Nayi Dhara Radio
Pratidin Ek Kavita
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
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Episodes
Vaapsi | Ashok Vajpeyi 18.11.2024 2:37
वापसी | अशोक वाजपेयी जब हम वापस आएँगे तो पहचाने न जाएँगे- हो सकता है हम लौटें पक्षी की तरह और तुम्हारी बगिया के किसी नीम पर बसेरा करें फिर जब तुम्हारे बरामदे के पंखे के ऊपर घोसला बनाएँ तो तुम्हीं हमें बार-बार बरजो ! या फिर थोड़ी-सी बारिश के बाद तुम्हारे घर के सामने छा गई हरियाली की तरह वापस आएँ हम जिससे राहत और सुख मिलेगा तुम्हें पर तुम जान नहीं पाओगे कि उस हरियाली में हम छिटके हुए हैं ! हो सकता...
Gaon Gaya Tha Main | Vishwanath Prasad Tiwari 17.11.2024 2:30
गाँव गया था मैं | विश्वनाथ प्रसाद तिवारी गाँव गया था मैं मेरे सामने कल्हारे हुए चने-सा आया गाँव अफसर नहीं था मैं न राजधानी का जबड़ा मुझे स्वाद नहीं मिला युवतियों के खुले उरोजों और विवश होंठों में अँधेरे में ढिबरी- सा टिंमटिमा रहा था गाँव उड़े हुए रंग-सा पुँछे हुए सिंदूर-सा सूखे कुएँ-सा जली हुई रोटी - सा हँड़िया में खदबदाते कोदौ के दाने-सा गाँव बतिया रहे थे कुछ समझदार लोग अपने मवेशियों और पुआल और...
Zindagi Se Yehi Gila Hai Mujhe | Ahmed Faraz 16.11.2024 1:55
ज़िन्दगी से यही गिला है मुझे | फ़राज़ ज़िन्दगी से यही गिला है मुझे तू बहुत देर से मिला है मुझे हमसफ़र चाहिये हुजूम नहीं इक मुसाफ़िर भी काफ़िला है मुझे तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल हार जाने का हौसला है मुझे लब कुशां हूं तो इस यकीन के साथ कत्ल होने का हौसला है मुझे दिल धड़कता नहीं सुलगता है वो जो ख़्वाहिश थी, आबला है मुझे कौन जाने कि चाहतों में फ़राज़ क्या गंवाया है क्या मिला है मुझे
Pukar | Kedarnath Aggarwal 15.11.2024 1:31
पुकार | केदारनाथ अग्रवाल ऐ इन्सानों! आँधी के झूले पर झूलो आग बबूला बन कर फूलो कुरबानी करने को झूमो लाल सवेरे का मूँह चूमो ऐ इन्सानों ओस न चाटो अपने हाथों पर्वत काटो पथ की नदियाँ खींच निकालो जीवन पीकर प्यास बुझालो रोटी तुमको राम न देगा वेद तुम्हारा काम न देगा जो रोटी का युद्ध करेगा वह रोटी को आप वरेगा!
Vo Ped | Shashiprabha Tiwari 14.11.2024 2:30
वो पेड़ | शशिप्रभा तिवारी तुमने घर के आंगन में आम के गाछ को रोपा था तुम उसी के नीचे बैठ कर समय गुज़ारते थे उसकी छांव में लोगों के सुख दुख सुनते थे उस पेड़ के डाल के पत्ते उसके मंजर उसके टिकोरे उसके कच्चे पक्के फल सभी तुमसे बतियाते थे जब तुम्हारा मन होता अपने हाथ से उठाकर किसी के हाथ में आम रखते कहते इसका स्वाद अनूठा है वह पेड़ किसी को भाता था किसी को नहीं भी जैसे तुम कहते थे हर कोई मुझ...
Dua Sab Karte Aaye Hain | Firaaq Gorakhpuri 13.11.2024 2:19
दुआ सब करते आए हैं | फ़िराक़ गोरखपुरी दुआ सब करते आए हैं दुआ से कुछ हुआ भी हो दुखी दुनिया में बन्दे अनगिनत कोई ख़ुदा भी हो कहाँ वो ख़ल्वतें दिन रात की और अब ये आलम है। कि जब मिलते हैं दिल कहता है कोई तीसरा भी हो ये कहते हैं कि रहते हो तुम्हीं हर दिल में दुख बन कर ये सुनते हैं तुम्हीं दुनिया में हर दुख की दवा भी हो तो फिर क्या इश्क़ दुनिया में कहीं का भी न रह जाए ज़माने से लड़ाई मोल ले तुझसे बुरा भी ह...
Pyar Mein Chidiya | Kuldeep Kumar 12.11.2024 1:27
प्यार में चिड़िया | कुलदीप कुमार एक चिड़िया अपने नन्हे पंखों में भरना चाहती है आसमान वह प्यार करती है आसमान से नहीं अपने पंखों से एक दिन उसके पंख झड़ जायेंगे और वह प्यार करना भूल जायेगी भूल जायेगी वह अन्धड़ में घोंसले को बचाने के जतन बच्चों को उड़ना सिखाने की कोशिशें याद रहेगा सिर्फ़ पंखों के साथ झड़ा आसमान
Koi Hans Raha Hai Koi Ro Raha Hai | Akbar Allahabadi 11.11.2024 1:56
कोई हँस रहा है कोई रो रहा है | अकबर इलाहाबादी कोई हँस रहा है कोई रो रहा है कोई पा रहा है कोई खो रहा है कोई ताक में है किसी को है गफ़लत कोई जागता है कोई सो रहा है कहीँ नाउम्मीदी ने बिजली गिराई कोई बीज उम्मीद के बो रहा है इसी सोच में मैं तो रहता हूँ 'अकबर' यह क्या हो रहा है यह क्यों हो रहा है
Ladki Ne Darna Chhor Diya | Sheoraj Singh 'Bechain' 10.11.2024 2:02
लड़की ने डरना छोड़ दिया | डॉ श्यौराज सिंह बेचैन लड़की ने डरना छोड़ दिया अक्षर के जादू ने उस पर असर बड़ा बेजोड़ किया, चुप्पा रहना छोड़ दिया, लड़की ने डरना छोड़ दिया। हंसकर पाना सीख लिया, रोना-पछताना छोड़ दिया। बाप को बोझ नहीं होगी वह, नहीं पराया धन होगी लड़के से क्यों- कम होगी, वो उपयोगी जीवन होगी। निर्भरता को छोड़ेगी, जेहनी जड़ता को तोड़ेगी समता मूल्य जियेगी अब वो एकतरफा क्यों ओढ़ेगी। जल्दी नहीं क...
Doosre Log | Manglesh Dabral 09.11.2024 3:16
दूसरे लोग | मंगलेश डबराल दूसरे लोग भी पेड़ों और बादलों से प्यार करते हैं वे भी चाहते हैं कि रात में फूल न तोड़े जाएँ उन्हें भी नहाना पसन्द है एक नदी उन्हें सुन्दर लगती है दूसरे लोग भी मानवीय साँचों में ढले हैं थके-मांदे वे शाम को घर लौटना चाहते हैं। जो तुम्हारी तरह नहीं रहते वे भी रहते हैं यहाँ अपनी तरह से यह प्राचीन नगर जिसकी महिमा का तुम बखान करते हो सिर्फ़ धूल और पत्थरों का पर्दा है और भूरी...
Vah Chehra | Kuldeep Kumar 08.11.2024 1:28
वह चेहरा | कुलदीप कुमार आज फिर दिखीं वे आँखें किसी और माथे के नीचे वैसी ही गहरी काली उदास फिर कहीं दिखे वे सांवले होंठ अपनी ख़ामोशी में अकेले किन्हीं और आँखों के तले झलकी पार्श्व से वही ठोड़ी दौड़कर बस पकड़ते हुए देखे वे केश लाल बत्ती पर रुके-रुके अब कभी नहीं दिखेगा वह पूरा चेहरा?
Tumhari Kavita | Prashant Purohit 07.11.2024 3:05
तुम्हारी कविता | प्रशांत पुरोहित तुम्हारी कविता में उसकी काली आँखें थीं- कालिमा किसकी- पुतली की, भँवों की, कोर की, या काजल-घुले आँसुओं की झिलमिलाती झील की? तुम्हारी ग़ज़ल में उसकी घनी ज़ुल्फ़ें थीं— ज़ुल्फ़ें कैसीं- ललाट लहरातीं, कांधे किल्लोलतीं, कमर डोलतीं, या पसीने-पगी पेशानी पे पसरतीं, बट खोलतीं? तुम्हारी नज़्म में उसकी आवाज़ थी - आवाज़ कैसी- गाती हुई, बुलाती हुई, अलसाती हुई, या हाँफती काली...
Nadiyan | Alok Dhanwa 06.11.2024 1:31
नदियाँ | आलोक धन्वा इछामती और मेघना महानंदा रावी और झेलम गंगा गोदावरी नर्मदा और घाघरा नाम लेते हुए भी तकलीफ़ होती है उनसे उतनी ही मुलाक़ात होती है जितनी वे रास्ते में आ जाती हैं और उस समय भी दिमाग कितना कम पास जा पाता है दिमाग तो भरा रहता है लुटेरों के बाज़ार के शोर से।
Pani Ek Roshni Hai | Kedarnath Singh 05.11.2024 2:28
पानी एक रोशनी है। केदारनाथ सिंह इन्तज़ार मत करो जो कहना हो कह डालो क्योंकि हो सकता है फिर कहने का कोई अर्थ न रह जाए सोचो जहाँ खड़े हो, वहीं से सोचो चाहे राख से ही शुरू करो मगर सोचो उस जगह की तलाश व्यर्थ है। जहाँ पहुँचकर यह दुनिया एक पोस्ते के फूल में बदल जाती है नदी सो रही है उसे सोने दो उसके सोने से दुनिया के होने का अन्दाज़ मिलता है। पूछो चाहे जितनी बार पूछना पड़े चाहे पूछने में जितनी तकलीफ़ हो...
Ma | Uttima Keshari 04.11.2024 1:36
माँ | उत्तिमा केशरी माँ आसनी पर बैठकर जब एकाकी होकर बाँचती है रामायण तब उनके स्निग्ध ज्योतिर्मय नयन भीग उठते हैं बार-बार । माँ जब ज्योत्सना भरी रात्रि में सुनाती है अपने पुरखों के बारे में तो उनकी विकंपित दृष्टि ठहर जाती है कुछ पल के लिए मानो सुनाई पड़ रही हो एक आर्तनाद ! माँ जब सोती है धरती पर सुजनी बिछाकर तब वह ढूँढ़ रही होती है अपनी ही परछाई जिसे उसने छुपाकर रखा है वर्षों से ।
Andhere Ki Bhi Hoti Hai Ek Vyavastha | Anupam Singh 03.11.2024 3:42
अँधेरे की भी होती है एक व्यवस्था | अनुपम सिंह अँधेरे की भी होती है एक व्यवस्था चीज़ें गतिमान रहती हैं अपनी जगहों पर बादल गरजते हैं कहीं टूट पड़ती हैं बिजलियाँ बारिश अँधेरे में भी भिगो देती है पेड़ पत्तियों से टपकता पानी सुनाई देता है अँधेरे के आईने में देखती हूँ अपना चेहरा तुम आते तो दिखाई देते हो बस! ख़त्म नहीं होतीं दूरियाँ आँसू ढुलक जाते हैं गालों पर अँधेरे में भी दुख की होती है एक चमक दूर दी ज...
Achha Tha Agar Zakhm Na Bharte Koi Din Aur | Faraz 02.11.2024 2:55
अच्छा था अगर ज़ख्म न भरते कोई दिन और | फ़राज़ अच्छा था अगर ज़ख्म न भरते कोई दिन और उस कू-ए-मलामत में गुज़रते कोई दिन और रातों के तेरी यादों के खुर्शीद उभरते आँखों में सितारे से उभरते कोई दिन और हमने तुझे देखा तो किसी और को ना देखा ए काश तेरे बाद गुज़रते कोई दिन और राहत थी बहुत रंज में हम गमतलबों को तुम और बिगड़ते तो संवरते कोई दिन और गो तर्के-तअल्लुक था मगर जाँ पे बनी थी मरते जो तुझे याद ना करते कोई...
Vah Jan Mare Nahi Marega | Kedarnath Agarwal 01.11.2024 1:58
वह जन मारे नहीं मरेगा | केदारनाथ अग्रवाल जो जीवन की धूल चाटकर बड़ा हुआ है, तूफानों से लड़ा और फिर खड़ा हुआ है, जिसने सोने को खोदा, लोहा मोड़ा है, जो रवि के रथ का घोड़ा है, वह जन मारे नहीं मरेगा, नहीं मरेगा!! जो जीवन की आग जलाकर आग बना है, फौलादी पंजे फैलाये नाग बना है, जिसने शोषण को तोड़ा, शासन मोड़ा है, जो युग के रथ का घोड़ा है, वह जन मारे नहीं मरेगा, नहीं मरेगा!!
Ma Ki Zindagi | Suman Keshari 31.10.2024 1:38
माँ की ज़िन्दगी | सुमन केशरी चाँद को निहारती कहा करती थी माँ वे भी क्या दिन थे जब चाँदनी के उजास में जाने तो कितनी बार सीए थे मैंने तुम्हारे पिताजी का कुर्ते काढ़े थे रूमाल अपनी सास-जिठानी की नज़रें बचा के अपने गालों की लाली छिपाती वे झट हाज़िर कर देती सूई-धागा और धागा पिरोने की बाज़ी लगाती हरदम हमारी जीत की कामना करती माँ ऐसे पलों में खुद बच्ची बन जाती बिटिया यह नानी की कहानी नहीं इसी शहर की यह ते...
Mujhe Prem Chahiye | Nilesh Raghuvanshi 30.10.2024 1:52
मुझे प्रेम चाहिए | नीलेश रघुवंशी मुझे प्रेम चाहिए घनघोर बारिश-सा । कड़कती धूप में घनी छाँव-सा ठिठुरती ठंड में अलाव-सा प्रेम चाहिए मुझे। उग आये पौधों और लबालब नदियों-सा दूर तक पैली दूब उस पर छाई ओस की बुँदों सा । काले बादलों में छिपा चाँद सूरज की पहली किरण-सा प्रेम चाहिए । खिला-खिला लाल गुलाब-सा कुनमुनाती हँसी-सा अँधेरे में टिमटिमाती रोशनी-सा प्रेम चाहिए। अनजाना अनचीन्हा अनबोला सा पहली नज़र-सा प्र...
Stree | Sushila Takbhore 29.10.2024 1:33
स्त्री | सुशीला टाकभौरे एक स्त्री जब भी कोई कोशिश करती है लिखने की बोलने की समझने की सदा भयभीत-सी रहती है मानो पहरेदारी करता हुआ कोई सिर पर सवार हो पहरेदार जैसे एक मज़दूर औरत के लिए ठेेकेदार या खरीदी संपत्ति के लिए चौकीदार वह सोचती है लिखते समय कलम को झुकाकर बोलते समय बात को संभाल ले और समझने के लिए सबके दृष्टिकोण से देखे क्योंकि वह एक स्त्री है!
Marne Ki Fursat | Anamika 28.10.2024 1:54
मरने की फ़ुरसत | अनामिका ईसा मसीह औरत नहीं थे वरना मासिक धर्म ग्यारह बरस की उमर से उनको ठिठकाए ही रखता देवालय के बाहर! बेथलेहम और यरूशलम के बीच कठिन सफ़र में उनके हो जाते कई तो बलात्कार और उनके दुधमुँहे बच्चे चालीस दिन और चालीस रातें जब काटते सड़क पर, भूख से बिलबिलाकर मरते एक-एक कर— ईसा को फ़ुरसत नहीं मिलती सूली पर चढ़ जाने की भी!
Kab Laut Ke Aaoge | Salman Akhtar 27.10.2024 1:36
कब लौट के आओगे बता क्यों नहीं देते | सलमान अख़्तर कब लौट के आओगे बता क्यों नहीं देते दीवार बहानों की गिरा क्यों नहीं देते तुम पास हो मेरे तो पता क्यों नहीं चलता तुम दूर हो मुझसे तो सदा क्यों नहीं देते बाहर की हवाओं का अगर ख़ौफ़ है इतना जो रौशनी अंदर है, बुझा क्यों नहीं देते
Anupasthit Upasthit | Rajesh Joshi 26.10.2024 3:47
अनुपस्थित-उपस्थित | राजेश जोशी मैं अक्सर अपनी चाबियाँ खो देता हूँ छाता मैं कहीं छोड़ आता हूँ और तर-ब-तर होकर घर लौटता हूँ अपना चश्मा तो मैं कई बार खो चुका हूँ पता नहीं किसके हाथ लगी होंगी वे चीजें किसी न किसी को कभी न कभी तो मिलती ही होंगी वे तमाम चीज़ें जिन्हें हम कहीं न कहीं भूल आए छूटी हुई हर एक चीज़ तो किसी के काम नहीं आती कभी भी लेकिन कोई न कोई चीज़ तो किसी न किसी के कभी न कभी काम आती ही होग...
Dada Ki Tasveer | Manglesh Dabral 25.10.2024 2:43
दादा की तस्वीर | मंगलेश डबराल दादा को तस्वीरें खिंचवाने का शौक़ नहीं था या उन्हें समय नहीं मिला उनकी सिर्फ़ एक तस्वीर गन्दी पुरानी दीवार पर टँगी है वे शान्त और गम्भीर बैठे हैं। पानी से भरे हुए बादल की तरह दादा के बारे में इतना ही मालूम है कि वे माँगनेवालों को भीख देते थे नींद में बेचैनी से करवट बदलते थे और सुबह उठकर बिस्तर की सिलवटें ठीक करते थे मैं तब बहुत छोटा था मैंने कभी उनका गुस्सा नहीं देखा...
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