Dr. Sudhanshu Kumar
Kalam (Hindi Poetry)
Presented podcasts will feature spoken lines of Hindi poems written and narrated by Dr. Sudhanshu Kumar. The episodes are a trial to reach out various sentiments and thoughts through words.
Author
Dr. Sudhanshu Kumar
Category
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Latest episode
Aug 12, 2024
Where to listen?
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Episodes
मन की बात 30.09.2022 4:06
सैनिकों के त्याग, बलिदान और बहादुरी के अनेक किस्से और कहानियाँ आप लोगों नें सुना होगा। क्या कभी उनके व्यक्तिगत जीवन में झाँकने का प्रयास कभी किसी ने किया है। आइए आज हम एक सैनिक के मन की बात, उसकी पत्नी की पीड़ा को अपनी कविता " मन की बात " से व्यक्त करने का प्रयास करते हैं।
शिक्षक शिक्षण और वो 27.08.2022 5:32
बेसिक शिक्षा में नित नये प्रयोग होते रहते हैं। इसी प्रयोग की कड़ी में एक नया नाम सामने आया है, जिसका नाम है टास्क फोर्स। इस टास्क फोर्स का नाम सुनते ही शिक्षकों में भय व्याप्त हो जाता है। इस भय से कितना गुणवत्तापूर्ण शिक्षण हो रहा है, आइए जानते हैं हमारी कविता " शिक्षक शिक्षण और वो " से।
गुुमनाम परिंदे 14.08.2022 4:02
स्वतंत्रता दिवस के खुशनुमा, शरीर में सिहरन पैदा करने वाले प्रभात की बधाई और शुभकामनायें। आजादी के इस अमृत महोत्सव में आज हम उन अमर बलिदानियों को याद करेंगे जिनका देश के किसी भी अभिलेख में नामोनिशान नहीं है। वे गुमनाम हैं। उन्होंनें निष्काम भाव से हमें स्वतंत्रता दिलाई पर खुद काल के गाल में समा गये। आइए उन्हीं मतवालों को स्मरण करते हैं हमारी कविता " गुमनाम परिंदे " से।
स्नेह सूत्र 11.08.2022 4:23
भाई-बहन के अटूट विश्वास और प्रेम के प्रतीक रक्षाबंधन के पावन पर्व पर हम सभी श्रोताओं का हार्दिक स्वागत, अभिनन्दन और वंदन करते हैं। वैसे तो इस प्रेम को शब्दों में व्यक्त करना सम्भव नहीं है फिर भी उसके कुछ अंशों को हमारी कविता " स्नेह सूत्र " के माध्यम से व्यक्त करने का प्रयास किया गया है।
गाँव छोड़कर हम बैठे 06.08.2022 5:10
आइये आज हम अपने सुखद अतीत में खो जायें। गाँवों में अतीत की भावनाओं की खुशबू को महसूस करें। गाँव से शहर की ओर जाने और विचार परिवर्तन से होने वाली समस्याओं उजागर करते हुए अतीत के आनन्ददायी पलों को भी याद करायेगी हमारी कविता "गाँव छोड़कर हम बैठे"।
हृदय 18.07.2022 4:25
हृदय का रक्त से सम्बन्ध अन्योन्याश्रित है। रुधिर वायु और भोजन से समन्वय करके स्थूल काया की गतिविधियों को संचालित करता है तथा तन मन और जीवन का समन्वय प्राणिमात्र की गतिशीलता के लिए आवश्यक है। जीवन काया के साथ अनवरत प्रवाहमान बना रहे , इसी अवधारणा को व्यक्त करेगी हमारी नई कविता " हृदय "। यहाँ दिल के भाव पक्ष के बजाय उसके भावनाहीन पक्ष अर्थात यांत्रिक पक्ष को महत्व दिया गया है।
भूख 10.07.2022 4:07
एक कहावत हम लोग अक्सर सुनते हैं " पेट न होता तो किसी का किसी से भेंट न होता "। भूख जीव के गतिशीलता का प्रमुख कारक है। प्राणिमात्र के सभी इन्द्रियों की चैतन्यता भूख में सन्निहित है। भूख की तीव्रता हमारे कार्य की प्रक्रिया को गतिमान करती है। ज्ञान की जिज्ञासा हो या शान की भूख, प्रेम की प्यास हो या भक्ति की आकांक्षा भूख ही समस्त क्रियाओं का केन्द्र है। भूख के इन्हीं आयामों से परिचित करायेगी हमरी कवित...
निवेदन 01.07.2022 4:04
मानव जीवन संघर्ष की गाथा बने। व्यक्ति नवल सृजन खुद करे। उसे किसी बैसाखी की जरूरत महसूस न हो। उसके विचारों में सूक्ष्म सत्ता का आभास तो हो लेकिन वह उससे किसी भी दशा में याचना न करे। वह अपने भाग्य का विधाता खुद बने। इन्हीं भावों का अहसास कराएगी हमारी कविता " निवेदन "।
नारी 22.06.2022 3:57
समष्टि में शक्ति निराकार है उसके अनेक साकार रूपों में नारी सर्व शक्तिमान है। ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं क्योकि ईश्वर को भी मानव रूप में आसुरी शक्तियों का विनाश करने के लिए नारी शक्ति की उपासना करनी पड़ी। सृष्टि का सृजन भी नारी शक्ति के अभाव में असम्भव है। नारी जगत की समस्त रचनात्मक प्रक्रियाओं के केंद्र में है। नारी के अनेक रूपों का दर्शन करायेगी हमारी कविता " नारी "।
अश्क (ऑंसू) 11.06.2022 5:23
माँ अपनी सन्तान के जीवन को सुखमय बनाने के लिए क्या कुछ नहीं करती। लेकिन उसकी ही सन्तान उसके प्राण के प्यासे हो जाय तो माँ का क्या हाल होगा। आज हम ऐसी ही दुख भरी कहानी के साथ प्रस्तुत हैं। आइए सुनते हैं माँ भारती के दुख को हमारी कविता " अश्क " से।
राष्ट्रद्रोह 06.06.2022 5:06
राष्ट्रद्रोह जघन्य अपराध है। एक देशभक्त अपने प्राण भी देकर देश की रक्षा करता है। अगर कोई व्यक्ति दूसरे देश के साथ मिलकर अपने देश के साथ विश्वासघात करता है और अपने ही देश के लोगों के कत्ल के लिए पैसे का प्रबन्ध करता है, लोगों के आपसी सौहार्द को बिगाड़ता है, सामूहिक नरसंहार में अप्रत्यक्ष भूमिका निभाता है तो उसके लिए क्या दण्ड होना चाहिए? इसको हम न्यायालय पर छोड़ते हैं,लेकिन अपनी भावना के उफान को अप...
कश्मीर का शत्रुघ्न 01.06.2022 7:12
आतंकवाद किसी भी देश की सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक, व्यापारिक और राजनीतिक गतिविधियों में गतिरोध पैदा करके उसकी रीढ़ रज्जु को तोड़ देता है। इसका अद्यतन उदाहरण हमारा केन्द्र शासित राज्य जम्मू-कश्मीर है। यहाँ के रक्तपात को रोकने से लेकर अमन और शांति के लिए जो प्रयास हमारे शत्रुध्न ने किया है उसका असर अब दिखने लगा है। आइए हमारी नयी कविता " कश्मीर का शत्रुघ्न " के माध्यम से उसकी वस्तु स्थिति क...
बुढ़ापे का दर्द 22.05.2022 4:12
जीवन के अन्तिम पड़ाव पर बृद्धावस्था की कहानी कह रही है हमारी नयी कविता " बुढ़ापे का दर्द "। बुढ़ापे में दैहिक, दैविक और भौतिक कष्ट के साथ-साथ मानसिक तनाव सर्वाधिक पीड़ादायक होता है। इस समय व्यक्ति की काया के सभी अंग और अंगतंत्र शिथिल होते हुए इहलोक से परलोक की यात्रा की ओर इशारा करने लगते हैं। आइए इसी कहानी को सुनते हैं।
कामना 15.05.2022 4:25
प्रेम शब्दों से व्यक्त नहीं हो सकता। भाव के स्तर पर हृदय से उत्पन्न मस्तिष्क से परे संवेदनाओं के स्पंदन का भावनाओं के रूप में स्फुरण प्रेम को प्रदर्शित करने का एक माध्यम हो सकता है पर प्रेम नहीं। एक प्राणी का दूसरे से प्रेम, प्राणिमात्र का ईश्वर से प्रेम, चेतन का जड़ से प्रेम आदि के प्रदर्शन के अनेक माध्यम हैं। उन्हीं माध्यमों में से एक माध्यम है " कामना "। आइए सुनते हैं हमारी कविता का...
कर्मरथी 03.05.2022 3:11
"कर्मरथी" कर्म के रथ पर सवार उन कर्मवीरों की गाथा है जो दिन-रात अपने काम में तल्लीन रहते हैं। उनके बच्चे और वे खुद भूखे प्यासे रहकर, अपने शरीर की परवाह किए बिना कर्म योग की धारा में गोता लगाते हुए गीता के संदेशों के वाहक हैं। आइये इन्हीं संदेशों को सुनते हैं, हमारी कविता " कर्मरथी " से।
आशा 24.04.2022 3:21
आशा उस निराश्रित निर्धन की कहानी है जो हमारे देश के हर समाज में उपेक्षित हैं लेकिन किसी से कुछ माॅगने के बजाय अपने जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओ की पूर्ति स्वयं करती हैं और जीवन जीने की आशा को प्रसन्नता के साथ बनाये रखती हैं। आशा भूख मिटाने के लिए संघर्ष की गाथा है। अपनी कठिनाइयों को कितनी सहजता से वह दूर करती हैं, इसे जानने के लिए आइये सुनते हैं हमारी कविता " आशा "।
पेंशन का टेंशन 15.04.2022 3:24
सरकारी कर्मचारियों के लिए पेंशन बृद्धावस्था में सुरक्षा कवच था। सरकार ने पेंशन बन्द कर दिया है। पेंशन न मिलने का तनाव कितना है? पेंशन विहीन कर्मचारियों की मनोदशा कैसी है? इसे महसूस करने के लिए हम एक नई कविता "पेंशन की टेंशन" प्रस्तुत कर रहे हैं। हमें पूर्ण विश्वास है कि पेंशन न मिलने का दर्द शासन तक अवश्य पहुँचेगा।
श्रीराम 09.04.2022 3:21
भगवान श्रीराम के प्राकट्य दिवस रामनवमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ आज के हमारे इस एपीसोड में आप सभी का स्वागत है। आइये इस कविता के माध्यम से उनके द्वारा किए गए कार्यों और सन्देशों को आत्मसात करने की चेष्टा करतें हैं।
बुनियाद 03.04.2022 3:24
जीवन बुनियाद के बिना नहीं चल सकता । जीवन जीने के लिए अनेक बुनियादों की आवश्यकता पड़ती है। सर्व प्रथम बुनियाद रोटी, कपड़ा और मकान है। इसके बाद शिक्षा जीवन की आधारभूत आवश्यकता है। जीवन के बुनियाद को समेटे हुए प्रस्तुत है हमारी कविया "बुनियाद"।
शहीद ए आज़म 23.03.2022 2:48
शहीद दिवस के इस कारुणिक पर्व पर हम समस्त सहीदों को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं। आज इस पर्व पर शहीदे आजम के शान का सम्मान करते हुए हम हमारी कविता शहीद ए आजम प्रस्तुत कर रहे हैं।
जोगीरा सर रर 18.03.2022 2:48
होली के अबीर और गुलाल में सराबोर कर देने वाली हमारी कविता जोगीरा सर र र आप के समक्ष प्रस्तुत है। आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनायें।
कारनामों का दहन 17.03.2022 4:09
बुराई पर अच्छाई की जीत के इस पर्व पर प्रस्तुत है हमारी कविता " कारनामों का दहन " जिसमें मन के कुत्सित विकारों को भस्म करके मन पर विजय पाने की परिकल्पना की गई है।
युद्ध 02.03.2022 3:44
युद्ध मानव जीवन के लिए अभिशाप है। इससे किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। यह राजनेताओं की व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा का परिणाम है। इसकी विभीषिका आम जन को झेलनी पड़ती है। आइए आम जन की पीड़ा को व्यक्त करने वाली हमारी कविता "युद्ध" की विभीषिका को सुनकर महसूस करते हैं।
लोकतंत्र का महापर्व 25.02.2022 4:38
उत्तर प्रदेश में इस समय चुनावी बयार बह रही है। गलियों और चौराहों पर मतदाताओं में चर्चा का केन्द्र बिन्दु है किस क्षेत्र से किस पार्टी से किस जाति का प्रत्याशी खड़ा है। कहाॅ क्या बॅट रहा है, कहाँ दावतें हो रही हैं। नेता जी व्यक्तिगत सभी लोगों से आशीर्वाद लेने के लिए सबसे मिल रहे हैं। आइये इसी परिदृश्य का आनन्द लेते हैं हमारी कविता " लोकतंत्र का महापर्व " से।
नियतता और परिवर्तन 15.02.2022 4:44
सामान्य अर्थों में हम नियतता और परिवर्तन को विपरीत अवधारणायें मानते हैं। इन अवधारणाओं पर अगर हम समग्र रूप से दृष्टिपात करें तो हमें ये एक दूसरे के पूरक लगते हैं। संसार सागर में सब कुछ नियत है, यहाँ तक कि परिवर्तन भी नियत है।
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