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Pratidin Ek Kavita

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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

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Jul 11, 2026

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Episodes

Lok Jagat Ka Ladka | Devansh Ekant 29.12.2023

लोक जगत का लड़का | देवांश एकांत लगभग देहात और लगभग बीहड़ के बीच से वह लगभग क़स्बा आया था और उसे यह क़स्बा लगभग से आगे बढ़ पूरा का पूरा शहर लगा था उसकी आँखों में बल्ब का प्रतिबिम्ब असल रोशनी से अधिक जगमगाया मेज़ पर रखा कम्प्यूटर देख स्टीव जॉब्स या बिल गेट्स भी इतना उत्साहित न हुए होंगे जितना वह हो गया था न्योछावर शीशे पर अक्षरों और चित्रों को उड़ते देख गाड़ी के इंजन की ध्वनि सुन उसके भीतर की प्रणालि...

Connaught Place | Vishwanath Prasad Tiwari 28.12.2023

कनॉट प्लेस - विश्वनाथ प्रसाद तिवारी लोग ऐसे भाग रहे हैं कि लगता है कुछ ही घंटों में खाली हो जायेगा कनॉट प्लेस सबको आशा है कि सबको मिल जाएगी गाड़ी सबको भय है कि सबकी छूट जाएगी गाड़ी सबके पास माल- असबाब है वक़्त नहीं है. किसी के पास किससे कहूँ कि मेरे साथ चलो सभी जानते हैं  कि अभी गिरने वाला है. एटम बम सभी जानते हैं  कि अभी या फिर कभी नहीं  मुझे कोई जल्दी नहीं है खरामे-खरामे पकड़ ही लूँगा अपनी आखिरी बस...

Prem Pita Ka Dikhai Nahi Deta | Chandrakant Devtale 27.12.2023

प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता - चंद्रकांत देवताले तुम्हारी निश्चल आँखें  तारों-सी चमकती हैं मेरे अकेलेपन की रात के आकाश में  प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता  ईथर की तरह होता है  ज़रूर दिखाई देती होंगी नसीहतें  नुकीले पत्थरों-सी  दुनिया भर के पिताओं की लंबी क़तार में  पता नहीं कौन-सा कितना करोड़वाँ नंबर है मेरा  पर बच्चों के फूलों वाले बग़ीचे की दुनिया में  तुम अव्वल हो पहली क़तार में मेरे लिए  मुझे...

Jagah Ke Paas | Prakash Sahu 26.12.2023

जगह के पास | प्रकाश साहू घर का एक कोना होता है जहाँ कुछ तस्वीरें होती है माने गए ईश्वर की या बीते हुए मनुष्य की उसके आसपास कुछ छोटे बड़े रहस्य खुलते रहते हैं वह कोना कभी चौंकता नहीं उसी तरह के रहस्य शराबखाने , अस्पताल और घनिष्ट मित्र के पास भी खुलते हैं ये जगहें कभी चौंकतीं नहीं गुस्सा नहीं दिखाती अपना लेती है हर बात को (तथ्यों की तरह) साहस देती है अपनाने का बालों में उँगलियाँ फिराकर सुलाती है यह ध...

Mere Paas Prem Ke Liye Khalipan Hai, Jagah Nahi | Shraddha Upadhyay 25.12.2023
Gujarat Nahin Tumhara Zila | Shashwat Upadhyay 24.12.2023

गुजरात नहीं तुम्हारा जिला | शाश्वत उपाध्याय दो अलग दुनिया के बीच खटकती- झमकती (लगभग) उपस्थिति  कवि की तरफ से कभी “वारी जावां” की लड़ाई लड़ती है कभी ‘हासिल’ का चोंगा ओढ़ कर खुद पर इठलाने का बहाना ढूंढ़ती है नशा और नशेमन को दोष देने बढ़ते ही हैं पांव कि चुप-चाप ‘जो हो रहा है, होने दो’ के भाव से  बीयर की घूंट के साथ पानी हुई जाती है हैसियत। पुल गिरने से लेकर  सरकार गिरने तक उसी शहर में माला-फूल-बलात्...

Samooh Gaan | Dr Sheoraj Singh 'Bechain' 23.12.2023

समूह गान | डॉ. श्यौराज सिंह 'बेचैन'  नौजवां नया ‘जहाँ’ बनाएँगे। नौजवां नया ‘जहाँ’ बनाएँगे। खुशहाली हर किसी को हो– उजाली हर किसी को हो। जो आसमान की रही– वो रोशनी ज़मीं की हो। हमीं ‘शमाँ’ जलाएँगे-जलाएँगे। नौजवां नया ‘जहाँ’ बनाएँगे। नौजवां नया ’जहाँ’ बनाएँगे। जात-पात की तनाव  ऊँच-नीच, भेदभाव पेट के सवाल का जो दे नहीं सके जवाब ऐसी रहनुमाई अब न चाहेंगे।  नौजवां नया ‘जहाँ’ बनाएँगे। ये जो सांप्रदायिकता की...

Acche Bacche | Naresh Saxena 22.12.2023

अच्छे बच्चे | नरेश सक्सेना  कुछ बच्चे बहुत अच्छे होते हैं  वे गेंद और ग़ुब्बारे नहीं माँगते  मिठाई नहीं माँगते ज़िद नहीं करते  और मचलते तो हैं ही नहीं  बड़ों का कहना मानते हैं  वे छोटों का भी कहना मानते हैं  इतने अच्छे होते हैं  इतने अच्छे बच्चों की तलाश में रहते हैं हम  और मिलते ही  उन्हें ले आते हैं घर  अक्सर  तीस रुपए महीने और खाने पर। 

Vikshipt | Devansh Ekant 21.12.2023

विक्षिप्त | देवांश एकांत  उनके पैदा होते ही आदमी-औरत से माँ-पिता बने युगल की कामनाओं को ज्वर आ गया मेडिकल जाँच में ख़ारिज हुई उनकी परिपक्वता और मुक्त कर दिया गया उन्हें आकांक्षाओं से जैसे बहा दी गयीं हों अस्थियाँ गंगा में धीरे से उन्हें पागल कहा गया और तेज़ी से यह शब्द उनकी देह पर रोया बन उगने लगा उनमें से कुछ को हँसने का रोग था वे ईश्वर का चुटकुला कहलाये कुछ को दृश्यों के पीछे प्रेत दिखे वे किसी...

Maine Prem Kiya | Abhilash Pranav 20.12.2023

मैंने प्रेम किया | अभिलाष प्रणव  मैंने प्रेम किया, और चाहा कि आज़ाद ही रहूँ, याने मैंने खुद में और प्रेम में, खुद को चुना, सुविधा चुनी, आजादी चुनी, उसी वक़्त, उसने प्रेम किया और चाहा के उसे बाँध लिया जाए, याने उसने खुद में और प्रेम में, प्रेम को चुना, मुझे चुना, बंधन चुना, अब, जबके हम साथ नहीं हैं, मैं चाहता हूँ के वो बंध जाए, वो आगे बढ़ गयी है, और आजाद है. वो चाहती है के मैं आजाद हो जाऊं, और मैं वही...

Kavita Ki Hawa | Kanishka 19.12.2023

कविता की हवा | कनिष्का जब भी पापड़ तिलौरी चुरा छनते ढक के न रखें तो हवा लगने से खराब हो जाते हवा न लगे इसलिए मेहमानों को परोसे गए बचे बिस्कुट मठरी नमकीन नमकपारों जैसी चीजों को डब्बे में बंद करके रखा जाता है ताकि हवा न लगे हवा लगना कभी भी अच्छा नहीं माना गया हवाएँ एक भुलक्कड़ जलचर है जो संसार रुपी समुद्र में यहाँ वहाँ किसी से भी जा टकरा उसे अपने गिरोह में मिला लेते हैं पत्थरों को जब हवा लगी तो वह त...

Hidayatein | Babusha Kohli 18.12.2023

हिदायतें | बाबुषा कोहली उस आदमी से सहानुभूति रखना  जो ख़राब कविताएँ लिखता है  कविता, हर हाल में जिजीविषा का प्रतीक है  इसे तुम इस तरह सोचना  कि इस ख़तरनाक समय में कमस्कम वह जीना तो चाहता है  उस आदमी पर मत हँसना  जो दिशाओं को इतना ही जान पाया हो  जितना कि मोबाइल स्क्रीन के चार कोने  दरअसल, वह इस बात की संभावना है  कि किसी ऐसे ग्रह में भी जीवन संभव है जहाँ पानी न हो  उस आदमी को शुक्रिया कहना जिसने तुम...

Purkhon ka Dukh | Madan Kashyap 17.12.2023

पुरखों का दुःख - मदन कश्यप दादा की एक पेटी पड़ी थी टीन की  उसमें ढेर सारे काग़ज़ात के बीच  जरी वाली एक टोपी भी थी ज़र-ज़मीन के दस्तावेज़ बँटवारे की लादाबियाँ... उनकी लिखावट अच्छी थी  अपने ज़माने के ख़ासे पढ़े-लिखे थे दादा  तभी तो कैथी नहीं नागरी में लिखते थे उनमें कोई भी दस्तावेज़ नहीं था दुख का  दादा ने अपनी पीड़ाओं को कहीं भी दर्ज नहीं किया था  उनके ऐश्वर्य की कुछ कथाएँ ज़रूर सुनाती थी दादी  कि...

Pita Ke Shraadh Par | Ajay Jugran 16.12.2023

पिता के श्राद्ध पर | अजेय जुगरान हम कान लगाए बैठे हैं  लगता है अभी आवाज़ देंगे  लेकिन नहीं, वो हैं ही नहीं । मस्तिष्क पर आघात से पहले  वे पूर्णतः आत्मनिर्भर थे  या यूँ कहें केवल अम्मा पर निर्भर थे । हमसे कभी कुछ माँगा ही नहीं  केवल ताश, शतरंज या कैरम  खेलने का साथ छोड़ । उसके बाद उनकी आखें बोलने लगीं  और जब तक वो जिंदा थे  तब तक हम उन्हें पढ़ मददगार साक्षी रहे बने  उनके लिए टीवी लगाकर  उनके कमरे स...

Thand Mein Gauraiyya | Kedarnath Singh 15.12.2023

ठंड में गौरैया | केदारनाथ सिंह ठंड पर लिखी जाने वाली इस कविता में  यह गौरैया कहाँ से आ गई सबसे पहले? भला वह क्यों नहीं  जो चला जा रहा है सड़क पर  अपने कोट का कॉलर ठीक करता हुआ?  क्यों नहीं वह स्त्री  जो तार पर जल्दी-जल्दी फैला रही है  अपने स्वेटर?  वह धुनिया क्यों नहीं  जो चला जा रहा है गली में रुई के रेशों को आवाज़ देता हुआ? क्यों आख़िर क्यों  कविता के शुरू में वही गौरैया  छज्जे पर बैठी हुई  जिसे...

Selfi | Anamika 14.12.2023

सेल्फी | अनामिका  माएरी मैं तो गोविंद लीनों मौल चित्तौड़ के एक लिपे-पुते दालान में  मुझे मिल गई मीरा बाई  गोविंद को तौलतीं  एक विराट से तराज़ू पर  जो है आदमी का मन  डोलता ही रहता है हमेशा  और कभी एकाद पल संतुलित होकर फिर से झुक जाता है एक तरफ  बेचारगी में मीराबाई को मगन देखकर  मेरे मन में यह अचानक जगा  कि मैं सेल्फ़ी लूँ इधर मेरे बच्चों ने मुझे एक मोबाइल दी थी  और सिखाया था मनोयोग से  कि कैसे लेते...

Ma Ki Aankhen | Shrikant Verma 13.12.2023

माँ की आँखें | श्रीकांत वर्मा  मेरी माँ की डबडब आँखें  मुझे देखती हैं यों  जलती फ़सलें, कटती शाखें।  मेरी माँ की किसान आँखें!  मेरी माँ की खोई आँखें  मुझे देखती हैं यों  शाम गिरे नगरों को  फैलाकर पाँखें।  मेरी माँ की उदास आँखें।

Aage Badhenge | Ali Sardar Jafri 12.12.2023

आगे बढ़ेंगे | अली सरदार जाफ़री | आरती जैन वो बिजली-सी चमकी, वो टूटा सितारा, वो शोला-सा लपका, वो तड़पा शरारा, जुनूने-बग़ावत ने दिल को उभारा, बढ़ेंगे, अभी और आगे बढ़ेंगे! गरजती हैं तोपें, गरजने दो इनको दुहुल बज रहे हैं, तो बजने दो इनको, जो हथियार सजते हैं, सजने दो इनको बढ़ेंगे, अभी और आगे बढ़ेंगे! कुदालों के फल, दोस्तों, तेज़ कर लो, मुहब्बत के साग़र को लबरेज़ कर लो, ज़रा और हिम्मत को महमेज़ कर लो, ब...

Kavita Ka Janam | Ramdarash Mishra 11.12.2023

कविता का जन्म | रामदरश मिश्र | कार्तिकेय खेतरपाल आजकल  सोते-सोते जागता हूँ  जागते-जागते सोता हूँ  कहीं हो कर भी वहाँ नहीं होता हूँ  वाचाल भाषा  गर्भिणी युवती की तरह  अपनी ही आभा के भार से भर जाती है  आँखें दृश्यों से होकर  हो जाती हैं दृश्यों के पार  टूटे हुए रास्तों में  जुड़ जाता है संवाद  अपने ही भीतर कुछ खोया हुआ आता है याद  चारों ओर के अवकाशों में  कुछ थर्राने लगता है  सन्नाटा भी धीरे-धीरे गा...

Ab Main Suraj Ko Nahi Doobne Dungi | Sarveshwar Dayal Saxena 10.12.2023

 अब मैं सूरज को नहीं डूबने दूंगा | सर्वेश्वरदयाल सक्सेना अब मैं सूरज को नहीं डूबने दूंगा। देखो मैंने कंधे चौड़े कर लिये हैं मुट्ठियाँ मजबूत कर ली हैं और ढलान पर एड़ियाँ जमाकर खड़ा होना मैंने सीख लिया है। घबराओ मत मैं क्षितिज पर जा रहा हूँ। सूरज ठीक जब पहाडी से लुढ़कने लगेगा मैं कंधे अड़ा दूंगा देखना वह वहीं ठहरा होगा। अब मैं सूरज को नही डूबने दूँगा। मैंने सुना है उसके रथ में तुम हो तुम्हें मैं उता...

Billiyaan | Rajesh Joshi 09.12.2023

बिल्लियाँ - राजेश जोशी  मन के एक टुकड़े से चांद बनाया गया और दूसरे से बिल्लियाँ मन की ही तरह उनके भी हिस्से में आया भटकना अव्वल तो वे पालतू बनती नहीं और बन जाएं तो भरोसे के लायक नहीं होतीं उनके पांव की आवाज़ नहीं होती हरी चालाकी से बनाई गयीं उनकी आंखें अंधेरे में चमकती हैं चांद के भ्रम में वो भगोनी में रखा दूध पी जाती हैं मन के एक हिस्से से चांद बनाया गया और दूसरे से बिल्लियाँ चांद के हिस्से में अमर...

Ma Hai Resham Ke Kaarkhane Mein | Ali Sardar Jafri 08.12.2023

मां है रेशम के कारखाने में | अली सरदार जाफ़री मां है रेशम के कारखाने में बाप मसरूफ सूती मिल में है कोख से मां की जब से निकला है बच्चा खोली के काले दिल में है जब यहाँ से निकल के जाएगा कारखानों के काम आयेगा अपने मजबूर पेट की खातिर भूक सरमाये की बढ़ाएगा हाथ सोने के फूल उगलेंगे जिस्म चांदी का धन लुटाएगा खिड़कियाँ होंगी बैंक की रौशन खून इसका दिए जलायेगा यह जो नन्हा है भोला भाला है खूनीं सरमाये का निवाल...

Peeche Se | Arun Kamal 07.12.2023

पीछे से | अरुण कमल  कितना साफ़ आकाश है  पानी से पोंछा हुआ दूर ऊपर उठा उठता जाता नील  बादलों के तबक कहीं-कहीं  और इतने पंछी उठ रहे झुक रहे  हवा बस इतनी कि भरी है सब जगह  और एक चिड़िया वहाँ अकेली छोटी ठहरी हुई  ज़िंदगी की छींट कितना सुन्दर है संसार दिन के दो बजे  मनोहर शान्त  और यह सब मैं देख रहा हूँ गुलेल के पीछे से। 

Chunaav | Anamika 06.12.2023

चुनाव - अनामिका अपनी चपलता मुद्राओं में भी नर्तक सम तो नहीं भूलता पहीया नहीं भूलता अपना धूरा तू काहे भूल गई अनामिका तू कौन है याद रख शास्त्रों ने कहा तू-तू मैं-मैं करती दुनिया ने उंगली उठाई आखिर तू है कौन किस खेत की मूली मैं तो घबरा ही गई घबराकर सोचा इस विषम जीवन में मेरा सम कौन भला नाम तक कि कोई चौहत दी तो मुझको मिली नहीं यों ही पुकारा कि कर किये लोग अनामिका एक अकेला शब्द अनामिका आगे नाथ न पीछे प...

Cornice Par | Kunwar Narayan 05.12.2023

कार्निस पर -कुँवर नारायण  कार्निस पर एक नटखट किरण बच्चे-सी खड़ी जंगला पकड़ कर, किलकती है  “मुझे देखो!” साँस रोके बांह फैलाए खड़ा गुलमुहर... कब वह कूद कर आ जाए उसकी गोद में!

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