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Pratidin Ek Kavita

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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

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11 de jul de 2026

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Episódios

Nadi Ka Smarak | Kedarnath Singh 23.03.2025

 नदी का स्मारक | केदारनाथ सिंह अब वह सूखी नदी का एक सूखा स्मारक है। काठ का एक जर्जर पुराना ढाँचा जिसे अब भी वहाँ लोग कहते हैं 'नाव' जानता हूँ लोगों पर उसके ढेरों उपकार हैं पर जानता यह भी हूँ कि उस ढाँचे ने बरसों से पड़े-पड़े खो दी है अपनी ज़रूरत इसलिए सोचा अबकी जाऊँगा तो कहूँगा उनसे- भाई लोगों,  काहे का मोह आख़िर काठ का पुराना ढाँचा ही तो है सामने पड़ा एक ईंधन का ढेर- जिसका इतना टोटा है! वैसे भी दु...

Utra Jwaar | Doodhnath Singh 22.03.2025

उतरा ज्वार | दूधनाथ सिंह उतरा ज्वार  जल मैला  लहरें गयीं क्षितिज के पार  काला सागर अन्धी आँखें फाड़ ताक रहा है गहन नीलिमा  बुझे हुए तारे कचपच-कचपच ढूँढ़ रहे हैं ठौर  मैं हूँ मैं हूँ यह दृश् । खोज रहा हूँ बंकिम चाँद क्षितिज किनारे मन में जो अदृश्य है ।

Abhaya | Ashwini 21.03.2025

अभया | अश्विनी  पुरवा सुहानी नहीं, डरावनी है इस बार, चपला सी दिल दहलाती आती चीत्कार। वर्षा नहीं, रक्त बरसा है इस बार, पक्षी उड़ गए पेड़ों से, रिक्त है हर डार।  किसे सुनाती हो दुख अपना, सभी बहरे हैं,  नहीं समझेगा कोई, घाव तुम्हारे कितने गहरे हैं।  पहने मुखौटे घूमते, घिनौने वही सब चेहरे हैं,  अपराधी सत्ता के गलियारों में ही तो ठहरे हैं।  रक्षक बने भक्षक, छाई चारों ओर निराशा, धन के हाथों बिके हैं सब,...

Maun Hi Mukhar Hai | Vishnu Prabhakar 20.03.2025

मौन ही मुखर है | विष्णु प्रभाकर कितनी सुन्दर थी वह नन्हीं-सी चिड़िया कितनी मादकता थी कण्ठ में उसके जो लाँघ कर सीमाएँ सारी कर देती थी आप्लावित विस्तार को विराट के कहते हैं वह मौन हो गई है- पर उसका संगीत तो और भी कर रहा है गुंजरित- तन-मन को दिगदिगन्त को इसीलिए कहा है महाजनों ने कि मौन ही मुखर है, कि वामन ही विराट है ।

Ve Log | Lakshmi Shankar Vajpeyi 19.03.2025

वे लोग | लक्ष्मी शंकर वाजपेयी वे लोग डिबिया में भरकर पिसी हुई चीनी तलाशते थे चींटियों के ठिकाने छतों पर बिखेरते थे बाजरा के दाने कि आकर चुगें चिड़ियाँ वे घर के बाहर बनवाते थे पानी की हौदी कि आते जाते प्यासे जानवर पी सकें पानी भोजन प्रारंभ करने से पूर्व वे निकालते थे गाय तथा अन्य प्राणियों का हिस्सा सूर्यास्त के बाद, वे नहीं तोड़ने देते थे पेड़ से एक पत्ती कि ख़लल न पड़ जाए सोये हुए पेड़ों की नींद म...

Jhoot Ki Nadi | Vijay Bahadur Singh 18.03.2025

झूठ की नदी | विजय बहादुर सिंह झूठ की नदी में डगमग हैं  सच के पाँव चेहरे  पीले पड़ते जा रहे हैं मुसाफ़िरों के मुस्कुरा रहे हैं खेवैये मार रहे हैं डींग भरोसा है  उन्हें फिर भी सम्हल जाएगी नाव मुसाफ़िर  बच जाएँगें भँवर थम जाएगी

Hone Lagi Hai Jism Mein Jumbish To Dekhiye | Dushyant Kumar 17.03.2025

होने लगी है जिस्म में जुम्बिश तो देखिए |  दुष्यंत कुमार  होने लगी है जिस्म में जुम्बिश तो देखिए इस परकटे परिन्दे की कोशिश तो देखिए। गूंगे निकल पड़े हैं, ज़ुबाँ की तलाश में, सरकार के खिलाफ़ ये साज़िश तो देखिए। बरसात आ गई तो दरकने लगी ज़मीन, सूखा मचा रही ये बारिश तो देखिए। उनकी अपील है कि उन्हें हम मदद करें, चाकू की पसलियों से गुज़ारिश तो देखिए । जिसने नज़र उठाई वही शख्स गुम हुआ, इस जिस्म के तिलिस्म...

Nazar Jhuk Gayi Aur Kya Chahiye | Firaaq Gorakhpuri 16.03.2025

नज़र झुक गई और क्या चाहिए | फ़िराक़ गोरखपुरी नज़र झुक गई और क्या चाहिए अब ऐ ज़िंदगी और क्या चाहिए निगाह -ए -करम की तवज्जो तो है वो कम कम सही और क्या चाहिए दिलों को कई बार छू तो गई मेरी शायरी और क्या चाहिए जो मिल जाए दुनिया -ए -बेगाना में तेरी दोस्ती और क्या चाहिए मिली मौत से ज़िंदगी फिर भी तो न की ख़ुदकुशी और क्या चाहिए जहाँ सौ मसाइब थे ऐ ज़िंदगी  मोहब्बत भी की और क्या चाहिए गुमाँ जिसपे है ज़िंदगी का...

Capitalism | Gaurav Tiwari 15.03.2025

कैपिटलिज़्म | गौरव तिवारी  बाग में अक्सर नहीं तोड़े जाते गुलाब लोग या तो पसंद करते हैं उसकी ख़ुशबू या फिर डरते हैं उसमें लगे काँटों से जो तोड़ने पर कर सकते हैं उन्हें ज़ख्मी वहीं दूसरी तरफ़ घास कुचली जाती है, रगड़ी जाती है, कर दी जाती है अपनी जड़ों से अलग सहती हैं अनेक प्रकार की प्रताड़नाएं फिर भी रहती हैं बाग में, क्योंकि बाग भी नहीं होता बाग घास के बगैर  माली भी रखता है थोड़ा-बहुत ध्यान घास का, ताक...

Hajamat | Anup Sethi 14.03.2025

हजामत | अनूप सेठी    सैलून की कुर्सी पर बैठे हुए कान के पीछे उस्तरा चला तो सिहरन हुई आइने में देखा बाबा ने साठ-पैंसठ साल पहले भी कान के पीछे गुदगुदी हुई थी पिता ने कंधे से थाम लिया था आइने में देखा बाबा ने पीछे बैंच पर अधेड़ बेटा पत्रिकाएँ पलटता हुआ बैठा है चालीस साल पहले यह भी उस्तरे की सरसराहट से बिदका था बाबा ने देखा आइने में इकतालीस साल पहले जब पत्नी को पहली बार ब्याह के बाद गाँव में घास की गड...

Ek Chota Sa Anurodh | Kedarnath Singh 13.03.2025

एक छोटा सा अनुरोध | केदारनाथ सिंह आज की शाम जो बाज़ार जा रहे हैं उनसे मेरा अनुरोध है एक छोटा-सा अनुरोध क्यों न ऐसा हो कि आज शाम हम अपने थैले और डोलचियाँ रख दें एक तरफ़ और सीधे धान की मंजरियों तक चलें चावल ज़रूरी है ज़रूरी है आटा दाल नमक पुदीना पर क्यों न ऐसा हो कि आज शाम हम सीधे वहीं पहुँचें एकदम वहीं जहाँ चावल दाना बनने से पहले सुगन्ध की पीड़ा से छटपटा रहा हो उचित यही होगा कि हम शुरू में ही आमने-...

Jal | Ashok Vajpeyi 12.03.2025

 जल | अशोक वाजपेयी जल खोजता है जल में हरियाली का उद्गम कुछ नीली स्मृतियाँ  और मटमैले चिद्म जल भागता है जल की गली में गाते हुए लय का विलय का उच्छल गान जल देता है जल को आवाज़, जल सुनता है जल की कथा, जल उठाता है अंजलि में जल को, जल करता है जल में डूबकर उबरने की प्रार्थना जल में ही थरथराती है जल की कामना।

Aman Ka Naya Silsila Chahta Hun | Lakshmi Shankar Vajpeyi 11.03.2025

अमन का नया सिलसिला चाहता हूँ | लक्ष्मीशंकर वाजपेयी अमन का नया सिलसिला चाहता हूँ जो सबका हो ऐसा ख़ुदा चाहता हूँ। जो बीमार माहौल को ताज़गी दे वतन के लिए वो हवा चाहता हूँ। कहा उसने धत इस निराली अदा से मैं दोहराना फिर वो ख़ता चाहता हूँ। तू सचमुच ख़ुदा है तो फिर क्या बताना तुझे सब पता है मैं क्या चाहता हूँ। मुझे ग़म ही बांटे मुक़द्दर ने लेकिन मैं सबको ख़ुशी बांटना चाहता हूँ। बहुत हो चुका छुप के डर डर के...

Sapne | Shivam Chaubey 10.03.2025

सपने | शिवम चौबे  रिक्शे वाले सवारियों के सपने देखते हैं सवारियाँ गंतव्य के दुकानदार के सपने में ग्राहक ही आएं ये ज़रूरी नहीं मॉल भी आ सकते हैं छोटे व्यापारी पूंजीपतियों के सपने देखते हैं। पूंजीपति प्रधानमंत्री के सपने देखता है प्रधानमंत्री के सपने में सम्भव है जनता न आये आम आदमी अच्छे दिन के स्वप्न देखता है। पिता देखते हैं अपना घर होने का सपना माँ के सपने में आती है अच्छी नींद हर व्यक्ति अपनी जगह...

Main Unka Hi Hota | Muktibodh 09.03.2025

मैं उनका ही होता|  गजानन माधव मुक्तिबोध मैं उनका ही होता, जिनसे मैंने रूप-भाव पाए हैं। वे मेरे ही लिए बँधे हैं जो मर्यादाएँ लाए हैं। मेरे शब्द, भाव उनके हैं, मेरे पैर और पथ मेरा, मेरा अंत और अथ मेरा, ऐसे किंतु चाव उनके हैं। मैं ऊँचा होता चलता हूँ उनके ओछेपन से गिर-गिर, उनके छिछलेपन से खुद-खुद, मैं गहरा होता चलता हूँ।

Prem Gatha | Ajay Kumar 08.03.2025

प्रेम गाथा | अजय कुमार प्रेम एक कमरे को कैनवास में तब्दील कर के उसमें आँक सकता है एक बादल जंगल में नाचता हुआ मोर एक गिरती हुई बारिश देवदार का एक पेड़ एक सितारों भरी रेशमी रात एक अलसाई गुनगुनाती सुबह समुंदर की लहरों को मदमदाता शोर प्रेम एक गलती को दे सकता है पद्म विभूषण एक झूठ को सहेज कर रख सकता है आजीवन एक पराजय का सहला सकता है माथा और हर प्रतीक्षा का कर सकता है आलिंगन पर प्रेम की नदी में अपमानों...

Chanderi | Kumar Ambuj 07.03.2025

चँदेरी | कुमार अम्बुज चंदेरी मेरे शहर से बहुत दूर नहीं है  मुझे दूर जाकर पता चलता है  बहुत माँग है चंदेरी की साड़ियों की  चँदेरी मेरे शहर से इतनी क़रीब है  कि रात में कई बार मुझे  सुनाई देती है करघों की आवाज़  जब कोहरा नहीं होता  सुबह-सुबह दिखाई देते हैं चँदेरी के किले के कंगूरे  चँदेरी की दूरी बस इतनी है  जितनी धागों से कारीगरों की दूरी मेरे शहर और चँदेरी के बीच  बिछी हुई है साड़ियों की कारीगरी ...

Wo To Khusbu Hai Hawaon Mein Bikhar Jayega | Parveen Shakir 06.03.2025

वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा | परवीन शाकिर वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा मसअला फूल का है फूल किधर जाएगा हम तो समझे थे कि इक ज़ख़्म है भर जाएगा क्या ख़बर थी कि रग-ए-जाँ में उतर जाएगा वो हवाओं की तरह ख़ाना-ब-जाँ फिरता है एक झोंका है जो आएगा गुज़र जाएगा वो जब आएगा तो फिर उस की रिफ़ाक़त के लिए मौसम-ए-गुल मिरे आँगन में ठहर जाएगा आख़िरश वो भी कहीं रेत पे बैठी होगी तेरा ये प्यार भी दरिया...

Silbatta | Prashant Bebaar 05.03.2025

सिलबट्टा | प्रशांत बेबार  वो पीसती है दिन रात लगातार मसाले सिलबट्टे पर तेज़ तीखे मसाले अक्सर जलने वाले पीसकर दाँती तानकर भौहें वो पीसती है हरी-हरी नरम पत्तियाँ और गहरे काले लम्हे सिलेटी से चुभने वाले किस्से वो पीसती हैं मीठे काजू, भीगे बादाम और पीस देना चाहती है सभी कड़वी भददी बेस्वाद बातें लगाकर आलती-पालती लिटाकर सिल, उठाकर सिरहाना उसका दोनों हथेलियों में फँसाकर बट्टा सीने में सास भरकर नथुने फुला...

Adiyal Saans | Kedarnath Singh 04.03.2025

अड़ियल साँस | केदारनाथ सिंह पृथ्वी बुख़ार में जल रही थी और इस महान पृथ्वी के एक छोटे-से सिरे पर एक छोटी-सी कोठरी में लेटी थी वह और उसकी साँस अब भी चल रही थी और साँस जब तक चलती है झूठ सच पृथ्वी तारे - सब चलते रहते हैं डॉक्टर वापस जा चुका था और हालाँकि वह वापस जा चुका था पर अब भी सब को उम्मीद थी कि कहीं कुछ है। जो बचा रह गया है नष्ट होने से जो बचा रह जाता है लोग उसी को कहते हैं जीवन कई बार उसी को काई...

Ae Aurat | Nasira Sharma 03.03.2025

ऐ औरत! | नासिरा शर्मा  जाड़े की इस बदली भरी शाम को कहाँ जा रही हो पीठ दिखाते हुए ठहरो  तो ज़रा! मुखड़ा तो देखूँ कि उस पर कितनी सिलवटें हैं थकन और भूख-प्यास की सर पर उठाए यह सूखी लकड़ियों का गट्ठर  कहाँ लेकर जा रही हो  इसे? तुम्हें नहीं पता है कि लकड़ी जलाना, धुआँ फैलाना, वायु को दूषित करना अपराध है अपराध!   गैस है, तेल है ,क्यों नहीं करतीं इस्तेमाल उसे तुम्हारी ग़रीबी, बेचारगी और बेकारी के दुखड़ों...

Haar | Prabhat 02.03.2025

हार | प्रभात जब-जब भी मैं हारता हूँ मुझे स्त्रियों की याद आती है और ताक़त मिलती है वे सदा हारी हुई परिस्थिति में ही काम करती हैं उनमें एक धुन एक लय एक मुक्ति मुझे नज़र आती है वे काम के बदले नाम से गहराई तक मुक्त दिखलाई पड़ती हैं असल में वे निचुड़ने की हद तक थक जाने के बाद भी इसी कारण से हँस पाती हैं कि वे हारी हुई हैं विजय सरीखी तुच्छ लालसाओं पर उन्हें ऐतिहासिक विजय हासिल है

Gussa | Gulzar 01.03.2025

ग़ुस्सा |  गुलज़ार बूँद बराबर बौना-सा भन्नाकर लपका पैर के अँगूठे से उछला टख़नों से घुटनों पर आया पेट पे कूदा नाक पकड़ कर फन फैला कर सर पे चढ़ गया ग़ुस्सा!

Mareez Ka Naam | Usman Khan 28.02.2025

मरीज़ का नाम- उस्मान ख़ान चाहता हूँ किसी शाम तुम्हें गले लगाकर ख़ूब रोना लेकिन मेरे सपनों में भी वो दिन नहीं ढलता जिसके आख़री सिरे पर तुमसे गले मिलने की शाम रखी है सुनता हूँ कि एक नए कवि को भी तुमसे इश्क़ है मैं उससे इश्क़ करने लगा हूँ मेरे सारे दुःस्वप्नों के बयान तुम्हारे पास हैं और तुम्हारे सारे आत्मालाप मैंने टेप किए हैं मैं साइक्रेटिस्ट की तरफ़ देखता हूँ वो तुम्हारी तरफ़ और तुम मेरी तरफ़ और हम...

Banaya Hai Maine Ye Ghar | Ramdarash Mishra 27.02.2025

बनाया है मैंने ये घर | रामदरश मिश्र बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरे खुले मेरे ख़्वाबों के पर धीरे-धीरे किसी को गिराया न ख़ुद को उछाला कटा ज़िन्दगी का सफर धीरे-धीरे जहाँ आप पहुँचे छलॉंगें लगा कर वहाँ मैं भी पहुँचा मगर धीरे-धीरे पहाड़ों की कोई चुनौती नहीं थी उठाता गया यों ही सर धीरे-धीरे गिरा मैं कहीं तो अकेले में रोया गया दर्द से घाव भर धीरे-धीरे न हँस कर, न रोकर किसी में उड़ेला पिया ख़ुद ही अपना ज़हर...

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