि...
Pehra | Archana Verma 01.10.2024 1:25
पहरा | अर्चना वर्मा जहां आज बर्फ़ है बहुत पहले वहां एक नदी थी एक चेहरा है निर्विकार जमी हुई नदी. आंख, बर्फ़ में सुराख़ द्वार के भीतर है तो एक संसार मगर कैद हलचलों पर मुस्तैद महज़ अंधेरा है सख़्त और ख़ूँख़ार और गहरा है. पहरा है उस पर जो बर्फं की नसों में बहा नदी ने जिसे जम कर सहा
Bahut Pehle Se | Firaq Gorakhpuri 30.09.2024 2:11
बहुत पहले से | फ़िराक़ गोरखपुरी बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं मिरी नज़रें भी ऐसे क़ातिलों का जान ओ ईमाँ हैं निगाहें मिलते ही जो जान और ईमान लेते हैं जिसे कहती है दुनिया कामयाबी वाए नादानी उसे किन क़ीमतों पर कामयाब इंसान लेते हैं तबीअ'त अपनी घबराती है जब सुनसान रातों में हम ऐसे में तिरी यादों की चादर तान लेते हैं ख़ुद अपना फ़ैसला भी इश्क़ में काफ़...
Podcasts parecidos
O Replaio não é o publicador dos podcasts; os nomes dos programas, as capas e o áudio pertencem aos seus autores e são distribuídos por feeds RSS públicos