Nayi Dhara Radio
Pratidin Ek Kavita
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
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Episodes
Andhere Ka Swapn | Priyanka 13.12.2024 2:09
अंधेरे का स्वप्न | प्रियंका मैं उस ओर जाना चाहती हूँ जिधर हो नीम अँधेरा ! अंधेरे में बैठा जा सकता है थोड़ी देर सुकून से और बातें की जा सकती हैं ख़ुद से थोड़ी देर ही सही जिया जा सकता है स्वयं को ! अंधेरे में लिखी जा सकती है कविता हरे भरे पेड़ की फूलों से भरे बाग़ीचे की ओर उड़ती हुई तितलियों की अंधेरे में देखा जा सकता है सपना तुम्हारे साथ होने का तुम्हारे स्पर्श की, अनुभूतियों के स्वाद चखने का सफ़...
Itna To Zindagi Main Kisi Ki Khalal Pade | Kaifi Azmi 12.12.2024 2:04
इतना तो ज़िन्दगी में किसी की ख़लल पड़े | कैफ़ी आज़मी इतना तो ज़िन्दगी में किसी की ख़लल पड़े हँसने से हो सुकून ना रोने से कल पड़े जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी-पी के अश्क-ए-ग़म यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े एक तुम के तुम को फ़िक्र-ए-नशेब-ओ-फ़राज़ है एक हम के चल पड़े तो बहरहाल चल पड़े मुद्दत के बाद उस ने जो की लुत्फ़ की निगाह जी ख़ुश तो हो गया मगर आँसू निकल पड़े साक़ी सभी को है ग़म-ए-तश्नालबी मगर...
Itihaas | Naresh Saxena 11.12.2024 2:20
इतिहास | नरेश सक्सेना बरत पर फेंक दी गई चीज़ें, ख़ाली डिब्बे, शीशियाँ और रैपर ज़्यादातर तो बीन ले जाते हैं बच्चे, बाकी बची, शायद कुछ देर रहती हो शोकमग्न लेकिन देखते-देखते आपस में घुलने मिलने लगती हैं। मनाती हुई मुक्ति का समारोह। बारिश और ओस और धूप और धूल में मगन उड़ने लगती हैं उनकी इबारतें मिटने लगते हैं मूल्य और निर्माण की तिथियाँ छपी हुई चेतावनियाँ होने लगतीं अदृश्य कंपनी की मॉडल के स्तनों पर...
Jo Yuva Tha | Shrikant Verma 10.12.2024 1:59
जो युवा था | श्रीकांत वर्मा लौटकर सब आएँगे सिर्फ़ वह नहीं जो युवा था— युवावस्था लौटकर नहीं आती। अगर आया भी तो वह नहीं होगा। पके बाल, झुर्रियाँ, ज़रा, थकान वह बूढ़ा हो चुका होगा। रास्ते में आदमी का बूढ़ा हो जाना स्वाभाविक है— रास्ता सुगम हो या दुर्गम कोई क्यों चाहेगा बूढ़ा कहलाना? कोई क्यों अपने पके बाल गिनेगा? कोई क्यों चेहरे की सलें देख चाहेगा चौंकना? कोई क्यों चाहेगा कोई उससे कहे आदमी कितनी जल्द...
Yadi Prem Hai Mujhse | Ajay Jugran 09.12.2024 3:08
यदि प्रेम है मुझसे | अजय जुगरान यदि प्रेम है मुझसे तो मेरी घृणा का विरोध करना फिर वो चाहे किसी भी व्यक्ति किसी नस्ल से हो, यदि प्रेम है मुझसे तो मेरे क्रोध का विरोध करना फिर वो चाहे मेरे स्वयं या किसी और के प्रति हो, यदि प्रेम है मुझसे तो मेरी हिंसा का विरोध करना फिर वो चाहे किसी पशु किसी पेड़ के विरुद्ध हो, यदि प्रेम है मुझसे तो मेरी उपेक्षा का विरोध करना फिर वो चाहे किसी भी विचार मत या तर्...
Vah Ma Hai | Damodar Khadse 08.12.2024 2:27
वह माँ है | दामोदर खड़से दुःख जोड़ता है माँ के अहसासों में... माँ की अँगुलियों में होती है दवाइयों की फैक्ट्री! माँ की आँखों में होती हैं अग्निशामक दल की दमकलें माँ के सान्निध्य में होती है झील हर प्यास के लिए। स्वर्ग की कल्पना है माँ, माँ स्वर्ग होती है... समय की बेवफाई दुनिया के खिंचाव आकाश की ढलान सपनों के खौफ यात्राओं की भूख और सूरज के होते हुए अँधेरे के डर को काटता है कोई– ...
Ek Pal Hi Sahi | Nandkishore Acharya 07.12.2024 2:00
एक पल ही सही | नंदकिशोर आचार्य कभी निकाल बाहर करूँगा मैं समय को हमारे बीच से अरे, कभी तो जीने दो थोड़ा हम को भी अपने में ठेलता ही रहता है जब देखो जाने कहाँ फिर चाहे शिकायत कर दे वह उस ईश्वर को देखता जो आँखों से उसकी उसी के कानों से सुनता दे दे वह भी सज़ा जो चाहे एक पल ही सही जी तो लेंगे हम थोड़ा एक-दूसरे में समय के- और उस पर निर्भर ईश्वर के- बिना देखता हूँ पर हमारे बिना कैसे जिएँगे वे ख़ुद?
Dincharya | Shrikant Varma 06.12.2024 2:01
दिनचर्या | श्रीकांत वर्मा एक अदृश्य टाइपराइटर पर साफ़, सुथरे काग़ज़-सा चढ़ता हुआ दिन, तेज़ी से छपते मकान, घर, मनुष्य और पूँछ हिला गली से बाहर आता कोई कुत्ता। एक टाइपराइटर पृथ्वी पर रोज़-रोज़ छापता है दिल्ली, बंबई, कलकत्ता। कहीं पर एक पेड़ अकस्मात छप करता है सारा दिन स्याही में न घुलने का तप। कहीं पर एक स्त्री अकस्मात उभर करती है प्रार्थना हे ईश्वर! हे ईश्वर! ढले मत उमर। बस के अड्डे पर एक चाय की दु...
Kaurav Kaun, Kaun Pandav | Atal Bihari Vajpayee 05.12.2024 1:55
कौरव कौन, कौन पांडव | अटल बिहारी वाजपेयी कौरव कौन कौन पांडव, टेढ़ा सवाल है। दोनों ओर शकुनि का फैला कूटजाल है। धर्मराज ने छोड़ी नहीं जुए की लत है। हर पंचायत में पांचाली अपमानित है। बिना कृष्ण के आज महाभारत होना है, कोई राजा बने, रंक को तो रोना है।
Bachpan | Vinay Kumar Singh 04.12.2024 1:26
बचपन | विनय कुमार सिंह चाय के कप के दाग दिखाई दे रहे थे और फिर गुस्से से दी गई गाली के अक्स उस छोटे बच्चे के चेहरे पर देर तक दिखाई देते रहे जो अपने कमज़ोर हाथों से निर्विकार भाव से उन्हें चुपचाप धुल रहा था ।
Nadi | Kedarnath Singh 03.12.2024 2:26
नदी | केदारनाथ सिंह अगर धीरे चलो वह तुम्हें छू लेगी दौड़ो तो छूट जाएगी नदी अगर ले लो साथ तो बीहड़ रास्तों में भी वह चलती चली जाएगी तुम्हारी उँगली पकड़कर अगर छोड़ दो तो वहीं अँधेरे में करोड़ों तारों की आँख बचाकर वह चुपके से रच लेगी एक समूची दुनिया एक छोटे-से घोंघे में सच्चाई यह है कि तुम कहीं भी रहो तुम्हें वर्ष के सबसे कठिन दिनों में भी प्यार करती है एक नदी नदी जो इस समय नहीं है हमारे आसपास पर हो...
Mere Bheetar Ki Koel | Sarveshwar Dayal Saxena 02.12.2024 2:23
मेरे भीतर की कोयल | सर्वेश्वरदयाल सक्सेना मेरे भीतर कहीं एक कोयल पागल हो गई है। सुबह, दुपहर, शाम, रात बस कूदती ही रहती है हर क्षण किन्हीं पत्तियों में छिपी थकती नहीं। मैं क्या करूँ? उसकी यह कुहू-कुहू सुनते-सुनते मैं घबरा गया हूँ। कहाँ से लाऊँ एक घनी फलों से लदी अमराई? कुछ बूढ़े पेड़ पत्तियाँ सँभाले खड़े हैं यही क्या कम है! मैं जानता हूँ वह अकेली है और भूखी अपनी ही कूक की प्रतिध्वनि के सहारे वह जिय...
Meri Deh Main Paon Sahi Salamat Hain | Shahanshah Alam 01.12.2024 3:16
मेरी देह में पाँव सही-सलामत हैं | शहंशाह आलम यह उदासी का बीमारी का मारकाट का समय है तब भी इस उदासी को इस बीमारी को हराता हूँ मैं देखता हूँ इतनी मारकाट के बाद भी मेरी देह में मेरे पाँव सही-सलामत हैं मैं लौट आ सकता हूँ घाट किनारे से गंगा में बह रहीं लाशों का मातम करके मेरे दोनों हाथ साबुत हैं अब भी छू आ सकता हूँ उसके गाल को दे सकता हूँ बूढ़े आदमी का गिर गया पुराना चश्मा उस हत्यारे को मार भगा सकता ह...
Ghoos Mahatmay | Kaka Hathrasi 30.11.2024 1:23
घूस माहात्म्य | काका हाथरसी कभी घूस खाई नहीं, किया न भ्रष्टाचार ऐसे भोंदू जीव को बार-बार धिक्कार बार-बार धिक्कार, व्यर्थ है वह व्यापारी माल तोलते समय न जिसने डंडी मारी कहँ 'काका', क्या नाम पायेगा ऐसा बंदा जिसने किसी संस्था का, न पचाया चंदा
Daant | Nilesh Raghuvanshi 29.11.2024 1:37
दाँत | नीलेश रघुवंशी गिरने वाले हैं सारे दूधिया दाँत एक-एक कर टूटकर ये दाँत जायेंगे कहाँ ? छत पर जाकर फेंकूँ या गड़ा दूँ ज़मीन में छत से फैंकूँगा चुरायेगा आसमान बनायेगा तारे बनकर तारे चिढ़ायेंगे दूर से डालूँ चूहे के बिल में आयेंगे लौटकर सुंदर और चमकीले चिढ़ायेंगे बच्चे 'चूहे से दाँत’ कहकर खपरैल पर गये तो आयेंगे कवेल की तरह या उड़ाकर ले जायेगी चिड़िया गड़ाऊँगा ज़मीन में बन जायेंगे पेड़ खायेगा मिठ...
Gum hai Khud | Nandkishore Acharya 28.11.2024 1:37
गुम है ख़ुद | नंदकिशोर आचार्य ऐसी भी होती होगी खोज न कोई खोजी है जिसमें न कोई लक्ष्य तलाश ख़ुद की तलाश में अनवरत है गुम और मैं -जिसे खोजी कहते हैं सब- गुम हूँ उस खोज में जो कहीं खो कर मुझे गुम है ख़ुद।
Apni Mehfil | Kanhaiya Lal Nandan 27.11.2024 2:19
अपनी महफ़िल | कन्हैया लाल नंदन अपनी महफ़िल से ऐसे न टालो मुझे मैं तुम्हारा हूँ, तुम तो सँभालो मुझे ज़िंदगी! सब तुम्हारे भरम जी लिए हो सके तो भरम से निकालो मुझे मोतियों के सिवा कुछ नहीं पाओगे जितना जी चाहे उतना खँगालो मुझे मैं तो एहसास की एक कंदील हूँ जब भी चाहो बुझा लो, जला लो मुझे जिस्म तो ख़्वाब है, कल को मिट जाएगा रूह कहने लगी है, बचा लो मुझे फूल बन कर खिलूँगा, बिखर जाऊँगा ख़ुशबुओं की तरह से...
Baad Ki Sambhavnayein Saamne Hain | Dushyant Kumar 26.11.2024 2:06
बाढ़ की संभावनाएँ सामने हैं / दुष्यंत कुमार बाढ़ की संभावनाएँ सामने हैं, और नदियों के किनारे घर बने हैं । चीड़-वन में आँधियों की बात मत कर, इन दरख्तों के बहुत नाज़ुक तने हैं । इस तरह टूटे हुए चेहरे नहीं हैं, जिस तरह टूटे हुए ये आइने हैं। आपके क़ालीन देखेंगे किसी दिन, इस समय तो पाँव कीचड़ में सने हैं । जिस तरह चाहो बजाओ इस सभा में, हम नहीं हैं आदमी, हम झुनझुने हैं। अब तड़पती-सी ग़ज़ल कोई सुनाए, हमस...
Suno Bitiya | Suman Keshri 25.11.2024 1:36
सुनो बिटिया... | सुमन केशरी सुनो बिटिया मैं उड़ती हूँ खिड़की के पार चिड़िया बन तुम देखना खिलखिलाती ताली बजाती उस उजास को जिसमें चिड़िया के पर सतरंगी हो जाएँ ठीक कहानियों की दुनिया की तरह तुम सुनती रहना कहानी देखना चिड़िया का उड़ना आकाश में हाथों को हवा में फैलाना सीखना और पंजों को उचकाना इसी तरह तुम देखा करना इक चिड़िया का बनना सुनो बिटिया मैं उड़ती हूँ खिड़की के पार चिड़िया बन तुम आना…..
Prem Main Kia Gaya Apradh | Rupam Mishra 24.11.2024 1:41
प्रेम में किया गया अपराध | रूपम मिश्र प्रेम में किया गया अपराध भी अपराध ही होता है दोस्त पर किसी विधि की किताब में उसका दंड निर्धारण नहीं हुआ तुम सुन्दर हो! ये वाक्य स्त्री के साथ हुआ पहला छल था और मैं तुमसे प्रेम करता हूँ आखिरी अपराध उसके बाद किसी और अपराध की जरूरत नहीं पड़ी कभी गैरजरूरी लगने लगे प्रेम या खुद को जाया करने की कीमत मॉगने लगे आत्मा तो घृणा या उदासीनता से मुँह न फेरना अपना कोई बड़ा...
Kadam Milakar Chalna Hoga | Atal Bihari Vajpayee 23.11.2024 3:28
क़दम मिला कर चलना होगा / अटल बिहारी वाजपेयी बाधाएँ आती हैं आएँ घिरें प्रलय की घोर घटाएँ, पावों के नीचे अंगारे, सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ, निज हाथों में हँसते-हँसते, आग लगाकर जलना होगा। क़दम मिलाकर चलना होगा। हास्य-रूदन में, तूफ़ानों में, अगर असंख्यक बलिदानों में, उद्यानों में, वीरानों में, अपमानों में, सम्मानों में, उन्नत मस्तक, उभरा सीना, पीड़ाओं में पलना होगा। क़दम मिलाकर चलना होगा। उजियारे में,...
Kewal Main Nahi Hun | Ramdarash Mishra 22.11.2024 1:52
केवल मैं नहीं हूँ | रामदरश मिश्र तुम्हारे लिए लाता रहा रंग-बिरंगे उपहार लैंडस्केप रेडियो टी.वी. वीडियो-गेम्स फ्रीज तरह-तरह के फर्नीचर और न जाने कितने-कितने उपकरण साज-सज्जा के जब देखा कि मेरा कमरा एकदम भर गया है इनसे तो मैं कितना ख़ुश हुआ था ओ मेरे सुख! अब सोचता हूँ- सभी कुछ तो है इस कमरे में केवल मैं नहीं हूँ।
Chamba Ki Dhoop | Kumar Vikal 21.11.2024 1:51
चम्बा की धूप | कुमार विकल ठहरो भाई, धूप अभी आयेगी इतने आतुर क्यों हो आख़िर यह चम्बा की धूप है एक पहाड़ी गाय आराम से आयेगी यहीं कहीं चौग़ान में घास चरेगी गद्दी महिलाओं के संग सुस्तायेगी किलकारी भरते बच्चों के संग खेलेगी रावी के पानी में तिर जायेगी और खेल कूद के बाद यह सूरज की भूखी बिटिया आटे के पेड़े लेने को हर घर का चूल्हा -चौखट चूमेगी और अचानक थककर दूध बेचकर लौट रहे गुज्जर- परिवारों के संग, अपनी...
Bheegna | Prashant Purohit 20.11.2024 2:15
भीगना | प्रशांत पुरोहित जब सड़क इतनी भीगी है तो मिट्टी कितनी गीली होगी, जब बाप की आँखें नम हैं, तो ममता कितनी सीली होगी। जेब-जेब ढूँढ़ रहा हूँ माचिस की ख़ाली डिब्बी लेकर, किसी के पास तो एक अदद बिल्कुल सूखी तीली होगी। कोई चाहे ऊपर से बाँटे या फिर नीचे से शुरू करे, बीच वाला फ़क़त हूँ मैं, जेब मेरी ही ढीली होगी। ना रहने को ना कहने को, मैं कभी सड़क पर नहीं आता मैं तनख़्वाह का बंधुआ, आज़ादी बड़ी र...
Jeevan | Agyeya 19.11.2024 1:33
जीवन | अज्ञेय चाबुक खाए भागा जाता सागर-तीरे मुँह लटकाए मानो धरे लकीर जमे खारे झागों की— रिरियाता कुत्ता यह पूँछ लड़खड़ाती टांगों के बीच दबाए। कटा हुआ जाने-पहचाने सब कुछ से इस सूखी तपती रेती के विस्तार से, और अजाने-अनपहचाने सब से दुर्गम, निर्मम, अन्तहीन उस ठण्डे पारावार से!
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