कीर्ति बल्लभ जोशी

DEVINE VERSES (दिव्य श्लोक)

"दिव्य श्लोक" एक आध्यात्मिक पॉडकास्ट है जो वाल्मीकि रामायण और अन्य पवित्र हिंदू ग्रंथों की कालातीत कहानियों और शिक्षाओं को साझा करने के लिए समर्पित है। इस श्रृंखला में, हम प्राचीन ग्रंथों की गहरी और अद्भुत कथाओं को प्रस्तुत करेंगे, उनकी ज्ञानवर्धक शिक्षाओं को समझेंगे और आज के जीवन में उनकी प्रासंगिकता को खोजेंगे।हर एपिसोड में श्रोताओं को भगवान राम, सीता, और अन्य प्रमुख पात्रों की अद्भुत कहानियों की यात्रा पर ले जाया जाएगा, जैसा कि वाल्मीकि रामायण में वर्णित है। साथ ही, पॉडकास्ट में अन्य पवित्र ग्रंथों से प्रेरक चर्चाएँ और कथाएँ भी प्रस्तुत की जाएंगी, जो आध्यात्मिक ज्ञान और प्रेरणा का खजाना है

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Autor

कीर्ति बल्लभ जोशी

Categoria

Religion

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Último episódio

8 de nov de 2025

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Episódios

विष्णु सहस्रनाम स्त्रोत्रम 08.11.2025

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र हिन्दू धर्म का एक अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली स्तोत्र है, जिसमें भगवान विष्णु के 1000 दिव्य नामों का वर्णन है। यह महाभारत के अनुशासन पर्व में भी मिलता है। इसे भीष्म पितामह ने सूर्य देव की उपस्थिति में युधिष्ठिर को बताया था, जब वे शरशय्या पर थे। ⸻ 📜 इसका महत्व ​इसे पढ़ने से मन और आत्मा को शांति मिलती है। ​नकारात्मकता दूर होती है, मानसिक शक्ति बढ़ती है। ​ धन, स्वास्थ्य और समृद...

वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड त्रिषष्टितम: सर्ग 22.03.2025

1. विश्वामित्र की तपस्या और महर्षि पद की प्राप्ति शुनःशेप की रक्षा करने के बाद महर्षि विश्वामित्र ने फिर से कठोर तपस्या आरंभ कर दी। उन्होंने अनेक वर्षों तक घोर तप किया, जिससे प्रसन्न होकर ब्रह्मदेव ने उन्हें दर्शन दिए और कहा— "हे विश्वामित्र! तुम्हारी तपस्या अत्यंत प्रभावशाली है। अब तुम 'महर्षि' कहलाओगे।" ब्रह्मदेव ने यह भी कहा कि यद्यपि उन्होंने महर्षि पद प्राप्त कर लिया है, फिर भी वे 'ब्रह्मर्षि...

वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड एकषष्टितम : सर्ग 22.03.2025

वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के 61वें सर्ग में मुनि विश्वामित्र की तपस्या का वर्णन किया गया है। इस सर्ग में बताया गया है कि जब राजा त्रिशंकु को स्वर्ग में भेजने का प्रयास विफल हो गया और देवताओं ने उसे स्वर्ग से गिरा दिया, तब मुनि विश्वामित्र ने अपनी तपस्या को और भी कठोर बना लिया। त्रिशंकु की घटना के बाद, विश्वामित्र अत्यंत क्रोधित और दुखी हो गए। वे सोचने लगे कि उन्हें अपनी तपस्या को और अधिक प्रबल ब...

वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड द्विषष्टितम: सर्ग 22.03.2025

कथा का संक्षिप्त सार राजा हरिश्चंद्र और उनका यज्ञ अयोध्या के इक्ष्वाकु वंशी राजा हरिश्चंद्र ने एक यज्ञ करने का निश्चय किया। इस यज्ञ के लिए एक मनुष्य बलि की आवश्यकता थी, जिसे वे प्राप्त नहीं कर पा रहे थे। वे इस समस्या को हल करने के लिए अपने गुरु वशिष्ठ मुनि के पास गए, लेकिन कोई समाधान नहीं मिला। शुनःशेप का क्रय राजा हरिश्चंद्र ऋचीक मुनि के पुत्र शुनःशेप को उनके माता-पिता से मूल्य देकर क्रय कर लेते...

वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड षष्टितम: सर्ग: 07.03.2025

वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड - साठवां सर्ग: त्रिशंकु का यज्ञ और नूतन स्वर्ग की रचना प्रस्तावना राजा त्रिशंकु ने सशरीर स्वर्ग प्राप्ति की अभिलाषा से महर्षि विश्वामित्र का आश्रय लिया। अपने यज्ञीय बल और तपोबल से महर्षि ने त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेजा, किंतु देवराज इंद्र ने त्रिशंकु को वापस पृथ्वी की ओर भेज दिया। इससे क्रोधित होकर विश्वामित्र ने एक नए स्वर्ग की रचना का संकल्प किया, किंतु देवताओं के समझान...

वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड एकोनषष्टितम :सर्ग: 06.03.2025

वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के 59वें सर्ग में महर्षि विश्वामित्र द्वारा त्रिशंकु के यज्ञ की तैयारी का वर्णन किया गया है। इस सर्ग में महर्षि विश्वामित्र अपने पुत्रों और अन्य ऋषि-मुनियों को यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रित करते हैं। प्रसंग का सारांश: 1. यज्ञ का निश्चय: महर्षि विश्वामित्र राजा त्रिशंकु की इच्छा को पूर्ण करने के लिए एक महान यज्ञ का आयोजन करने का निश्चय करते हैं, जिससे त्रिशंकु अ...

वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड अष्टपंचाश: सर्ग: 06.03.2025

वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के 58वें सर्ग में राजा त्रिशंकु, महर्षि वशिष्ठ के पुत्रों और महर्षि विश्वामित्र के बीच एक महत्वपूर्ण घटना का वर्णन मिलता है। प्रसंग का सारांश: 1. त्रिशंकु की इच्छा: इक्ष्वाकु वंश के राजा त्रिशंकु को अपने जीवित अवस्था में ही स्वर्ग जाने की तीव्र इच्छा होती है। वे इस यज्ञ को संपन्न कराने के लिए पहले महर्षि वशिष्ठ के पास जाते हैं। 2. वशिष्ठ का अस्वीकार: महर्षि वशिष्ठ त्रिश...

वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड सप्तपंचाश: सर्ग: 05.03.2025

वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के 57वें सर्ग में राजा विश्वामित्र के घोर तपस्या और ब्रह्मर्षि बनने के दृढ़ निश्चय का वर्णन मिलता है। प्रसंग का सारांश: 1. तपस्या का आरम्भ: महर्षि वशिष्ठ के ब्रह्मदण्ड के आगे अपने सभी दिव्यास्त्रों की विफलता देखकर राजा विश्वामित्र को यह समझ में आ जाता है कि क्षत्रिय बल और दिव्यास्त्रों की शक्ति से ब्रह्मतेज पर विजय प्राप्त नहीं की जा सकती। 2. राजर्षि पद की प्राप्ति: राज...

वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड षट्पंचाश: सर्ग: 05.03.2025

वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के 56वें सर्ग में महर्षि वशिष्ठ और राजा विश्वामित्र के बीच एक महत्वपूर्ण घटना का वर्णन मिलता है। इस प्रसंग में राजा विश्वामित्र अपने अहंकार और शक्ति के मद में महर्षि वशिष्ठ के ऊपर नाना प्रकार के दिव्यास्त्रों का प्रयोग करते हैं, किंतु महर्षि वशिष्ठ अपने ब्रह्मदण्ड (ब्रह्मा का दिया हुआ एक दिव्य दण्ड) के माध्यम से सभी अस्त्रों को निष्फल कर देते हैं। प्रसंग का सारांश: 1. व...

वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड पंचपंचाश :सर्ग : 04.03.2025

वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के 55वें सर्ग में यह प्रसंग आता है कि जब राजा विश्वामित्र ने वशिष्ठ मुनि के आश्रम में उनकी दिव्य गौ “कामधेनु” को बलपूर्वक ले जाने का प्रयास किया, तो वशिष्ठ ने अपने तपोबल से कामधेनु को निर्देश दिया, जिससे उसकी शक्ति से विश्वामित्र की सेना नष्ट हो गई। इसके बाद, विश्वामित्र ने अपने सौ पुत्रों को आदेश दिया कि वे वशिष्ठ को पकड़ लें, लेकिन वशिष्ठ के प्रताप से वे सभी भस्म हो ग...

वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड चतुपंचाश:सर्ग: 03.03.2025

सर्ग 54 में राजा विश्वामित्र, महर्षि वशिष्ठ की दिव्य गाय शबला (कामधेनु) को बलपूर्वक ले जाने का प्रयास करते हैं। वशिष्ठ के मना करने पर भी जब विश्वामित्र ने अपने बल के घमंड में शबला को हांकने का प्रयास किया, तो शबला ने अपनी अद्भुत शक्तियों का प्रदर्शन किया। शबला का करुण क्रंदन: जब सैनिक शबला को ले जाने लगे, तो शबला अत्यंत दुःखी होकर महर्षि वशिष्ठ के पास आई और रोते हुए बोली: “हे ब्राह्मण! आप मुझे क्य...

वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड त्रिपंचाश:सर्ग 03.03.2025

सर्ग 53 में महर्षि वाल्मीकि ने राजा विश्वामित्र और महर्षि वशिष्ठ के बीच कामधेनु गाय (जिसे ‘शबला’ भी कहते हैं) को लेकर हुए संवाद का वर्णन किया है। प्रसंग: राजा विश्वामित्र एक महान क्षत्रिय थे। एक बार वे अपनी सेना सहित महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में पहुँचे। वशिष्ठ ने सभी का आदरपूर्वक स्वागत किया। उन्होंने शबला गाय की सहायता से पूरे राजा और उनकी विशाल सेना को भोजन कराया। कामधेनु की विशेषता: शबला एक दिव्य...

वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड द्विपंचाश:सर्ग: 02.03.2025

वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के 52वें सर्ग में महर्षि वशिष्ठ द्वारा राजा विश्वामित्र का सत्कार और कामधेनु (नंदिनी) को अभीष्ट वस्तुओं को उत्पन्न करने का आदेश देने की कथा वर्णित है। 1. राजा विश्वामित्र का आगमन राजा विश्वामित्र, जो एक प्रतापी राजा और महान योद्धा थे, एक दिन अपनी विशाल सेना, मंत्रियों और सेवकों के साथ महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में पहुंचे। वशिष्ठ ऋषि का आश्रम पवित्र, प्राकृतिक सुंदरता से भर...

वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड एकपंचाश:सर्ग: 02.03.2025

वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के 51वें सर्ग में ऋषि शतानन्द द्वारा ऋषि विश्वामित्र से श्रीराम के विषय में जानकारी प्राप्त करने और श्रीराम को विश्वामित्र की पुरानी कथा सुनाने का विस्तृत वर्णन है। 1. शतानन्द जी का आगमन और प्रश्न महर्षि शतानन्द, जो राजा जनक के राजपुरोहित और अहल्या-पुत्र थे, को जब ज्ञात हुआ कि उनके माता-पिता का उद्धार श्रीराम के द्वारा हुआ है, तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए। वे स्वयं राजा जनक...

वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड पंचाश: सर्ग: 02.03.2025

वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के 50वें सर्ग में श्रीराम, लक्ष्मण और ऋषि विश्वामित्र का मिथिला पुरी पहुंचने का वर्णन किया गया है। इस सर्ग में राजा जनक द्वारा अतिथियों का स्वागत और विश्वामित्र से उनका परिचय प्राप्त करने का प्रसंग है। श्रीराम का मिथिला पुरी पहुंचना अहल्या के उद्धार के पश्चात, श्रीराम, लक्ष्मण और ऋषि विश्वामित्र मिथिला की ओर बढ़े। मिथिला नगरी अपनी समृद्धि, शांति और भव्यता के लिए प्रसिद्...

वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड एकोनपंचाश:सर्ग 02.03.2025

वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के 49वें सर्ग में अहल्या उद्धार की कथा का विस्तार मिलता है और इंद्र को पितृ देवताओं द्वारा पुनर्स्थापित किए जाने की घटना का वर्णन है। पितृ देवताओं द्वारा इंद्र का उद्धार जब महर्षि गौतम ने इंद्र को अपनी पत्नी अहल्या के साथ छल करते हुए देखा, तो उन्होंने क्रोध में आकर इंद्र को शाप दिया कि उसके शरीर पर सहस्र (हजार) योनियों के चिह्न हो जाएं। इस शाप के कारण इंद्र अत्यंत लज्जि...

वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड अष्टचत्वारिंश:सर्ग 02.03.2025

वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के 48वें सर्ग में ऋषि विश्वामित्र, श्रीराम और लक्ष्मण के साथ विशाला पुरी पहुँचते हैं। वहाँ का राजा सुमति उनका आदरपूर्वक स्वागत करता है। राजा सुमति को ज्ञात होता है कि श्रीराम और लक्ष्मण स्वयं दशरथ नंदन हैं और ऋषि विश्वामित्र के साथ हैं, तो वह अत्यंत प्रसन्न होता है। वह उन्हें आतिथ्य सत्कार प्रदान करता है और वे उस रात विशाला पुरी में ही ठहरते हैं। अगले दिन मिथिला की ओर प...

वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड सप्तचत्वारिंश:सर्ग 22.02.2025

वाल्मीकि रामायण – बालकाण्ड – सर्ग 47 में महर्षि विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को लेकर विशाला नगरी पहुँचते हैं। वहाँ के राजा सुमति उनका आदरपूर्वक स्वागत करते हैं। इस दौरान राजा सुमति, विश्वामित्र से पूछते हैं कि वे इन दो दिव्य रूप वाले राजकुमारों (राम और लक्ष्मण) को कहाँ ले जा रहे हैं और उनके आने का उद्देश्य क्या है। राजा सुमति के वंश का उल्लेख राजा सुमति के वंश का उल्लेख करते हुए महर्षि विश्वामित्र क...

वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड षट्चत्वारिंश: सर्ग 21.02.2025

वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के 46वें सर्ग में महर्षि कश्यप और उनकी पत्नी दिति के बीच संवाद तथा इंद्र द्वारा दिति के गर्भ का विभाजन वर्णित है। 1. दिति का वरदान माँगना दिति, जो महर्षि कश्यप की पत्नी थीं, ने उनसे एक वीर पुत्र का वरदान माँगा, जो इंद्र को पराजित कर सके। वह अपने पुत्रों (हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष) की मृत्यु से दुखी थीं और चाहती थीं कि उनका होने वाला पुत्र इंद्र का वध करे। महर्षि कश्यप न...

वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड पंचचत्वारिंश:सर्ग 20.02.2025

वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड, 45वें सर्ग में समुद्र मंथन वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के 45वें सर्ग में महर्षि विश्वामित्र श्रीराम को समुद्र मंथन की कथा सुनाते हैं। इसमें देवताओं और दैत्यों ने मिलकर अमृत प्राप्ति के लिए क्षीरसागर का मंथन किया था। समुद्र मंथन की प्रक्रिया 1. समुद्र मंथन का कारण – असुरों के बढ़ते प्रभाव से चिंतित होकर देवताओं ने भगवान विष्णु से सहायता मांगी। उन्होंने अमृत प्राप्त करने क...

वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड चतुश्चत्वारिंश: सर्ग 19.02.2025

वाल्मीकि रामायण के बालकांड के 44वें सर्ग में भगवान ब्रह्मा जी राजा भगीरथ की तपस्या, उनके धैर्य और प्रयासों की सराहना करते हैं। सारांश: जब गंगा नदी भगवान शिव की जटाओं से मुक्त होकर प्रवाहित होती हैं, तो भगीरथ उनका अनुसरण करते हुए आगे बढ़ते हैं। गंगा विभिन्न दिशाओं में बहती हुई कपिल मुनि के आश्रम तक पहुँचती हैं, जहाँ राजा सगर के साठ हजार पुत्रों की राख स्थित थी। जैसे ही गंगा का जल उनके ऊपर प्रवाहित...

वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड त्रिचत्वारिंश: सर्ग 19.02.2025

वाल्मीकि रामायण के बालकांड के 43वें सर्ग में राजा भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव गंगा को अपनी जटाओं में धारण करते हैं और फिर धीरे-धीरे उसे धरती पर छोड़ते हैं। जब गंगा भगवान शिव की जटाओं से मुक्त होकर प्रवाहित होती हैं, तो वे वेगपूर्वक धरती पर आती हैं और आगे बढ़ते हुए बिंदुसरोवर में प्रविष्ट हो जाती हैं। संदर्भ: राजा सगर के साठ हजार पुत्रों की मुक्ति के लिए भगीरथ कठोर तपस्या करते हैं, जि...

वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड द्विचत्वारिंश: सर्ग 17.02.2025

वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के 42वें सर्ग में अंशुमान और भगीरथ की तपस्या तथा ब्रह्माजी के वरदान का वर्णन मिलता है। अंशुमान की तपस्या और असफलता अंशुमान, जिन्होंने अपने चाचाओं की भस्म देखी थी, अपने पितामह सगर को सारी घटना सुनाकर लौट आए। उन्होंने भी गंगाजल से अपने चाचाओं का तर्पण करने का संकल्प लिया। इसके लिए उन्होंने घोर तपस्या की, परंतु वे गंगा को पृथ्वी पर लाने में सफल नहीं हो सके। अंततः वे अपनी आ...

वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड एकचत्वा रिंश: सर्ग 17.02.2025

वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के 41वें सर्ग में अंशुमान का रसातल में जाकर अश्व को लाने और अपने चाचाओं के मारे जाने का समाचार देने का वर्णन मिलता है। जब राजा सगर के साठ हजार पुत्रों ने कपिल मुनि के आश्रम में जाकर उनके यज्ञीय अश्व को देखा, तो वे क्रोधित होकर उसे चुराने का दोष कपिल मुनि पर लगाने लगे। उनके इस अपराध के कारण कपिल मुनि ने उन्हें अपनी तेजस्वी दृष्टि से भस्म कर दिया। इसके बाद, राजा सगर ने अप...

वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड चत्वारिंश: सर्ग 15.02.2025

वाल्मीकि रामायण – बालकाण्ड – 40वाँ सर्ग इस सर्ग में महर्षि विश्वामित्र श्रीराम को राजा सगर के पुत्रों के अंत की कथा सुनाते हैं। सगर के पुत्र जब खोदे हुए मार्ग से कपिल मुनि के आश्रम तक पहुँचते हैं, तो वे वहाँ यज्ञीय अश्व को देखते हैं और जल्दबाजी में मुनि को दोषी ठहरा देते हैं। उनके इस अधर्म के कारण वे महर्षि कपिल के क्रोध से भस्म हो जाते हैं। 1. सगर के पुत्रों का कपिल मुनि के आश्रम में पहुँचना सगर...

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