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Pratidin Ek Kavita

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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

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Jul 11, 2026

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Episodes

Sharton Par Tika Hai Mera Prem | Anupam Singh 23.01.2024

शर्तों पर टिका है मेरा प्रेम | अनुपम सिंह  मुझसे प्रेम करने के लिए  तुम्हें शुरू से शुरू करना होगा  पैदा होना होगा स्त्री की कोख से  उसकी और तुम्हारी धड़कन  धड़कनी होगी एक साथ मुझसे प्रेम करने के लिए  सँभलकर चलना होगा हरी घास पर  उड़ते हुए टिड्डे को पहले उड़ने देना होगा  पेड़ों के पत्ते बहुत ज़रूरत पर ही तोड़ने होंगे  कि जैसे आदिवासी लड़के तोड़ते हैं  फूलों को नोच  कभी मत चढ़ाना देवताओं की मूर्तिय...

Vo Kahan Hain Jo Kavita Likhti Hain | Rupam Mishra 22.01.2024

वो कहाँ हैं जो कविता लिखती हैं | रूपम मिश्र  वे बहुत दिन बाद आए हैं  भइया के सखा हैं  तो रवायतन मेरे भइया हैं  किसी पत्रिका में मेरी कविता पढ़ अभिभूत हैं भइया से अक्सर मेरा बखान करते  एक बार मिलना चाहते  भइया भी अप्रत्याशित गर्व से भर जाते  और लखनऊ आने पर मुझसे मिलवाने का वादा करते फिर जल्दी संजोग बना भतीजे के हैप्पी बर्थ डे में वे पधारे  भइया ने भीड़ में से मुझे बुलाया और हहर कर बताया  इनको नहीं...

Purusharth | Shraddha Upadhyay 21.01.2024

पुरुषार्थ | श्रद्धा उपाध्याय क्या पुरुषार्थ के अधिकार क्षेत्र में शामिल हैं  औरतें जो रचाती हैं रास  औरतें जो पकड़ी रहती हैं आस  औरतें जो अग्नि में तप्ती हैं  औरतें जो मूड नेह में घटती हैं औरतें जो उठाती हैं भांडे  औरतें जो चलाती हैं चरखे  औरतें जो घर चलाती हैं  औरतें जो जूठन खाती हैं  औरतें जो लहू में नहाती हैं और जो धान लगती हैं  औरतें जो तीज मनाती हैं  मैं एक थकी हुई औरत हूँ  मैं 16000 आदमियों...

Mithai Banane Wale | Shashwat Upadhyay 20.01.2024

मिठाई बनाने वाले | शाश्वत उपाध्याय  जब दुनिया बनी तो सबसे पहले बने मिठाई बनाने वाले हाथों में भर भर के चीनी की परत परत भी ऐसी वैसी नहीं एकदम गूलर का फूल छुआ के जितना खर्च हो, उतना बढ़े उंगली के पोरों में घी का कनस्तर, कनस्तर भी वही गूलर के फूलों वाला आँखों में परख, परख भी एकदम पाग चिन्ह लेने वाली इतने सब के बाद बोली तो मीठी होनी ही थी सो भी है। लेकिन कलेजा? मठूस हलवाई कहीं का, बचपन में ही काले रसगु...

Ukti | Suryakant Tripathi 'Nirala' 19.01.2024

 उक्ति | सूर्यकांत त्रिपाठी निराला कुछ न हुआ, न हो।  मुझे विश्व का सुख, श्री, यदि केवल  पास तुम रहो !  मेरे नभ के बादल यदि न कटे—  चंद्र रह गया ढका,  तिमिर रात को तिरकर यदि न अटे  लेश गगन-भास का,  रहेंगे अधर हँसते, पथ पर, तुम  हाथ यदि गहो।  बहु-रस साहित्य विपुल यदि न पढ़ा—  मंद सबों ने कहा—  मेरा काव्यानुमान यदि न बढ़ा—  ज्ञान जहाँ का रहा,  रहे, समझ है मुझमें पूरी, तुम  कथा यदि कहो।

Angor | Jacinta Kerketta 18.01.2024

अंगोर | जसिंता केरकेट्टा शहर का अंगार  जलता है, जलाता है  फिर राख हो जाता है।  गाँव के अंगोर  एक चूल्हे से  जाते हैं दूसरे चूल्हे तक  और सभी चूल्हे सुलग उठते हैं। 

Hawa Mein Pul | Madan Kashyap 17.01.2024

हवा में पुल | मदन कश्यप हवा में पुल था इसीलिए हवा का पुल था  क्योंकि हवा का पुल ही  हवा में हो सकता था  (आप चाहें तो इस पाठ को बदल सकते हैं, वह इस प्रकार: हवा का पुल था  इसीलिए हवा में पुल था क्योंकि हवा का पुल हवा में ही हो सकता था).... वैसे पुल के होने के लिए  कहीं न कहीं धरती से उसका जुड़ा हुआ होना ज़रूरी होता है। पुल क्या कोई भी ढाँचा केवल हवा में नहीं होता  हवा भी हवा में नहीं होती  वह भी पृथ्...

Kavita | Damodar Khadse 16.01.2024

कविता | दामोदर खड़से समय जब कहीं गिरवी हो जाता है साँसें तब कितनी भारी हो जाती हैं आसपास दिखता नहीं कुछ भी केवल देह दौड़ती है बरसाती बादलों की तरह  हाँफना भी भुला देती है थकान! ऐसे में तब तुम कविता की ताबीज बाँहों पर बाँध लेना! एक गुनगुनाहट  छोटे-छोटे छंदों की फुसफुसाहट शब्दों की दस्तक  और अपनी आहट भीतर ही भीतर पा लेना! कविता, अँधेरी रातों को चुभती विसंगत बातों को देगी एक संदेश और रह-रहकर  टूटता सम...

Laut Ke Wapas Aana | Shrey Karkhur 15.01.2024

लौट के वापस आना | श्रेय कारखुर  मेरी भाषा के एक बुजुर्ग कवि ने कहा है  कि घर बाहर जाने के लिए उतना नहीं होता  जितना लौट के वापस आने के लिए होता है मैंने हमेशा इन पंक्तियों को भरा हुआ पाया है  बहुत सी उम्मीद और ढेर सारे इंतज़ार से लौट के वापस आने में इंतज़ार भर की दूरी होती है  जिसे तय करती है पहाड़ों से लौटती गूंज  इस उम्मीद में,  कि कोई उसके लौटने का इंतजार कर रहा है  जैसे कवि करता है इंतज़ार, कव...

Apradh | Leeladhar Jagudi 14.01.2024

अपराध | लीलाधर जगूड़ी  जहाँ-जहाँ पर्वतों के माथे थोड़ा चौड़े हो गए हैं  वहीं-वहीं बैठेंगे फूल उगने तक  एक-दूसरे की हथेलियाँ गर्माएँगे  दिग्विजय की ख़ुशी में मन फटने तक  देह का कहाँ तक करें बँटवारा  आजकल की घास पर घोड़े सो गए हैं  मृत्यु को जन्म देकर ईश्वर अपराधी है  इतनी ज़ोरों से जिएँ हम दोनों  कि ईश्वर के अँधेरे को क्षमा कर सकें। 

Sangatkaar | Manglesh Dabral 13.01.2024

संगतकार | मंगलेश डबराल मुख्य गायक के चट्टान जैसे भारी स्वर का साथ देती  वह आवाज़ सुंदर कमज़ोर काँपती हुई थी  वह मुख्य गायक का छोटा भाई है  या उसका शिष्य  या पैदल चलकर सीखने आने वाला दूर का कोई रिश्तेदार  मुख्य गायक की गरज में  वह अपनी गूँज मिलाता आया है प्राचीन काल से  गायक जब अंतरे की जटिल तानों के जंगल में  खो चुका होता है  या अपने ही सरगम को लाँघकर  चला जाता है भटकता हुआ एक अनहद में  तब संगतकार...

Naye Tarah Se | Shashwat Upadhyay 12.01.2024

नए तरह से लैस होकर आ गई है नई सदी | शाश्वत उपाध्याय  जो दिख नहीं रही मनिहारिन, उसके चूड़ियों का बाज़ार बेड़ियों के भेंट चढ़ गया है। मोतियों की दुकान से सीपियों ने रार ठान लिया है नई तरह की लड़ाई लेकर आई है नई सदी। टिकुली साटती-दोपहर काटती सारी औरतें शिव चर्चाओं में गूंथ दी गईं हैं। शिव के गीतों में, अब छपरा-सिवान के सज्जन का ज़िक्र भी होने लगा है नई तरह की आस्था भी लेकर आ गई है नई सदी। खेत, भूरे होकर अल...

Pramaan Patra | Archana Verma 11.01.2024

प्रमाणपत्र - अर्चना वर्मा   लक्षणों की किताब से उसने चुन लिया एक रोग  और उसे जीवन का भोग  बना लिया उसके पास भी था आखिरकार  दिखाने के लिए एक घाव  वह उसे चाव से सहलाते हुए  पालने लगा शामों का अकेलापन  अब काटने नहीं दौड़ता बातचीत के लिए विषयों की  कमी नहीं  चिकित्सा की नवीनतम शोध से  मृत्यु दर के आँकड़े तक  बिकाऊ हैं उसकी दुकान में वे अब आते हैं अक्सर  हाथों में फूल, चेहरों पर मुस्कान  घण्टों बिता जा...

Ma Ka Chehra | Krishna Kalpit 10.01.2024

माँ का चेहरा | कृष्ण कल्पित  जब छीन ली जाएगी हमसे एक-एक स्मृति  जब किसी के पास कुछ नहीं बचेगा  पीतल के तमग़ों के सिवा जब सब कुछ ठहर जाएगा  एक-एक पत्ता झर जाएगा  सब पत्थर हो जाएगा  ठोस और खुरदुरा  नदी में नहीं दिखाई देगी चाँद की परछाईं  किसी आँख में नहीं बचेगा सपना हम सब कुछ भूल जाएँगे  घर का रास्ता, गाँव का नाम  दस का पहाड़ा, सब कुछ  तब कौन जान पाएगा  छब्बीस अगस्त उन्नीस सौ पिचासी तक  मुझे एक-एक झु...

Rekhte Mein Kavita | Uday Prakash 09.01.2024

रेखते में कविता | उदय प्रकाश  जैसे कोई हुनरमन्द आज भी  घोड़े की नाल बनाता दीख जाता है  ऊँट की खाल की मसक में जैसे कोई भिश्ती  आज भी पिलाता है जामा मस्जिद और चाँदनी चौक में  प्यासों को ठण्डा पानी जैसे अमरकंटक में अब भी बेचता है कोई साधू  मोतियाबिन्द के लिए गुलबकावली का अर्क शर्तिया मर्दानगी बेचता है  हिन्दी अख़बारों और सस्ती पत्रिकाओं में अपनी मूँछ और पग्गड़ के  फ़ोटो वाले विज्ञापन में हकीम बीरूमल...

Vastutah | Bhawani Prasad Mishra 08.01.2024

वस्तुतः | भवानी प्रसाद मिश्र मैं जो हूँ मुझे वही रहना चाहिए। यानी वन का वृक्ष खेत की मेंड़ नदी की लहर दूर का गीत व्यतीत वर्तमान में उपस्थित भविष्य में मैं जो हूँ मुझे वही रहना चाहिए तेज़ गर्मी मूसलाधार वर्षा कड़ाके की सर्दी ख़ून की लाली दूब का हरापन फूल की जर्दी मैं जो हूँ मुझे वही रहना चाहिए मुझे अपना होना ठीक-ठीक सहना चाहिए तपना चाहिए अगर लोहा हूँ तो हल बनने के लिए बीज हूँ तो गड़ना चाहिए फल बनने क...

Naye Saal Par | Snehamayi Choudhary 07.01.2024

नए साल पर | स्नेहमयी चौधरी  दोपहर जिस समय  थोड़ी देर के लिए स्थिर हो जाती है,  चहल-पहल रुकती-सी जान पड़ती है,  उस पार का जंगल गहरा हरा हो उठता है,  अपने कामों की गिनती करते-करते  जब सिर ऊपर उठाती हूँ—  सूरज दूसरी दिशा में पहुँच चुकता है। दिन सरक कर चिड़ियों के पंखों में  दुबक जाता है।  मैं अपने को वहीं बैठी पाती हूँ  जहाँ सुबह थी।  हर साल की तरह  पिछले सारे अधूरे कामों की गड्डी की ओर से  आँख बंद क...

Haq | Kedarnath Singh 06.01.2024

हक़ | केदारनाथ सिंह  पक्षियों को अपने फैसले खुद लेने दो उड़ने दो उन्हें हिन्द से पाक और पाक से हिन्द के पेड़ों की ओर अगर सरहद जरूरी है पड़ी रहने दो उसे जहाँ पड़ी है वह पर हाथों को हक दो कि मिलते रहें हाथों से पैरों को हक दो कि जब भी चाहें जाकर मिल आएँ उधर के रास्तों से चलती रहे वार्ता होते रहें हस्ताक्षर ये सब सही ये सब ठीक पर हक को भी हक दो कि ज़िंदा रहे वह!

Barbie Aur Sadak | Shashwat Upadhyay 05.01.2024

बार्बी और सड़क | शाश्वत उपाध्याय  मुझे मुड़ती हुई सड़कों पर बहुत प्यार आता है  सड़क, जो मेरे बचपन के पसंदीदा बार्बी की कमर की तरह है  बड़े करीने से मुड़ रही हो  जिस पर मैं लट्टुओं की तरह बेतरतीब चलता हूँ, कुलांचे भरत हूँ  ऐसी चल में चलता हूँ कि कमर मटक जाती है  कि चलना खराब लग जाता है  यह सब कुछ इसलिए होता है  कि सड़क का मुड़ना  बार्बी के कमर जैसा समझ आता है  वैसा नहीं समझ आता जैसा है  अभी मुड़ती सड़को...

Saukh | Archana Verma 04.01.2024

सौख | अर्चना वर्मा  झुनिया को चर्राया  इज्जत को सौख  बड़के मालिक की  उतरन का कुरता  देखने में चिक्कन  बरतने में फुसफुस  नाप में छोटा  कंधे पर  छाती पर  कसता बड़ी जिद और जतन से  महंगू को पहनाया मुश्किल है महंगू को  अब सांस लेना भी झुनिया ने महंगू की  एक नहीं मानी सांस बांस रखी रहे  इज्जत की ठानी एड़ी से चोटी तक  अंगों पर ढांप ली  चादर पुरानी  जीते जी पगली ने  ओढ़ लिया कफन  कोठरी में घुस कर  कुंडी च...

Vagarth | Sunita Jain 03.01.2024

वागर्थ | सुनीता जैन  एक पके फल-सा  रसमय शब्द  खोजती रहती है  रसना  जो भले कुछ न कहे  पर संवेद में  पूरा उतर जाए  एक थिरक लय की  खोजती रहती हैं  उँगलियाँ  जो भले ही  सुनाई न दे  पर साँसों में  ताल-सी  बज जाए  एक वागर्थ  ढूँढ़ती रहती हैं  आँखों की  पुतलियाँ  जो हथेलियों-सा  कहने और सहने को  संपुट  कर जाए 

Nadi Aur Sabun | Gyanendrapati 02.01.2024

नदी और साबुन | ज्ञानेन्द्रपति  नदी! तू इतनी दुबली क्यों है और मैली-कुचैली मारी हुई इच्छाओं की तरह मछलियाँ क्यों उतारे हैं तुम्हारे दुर्दिनों के दुर्जल में किसने तुम्हारा नीर हरा कलकल में कलुष भरा बाघों के जुठारने से तो कभी दूषित नहीं हुआ तुम्हारा जल न कछुओं की दृढ़ पीठों से उलीचा जाकर भी कम हुआ हाथियों की जल-क्रीड़ाओं को भी तुम सहती रहीं सानंद आह! लेकिन स्वार्थी कारख़ानों का तेज़ाबी पेशाब झेलते बैंग...

Naye Saal Ki Shubhkaamnayein | Sarveshwar Dayal Saxena 01.01.2024

नए साल की शुभकामनाएँ! - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना नए साल की शुभकामनाएँ! खेतों की मेड़ों पर धूल भरे पाँव को कुहरे में लिपटे उस छोटे से गाँव को नए साल की शुभकामनाएं! जाँते के गीतों को बैलों की चाल को करघे को कोल्हू को मछुओं के जाल को नए साल की शुभकामनाएँ! इस पकती रोटी को बच्चों के शोर को चौंके की गुनगुन को चूल्हे की भोर को नए साल की शुभकामनाएँ! वीराने जंगल को तारों को रात को ठंडी दो बंदूकों में घर की बा...

Bhaap | Shahanshah Alam 31.12.2023

भाप | शहंशाह आलम समुद्र की भाप होकर गया पानी वापस लौट आता है या जो रेत की भाप गई लौट आई बारिश बनकर शब्द की भाप गई वह भी दिमाग़ को भेदती लौट आई पछतावे की भाप गई फिर जूते के तल्ले के आगे दबी आकर भाप बनकर गया लड़की का ख़्वाब अब नहीं लौटता चाहकर दबे पाँव ख़्वाब जैसे लौट आता था घोड़ी पर सवार लड़का बनकर असर कम हो गया है माँ की दुआओं का तभी हत्यारा अपनी भीड़ में पाकर मार डालता है आग की भाप के बीच राँगे क...

Kukurmutta Prem | Kanishka 30.12.2023

कुकुरमुत्ता प्रेम | कनिष्का  गोले के जिस डायामीटर में हम पैदा हुए वहाँ से शुरू हुई कथाएँ तालू से फुली और दंत के बीच फस गई ऐसी दंत कथाए ओंघराए हैं मेरे तुम्हारे घर आँगन में शब्दों की नसबंदी में प्रेम कुकुरमुत्ता है कही भी उग आता है संसार की माँ ने अपने मैल से जन्मा इस कवक को जो अपनारजक है संसार पर लगे तरकारी और झोर के दाग से सने कपड़ों पर धर्म के सरिए में सुरंग बना पंथी लोक को छोड़ते हुए कुकुरमुत्त...

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