Siva Prasad
Gita Acharan
Bhagavad Gita is a conversation between Lord Krishna and Warrior Arjun. The Gita is Lord's guidance to humanity to be joyful and attain moksha (salvation) which is the ultimate freedom from all the polarities of the physical world. He shows many paths which can be adopted based on one's nature and conditioning. This podcast is an attempt to interpret the Gita using the context of present times. Siva Prasad is an Indian Administrative Service (IAS) officer. This podcast is the result of understanding the Gita by observing self and lives of people for more than 25 years, being in public life.
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Autor
Siva Prasad
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27 paź 2026
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Odcinki
200. आत्मा शरीर को प्रकाश देती है 16.11.2025 3:52
श्रीकृष्ण कहते हैं, "जिस प्रकार से एक सूर्य समस्त ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता है उसी प्रकार से आत्मा चेतना शक्ति के साथ पूरे शरीर को प्रकाशित करती है" (13.34)। शरीर में जीवन लाने के लिए आत्मा की आवश्यकता होती है। यह बिजली की तरह है जो उपकरणों में जीवन लाती है। गीता के तेरहवें अध्याय का शीर्षक 'क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग' है जहां श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि भौतिक शरीर को क्षेत...
199. एक जड़ एक मूल 10.11.2025 3:50
श्रीकृष्ण कहते हैं, "जब वे विविध प्रकार के प्राणियों को एक ही परम शक्ति परमात्मा में स्थित देखते हैं और उन सबको उसी से जन्मा समझते हैं तब वे ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त करते हैं" (13.31)। समसामयिक वैज्ञानिक समझ के अनुसार ब्रह्माण्ड लगभग 14 अरब वर्ष पूर्व एक बिन्दु से प्रारम्भ हुआ और आज भी विस्तारित हो रहा है। विस्तार की इस प्रक्रिया से बड़ी संख्या में तारे और ग्रह बने। इसने विभिन्न प्रकार के...
119. చైతన్యం, కరుణల పొందిక 04.11.2025 3:51
ఈ భూలోకంలో జ్ఞానోదయం పొందిన ప్రతి వ్యక్తి చేసిన బోధనల సారాంశమూ సమానత్వమే. పదములు, భాషలు మరియుపద్ధతులలో తేడా ఉండవచ్చు కానీ సమత్వము సాధించుటమే ప్రతి ఒక్కరి సందేశం యొక్క సారాంశము. దీనికి భిన్నంగా సాగిన ఏ ప్రభోధనమైనా, ఆచరణ అయినా మూఢత్వంతో కూడుకున్నది తప్ప మరోటి కాదు. మనస్సు విషయములో ఒక వైపు ఇంద్రియాలు మరియు మరొక వైపు బుద్ధి మధ్య సమతుల్యత సాధించడం. ఒకరుఇంద్రియాల వైపు మొగ్గితే కోరికల్లో మునిగిపోతాడు. మే...
198. हवा में महल 04.11.2025 3:54
श्रीकृष्ण कहते हैं, "जितने भी चर और अचर सृष्टि तुम्हें दिखाई दे रही हैं वे सब क्षेत्र और क्षेत्र के ज्ञाता का संयोग मात्र हैं (13.27)। जो परमात्मा को सभी जीवों में आत्मा के रूप में देखता है और जो इस नश्वर शरीर में दोनों को अविनाशी समझता है केवल वही वास्तव में देखता है" (13.28)। इसी तरह का वर्णन श्रीकृष्ण ने पहले भी किया था जहां उन्होंने 'सत्' को शाश्वत और 'असत्' को वह बता...
197. व्यक्तित्व पर मार्ग आधारित होता है 02.11.2025 3:55
द्रोणाचार्य धनुर्विद्या में निपुण थे जो अपने शिष्य अर्जुन को धनुर्विद्या सिखा रहे थे। एक और छात्र एकलव्य भी द्रोणाचार्य से सीखना चाहता था, जिन्होंने उसे शिक्षा देने से इनकार कर दिया। एकलव्य ने वापस लौटकर द्रोणाचार्य की एक मूर्ति स्थापित की और मूर्ति को वास्तविक गुरु मानकर धनुर्विद्या सीखी। कहा जाता है कि वह अर्जुन से भी श्रेष्ठ धनुर्धर निकला। यह कहानी गुरु-शिष्य के रिश्ते और ज्ञान प्राप्ति के क्षे...
118. పరివర్తనయే శాశ్వతము 24.10.2025 3:38
వ్యక్తీకరించబడిన అంటే భౌతిక ప్రపంచంలో, పరివర్తనం శాశ్వతము. అవ్యక్తమైన లేదా ఆత్మ ఎల్లప్పుడూ మార్పు లేకుండాఉంటుంది. ఈ రెండు రకాల వ్యవస్థల మధ్య సమన్వయం, సమతుల్యం సాధించటానికి ఓ పద్ధతి అవసరం. ఈ పధ్ధతి ఓ స్థిరమైన కేంద్రంను ఆధారం చేసుకుని చక్రం తిరగడానికి బాల్ బేరింగ్ వ్యవస్థ తీసుకొనివచ్చే సమన్వయము లాంటిది. ఈ పద్ధతికి మరో ఉదాహరణ ఏమిటంటే కారులో ఉండే గేరు బాక్స్. అది కారు, ఇంజనుల వేర్వేరు వేగాల మధ్య సమన...
196. एकता ही मुक्ति है 24.10.2025 4:03
श्रीकृष्ण कहते हैं, "इस शरीर में स्थित पुरुष को साक्षी (दृष्टा),अनुमन्ता, भर्ता, भोक्ता, महेश्वर और परमात्मा भी कहा जाता है'' (13.23)। इस जटिलता को समझने के लिए आकाश सबसे अच्छा उदाहरण है। इसे इसके स्वरूप के आधार पर अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है जैसे एक कमरा, एक घर, एक बर्तन आदि। मूलतः, आकाश एक है और बाकी इसकी अभिव्यक्तियां हैं। श्रीकृष्ण आश्वासन देते हैं, "वे जो परमात्मा, जीवात...
195. प्रकृति और पुरुष 14.10.2025 3:50
श्रीकृष्ण कहते हैं, "जान लो कि प्रकृति और पुरुष दोनों अनादि हैं। तीनों गुण और शरीर में होने वाले विकार (विकास या परिवर्तन) प्रकृति से पैदा होते हैं (13.20)। प्रकृति कारण और प्रभाव के लिए जिम्मेदार है, पुरुष सुख और दुःख के अनुभव के लिए जिम्मेदार है (13.21)। प्रकृति के प्रभाव में, पुरुष गुणों का अनुभव करता रहता है। गुणों के प्रति आसक्ति ही विभिन्न योनियों में जन्म का कारण है" (13.22)। परि...
117. నిగ్రహము అనే కళ 03.10.2025 3:19
మన మెదడు ఓక అద్భుతమైన అవయవం. దానికున్న ఓక ముఖ్యమైన లక్షణం ఏమిటంటే దానికి నొప్పి ఏమిటో తెలీదు ఎందుకంటే నొప్పిని గురించి మెదడుకు సూచనలు పంపే నోసిసెప్టార్లు మెదడులో ఉండవు. న్యూరో సర్జన్లు ఈ లక్షణాన్ని ఉపయోగించి మనిషి మేలుకొని ఉన్నప్పుడు మెదడు యొక్క శస్త్రచికిత్స చేస్తారు. శారీరక నొప్పులు మరియు ఆహ్లాదాలు మన మెదడు యొక్క తటస్థ స్థితితో పోల్చడం వలన కలిగే అనుభవాలు. అలాగేమానసిక భావాలకు కూడా ఇదే వర్తిస్తుంద...
194. परमात्मा सभी के दिलों में बसते हैं 03.10.2025 3:53
श्रीकृष्ण कहते हैं, "परमात्मा सबका पालनकर्ता, संहारक और सभी जीवों का जनक है। वे अविभाज्य हैं, फिर भी सभी जीवित प्राणियों में विभाजित प्रतीत होते हैं (13.17)। वे समस्त प्रकाशमयी पदार्थों के प्रकाश स्रोत हैं, वे सभी प्रकार की अज्ञानता के अंधकार से परे हैं। वे ज्ञान हैं, वे ज्ञान का विषय हैं और ज्ञान का लक्ष्य हैं। वे सभी जीवों के हृदय में निवास करते हैं (13.18)। इसे जानकर मेरे भक्त मेरी दिव्य प...
116. ఆధ్యాత్మికతకు సులభమైన మార్గం 26.09.2025 3:49
ఆధ్యాత్మిక మార్గం గురించి ఒక సాధారణ భావన ఏమిటంటే దానిని అనుసరించడం కష్టతరమైనది. అందువలననే, చిన్న ప్రయత్నాల ద్వారా కర్మయోగంలో పెద్ద లాభాలను పొందగలమని శ్రీకృష్ణుడు ఇంతకుముందు హామీ ఇచ్చారు(2.40). దీనిని మరింత సులభతరం చేస్తూ శ్రీకృష్ణుడు ఈ విధముగా చెప్పారు, "ఆహారవిహారాదులయందును, కర్మాచరణముల యందును, జాగ్రత్స్వప్నాదుల యందును, యథాయోగ్యముగా ప్రవర్తించు వానికి దుఃఖనాశకమగు ధ్యాన యోగము సిద్ధించును"...
193. पास होकर भी दूर 26.09.2025 3:57
एक बार एक पिता अपने दस साल के बेटे को खेल के मैदान में ले गया। उसने एक गेंद फेंकी और खेल का नियम यह था कि लड़के को गेंद वापस लाकर अपने पिता को देना है। मैदान खिलौनों से भरा था। रास्ते में, लड़के का ध्यान एक खिलौने की तरफ आकर्षित होता है और वह उसके साथ खेलना शुरू कर देता है। तब उसके पिता उसे गेंद के बारे में याद दिलाने के लिए आवाज लगाते हैं। वह खिलौने को छोड़कर फिर से गेंद के पीछे दौड़ना शुरू कर दे...
192. ‘वह’ हैं भी और नहीं भी 18.09.2025 4:16
जीवित रहने के लिए जिज्ञासा आवश्यक है। वर्त्तमान के संदर्भ में,अपने व्यावसायिक और व्यक्तिगत जीवन में अद्यतन (up-to-date)रहने की उम्मीद की जाती है। अर्जुन प्रश्न करते हैं कि क्या जानने योग्य है (13.1)। इसके बारे में, श्रीकृष्ण ने पहले उल्लेख किया था कि "जब 'उसे'जान लेते हैं तो जानने के लिए कुछ भी नहीं बचता" (7.2)। श्रीकृष्ण कहते हैं, "जो जाननेयोग्य है तथा जिसको जानकर मनुष्य...
115. ధ్యాన విధానము 18.09.2025 3:28
శ్రీకృష్ణుడు, మీరు మీ స్వంత మిత్రుడు లేదా మీ స్వంతశత్రువు అని చెప్పారు (6.6). మన స్వంత స్నేహితుడిగా మారడానికి ఇంద్రియాలను నియంత్రించడం ద్వారా (6.8) సుఖ-దుఃఖ భావాల పట్ల (6.7), బంగారు-రాయి వంటి వస్తువుల పట్ల (6.8) మరియు స్నేహితులు-శత్రువుల వంటి వ్యక్తుల పట్ల (6.9),సమానత్వ భావముతో ఉండాలని శ్రీకృష్ణుడు సూచించారు. దీనితోపాటు ధ్యాన మార్గమును కూడా అనుసరించవచ్చని శ్రీకృష్ణుడు చెప్పారు (6.10-6.15). శ్రీకృష...
114. అతిని విసర్జించాలి 13.09.2025 3:40
శ్రీకృష్ణుడు బంగారం, రాయి మరియు మట్టిని సమదృష్టితో చూడమని చెప్పిన తర్వాత (6.8), అయన ఈ సమత్వాన్ని గురించి మరింత విస్తారంగా ఇలా చెప్పారు, "సుహృదులయందును, మిత్రులయందును, శత్రువులయందును, ఉదాసీనులయందును, మధ్యస్థుల యందును, ద్వేషింపదగినవారి యందును, బంధువుల యందును, ధర్మాత్ములయందును, పాపులయందును, సమబుద్ధి కలిగియుండువాడు మిక్కిలి శ్రేష్ఠుడు" (6.9). శ్రీకృష్ణుడు బాహ్య విషయాలను, పరిస్థితులను సమదృష్ట...
191. आध्यात्मिक होना 13.09.2025 4:01
ज्ञान के बारे में अर्जुन के अनुरोध के जवाब में श्रीकृष्ण कहते हैं, "विनम्रता, दम्भहीनता, अहिंसा, क्षमा, मन-वाणी आदि की सरलता, गुरु की सेवा,पवित्रता, दृढ़ता, आत्मसंयम (13.8); इंद्रिय विषयों के प्रति वैराग्य, अहंकार रहित होना, जन्म, रोग, बुढ़ापा और मृत्यु के दोषों की अनुभूति (13.9); अनासक्ति, सन्तान, स्त्री, घर या धन आदि वस्तुओं की ममता से मुक्ति, प्रिय और अप्रिय प्राप्ति में सदा ही शाश्वत समभा...
180. साकार या निराकार 26.06.2025 3:56
भगवद गीता के ग्यारहवें अध्याय के अंत में (11.55), श्रीकृष्ण कहते हैं कि उन तक केवल भक्ति के माध्यम से ही पहुंचा जा सकता है। इस प्रकार, भगवद गीता के श्रद्धेय बारहवें अध्याय को भक्ति योग कहा जाता है। श्रीकृष्ण के विश्वरूप को देखकर अर्जुन भयभीत हो गए और उन्होंने पूछा, "आपके साकार रूप पर दृढ़तापूर्वक निरन्तर समर्पित होने वालों को या आपके अव्यक्त निराकार रूप की आराधना करने वालों में से आप किसे योग...
179. बदलते लक्ष्य 20.06.2025 3:49
मानसिक अस्पताल में काम करने वाला एक डॉक्टर अपने एक दोस्त को अस्पताल दिखाने ले गया। उसके दोस्त ने एक कमरे में एक आदमी को एक महिला की तस्वीर के साथ देखा और डॉक्टर ने बताया कि वह आदमी उस महिला से प्यार करता था और जब वह उससे शादी नहीं कर सका तो मानसिक रूप से अस्थिर हो गया। अगले कमरे में, उसी महिला की तस्वीर के साथ एक और आदमी था और डॉक्टर ने बताया कि उससे शादी करने के बाद वह मानसिक रूप से अस्थिर हो गया...
178. नफरत ही दुर्गति है 14.06.2025 3:40
श्रीकृष्ण कहते हैं, "मेरे इस विराट रूप को तुमसे पहले किसी ने नहीं देखा है (11.47)। मेरा यह विराट रूप न तो वेदों के अध्ययन से, न यज्ञों से, न दान से,न कर्मकाण्डों से और न ही कठोर तपस्या से देखा जा सकता है (11.48)। भयमुक्त और प्रसन्नचित्त होकर मेरे इस पुरुषोत्तम रूप को फिर से देखो" (11.49)। श्रीकृष्ण अपने मानव स्वरूप में आ जाते हैं (11.50) और अर्जुन का चित्त स्थिर हो जाता है (11.51)। श्र...
177. रिश्तों में शालीनता 07.06.2025 4:03
अर्जुन ने भय से कांपते हुए अपने दोनों हाथों को जोड़कर श्रीकृष्ण को नमस्कार किया और इस प्रकार कहा (11.35), "संसार आपकी स्तुति में प्रसन्न और आनंदित है, राक्षस भयभीत होकर भाग रहे हैं और सिद्ध पुरुष आपको नमन कर रहे हैं (11.36) चूँकि आप ब्रह्मा की उत्पत्ति के कारण हैं, देवों के देव हैं, ब्रह्मांड के निवास हैं। आप अविनाशी हैं, व्यक्त और अव्यक्त से परे हैं, आप सर्वोच्च हैं (11.37)। आप ही सर्वज्ञाता...
176. मित्र से परमात्मा तक 30.05.2025 4:01
विभिन्न संस्कृतियाँ परमात्मा का वर्णन अलग-अलग तरीके से करती हैं। हमारी आस्था के आधार पर परमात्मा का स्वरूप बदलता रहता है। अगर परमात्मा हमारे सामने किसी अलग आकार या रूप में प्रकट होते हैं तो उन्हें पहचान पाना कठिन होगा। इसी तरह अर्जुन शुरू से श्रीकृष्ण के साथ मित्र की तरह व्यवहार कर रहे थे। जब तक अर्जुन ने विश्वरूप को नहीं देखा तब तक वह नहीं पहचान सके कि श्रीकृष्ण परमात्मा हैं। वह क्षमा मांगते हुए...
175. निमित्त-मात्र की विशेषताएं 23.05.2025 3:34
श्रीकृष्ण अर्जुन को भविष्य की एक झलक दिखाते हैं जहां योद्धा मौत के मुंह में प्रवेश कर रहे हैं और कहते हैं कि अर्जुन केवल एक निमित्तमात्र है। श्रीकृष्ण आगे स्पष्ट करते हैं कि अर्जुन के बिना भी, उनमें से कोई भी जीवित नहीं रहेगा और इसलिए उसे तनाव मुक्त होकर लड़ना चाहिए। 'इंद्रिय केंद्रित' अहंकार से 'परमात्मा केंद्रित' निमित्तमात्र तक की यात्रा कठिन है। स्वाभाविक प्रश्न हैं कि इसे कैस...
129. ਪ੍ਰਮਾਤਮਾ ‘ਪਾਸਾ’ ਖੇਡਦਾ ਹੈ 14.05.2025 4:15
ਬ੍ਰਹਮੰਡ ਦੇ ਨਿਰਮਾਣ ਦੇ ਸ਼ੁਰੂਆਤੀ ਦੌਰ ਵਿੱਚ ਇਹ ਸਿਰਫ ਊਰਜਾ ਸੀ ਅਤੇਇਸ ਨੇ ਬਾਦ ਵਿੱਚ ਪਦਾਰਥ ਦਾ ਰੂਪ ਧਾਰਨ ਕੀਤਾ। ਵਿਗਿਆਨਕ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਇਹ ਸਵੀਕਾਰ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਕਿ ਬ੍ਰਹਮੰਡ ਵਿੱਚ ਤਾਪਮਾਨ, ਘਣਤਾ ਅਤੇ ਮੈਟਰ-ਐਂਟੀਮੈਟਰ ਦੇ ਅਨੁਪਾਤ ਵਿੱਚ ਸੂਖਮ (ਕਵਾਂਟਮ) ਭਿੰਨਤਾ ਸੀ ਅਤੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਭਿੰਨਤਾਵਾਂ ਦਾ ਕੋਈ ਵਿਗਿਆਨਕ ਕਾਰਨ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਇਹ ਪ੍ਰਸਥਿਤੀਆਂ ਹੀ ਪਦਾਰਥ ਦੇ ਨਿਰਮਾਣ ਲਈ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰ ਹਨ ਅਤੇ ਵਿਗਿਆਨ ਇਸ ਗੱਲ ਨਾਲ ਸਹਿਮਤ ਹੈ ਕਿ ਅੱਜ ਅਸੀਂ ਆਪਣੇ ਚਾਰੇ ਪਾਸੇ ਜੋ ਵਿੰਭਨਤਾਵਾਂ ਵੇਖਦੇ ਹ...
174. निमित्त-मात्र निष्क्रियता नहीं है 14.05.2025 3:43
अर्जुन देखता है कि सभी योद्धा श्रीकृष्ण के विश्वरूप के दांतों से चूर्ण हो रहे हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ये सभी योद्धा मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं और तुम केवल निमित्त-मात्र हो (11.33) और इसलिए व्यथित महसूस किए बिना युद्ध करो (11.34)। भले ही अर्जुन के शत्रु उनके द्वारा पहले ही मारे जा चुके हों, फिर भी श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध छोड़ने के लिए नहीं कहा। इसके बजाय, वह उसे बिना तनाव के लड़ने के लिए...
128. ਹਰ ਅੰਤ ਇਕ ਸ਼ੁਰੂਆਤ ਹੰੁਦਾ ਹੈ 04.05.2025 4:26
ਸ੍ਰੀ ਕਿ੍ਰਸ਼ਨ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ, ‘‘ਮੈਂ ਤੈਨੂੰ ਗਿਆਨ ਤੇ ਬੁੱਧੀ (ਸਿਆਣਪ) ਦੇ ਬਾਰੇ ਵਿੱਚਸਮਝਾਵਾਂਗਾ। ਜਦੋਂ ਤੂੰ ਇਸ ਨੂੰ ਸਮਝ ਜਾਵੇਂਗਾ ਤਾਂ ਇਸ ਤੋਂ ਅੱਗੇ ਇਸ ਸੰਸਾਰ ਵਿੱਚ ਸਮਝਣ ਯੋਗ ਕੁਝ ਵੀ ਨਹੀਂ ਰਹਿੰਦਾ’’ (7.2)। ਗਿਆਨ ਤੇ ਬੁੱਧੀ ਹੀ ਇਕ ਉਹ ਮਾਰਗ ਹੈ ਜਿਹੜਾ ਮਨ ਨੂੰ ਜਿੱਤਣ ਵਾਲੇ ਭਗਤ ਲੋਕਾਂ ਲਈ ਢੁਕਵਾਂ ਹੈ। ਇਸ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਸ੍ਰੀ ਕਿ੍ਰਸ਼ਨ ਨੇ ਆਪਣੇ ਦਿਲ ਦੀ ਮੰਨਣ ਵਾਲੇ ਭਗਤ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ, ‘‘ਖੁਦ ਵਿੱਚ ਸਾਰੇ ਪ੍ਰਣੀਆਂ ਨੂੰ ਤੇ ਸਾਰੇ ਪ੍ਰਾਣੀਆਂ ਵਿੱਚ ਖੁਦ ਨੂੰ ਵੇਖਣ ਅਤੇ ਹਰ ਥਾਂ ਤੇ ਉਨ੍...
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