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Pratidin Ek Kavita

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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

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Epizódok

Camere Ki Aankh | Kalpana Manorama 01.11.2026

कैमरे की आँख । कल्पना मनोरमा कैमरे की आँख होती है शातिर कहते होंगे लोग सच्चे दुख कहाँ पकड़ पाती कैमरे की आँख वह तो खोखली मुस्कान में रह जाती है फँसकर दरअस्ल, कैमरे की आँख में बैठा है आदमी का दुःख जो बचाकर आँख कैमरे की हुँकारता है बेरहमी से जिसे देखकर भाग जाता है सुख, दुम दबाकर दर्द फिर सिलने लगता है पुराना गूदड़ मुस्कान सेल्फ़ी वाली रचती होगी अल्पनाएँ, अट्टालिकाओं पर भोज-पत्रों पर किंचित छू नहीं पा...

Mera Pata | Amrita Pritam 31.10.2026

मेरा पता | अमृता प्रीतम आज मैंने अपने घर का नम्बर मिटाया है और गली के माथे पर लगा गली का नाम हटाया है और हर सड़क की दिशा का नाम पोंछ दिया है पर अगर आपको मुझे ज़रूर पाना है तो हर देश के, हर शहर की, हर गली का द्वार खटखटाओ यह एक शाप है, यह एक वर है और जहाँ भी आज़ाद रूह की झलक पड़े  समझना वह मेरा घर है।

Thakna Bhi Lazmi Tha | Zafar Iqbal 30.10.2026

थकना भी लाज़मी था । ज़फ़र इक़बाल  थकना भी लाज़मी था कुछ काम करते करते कुछ और थक गया हूँ आराम करते करते अंदर सब आ गया है बाहर का भी अंधेरा ख़ुद रात हो गया हूँ मैं शाम करते करते ये उम्र थी ही ऐसी जैसी गुज़ार दी है बदनाम होते होते बदनाम करते करते फँसता नहीं परिंदा है भी इसी फ़ज़ा में तंग आ गया हूँ दिल को यूँ दाम* करते करते कुछ बे-ख़बर नहीं थे जो जानते हैं मुझ को मैं कूच कर रहा था बिसराम करते करते सर से...

Nazm | Zeeshan Sahil 29.10.2026

नज़्म | ज़ीशाल साहिल ज़िंदगी खो नहीं गई लेकिन ऐसा लगता है दिल के पास बहुत एक बे-नाम सी उदासी है एक बे-वज्ह सा अंधेरा है आग जलती नज़र नहीं आती रात ढलती नज़र नहीं आती रह गुज़र है मगर तिरी ख़्वाहिश राह चलती नज़र नहीं आती

Yeh Prithvi Kya Kewal Tumhari Hai ? | Gyanendrapati 28.10.2026

यह पृथ्वी क्या केवल तुम्हारी है।  ज्ञानेन्द्रपति एक शक्तिशाली राष्ट्र के सिरमौर! तुम्हारी उल्लसित कल्पनाओं में पृथ्वी तुम्हारी उँगलियों पर नाचता क्रीड़ा-कंदुक -ठीक वैसा जैसा 'दि ग्रेट डिक्टेटर' में चैपलिन  ने दिखाया था तुम उसे राष्ट्र की शक्ति-साधना कहते हो जब परमाणु बम के भूमिगत परीक्षण से फिर-फिर  थर्राते हो पृथ्वी की मिटटी-देह  पयस्वती पृथ्वी के मर्मस्थल में मारकर घूँसा विश्व-मानव-समुदाय में अप...

Prarthna | Arun Kumar Singh 27.10.2026

प्रार्थना।  अरुण कुमार सिंह मैंने नदी से कहा कि मेरे घर चलो  तो उसने एक बूँद दे दी।  मैं उसे हृथेली में लेकर घर चला आया  और अपने ग्लास में रखा।  ग्लास कुऑँ बन गया।  मैंने जंगल से कहा मेरे घर चलो  तो उसने एक पत्ती दे दी।  मैं उसे जेब में रखकर घर आ गया और गमले में बो दिया। अगले दिन उसमें जंगल उगाया।   मैंने आसमान से कहा मेरे घर चलो  तो उसने मुझसे कहा घर में खिड़की बना दो।  फिर मैंने हवा से कहा मेरे...

O Sheher | Jacinta Kerketta 26.10.2026

ओ शहर! | जसिंता केरकेट्टा भागते हुए छोड़कर अपना घर पुआल, मिट्टी और खपरे पूछते हैं अक्सर ओ शहर! क्या तुम कभी उजड़ते हो किसी विकास के नाम पर?

Abki Baar Lauta To | Kunwar Narayan 25.10.2026

अबकी बार लौटा तो । कुँवर नारायण अबकी बार लौटा तो बृहत्तर लौटूँगा चेहरे पर लगाए नोकदार मूँछें नहीं कमर में बाँधे लोहे की पूँछे नहीं जगह दूँगा साथ चल रहे लोगों को तरेर कर न देखूँगा उन्हें भूखी शेर-आँखों से अबकी अगर लौटा तो मनुष्यतर लौटूँगा घर से निकलते सड़कों पर चलते बसों पर चढ़ते ट्रेनें पकड़ते जगह बेजगह कुचला पड़ा पिद्दी-सा जानवर नहीं अगर बचा रहा तो कृतज्ञतर लौटूँगा अबकी बार लौटा तो हताहत नहीं सबक...

Kabhi Kabhi Yun Bhi Humne | Nida Fazli 24.10.2026

कभी कभी यूँ भी हम ने । निदा फ़ाज़ली कभी कभी यूँ भी हम ने अपने जी को बहलाया है जिन बातों को ख़ुद नहीं समझे औरों को समझाया है हम से पूछो इज़्ज़त वालों की इज़्ज़त का हाल कभी हम ने भी इक शहर में रह कर थोड़ा नाम कमाया है उस को भूले बरसों गुज़रे लेकिन आज न जाने क्यूँ आँगन में हँसते बच्चों को बे-कारन धमकाया है उस बस्ती से छुट कर यूँ तो हर चेहरे को याद किया जिस से थोड़ी सी अन-बन थी वो अक्सर याद आया है कोई म...

Main Dekh Raha Hun | Agyeya 23.10.2026

मैं देख रहा हूँ । अज्ञेय मैं देख रहा हूँ झरी फूल से पँखुरी - मैं देख रहा हूँ अपने को ही झरते। मैं चुप हूँ : वह मेरे भीतर वसंत गाता है।

Jism Kya Hai Rooh Tak | Adam Gondvi 22.10.2026

जिस्म क्या है रूह तक । अदम गोंडवी जिस्म क्या है रूह तक सब कुछ ख़ुलासा देखिये आप भी इस भीड़ में घुस कर तमाशा देखिये जो बदल सकती है इस पुलिया के मौसम का मिजाज़ उस युवा पीढ़ी के चेहरे की हताशा देखिये जल रहा है देश यह बहला रही है क़ौम को किस तरह अश्लील है कविता की भाषा देखिये मतस्यगंधा फिर कोई होगी किसी ऋषि का शिकार दूर तक फैला हुआ गहरा कुहासा देखिये

Yaad | Kailash Vajpeyi 21.10.2026

याद । कैलाश वाजपेयी जहाँ में नहीं गया उन सभी देशों के वे सारे फूल मैं जिनके नाम नहीं जानता जैसे वसंत की प्रतीक्षा किए बिना खिल-खिल गए हों।

Kal Raat | Nida Fazli 20.10.2026

कल रात । निदा फ़ाज़ली कल रात वो थका हुआ चुप चुप उदास उदास सुनता रहा सड़क से गुज़रती बसों का शोर पीपल का पत्ता टूट के दीवार ढा गया आंतों का दर्द नींद की परियों को खा गया झुँझला के उस ने चाँदी का दीपक बुझा दिया आकाश को समेट के नीचे गिरा दिया फैली हुई ज़मीं को धुएँ सा उड़ा दिया फिर कुछ नहीं न खेत, न मैदाँ, न रास्ते बस इक निगाह खिड़की की रंग-जालियाँ (बस तीन चार आने की दो चार गोलियां)

Wo Zamana Guzar Gaya Kab Ka | Javed Akhtar 19.10.2026

वो ज़माना गुज़र गया कब का । जावेद अख़्तर वो ज़माना गुज़र गया कब का था जो दीवाना मर गया कब का ढूँढता था जो इक नई दुनिया लूट के अपने घर गया कब का वो जो लाया था हम को दरिया तक पार अकेले उतर गया कब का उस का जो हाल है वही जाने अपना तो ज़ख़्म भर गया कब का ख़्वाब-दर-ख़्वाब था जो शीराज़ा अब कहाँ है बिखर गया कब का

Zinda Rahein To Kya Hai | Muneer Niyazi 18.10.2026

ज़िंदा रहें तो क्या है जो मर जाएँ हम तो क्या । मुनीर नियाज़ी ज़िंदा रहें तो क्या है जो मर जाए हम तो क्या।  दुनिया में ख़ामोशी से गुज़र जाए हम तो क्या।  हस्ती ही अपनी क्या है ज़माने के सामने, एक ख़्वाब हैं जहां में बिखर जाए हम तो क्या।  अब कौन मुंतज़िर (इंतज़ार करने वाला) है हमारे लिये वहाँ, शाम आ गई है लौट के घर जाएँ हम तो क्या।  दिल की ख़लिश तो साथ रहेगी तमाम उम्र, दरिया-ए-ग़म के पार उतर जाएँ हम...

Nayi Sanskriti | Doodhnath Singh 17.10.2026

नई संस्कृति । दूधनाथ सिंह आसमान में बसा हुआ नगर निर्वसन हवा को नींव में चुनवा कर, आपस में टकराते, जूझते मकान। बँधे हुए कुत्तों का मुँह नोचते व्यवसायी जूतों के तल्लों में सोना चिपकाए कंधों पर लादे— मसान। बेतहाशा भागती हुई भीड़ अमर-बेलि की काली लतरों पर, और दुहरे चुटीले अँधेरे में गुँथे हुए पीली रोशनी के बियाबान। ढेर-सा सवेरा—अलकतरे से पुती किवाड़ों की फटी सनद में पिरोया-सा। भीतर एक गाए गए मौसम, एक...

Maun | Arti Abodh 16.10.2026

मौन । आरती अबोध अर्धविकसित चेतना के बहेलिए ने अव्यक्त आकांक्षाओं के मेरे मृग की हत्या कर दी जिस संग मुझे मरने का सुख भोगना था उसके न होने का संताप मेरी आत्मा में उतर आया और इस तरह प्रेम में मेरी भाषा मौन बनकर बही।

Prem Ke Baare Mein Ek Shabd Nahi | Viren Dangwal 15.10.2026

प्रेम के बारे में एक शब्द नहीं । वीरेन डंगवाल शहद के बारे में मैं एक शब्द भी नहीं बोलूँगा वह जो बहुश्रुत संकलन था सहस्र पुष्प कोषों में संचित रहस्य रस का जो न पारदर्शी न ठोस न गाढ़ा न द्रव न जाने कब एक तर्जनी की पोर से चखी थी उसकी श्यानता गई नहीं अब भी वह काकु से तालु से जीभ के बीचों-बीच से आँखों की शीतलता में भी वही प्रेम के बारे में मैं एक शब्द भी नहीं बोलूँगा।

Ghar Ek Muktibodh-Numa Kavita Hai | Kumar Divyanshu Shekhar 14.10.2026

घर एक मुक्तिबोध-नुमा कविता है ।  कुमार दिव्यनशु शेखर   कुल जमा चार लोग रहते हैं छुट्टियों में गिनती कुछ बढ़ जाती है घर एक मुक्तिबोध-नुमा कविता है। अलग-अलग अँधेरे हिस्सो में  अपनी ही प्राणवायु के बीच साँय-साँय करते लोग जोड़ रहे हैं लेखा-जोखा―'अब तक क्या किया, जीवन क्या जिया!' एक लड़का है जिसकी दाढ़ी सफेद हो रही है मरम्मत करता रहता है पहिया वर्तमान का हर बार जिस पर भूत की कील उभर आती है धुरी में भविष्य...

Kharepan Ka Ehsaas | Kanhaiya Lal Nandan 13.10.2026

खारेपन का अहसास । कन्हैयालाल नंदन खारेपन का अहसास मुझे था पहले से पर विश्वासों का दोना सहसा बिछल गया कल, मेरा एक समंदर गहरा-गहरा सा मेरी आंखों के आगे उथला निकल गया।

Khut Jayein | Nilesh Raghuvanshi 12.10.2026

खुट जाएँ । नीलेश रघुवंशी  नए साल के आगमन पर पूछा गया सिंघाड़े बेचने वाली से नए साल के बारे में क्या सोचा है तुमने सिंघाड़े बेचती स्त्री ने कहा नए साल में हम खुट जाएँ खुट जाएँ मतलब.. खुट जाएँ मतलब खुट जाएँ याने हम मर जाएँ ही ही हा हा ही हा अरे अरे ए ऐसा नहीं कहते हँसी ठसक से सिंघाड़े वाली मुश्किल से जबरिया हँसी को रोकती बोली क्यों खुटने से डरते हो ??? हम तो रोज़ खुटते हैं…

Ek Baar | Rajula Shah 11.10.2026

एक बार । राजुला शाह बह जाने देना उड़ जाने देना अपने आप को एक बार तुम भी। गुब्बारे-सा हवा के बुलबुले-सा हल्का होगा तुम्हारा मन और कहीं भी जा सकेगा बिला रोक-टोक फिर- प्रेम से इन्तज़ार में इन्तज़ार से मौन में मौन से निपट शून्य में और तुम्हें लगेगा, सबसे ताकतवर हो तुम ऊपर और ऊपर और ऊपर उठते हुए....

Chandini | Ramvilas Sharma 10.10.2026

चाँदनी । रामविलास शर्मा चाँदी की झीनी चादर-सी फैली है वन पर चाँदनी। चाँदी का झूठा पानी है यह माह-पूस की चाँदनी। खेतों पर ओस-भरा कुहरा, कुहरे पर भीगी चाँदनी; आँखों में बादल-से आँसू, हँसती है उन पर चाँदनी। दु:ख की दनिया पर बुनती है माया के सपने चाँदनी। मीठी मुस्कान बिछाती है भीगी पलकों पर चाँदनी। लोहे की हथकड़ियों-सा दु:ख, सपनों-सी झूठी चाँदनी; लोहे से दु:ख को काटे क्या सपनों-सी मीठी चाँदनी। यह चाँद...

Parcham | Kumar Ambuj 09.10.2026

परचम।  कुमार अम्बुज  वहाँ एक फूल खिला हुआ है अकेला  कोई उसे छू भी नहीं रहा है  किसी सुबह शाम में वह झर जाएगा  लेकिन देखो, वह खिला हुआ है बारिश, धूल और यातनाओं को और ऋतुओं को  जज़्ब करते हुए  एक पत्थर भी है वहाँ किसी की प्रतीक्षा में  आसपास की हर चीज़ इशारा करती है  तालाब किनारे अँधेरी झाड़ियों में चमकते हैं जुगनू  दुर्दिनों के किनारे शब्द मुझे प्यास लग आयी है और यह सपना नहीं है  जैसे पेड़ की यह छा...

Buri Aurat Ke Sapnon Mein | Kailash Manhar 08.10.2026

बुरी औरत के सपनों में । कैलाश मनहर बुरी औरत के सपनों में नहीं होता पति और चरित्र और मर्यादाएँ बन्द खिड़कियों वाला पिंजरेनुमा घर बुरी औरत के सपनों में नहीं होती बदन को धरती बनाकर धान कुटवाने वाली निर्जीव सहन-शक्ति बचपन के प्रेम को भूल जाने वाला परिवार की प्रतिष्ठा के नाम का पाखण्ड-पर्व कभी नहीं होता बुरी औरत के सपनों में दुनियादारी के घुटते हुए अँधेरे की चहारदीवारी में आत्महत्या का अनायास आदर्श नही...

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